हमारी जीवनशक्ति, चेतना शक्ति बीज रूप से शरीर के नीचे के केंद्र यानी मूलाधार चक्र में सुप्त पड़ी है। इस दिव्य योग में मंत्र जप व साधना से वह जाग्रत होकर ऊध्र्वगामी होती है। ऊर्जा के इस ऊध्र्वगमन से शरीर में स्थित षट्नाड़ी चक्रों का वेधन होता है। इससे नाड़ी शोधन होकर स्वरों की पुष्टि और प्राणों की गति सामान्य होती है। साधक इस ऊर्जावान साधना से उत्तम स्वास्थ्य के साथ ही अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करता है। यही दिव्य ऊर्जा शरीर में रामजन्म है जिसे पर्व के रूप में रामनवमी को मनाया जाता है।
ऊर्जादायक अनुष्ठान
देवी भागवत, चतुर्वर्गचिंतामणि, कालोदय, मदनरत्न, निर्णयसिंधु आदि ग्रंथों के अनुसार नवरात्र में शक्ति जागृत रहती है। इस समय नवाह्न् पाठ को अश्वमेध यज्ञानुष्ठान के समान फल देने वाला माना गया है। महाभारत में आया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी यह अनुष्ठान किया था। महर्षि व्यास ने राजा जनमेजय को कलिकाल में नवदुर्गा पूजन श्रेष्ठ व सिद्धि प्रदाता बताया था। व्यास ने इन शक्तियों की स्थापना के उद्देश्य से ही मरकडेय पुराण की रचना की। नवरात्र की नौ देवियां हैं जिनकी क्रम से पूजा आराधना करनी चाहिए-
1. शैलपुत्री, 2. ब्रrाचारिणी, 3. चंद्रघंटा, 4. कुष्मांडा, 5. स्कंदमाता, 6. कात्यायिनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी और 9. सिद्धिदात्री।
सर्वप्रकारेण लाभ
भौतिक और आध्यात्मिक लाभ के लिए गायत्री महामंत्र का लघु अनुष्ठान भी करना चाहिए। रोजाना 27 माला करने से नौ दिन में लघु अनुष्ठान पूरा हो जाता है। रामचरित मानस, हनुमान चालीसा, रामरक्षास्तोत्र, सुदर्शन कवच, दैवीकवच आदि का पारायण भी सिद्धिदायक है। चार प्रकार के मंत्रों में साबर मंत्र सिद्धि के लिए, तांत्रिक मंत्र चमत्कार के लिए, बीजमंत्र ग्रहदोष निवारण व देव प्रसन्नता के लिए और वैदिक मंत्र आत्म शांति व आध्यात्मिक सिद्धि के लिए फलदायी होते हैं। अपने उद्देश्य के अनुसार इनका चयन कर सकते हैं।
अंतिम दिन साधना की पूर्णाहुति हवन के साथ करनी चाहिए। हवन में आहुति स्वयं के हित के साथ ही राष्ट्रहित का चिंतन करते हुए दें। अंत में कुमारीपूजा करनी चाहिए। यह नवरात्र का प्राण है। वस्त्रालंकार, गंध, पुष्प से कुमारियों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक उन्हें भोजन कराना चाहिए। दो साल की बालिका कुमारी, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छह साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शांभवी और नौ साल की दुर्गा कही जाती है।
अनुष्ठान विधि इस बार छह अप्रैल, रविवार को प्रतिपदा तिथि का क्षय हुआ है, फिर भी शास्त्र सम्मति से इस दिन अभिजित् मुहूर्त (12.04 से 12.54 बजे) में घट स्थापना करें। अखंड तेल का दीपक प्रज्वलित करें। स्नान के बाद धुले हुए वस्त्र धारण करें और कंबल के आसन पर ईशान कोण की ओर मुंह करके, सुखासन में बैठकर साधना करें। साधना में रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहनी चाहिए अन्यथा ऊर्जा का ऊध्र्वगमन नहीं होगा।
