Sunday, November 15, 2009
सोमवती अमावस्या का महत्व
इस दिन सोमवती अमावस्या और मार्गशीर्ष संक्रांति एक साथ होने से तीर्थो पर स्नान, दान-जाप आदि का महात्म्य बढ़ जाता है। धर्मनिष्ठ लोग इस दिन व्रत का संकल्प लेकर अपने इष्टदेव एवं भगवान विष्णु एवं शिव पूजन करने से आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए पीपल वृक्ष की सफाई और गंगाजल युक्त दुग्ध से सींचकर धूप-दीप आदि से पूजन करके कम से कम 7 बार प्रदक्षिणा करना कल्याणकारी होगा।
सुबह संक्रांति की शुभ बेला में ब्राrाणों को दक्षिणा सहित भोजन, वस्त्र, फलों का दान करने का सुअवसर प्राप्त होगा। मार्गशीर्ष माह में पांच मंगलवार, राहु-केतु का राशि परिवर्तन और सूर्य के राशि परिवर्तन से विभिन्न राशियों के जातकों पर भिन्न-भिन्न असर पड़ेगा। ग्रहों का शुभ व अशुभ प्रभाव जीवन को पूर्ण प्रभावित करता है। ग्रह ईश्वर के प्रतिनिधि हैं जो जीवात्माओं के कर्म फल का भुगतान कर जीवात्मा को शुद्ध व पवित्र बनाने का कार्य करते हैं। ग्रहों द्वारा अशांति व अनिष्टों से छुटकारा पाने के लिए हमें ईश्वर ने कई अवसर प्रदान किए हैं। सोमवती अमावस्या एवं संक्रांति बेला एक साथ आकर यह सुअवसर प्रदान कर रही है।
सोमवती अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करके तुलसीजी, शंकर-पार्वतीजी की विधि-विधान सहित पूजा करके मां गौरी को सिंदूर चढ़ा श्रंगार की वस्तुएं श्रद्धापूर्वक भेंट करनी चाहिए। पूजा के बाद चढ़ाए हुए सिंदूर में से थोड़ा लेकर सुहागिनें अपनी मांग में भरकर मां पार्वतीजी से अखंड सुहाग एवं सौभाग्य के लिए प्रार्थना करें। यह पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ होता है। इस दिन व्रत करने वाले प्रात:काल उठकर स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पीपल वृक्ष के समीप जाकर उसकी जड़ सहित भगवान विष्णु का पूजन करें।
गोविंदजी के पूजन में पीले वस्त्र, अक्षत, फूल, फल तथा नैवेद्य इत्यादि पदार्थो का प्रयोग किया जाता है। इस समय कई प्रकार के रत्न, सोना, चांदी, हीरा-मोती मणियों को हाथ में लेकर भी पूजा की जाती है। यदि सामथ्र्य न हो तो फल, पुष्प, नैवेद्य, वस्त्रादि से तांबे का पात्र या एक सुपारी से भी 107 प्रदक्षिणा पूर्ण की जा सकती हैं। पूजा के समापन पर सभी वस्तुएं ब्राrाण को दान कर देनी चाहिए। इस प्रकार किए गए व्रत से कुंवारी कन्याओं को अच्छा वर एवं सुहागिन स्त्रियों को सुपुत्र एवं धन की प्राप्ति होती है।
मां गौरी को ऐसे करें प्रसन्न
विभिन्न राशियों के जातक कुछ उपयोगी उपाय करके ग्रहों की अशुभता को दूर कर सकते हैं। भगवान शिव-पार्वती व विष्णु की आराधना कर अखंड सौभाग्य एवं निरोगी काया प्राप्त करें।
मेष- मां पार्वती को लाल चुनरी व श्रंगार की वस्तुएं अर्पित करें। गुड़ व मसूर की दाल की पोटली बनाकर संध्या के समय किसी गरीब या भिखारी को दें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व पीले पुष्प अर्पित करें।
वृष- मां पार्वती को गुलाबी रंग की चुनरी भेंट करें। चांदी के लोटे में गंगाजल व तुलसी के पत्ते को डालकर भगवान विष्णु को जल अर्पण करें। सफेद चावल सफेद कपड़े में बांधकर एक पोटली सुबह किसी गरीब स्त्री को दान करें। सफेद बर्फी का भगवान विष्णु को भोग लगाएं।
मिथुन- मां पार्वती को हरे रंग की चुनरी और मेंहदी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला अर्पण करना शुभ होगा। मिश्री और इलायची का भोग लगाएं। पोटली में मूंग की दाल बांधकर प्रात:काल ब्राrाण को दान करें।
कर्क- मां पार्वती को लाल रंग की चुनरी और पीली चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को चंदन का टीका व पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। दूध और पोटली में चावल या चीनी का दान किसी ब्राrाणी को करें।
