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Friday, November 20, 2009

दंडाधिकारी शनिदेव

शनि सभी ग्रहों से दूर रहकर तुला राशि को अपना उच्च आसन बनाकर, धर्म-अधर्म को न्याय के तराजू में तौलकर आमजन के लिए दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं।
शनि ग्रह का नाम सुनते ही प्राय: भय पैदा होने लगता है, जबकि शनि लोकतांत्रिक पद्धति के पालक तथा संसार की हर चल-अचल वस्तु से संबद्ध होने से आमजन का ग्रह है। शनि जयंती ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को आती है।
शनि के जन्म को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं हैं। शनिदेव राम, कृष्ण, हनुमान, पार्वती आदि को भी अपना प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहे। इन कथाओं में शनिग्रह को नकारात्मक या अनिष्ट कारक ग्रह के रूप में अधिक वर्णित कर दिया गया है, वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है।
शनि नवग्रहों में न्यायाधीश हैं। न्यायाधीश कभी भी किसी व्यक्ति से जल्दी प्रभावित नहीं होते, अपितु दूरियां बनाकर चलते हैं। उसी तरह शनि ग्रह भी सभी ग्रहों से दूर रहकर, तुला राशि को अपना उच्च आसन बनाकर, धर्म-अधर्म को न्याय के तराजू में तौलकर आमजन के लिए दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं।
शनि ग्रह मानव के अंत:करण का प्रतीक है। चर्म, श्वास, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, रक्त प्रवाह, अपच, कब्ज, मनोरोग, प्रेतबाधा, अंधापन, मुंह एवं अन्य अंगों से दरुगध आदि अनेक विकारों का कारण शनि होता है।
देर तक सोने वाले, जुआ, सट्टा, शराब, शेयर, प्रॉपर्टी, खनिज पदार्थ आदि में भी इनका पूर्ण हस्तक्षेप रहता है। वास्तव में शनि एक गरीब बुजुर्ग ग्रह हैं, जो सदैव आशीर्वाद देने को आतुर रहते हैं, लेकिन लोग उनकी उपेक्षा करके अपने आपको संकट में डालते रहते हैं।
हमारे शरीर में ऑक्सीजन रहित रक्त को ले जाने वाली शिराओं का स्वामी शनि ही होता है। शनि की भूमिका तन-मन एवं धन तीनों में महत्वपूर्ण होती है। मानव जीवन के सारे कष्टों को हरने वाला एकमात्र शनि ग्रह ही है। यह अलग बात है कि शनि को प्राय: क्रूर ग्रह ही माना जाता है, जबकि शनि हर राशि को अपनी तरह से सहयोग करते हैं।
वायु पुत्र हनुमान ने भगवान राम को हरसंभव सहयोग किया, तो आमजन को भी वायुग्रह शनि हमेशा सहयोगी ही बना रहता है। धोखेबाज, चोर, झूठ बोलने वाले, दुराचारी, अपराधी आदि के लिए शनि मारक समान रहता है, तो साधु संतों, विद्वानों तथा सदाचरण से चलने वालों के लिए सेवक स्वरूप प्रबल कारक ग्रह रहता है।
मार्गी शनि
शनि १७ मई से सिंह राशि में मार्गी हुआ है तथा ९ सितंबर २क्क्९ को कन्या राशि में भरणी नक्षत्र एवं मेष राषि के चंद्रमा में प्रवेश करेगा। ९ सितंबर से पहले कर्क, सिंह एवं कन्या राशि को साढ़े साती शनि चल रहा है तथा मकर एवं वृष राषि को ढैय्या शनि है।
९ सितंबर २क्क्९ से सिंह, कन्या एवं तुला को साढ़े साती तथा कुंभ एवं मिथुन का ढैय्या शनि प्रारंभ हो जाएगा। मकर एवं वृष राशि को तो ढैय्या शनि भी तांबे के पाये पर होने से श्रेष्ठ फलदायक है साथ ही आगामी सितंबर से सिंह, तुला, कुंभ एवं मीन राशि को शनि की साढ़े साती एवं ढैय्या लगेगी जो श्रेष्ठ रहेगी।
कर्क, सिंह एवं कन्या राशि वालों को शनि की प्रसन्नता के लिए घर में या अड़ोस-पड़ोस में किसी अशक्त बुजुर्ग की सेवा करनी चाहिए। अपंग लोगों की सेवा एवं आशीर्वाद से भी शनि का दुष्प्रभाव नष्ट होता है। शनिवार के दिन चमेली के तेल का दीपक हनुमान मंदिर में सूर्यास्त के समय जलाने से भी शनिदेव प्रसन्न रहते हैं।
शनि के प्रभाव
शनि की साढ़े साती एवं ढैय्या हमेशा खराब नहीं होती। शनि जिस दिन राशि बदलता है, उस दिन चंद्रमा जिस राशि पर हो उसके आधार पर सोना, चांदी, तांबा, लोहा आदि का पाया देखकर शनि की ढैय्या या साढ़े साती के फल को समझना चाहिए। चांदी एवं तांबे के पाये पर जब भी शनि की पनोती लगती है, तब बहुत अच्छा फल देती है। सोने एवं लोहे में भी प्रारंभ पनोती यदि महादशा और अंतर्दशा अच्छी हो तो कष्टदायक नहीं होती है। इसके बावजूद न जाने क्यों आमजन ने शनि ग्रह को बदनाम कर रखा है।
इस मंत्र के 23क्क्क् जप करने से भी शनि का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता है -
ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:॥

कैसे मिले संतान सुख ?