साधना में माला को कपड़े से ढंककर या गोमुखी में रखकर ही जाप करें अन्यथा जाप का फल नहीं मिलता है। रोजाना दिन में फलाहार या सादा सात्विक भोजन एक बार ही करें। नवरात्र में भूमि शयन करें और ब्रrाचर्य का पूर्ण पालन करे। साधना मौन व्रत के साथ, शांत चित्त से और मन में दृढ़ विश्वास के साथ करें। नवरात्र के अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद घट के जल को तुलसी में सींच दें व अन्य सामग्री को अच्छा चौघड़िया देखकर जल में प्रवाहित करें।
Monday, September 21, 2009
नवरात्र में श्री सरस्वती की उपासना - प्रो. शुकदेव
वैदिक ज्योतिष की गणना के अनुसार प्रतिवर्ष चार नवरात्र होते हैं। इनमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वासंतिक नवरात्र, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्र, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र एवं माघ शुक्ल प्रतिपदा से पुन: गुप्त नवरात्र होता है। शाक्त आगमों के अनुसार ये चारों नवरात्र साधकों के लिए अमोघ फलदायी होते हैं।
वासंतिक नवरात्र का महत्व
वैसे तो चारों नवरात्र साधना के महापर्व होते हैं किंतु इनमें चैत्र मास का वासंतिक नवरात्र देवी-देवताओं के दिन के प्रात:काल में पड़ता है। इसलिए इसकी महिमा अपरंपार है। इस वासंतिक नवरात्र में मां सरस्वती की साधना विशेष फलदायी होती है। इस वर्ष वासंतिक नवरात्र 6 अप्रैल से 14 अप्रैल २क्क्८ के बीच पड़ रहा है। (कुछ स्थानों पर 7 अप्रैल से भी नवरात्र मान्य हैं) यह समय मां सरस्वती के उपासकों के लिए कामधेनु या कल्पवृक्ष के समान फलदायी है।
शक्ति एवं उसके रूप
मानव जीवन समस्या एवं संकटों से भरा है। कष्टों के दलदल में फंसे लोगों को मुक्ति पाने के लिए ‘आद्याशक्ति’ की उपासना सबसे विश्वसनीय उपाय है। वह आद्याशक्ति ‘एकमेव’ एवं ‘अद्वितीय’ होते हुए भी अपने साधकों को काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी एवं कमला - इन दशमहाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती है। वही जगतजननी शैलपुत्री, ब्रrाचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री, इन नवदुर्गाओं के रूप में भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करती है। तात्विक दृष्टि से उसके तीन रूप महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हैं।
बौद्धिक विकास के लिए साधना
‘बुद्धिर्यस्य बलतस्य’ जैसे कालजयी सिद्धांतों को निरूपित करने वाले आचार्यो के अनुसार मानवीय शक्तियों में बुद्धि सर्वोपरि है किंतु जब मनुष्य की बुद्धि विचलित या भ्रष्ट हो जाती है, तब वह दयनीय स्थिति में फंस जाता है। यह स्थिति उसके धैर्य या विश्वास के टूटने पर आती है। मानवमात्र के धैर्य एवं विश्वास को जाग्रत कर उसके बौद्धिक विकास के लिए मां सरस्वती की उपासना की परंपरा हमारे यहां प्राचीन काल से प्रचलित है। मां सरस्वती की कृपा से प्राप्त बुद्धि के बल पर मनुष्य विद्या, यश एवं धन सभी कुछ प्राप्त कर लेता है। इसीलिए दुर्गा सप्तशती में बुद्धि को देवी/शक्ति का रूप माना गया है, यथा ‘या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता’, अस्तु।