सिंह- सुनहरी या नारंगी रंग की चुनरी मां पार्वती को भेंट करें। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पण करें। बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। एक पोटली में गुड़ व गेहूं बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।
कन्या- मां गौरी को हरे रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला व पेठा भोग लगाएं। मिश्री और इलायची भी भेंट करें। हरी मूंग व पांच इलायची हरी पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।
तुला- मां गौरी को गुलाबी या आसमानी रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को मिश्री व तुलसी के पत्ते अर्पण करें। चावल व चीनी सफेद वस्त्र में बांधकर किसी महिला या ब्राrाणी को दान करें। बर्फी का भोग लगाकर पांच कन्याओं को प्रसाद भी दें।
वृश्चिक- मां गौरी को लाल या पीली चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। गुड़ व गेहूं एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प अर्पण करें।
धनु- मां गौरी को पीली चुनरी, लाल चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। पीली चने की दाल, हल्दी की गांठ, गुड़ पीले वस्त्र में बांधकर विद्वान ब्राrाण को दान करें ।
मकर- हरी चुनरी और मेंहदी मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व मिश्री भेंट करें। तुलसी की माला भेंट करें। उड़द की दाल व गुड़ पोटली में बांधकर किसी असहाय गरीब व्यक्ति को दान करें।
कुंभ- हरी चुनरी और हरी चूड़ियां मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला चढ़ाएं। बर्फी का भोग लगाएं। उड़द की दाल व गुड़ किसी गरीब भिखारी को दान करें।
मीन- मां गौरी को पीले या लाल रंग की चुनरी चढ़ाएं। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पित करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। पीली चने की दाल, गुड़ व हल्दी एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।
Saturday, October 24, 2009
सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव - डॉ. विनोद शास्त्री
भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे। माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।।
भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।
ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगोंे की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।
यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।
शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए। जो चतुर्दशी में पारणा करता है, वह समस्त तीर्थो के स्नान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिवरात्रि का उपवास नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं।
शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प अति प्रिय हैं। अत: पूजन में इनका उपयोग करें। जो इस व्रत को हमेशा करने में असमर्थ है, उन्हें इसे बारह या चौबीस वर्ष करना चाहिए। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।
Thursday, October 15, 2009
पंच महोत्सव दीपावली पर्व - पं. गौरव शर्मा
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। इस दिन भगवान धन्वन्तरि ने लोगों के दु:ख और रोगों को हरने के लिए आयुर्वेद की रचना की थी। यह दिन अतिशुभ है। कोई भी नया कार्य इस दिन प्रारंभ करें तो सफलता निश्चित ही मिलती है। यह अबूझ मुहूर्त है। इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, बर्तन खरीदने चाहिए।
रूपचौदस
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या रूपचौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व सुगंधित तेल से मालिश कर ठंडे जल से स्नान करना चाहिए। इससे मनुष्य स्वस्थ रहता है, जो स्त्रियां इस दिन सजती-संवरती हैं, उनको अगले जन्म में सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है। इस दिन तेल में लक्ष्मीजी का और जल में गंगा का वास रहता है। भगवान कृष्ण ने इस दिन नरकासुर का वध किया था। इस दिन अपने घर के बाहर या दक्षिण दिशा में चौमुखी दीपक जलाना चाहिए।