आज हमारे समाज के सभी वर्गो में तनाव, निराशा, आपाधापी एवं हड़बड़ी का बोलबाला है, जो लोगों के बौद्धिक विचलन का लक्षण है किंतु समाज के अन्य वर्गो की अपेक्षा युवा वर्ग इस समस्या से ज्यादा ग्रस्त है। मां सरस्वती की उपासना इस बीमारी की रामबाण औषधि है। इसलिए इस वासंतिक नवरात्र में छात्रों, बेरोजगार युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को मां सरस्वती की उपासना करनी चाहिए।
इस वासंतिक नवरात्र में छात्रों एवं युवाओं को अपनी परीक्षा, प्रवेश परीक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा, इंटरव्यू, काउंसलिंग एवं ग्रुप डिस्कशन आदि में सफलता के लिए जिन मंत्रों का अनुष्ठान करना चाहिए, वे इस प्रकार हैं :- परीक्षा, प्रवेश परीक्षा एवं प्रतियोगिता
परीक्षा के लिए
‘ú हृीं ऐं हृीं ú सरस्वत्यै नम:’
शोधछात्र एवं प्रोफेशनल कोर्सो के छात्रों के लिए
ú ऐं सरस्वत्यै सुबुद्धिं सिद्धिं कुरु स्वाहा’
इंटरव्यू, काउंसलिंग एवं ग्रुप डिस्कशन आदि के लिए
‘वद वद वाग्वादिनि स्वाहा’
माध्यमिक कक्षाओं के सामान्य छात्रों के लिए ‘ú ऐं सरस्वत्यै नम:’
अनुष्ठान विधिनित्य नियम से निवृत्त होकर सफेद धुले वस्त्र पहनें। आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर माथे पर चंदन या तिलक लगाएं। अपने सामने श्री सरस्वती का यंत्र/मूर्ति/चित्र स्थापित कर उसका षोडशोपचार या पंचोपचार (गंध, अक्षत, पुष्प, धूप एवं दीप) से पूजन कर मां सरस्वती का ध्यान करते हुए एकाग्रतापूर्वक मंत्र का जप करें।
अनुष्ठान के दिनों में एक समय फलाहार या सात्विक आहार लेना चाहिए। जप के बाद शारदा स्तोत्र, सिद्ध सारस्वत स्तोत्र या श्री सरस्वती सहस्त्रनाम आदि का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। वासंतिक नवरात्र में श्रद्धापूर्वक मां सरस्वती का पूजन, मनोयोगपूर्वक मंत्र का जप और आस्थापूर्वक पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
Sunday, September 20, 2009
बच्चे सुधारें आपके सितारे
बच्चे परिवार और राष्ट्र का भविष्य और उसका मुख्य आधार हैं। उन्हीं के कारण जीवन गुलजार होता है। वे भविष्य के राष्ट्र के निर्माता हैं। देश व विश्व की अमूल्य संपदा हैं। ग्रह हमारे जीवन व्यवहार से बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। बच्चों के प्रति हमारे अच्छे एवं बुरे व्यवहार का प्रभाव भी हमारे ग्रहों और उनसे प्राप्त होने वाले परिणामों पर पड़ता है। ज्योतिषीय दृष्टि में बाल रक्षा दिवस का अपना विशिष्ट महत्व है।
काल पुरुष की कुंडली में पांचवां घर संतान का माना गया है। सूर्य आत्मा और पिता का कारक ग्रह है। बच्चे, जिन्हें आत्मज कहा जाता है, उनके जोखिम भरे श्रम करने से सूर्य ग्रह कुपित हो उठता है। अत: आत्मा की प्रसन्नता हेतु बालकों की सुरक्षा व विकास कर उनका संरक्षण करना चाहिए।
जब हम बच्चों पर अन्याय करते हैं तो हमारी आत्मा (सूर्य) पर बोझ पड़ता है और न्यायाधीश गुरु नाराज होते हैं। गुरु भाग्य का ग्रह है, इसलिए भाग्य खराब होता है। बच्चों से श्रम करवाने पर शनि, गुरु व सूर्य की क्रूरता भी झेलनी पड़ सकती है।
बच्चों से अनावश्यक कार्य करवाने से शनि, जो आध्यात्म के भी स्वामी हैं, वे दर-दर भटकाते हैं। बच्चों को कष्ट पहुंचाने से भगवान रुष्ट हो जाते हैं। बच्चों को संरक्षण व सहयोग देने से भगवान के साथ कुण्डली के कई भावों के ग्रह भी प्रसन्न होते हैं।