दीपावली
दीपावली को महानिशा और शुभ रात्रि माना गया है। इस रात में सूर्य और चंद्रमा की युति शुक्र की तुला राशि में होती है जो कि भौतिक सुखों और संपन्नता को प्रदान करती हैं। श्रीसूक्त और भविष्यपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी का वास बिल्ववृक्ष में माना गया है। दीपावली की रात के तीसरे और चौथे प्रहर में मंत्र और यंत्रों को सिद्ध करके संपन्नता प्राप्त की जा सकती है। लक्ष्मी पूजा स्थिर लग्न में ही करनी चाहिए।
गोवर्धन पूजा
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव होता है। सायंकाल मंदिरों में अन्नकूट महोत्सव होता है।
यम द्वितीया
यमद्वितीया भैया दूज के दिन पुरुषों को अपने घर भोजन न कर अपनी बहन के यहां भोजन करना चाहिए। इस दिन यमुना ने भी अपने भाई यमराज को घर पर बुलाकर भोजन कराया था। इस दिन यमुना में कच्च दूध, तिल और गंगा जल चढ़ाने से भाई-बहन के रिश्ते में अटूट प्रेम, मधुर संबंध बना रहता है। अगर बहन भाई को इस दिन भोजन कराती है तो उनके भाई की उम्र बढ़ती है। उन्हें धन-धान्य की प्राप्ति होती है। प्रात:काल चंद्रमा के दर्शन करने चाहिए।
दीपावली की रात्रि को निम्न उपाय करें
>> इस दिन श्रीयंत्र को स्थापित कर गन्ने के रस और अनार के रस से अभिषेक करके लक्ष्मी मंत्रों का जाप करें।
>> दीपावली की रात्रि को पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें। उसके दूर जाने की प्रतीक्षा करें। इससे आर्थिक संकट दूर होंगे।
>> लक्ष्मी पूजन के समय अपने बहीखातों व कलम-दवात का पूजन करना चाहिए।
>> दीपावली को रात्रि में हात्थाजोड़ी को सिंदूर में भरकर तिजोरी में रखने से धन में वृद्धि होती है।
>> सात गोमती चक्र और काली कोड़ियों को व्यापार वाले स्थान में रखने से निरंतर व्यापार में वृद्धि होती रहती है।
>> घर पर हमेशा बैठी हुई लक्ष्मीजी की और व्यापारिक स्थल पर खड़ी हुई लक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
>> लक्ष्मीजी को गन्ना, अनार, सीताफल अवश्य चढ़ाएं।
>> इस दिन पूजा स्थल में एकाक्षी नारियल की स्थापना करें। यह साक्षात लक्ष्मी का ही स्वरूप माना गया है। जिस घर में एकाक्षी नारियल की पूजा होती हो, वहां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।
>> दीपावली की रात्रि में श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र एवं गोपाल सहस्रनाम का पाठ करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
Sunday, October 11, 2009
समर्पण एवं भक्ति का मास - कार्तिक (पं. प्रहलाद कुमार)
मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन:। र्तीथ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ॥
अर्थात - भगवान विष्णु के सदृश्य ही कार्तिक मास श्रेष्ठ है। इस मास का महत्व पद्म पुराण, स्कन्द पुराण एवं अन्य पुराणों में विस्तार से लिखा गया है। इस माह में प्राय: सूर्य तुला राशि में रहते है और शीतकाल रहता है। अत: इस माह में पुरुष और स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ब्रrा मुहूर्त में उठकर जलाशय, नदी, तालाब आदि में स्नान कर भगवान राधा दमोदर की पूजा अर्चना करते है। शास्त्रों में कार्तिक मास के व्रत को मोक्ष प्रदान करने वाला मास माना गया है। इस समय के किए गए व्रत उपवास से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति बताई गई है।
कार्तिक मास के कर्म
व्रत एवं स्नान कार्तिक मास का स्नान व्रत करने वाले लोगों को अनेक प्रकार से संयम, नियम का पालन करना पड़ता है। संपूर्ण माह में व्रत और उपवास रखकर राधा दमोदर की पूजा की जाती है। इसमें व्रतोपवास करने से रोगों का विनाश होता है और प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती है। सद्बुद्धि प्राप्त करके मनुष्य दीघायरु एवं लक्ष्मी प्राप्त करता है।
दीपदान कार्तिक मास में व्रत उपवास रखने वाले साधक को प्रतिदिन दीप का दान करना चाहिए। तुलसी सेवा तुलसी का पौधा लगाना, तुलसी को जल सिंचन और तुलसी का सेवना निर्दिष्ट है। आयुर्वेद शास्त्र में भी तुलसी को एंटीबायटिक कहा गया है और इसके द्वारा पर्यावरण की शुद्धि होती है। भगवान को तुलसी पत्र और मंजरी अर्पण करने के साथ स्वयं भी तुलसी सेवन करने से व्यक्ति रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है। भगवान विष्णु को तुलसी अति प्रिय है।
भूमि पर शयन शास्त्र में उल्लेख है कि कार्तिक मास का व्रत करने वाले व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। इसके कारण एक ओर जहां मनुष्य शरीर में पृथ्वी तत्व की वृद्धि होती है वहीं भगवान के प्रति आस्थावान होकर व्यक्ति भय से मुक्त होता है।
ब्रrाचर्य का पालन तथा आहार पर नियंत्रण कार्तिक मास के नियमों के अंर्तगत ब्रrाचर्य का पालन करना नितांत आवश्यक है। साथ ही उड़द, मूंग, चना, मटर आदि द्वि-दल, दलहन एवं तेल आदि का परित्याग करना निर्देशित है। भगवान नाम का संकीर्तन करना और भगवान विष्णु की कथाओं का श्रवण करना श्रीमद्भगवदगीता, भागवत पुराण आदि का अध्ययन या श्रवण करना सत्य, अहिंसा पर चलकर धर्माचरण करना भी निर्देशित है। इस माह में पीपल, तुलसी, आंवला, गौ-पूजा, स्नान और गोवर्धन पूजा आदि का प्रावधान किया गया है।
जिसके कारण व्यक्ति इस लोक में धन ऐश्वर्य, बुद्धि, बल और यश प्राप्त करके अंत में मोक्ष प्राप्त करें। कार्तिक मास में काशी में निवास करके गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि व्रती को गंगा, विष्णु, शिव तथा सूर्य का स्मरण करके जल में प्रवेश कर नाभि पर्यंत जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। आंवला और काला तिल शरीर पर मलना चाहिए किंतु संन्यासियों को तुलसी के पौधें की जड़ में लगी हुई मृत्तिका लगाकार स्नान करना चाहिए। व्रत की समाप्ति पर पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करके बांस की टोकरी में अन्न और कांसे के पात्र में पुएं रखकर वस्त्र, स्वर्ण आदि का दान करना चाहिए।
कार्तिक मास के महत्वपूर्ण व्रतोत्सव
करवा चौथ, अहोई अष्टमी, गौवत्स द्वादशी, धन तेरस, गोत्रिरात्र व्रत, नरक चतरुदशी, दीपावली, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, यमद्वितीया, सूर्य षष्ठी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थापनी एकादशी, तुलसी विवाह, बैंकुंठ चतुर्दशी, विष्णु पंचक व्रत तथा कार्तिक पूर्णिमा। स्पष्ट है कि संपूर्ण कार्तिक मास में अनके महत्वपूर्ण व्रत एवं त्योहार संपन्न होते हैं। कार्तिक स्नान करने वाले व्रर्ती को प्रत्येक व्रत दिवस पर शास्त्र निर्धारित पद्धतियों के साथ व्रत का अनुशीलन करना चाहिये, जिससे व्रत के सहज फल प्राप्त होते हैं।
आप कैसी लक्ष्मी चाहते हैं - श्रीमती सविता
उसके आने के साथ ही उल्लू का आगमन भी घर में हो जाता है। फलस्वरूप उस व्यक्ति में तामसी प्रवृत्ति वाले दुगरुण भी आते हैं। जिस प्रकार उल्लू रात में जागता है एवं दिन में सोता है, ठीक उसी प्रकार वह भी देर से उठने एवं देर रात तक कार्य करने में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसे जातकों की संतान भी संस्कार विहीन हो जाती है। वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है कि अनैतिकता से प्राप्त की गई सफलता व समृद्धि लंबे समय तक साथ नहीं देती है।
लक्ष्मी की परिभाषा में आमजन केवल धन को ही मानते हैं जबकि लक्ष्मी आठ प्रकार की होती हैं - आद्य लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी, अमृत लक्ष्मी, काम लक्ष्मी, सत्य लक्ष्मी, भोग लक्ष्मी, योग लक्ष्मी। जैसा कि नाम से ही अर्थ स्पष्ट हो रहा है। ये सभी लक्षण लक्ष्मीवान के होते हैं अर्थात उपरोक्त में से एक भी लक्ष्मी व्यक्ति को समर्थ एवं सुखी बना सकती है।