सूर्य जो आत्मा व पिता का कारक ग्रह है, गुरु जो संतान की इच्छा पूरी करता है, वह और शनि बच्चों के संरक्षण व सहयोग से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
बाल सुरक्षा दिवस के अवसर पर बच्चों की आर्थिक, शारीरिक व नैतिक मदद कर उनकी रक्षा में योगदान दें। आत्म तत्व सूर्य, संतान तत्व गुरु तथा इच्छापूर्ति कारक शनि प्रसन्न हों तो अपना व राष्ट्र का भविष्य उज्जवल बन सकेगा।
काल पुरुष की कुंडली में पांचवां घर संतान का माना गया है। सूर्य आत्मा और पिता का कारक ग्रह है। बच्चे, जिन्हें आत्मज कहा जाता है, उनके जोखिम भरे श्रम करने से सूर्य ग्रह कुपित हो उठता है। अत: आत्मा की प्रसन्नता हेतु बालकों की सुरक्षा व विकास कर उनका संरक्षण करना चाहिए।
जब हम बच्चों पर अन्याय करते हैं तो हमारी आत्मा (सूर्य) पर बोझ पड़ता है और न्यायाधीश गुरु नाराज होते हैं। गुरु भाग्य का ग्रह है, इसलिए भाग्य खराब होता है। बच्चों से श्रम करवाने पर शनि, गुरु व सूर्य की क्रूरता भी झेलनी पड़ सकती है।
बच्चों से अनावश्यक कार्य करवाने से शनि, जो आध्यात्म के भी स्वामी हैं, वे दर-दर भटकाते हैं। बच्चों को कष्ट पहुंचाने से भगवान रुष्ट हो जाते हैं। बच्चों को संरक्षण व सहयोग देने से भगवान के साथ कुण्डली के कई भावों के ग्रह भी प्रसन्न होते हैं।
सूर्य जो आत्मा व पिता का कारक ग्रह है, गुरु जो संतान की इच्छा पूरी करता है, वह और शनि बच्चों के संरक्षण व सहयोग से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
बाल सुरक्षा दिवस के अवसर पर बच्चों की आर्थिक, शारीरिक व नैतिक मदद कर उनकी रक्षा में योगदान दें। आत्म तत्व सूर्य, संतान तत्व गुरु तथा इच्छापूर्ति कारक शनि प्रसन्न हों तो अपना व राष्ट्र का भविष्य उज्जवल बन सकेगा।
Tuesday, September 1, 2009
एक परिचय
नमस्कार!
ये ब्लॉग समर्पित है हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को। इस ब्लॉग में हम पोस्ट करेंगे ज्योतिष, वास्तु और धर्म से सम्बंधित रचनायें।
इस ब्लॉग का उद्देश्य है:
(१) हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना
(२) ज्योतिष-वास्तु एवं धर्म के बारे में लोगों को जागरूक करना ।
(३) ज्योतिष को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करना ।
आशा है आपको हमारा ये प्रयास पसंद आएगा।
धन्यवाद् सहित,
प्रबंधक
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धन्यवाद् सहित,
प्रबंधक
Friday, August 21, 2009
संतान सुख के लिए बृहस्पति को मनाएं
पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के जन्मदाता ब्रह्मा हैं, जबकि लाल किताब के अनुसार बृहस्पति को सभी ग्रहों का गुरु और ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) को प्रतीक माना गया है, इसलिए संतान सुख को लेकर जन्म कुंडली में बृहस्पति की स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बृहस्पति की स्थिति शुभ है और वह पहले, पांचवें या नौवें भाव में है तो जातक को संतान सुख अवश्य मिलता है। दूसरी ओर बृहस्पति के पक्के घरों यानी 2, 5, 9 और 12वें स्थान में यदि उसके शत्रुग्रह जैसे- राहु, शुक्र या बुध बैठे हों या बृहस्पति के साथ हों तो वे ग्रह शुभ प्रभाव पैदा करने वाली बृहस्पति की शक्ति क्षीण कर देते हैं। मंगल, चंद्र और सूर्य की युति से बृहस्पति का प्रभाव संतान के मामले में शुभ हो जाता है। यदि किसी की कुंडली के पांचवें भाव में बृहस्पति हो और बृहस्पतिवार को ही घर में पुत्र हो तो यह पुत्र जातक के भाग्य को जगा देता है। इसके विपरीत बृहस्पति के नौवें और इनके दुश्मन ग्रह-राहु, बुध या शुक्र के पांचवें घर में होने से संतान की ओर से माता-पिता को कष्ट मिलता है।
संतान के कारक ग्रह
लाल किताब के अनुसार केतु पुत्र तथा बुध कन्या संतान के कारक हैं। यदि संतान गर्भ में है तो उसकी सलामती जानने के लिए चंद्रमा की स्थिति देखना जरूरी है। यदि केतु की स्थिति उत्तम हो तो पुत्र प्राप्ति का योग बनता है और यदि बुध बलवान है तो पुत्री की प्राप्ति संभव है। जन्म कुंडली में केतु का आठवें या ग्यारहवें भाव में होना भी संतान सुख में बाधक होता है। आठवें भाव में केतु होने पर मंदिर या अपने कुलपुरोहित को सोना, केसर या हल्दी का दान देना शुभ है। किसी धर्मस्थान पर जाकर सफेद और काले रंग के कंबल दान करने से भी केतु का दुष्प्रभाव दूर होता है। वर्षफल के अनुसार शनि जब पांचवें घर में आ जाए तो जातक को दस साबुत बादाम धर्मस्थान पर चढ़ाना चाहिए और उनमें से पांच बादाम वापस लाकर घर में रखना चाहिए। यह क्रिया लगातार पांच दिनों तक करें। इन बादामों को वर्ष समाप्त होने पर जल के तेज प्रवाह में बहा दें। इसी प्रकार जन्म कुंडली या वर्ष कुंडली में राहु पांचवें घर में हो तो संतान की सलामती के लिए चांदी का ठोस हाथी घर में रखें।
गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा
* गर्भवती स्त्री के बाजू पर लाल धागा बांधें और जन्म लेते ही यह धागा संतान को बांध दें। मां के बाजू पर नया लाल धागा बांधें। यह क्रिया ख्8 महीने तक दोहराएं।
* गणोश की रोज आराधना करें।
* बच्चे के जन्म से पहले या प्रसव के लिए अस्पताल जाते समय एक नए बर्तन में दूध और अन्य बर्तन में खांड भरवाकर गर्भवती स्त्री का हाथ छुआकर एक जगह रखवा दें। जब प्रसव हो जाए तब दूध से भरा बर्तन और खांड किसी धर्मस्थान को अर्पित कर दें। बर्तन वापस न लाएं। बर्तन जितना नया और उपयोगी होगा, वह उतना ही शुभ फलकारक होगा।
* यदि माता-पिता की कुंडली में मंगल छठे भाव में या शनि पांचवें या शुक्र और बुध दोनों पांचवें भाव में हों तो इन ग्रह स्थितियों में संतान के जन्म पर मीठे के बजाय नमक से बनी खाने की वस्तु बतौर शगुन बांटें।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बृहस्पति की स्थिति शुभ है और वह पहले, पांचवें या नौवें भाव में है तो जातक को संतान सुख अवश्य मिलता है। दूसरी ओर बृहस्पति के पक्के घरों यानी 2, 5, 9 और 12वें स्थान में यदि उसके शत्रुग्रह जैसे- राहु, शुक्र या बुध बैठे हों या बृहस्पति के साथ हों तो वे ग्रह शुभ प्रभाव पैदा करने वाली बृहस्पति की शक्ति क्षीण कर देते हैं। मंगल, चंद्र और सूर्य की युति से बृहस्पति का प्रभाव संतान के मामले में शुभ हो जाता है। यदि किसी की कुंडली के पांचवें भाव में बृहस्पति हो और बृहस्पतिवार को ही घर में पुत्र हो तो यह पुत्र जातक के भाग्य को जगा देता है। इसके विपरीत बृहस्पति के नौवें और इनके दुश्मन ग्रह-राहु, बुध या शुक्र के पांचवें घर में होने से संतान की ओर से माता-पिता को कष्ट मिलता है।