अत: व्यक्ति को धन की चाह के बजाय आदर्श परिवार की ओर उन्मुख होना चाहिए ताकि जीवन में सभी सुख मिल सकें और वह उनका उपभोग भी कर सके। लक्ष्मी जी ने स्वयं कहा है - सत्य, दान, व्रत, तप, धर्म, पराक्रमी, सरल व्यक्ति के यहां मैं निवास करती हूं तथा जहां आलस्य, निद्रा, असंतोष, अधर्मी, संतान का पालन विधिवत न हो रहा हो, उस स्थान को मैं छोड़ देती हूं।
लक्ष्मी पानी की भांति चंचल होती हैं। फिर भी लक्ष्मी को स्थायी रूप से रोकने के लिए स्थायी प्रयास प्रतिवर्ष करने पड़ते हैं। दीपावली के दिन लक्ष्मीजी की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। शुभ मुहुर्त में एक कंबल के आसन पर बैठ कर सम्मुख पाटे पर पीले या लाल वस्त्र पर पीले चावल रखकर उस पर श्रीयंत्र की स्थापना करें। दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती जलाएं, मन में श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी का ध्यान करें।
आह्वान हेतु चावल चढ़ाएं, फिर श्रीयंत्र को जल से उसके बाद पंचामृत से, पुन: जल से स्नान कराएं। पुन: पटिए पर स्थापित करें। केसर, चंदन, कंकू, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी, सिंदूर, अक्षत, फूल, वस्त्र, सेंट, दूर्वा, धूप, दीप, बेसन की मिठाई, फल, सूखा मेवा, लोंग, इलायची, दक्षिणा भेंट करें। पश्चात निम्न मंत्र की तीन माला का जाप करें।
ú यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धन धान्य मे समृद्धि देहि दापय स्वाहा: जाप पूर्ण होने पर जल छोड़ें, दीपक, कपूर से आरती करें। आरती लें, प्रणाम करें एवं प्रार्थना करें कि हे माता आप कुबेर के खजाने ऋषि-सिद्धि सहित यहां विराजमान रहें। श्रीयंत्र को स्नान कराया हुआ जल अपने घर-कार्यालय और प्रतिष्ठान में छिड़कें।
Monday, September 28, 2009
कैसे मिले धनवान पति और रूपवान पत्नी
यदि वर की कुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो उसे सुंदर पत्नी मिलती है। यदि कन्या की कुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई भी हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा धनवान होता है।
वर की कुंडली में सुंदर पत्नी के योग
जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होता है तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही उपस्थित होता है तो जातक को सुंदर, आकर्षक, प्रभामंडल से युक्त एवं सौभाग्यशाली पत्नी प्राप्त होती है। जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होकर भाग्य भाव में उपस्थित होता है तो जातक को शीलयुक्त, रमणी एवं सुंदर पत्नी प्राप्त होती है तथा विवाह के पश्चात जातक का निश्चित भाग्योदय होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो जातक को चतुर, मृदुभाषी, सुंदर, सुशिक्षित, संस्कारवान, तीखे नाक-नक्श वाली, गौरवर्ण, संगीत, कला आदि में दक्ष, भावुक एवं चुंबकीय आकर्षण वाली, कामकला में प्रवीण पत्नी प्राप्त होती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में मिथुन या कन्या राशि उपस्थित हो तो जातक को कोमलाङ्गी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली, सौभाग्यशाली, मृदुभाषी, सत्य बोलने वाली, नीति एवं मर्यादाओं से युक्त बात करने वाली, oंृगारप्रिय, कठिन समय में पति का साथ देने वाली तथा सदैव मुस्कुराती रहने वाली पत्नी प्राप्त होती है। उन्हें वस्त्र एवं आभूषण बहुत प्रिय होते हैं।
जिस जातक के सप्तम भाव में कर्क राशि स्थित होती है, उसे अत्यंत सुंदर, भावुक, कल्पनाप्रिय, मधुरभाषी, लंबे कद वाली, छरहरी तथा तीखे नाक-नक्श वाली, सौभाग्यशाली तथा वस्त्र एवं आभूषणों से प्रेम करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में कुंभ राशि स्थित हो तो ऐसे जातक की पत्नी गुणों से युक्त धार्मिक, आध्यात्मिक कार्यो में गहरी अभिरुचि रखने वाली एवं दूसरों की सेवा और सहयोग करने वाली होती है।