संतान के कारक ग्रह
लाल किताब के अनुसार केतु पुत्र तथा बुध कन्या संतान के कारक हैं। यदि संतान गर्भ में है तो उसकी सलामती जानने के लिए चंद्रमा की स्थिति देखना जरूरी है। यदि केतु की स्थिति उत्तम हो तो पुत्र प्राप्ति का योग बनता है और यदि बुध बलवान है तो पुत्री की प्राप्ति संभव है। जन्म कुंडली में केतु का आठवें या ग्यारहवें भाव में होना भी संतान सुख में बाधक होता है। आठवें भाव में केतु होने पर मंदिर या अपने कुलपुरोहित को सोना, केसर या हल्दी का दान देना शुभ है। किसी धर्मस्थान पर जाकर सफेद और काले रंग के कंबल दान करने से भी केतु का दुष्प्रभाव दूर होता है। वर्षफल के अनुसार शनि जब पांचवें घर में आ जाए तो जातक को दस साबुत बादाम धर्मस्थान पर चढ़ाना चाहिए और उनमें से पांच बादाम वापस लाकर घर में रखना चाहिए। यह क्रिया लगातार पांच दिनों तक करें। इन बादामों को वर्ष समाप्त होने पर जल के तेज प्रवाह में बहा दें। इसी प्रकार जन्म कुंडली या वर्ष कुंडली में राहु पांचवें घर में हो तो संतान की सलामती के लिए चांदी का ठोस हाथी घर में रखें।
गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा
* गर्भवती स्त्री के बाजू पर लाल धागा बांधें और जन्म लेते ही यह धागा संतान को बांध दें। मां के बाजू पर नया लाल धागा बांधें। यह क्रिया ख्8 महीने तक दोहराएं।
* गणोश की रोज आराधना करें।
* बच्चे के जन्म से पहले या प्रसव के लिए अस्पताल जाते समय एक नए बर्तन में दूध और अन्य बर्तन में खांड भरवाकर गर्भवती स्त्री का हाथ छुआकर एक जगह रखवा दें। जब प्रसव हो जाए तब दूध से भरा बर्तन और खांड किसी धर्मस्थान को अर्पित कर दें। बर्तन वापस न लाएं। बर्तन जितना नया और उपयोगी होगा, वह उतना ही शुभ फलकारक होगा।
* यदि माता-पिता की कुंडली में मंगल छठे भाव में या शनि पांचवें या शुक्र और बुध दोनों पांचवें भाव में हों तो इन ग्रह स्थितियों में संतान के जन्म पर मीठे के बजाय नमक से बनी खाने की वस्तु बतौर शगुन बांटें।
Tuesday, July 21, 2009
नागपाश से पितृ और सर्पदोष का नाश - पं. बाबूलाल जोशी
जन्मकुंडली के केंद्र में स्थित ग्रहों के कारण सर्प दोष, सप्तमेश के पाप कर्तरी दोष, पंचम भाव स्थित शनि की सप्तम भाव पर वक्र दृष्टि, सर्प अवज्ञा व पितृ दोष का शमन विवाह अवसर पर की जाने वाली नागपाश क्रिया से होता है। आधुनिकता की चकाचौंध में इस क्रिया का लोप हो रहा है। नागपाश एक सामान्य क्रिया है, लेकिन इसका असर सर्पमुख बंधन से भी हो जाता है।
मुहूर्त प्रकरण में नए घर के निर्माण, देवालय के आरंभ और जलाशय के निर्माण अवसर पर सूर्य राशि (संक्रांति) के आधार पर गृहारंभ राहु चक्र द्वारा सर्पमुख देखकर शुभारंभ के निर्देश हैं। इसी तरह विवाह अवसर पर सूर्य संक्रांति द्वारा निर्धारित दिशा से मंडप रोपण में चारों कोणों पर रखी जाने वाली चवरीया (कलश) पर क्रमश: ३,५,७ कलश भी निर्धारित कोण से स्थापित करें।