सप्तम भाव में धनु या मीन राशि होने पर जातक को धार्मिक, आध्यात्मिक एवं पुण्य के कार्यो में रुचि रखने वाली, सुंदर, न्याय एवं नीति से युक्त बातें करने वाली, वाक्पटु, पति के भाग्य में वृद्धि करने वाली, सत्य का आचरण करने वाली और शास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
वधू की कुंडली में धनवान पति के योग
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में गुरु उपस्थित हो तो उसे सुंदर, धनवान, बुद्धिमान पति व श्रेष्ठ संतान मिलती है।
भाग्य भाव में या सप्तम, अष्टम और नवम भाव में शुभ ग्रह होने से ससुराल धनाढच्य एवं वैभवपूर्ण होती है।
कन्या की जन्मकुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र आदि में से कोई उपस्थित हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा उसे सुख व वैभव प्राप्त होता है।
कुंडली के लग्न में चंद्र हो तो ऐसी कन्या पति को प्रिय होती है और चंद्र व शुक्र की युति हो तो कन्या ससुराल में अपार संपत्ति एवं समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में वृषभ, कन्या, तुला लग्न हो तो वह प्रशंसा पाकर पति एवं धनवान ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में जितने अधिक शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र लग्न को देखते हैं या सप्तम भाव को देखते हैं, उसे उतना धनवान एवं प्रतिष्ठित परिवार एवं पति प्राप्त होता है।
कन्या की जन्मकुंडली में लग्न एवं ग्रहों की स्थिति की गणनानुसार त्रिशांश कुंडली का निर्माण करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि यदि कन्या का जन्म मिथुन या कन्या लग्न में हुआ है तथा लग्नेश गुरु या शुक्र के त्रिशांश में है तो उसके पति के पास अटूट संपत्ति होती है तथा कन्या सदैव ही सुंदर वस्त्र एवं आभूषण धारण करने वाली होती है।
कुंडली के सप्तम भाव में शुक्र उपस्थित होकर अपने नवांश अर्थात वृषभ या तुला के नवांश में हो तो पति धनाढच्य होता है।
सप्तम भाव में बुध होने से पति विद्वान, गुणवान, धनवान होता है, गुरु होने से दीर्घायु, राजा के संपत्ति वाला एवं गुणी तथा शुक्र या चंद्र हो तो ससुराल धनवान एवं वैभवशाली होता है।
एकादश भाव में वृष, तुला राशि हो या इस भाव में चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो ससुराल धनाढच्य और पति सौम्य व विद्वान होता है।
हर पुरुष सुंदर पत्नी और स्त्री धनवान पति की कामना करती है। लेकिन यह तभी संभव है, जब आपकी जन्मकुंडली में सितारों का योग उत्तम हो।कुंडली पर पड़ रही ग्रहों की दृष्टि और लग्न योग ही बताते हैं कि पत्नी कितनी रूपवान और पति कितना धनवान होगा।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसकी पत्नी शिक्षित, सुशील, सुंदर एवं कार्यो में दक्ष होती है, किंतु ऐसी स्थिति में सप्तम भाव पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो दाम्पत्य जीवन में कलह और सुखों का अभाव होता है।
जातक की जन्मकुंडली में स्वग्रही, उच्च या मित्र क्षेत्री चंद्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है तथा उसे सुंदर, सुशील, भावुक, गौरवर्ण एवं सघन केश राशि वाली रमणी पत्नी प्राप्त होती है। सप्तम भाव में क्षीण चंद्र दाम्पत्य जीवन में न्यूनता उत्पन्न करता है।
जातक की कुंडली में सप्तमेश केंद्र में उपस्थित हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होती है, तभी जातक को गुणवान, सुंदर एवं सुशील पत्नी प्राप्त होती है।
पुरुष जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित हो तो ऐसा जातक सौभाग्यशाली होता है तथा उसकी पत्नी सुंदर, सुशिक्षित होती है और कला, नाटच्य, संगीत, लेखन, संपादन में प्रसिद्धि प्राप्त करती है। ऐसी पत्नी सलाहकार, दयालु, धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में रुचि रखती है।
सुंदर पत्नी प्राप्ति हेतु श्लोक
पत्नी मनोरमां देहि मनोवृतानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
दुर्गा सप्तशती