इन्हें विधिपूर्वक पूजते हुए मूंज की रस्सी (एक विशेष प्रकार की घास) से नाग पाश बनाकर उसी दिशा में कलश पर बांधें। विवाह अथवा विवाह के बाद उत्पन्न होने वाले दोष दूर करने का यह भी एक तरीका है।
राहु मुख (सर्प मुख) की जानकारी
वृश्चिक,धनु, मकर राहु मुख वायव्य कोण
कुंभ, मीन, मेष राहु मुख नैऋ त्य कोण
वृषभ, मिथुन, कर्क राहु मुख आग्नेय कोण
सिंह, कन्या, तुला राहु मुख ईशान कोण
नागपाश लगाने की विधि किसानों व पशुपालकों से सीखी जा सकती है। यह एक सामान्य विधि है, जिसमें गांठ सामान्य व्यक्ति के द्वारा सरलता से नहीं खोली नहीं जा सकती। ऊर्जा संचार के साथ नक्षत्रों के मंत्रों द्वारा इसे पुष्ट किया जाता है ताकि विवाह अवसर का गठबंधन सुरक्षित रह सके।
मुहूर्त प्रकरण में नए घर के निर्माण, देवालय के आरंभ और जलाशय के निर्माण अवसर पर सूर्य राशि (संक्रांति) के आधार पर गृहारंभ राहु चक्र द्वारा सर्पमुख देखकर शुभारंभ के निर्देश हैं। इसी तरह विवाह अवसर पर सूर्य संक्रांति द्वारा निर्धारित दिशा से मंडप रोपण में चारों कोणों पर रखी जाने वाली चवरीया (कलश) पर क्रमश: ३,५,७ कलश भी निर्धारित कोण से स्थापित करें।
इन्हें विधिपूर्वक पूजते हुए मूंज की रस्सी (एक विशेष प्रकार की घास) से नाग पाश बनाकर उसी दिशा में कलश पर बांधें। विवाह अथवा विवाह के बाद उत्पन्न होने वाले दोष दूर करने का यह भी एक तरीका है।
राहु मुख (सर्प मुख) की जानकारी
वृश्चिक,धनु, मकर राहु मुख वायव्य कोण
कुंभ, मीन, मेष राहु मुख नैऋ त्य कोण
वृषभ, मिथुन, कर्क राहु मुख आग्नेय कोण
सिंह, कन्या, तुला राहु मुख ईशान कोण
नागपाश लगाने की विधि किसानों व पशुपालकों से सीखी जा सकती है। यह एक सामान्य विधि है, जिसमें गांठ सामान्य व्यक्ति के द्वारा सरलता से नहीं खोली नहीं जा सकती। ऊर्जा संचार के साथ नक्षत्रों के मंत्रों द्वारा इसे पुष्ट किया जाता है ताकि विवाह अवसर का गठबंधन सुरक्षित रह सके।
Saturday, June 20, 2009
तिलक का वैज्ञानिक आधार
ललाट पर तिलक धारण करने से मस्तिष्क को शांति और शीतलता मिलती है तथा बीटाएंडोरफिन और सेराटोनिन नामक रसायनों का स्राव संतुलित मात्रा में होने लगता है।
इन रसायनों की कमी से उदासीनता और निराशा के भाव पनपने लगते हैं अत: तिलक उदासीनता और निराशा से मुक्ति प्रदान करने में सहायक है। विभिन्न द्रव्यों से बने तिलक की उपयोगिता और महत्व अलग-अलग है।
चंदन का तिलक ताजगी लाता है और ज्ञान-तंतुओं की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कुमकुम का तिलक तेजस्विता प्रदान करता है। विशुद्ध मृत्तिका के तिलक से बुद्धि-वृद्धि और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
इन रसायनों की कमी से उदासीनता और निराशा के भाव पनपने लगते हैं अत: तिलक उदासीनता और निराशा से मुक्ति प्रदान करने में सहायक है। विभिन्न द्रव्यों से बने तिलक की उपयोगिता और महत्व अलग-अलग है।
चंदन का तिलक ताजगी लाता है और ज्ञान-तंतुओं की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कुमकुम का तिलक तेजस्विता प्रदान करता है। विशुद्ध मृत्तिका के तिलक से बुद्धि-वृद्धि और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
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