अच्छे वर की प्राप्ति के लिए श्लोक
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देहि पतिं में कुरु ते नम:॥
श्रीमद्भागवत्
धाता दाधार पृथिवीं धाता द्यामुत सूर्यम्।
धातास्या अग्रुवे पतिं दधातु प्रतिकाम्यम्॥
पतिलाभ सूक्त
Wednesday, September 23, 2009
कार्तिक शुक्ल एकादशी अथवा देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व
मेघदूत के उक्त कथन से यह तो स्पष्ट है कि महाकवि कालिदास के समय अर्थात ईसा पूर्व से ही कार्तिक शुक्ल एकादशी अथवा देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व है। वराहपुराण में लिखा है कि ब्रrा ने कुबेर को एकादशी दी और उसने (कुबेर ने) उसे उस व्यक्ति को दिया जो संयमित रहता है, शुद्ध करता है, केवल वही खाता है, जो पका हुआ नहीं है।
कुबेर प्रसन्न होने पर सब कुछ देते हैं। एक नारी का आख्यान लिखा है - वह अति झगड़ालू थी, अपने प्रेमी के विषय में सोचती थी और इस कारण वह अपने पति द्वारा निंदित हुई और पीटी भी गई। वह क्रोधित होकर बिना भोजन किए रात्रि भर रही। उपवास करने के कारण (जो जानबूझ कर या प्रसन्नतापूर्वक नहीं किया गया था, प्रत्युत क्रोधावेश में किया गया था) वह शुद्ध हो गयी। प्रसन्नतापूर्वक उपवास करने से मनुष्य को गर्हित वासनाओं से निवृत्ति मिलती है।
एकादशी व्रत के सामान्य महत्व के अतिरिक्त देव प्रबोधिनी एकादशी का विशेष सामाजिक महत्व है। वर्षाकाल के चार मासों में भारत के बहुत से भागों में प्राचीन काल में यातायात सुविधाएं नहीं थीं। इसलिए इस अवधि में विवाह निषिद्ध कर दिया गया। इसका एक और कारण यह है कि ये चार महीने खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और कृषि प्रधान देश भारत का किसान निश्चिंत होकर बिना किसी सामाजिक, धार्मिक दायित्व के इन चार महीनों में अपना कृषिकर्म कर सकता था।
इसलिए संभवत: यह कल्पना की गई कि इस अवधि में भगवान विष्णु शयन करते हैं। देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है। नए अन्न, मूल तथा फलों से भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है और उन्हें प्रार्थनापूर्वक उठाया जाता है। यद्यपि आज शहरीकरण बढ़ गया है तथा जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग नगरीय जीवन जी रहा है, किंतु भारत के प्रधान व्रत उत्सव, जिनमें देव प्रबोधिनी एकादशी भी शामिल है, आज भी मनाए जाते हैं।
राजबलि पांडे का यह मत है कि वैदिक काल में विष्णु सूर्य के ही एक स्वरूप थे। अत: ये दोनों एकादशियां सूर्य के मेघाच्छन्न और मेघ से मुक्त होने की प्रतीक भी हो सकती हैं। जैसाकि व्रतों के दिन होता है, देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भी लोग व्रत करते हैं और इन व्रतों के साथ बहुत-सा संयम भी जुड़ा होता है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। नारद पुराण में तो यह विधान किया गया है कि जो मानव आठ वर्ष से अधिक अवस्था का हो और अस्सी वर्ष से कम अवस्था का हो, उसे एकादशी व्रत करना चाहिए। वह यदि मोहवश एकादशी के दिन पका भोजन कर लेता है तो पाप का भागी होता है।
ऋषियों ने सामाजिक स्थिति को देखते हुए संन्यासियों, गृहस्थों, दीक्षित वैष्णवों, सामान्य वैष्णवों (स्मार्तो) के लिए उपवास की अलग-अलग व्यवस्था की है, जिसमें कृष्ण एकादशी को व्रत न करना, केवल पका भोजन न करना या कि अशक्त होने पर केवल रात्रि भोजन की व्यवस्था है। जबकि संन्यासियों के लिए सभी एकादशियों को निराहार, निर्जल व्रत की व्यवस्था है।
आज के संदर्भ में व्यक्ति के अपने कल्याण तथा समाज में उसकी उपादेयता बढ़ाने के लिए मनुष्य को देव प्रबोधिनी एकादशी जैसे महाव्रतों पर संयमित आचरण तथा मितभोजन करके अपने इष्टदेव का स्मरण-पूजन करना ही चाहिए। भले ही वह एकादशी के संबंध में पुराणोक्त व्यवस्था का पालन न कर सके। यह शास्त्रसम्मत विधान है और जो व्यक्ति शास्त्रसम्मत आचरण करता है, वह दीर्घ और सुखी जीवन जीता है।