संतान सुख जीवन को स्वर्ग बना देता है और इसका दु:ख नर्क। ज्योतिष के आईने में इस सुख को हासिल करना संभव है। अपनी राशि के लग्न का आंकलन कर और जरूरी उपाय अपनाकर संतान सुख प्राप्त करें।


मेष
मेष राशि वालों को संतान प्राप्ति के लिए निम्न उपाय करने चाहिए। रविवार व्रत रखें। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। शुभ मुहूर्त में शुक्ल पक्ष में माणिक्य धारण करें। सत्रह रुपए की सब्जी चौदह बुधवार तक काली गाय को खिलाएं। भोलेनाथ को हर सोमवार पंचमेवा डालकर खीर मंदिर में दें। 16 सोमवार ऐसा करने के बाद संतान संबंधी खुशखबरी अवश्य मिलेगी।

वृष
वृष लग्न की कुंडली में संतान का कारक ग्रह बुध होता है। ऐसे संतान सुख चाहने वाले जातक संतान गोपाल यंत्र अपने पूजा स्थान में स्थापित करें। नित्य ú नमो भगवते वासुदेवाय का जाप तुलसीमाला से करें। चांदी की एक बांसुरी सोमवार को श्रीकृष्ण को चढ़ाएं। बुधवार के दिन हरे रंग की ग्यारह चूड़ियां एवं हरा वस्त्र किन्नरों को दान में दें। बहते हुए जल में तांबे के सात सिक्के प्रवाहित करें। शीघ्र ही शुभ योग बनेगा।

मिथुन
मिथुन लग्न के जातक संतान हेतु शुक्ल पक्ष के बुधवार को पन्ना, हीरा युक्त रत्न शक्ति लॉकेट पहनें। स्फटिक माला धारण करें। हर शुक्रवार आटे के पेड़े में पनीर भरकर काली गाय को दें। गोपाल सहस्रनाम व हरिवंशपुराण का पाठ करें।

कर्क
कर्क लग्न के जातक संतान प्राप्ति हेतु लाल सूती कपड़े में एक मुट्ठी सौंफ बांधकर मंगलवार को अपने शयनकक्ष में रखें। कार्यसिद्धि यंत्र घर के पूजाकक्ष में शुभ मुहूर्त में स्थापित करें। प्रतिदिन मनोभाव से दर्शन एवं प्रार्थना करें। कुत्ते की भी सेवा करें। दूध, रोटी अवश्य खिलाएं।

सिंह
सिंह लग्न की कुंडली में संतान का कारक गुरु ग्रह होता है। ऐसे जातक भगवान विष्णु की उपासना करें। गुरुवार को भूरी गाय को गुड़ व भीगी चने की दाल खिलाएं। पूर्णिमा को किसी ब्राrाण को जनेऊ दान करें। लड्डू गोपाल मंदिर में रखें। प्रतिदिन दूध का भोग लगाएं। ú नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।

कन्या
कन्या लग्न की कुंडली में संतान का कारक ग्रह शनि होता है। ऐसे जातक शनिवार को रोटी पर तेल लगाकर काले कुत्ते को खिलाएं। संतरे का रस शिवलिंग पर चढ़ाएं। घर में नवग्रह हवन कराएं। पांच वस्त्र दक्षिणा समेत दें। भूरे रंग का कुत्ता न पालें। प्रत्येक सोमवार को शिव से संतान सुख की कामना करें। इच्छा पूर्ण होगी।

तुला
संतान के अभिलाषी तुला राशि के जातक शुक्लपक्ष में शनिवार को या शनि पुष्य योग में नीलम धारण करें। 21 शनिवार शिवजी को सवा पाव गन्ने का रस चढ़ाएं। महीने में एक बार मिट्टी के कुल्हड़ में मशरूम किसी मंदिर में रखें।

वृश्चिक
वृश्चिक लग्न के जातक संतान हेतु शुक्र पक्ष के गुरुवार या गुरु पुष्य योग में तर्जनी में पुखराज पहनें। 21 सोमवार शिव के मंदिर में सवा पाव घी चढ़ाएं। इसके पश्चात भगवान को गुलाब का इत्र अर्पित करें। संतान गोपाल यंत्र शुक्ल पक्ष में सोमवार को घर में पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित करें। शिवालय जाकर शिवलिंग पर प्रत्येक सोमवार को ग्यारह लोटे जल चढ़ाएं।

धनु
धनु लग्न के जातक शुक्लपक्ष के प्रथम मंगलवार को स्वर्ण में मूंगा रत्न दाएं हाथ की अनामिका अंगुली में पहनें। 21 मंगलवार हनुमानजी को पान का बीड़ा चढ़ाएं। एक किलो मसूर की दाल हर मंगलवार बहते जल में बहाएं। लड्डू गोपाल की मूर्ति घर में रखें। शुक्ल पक्ष के सोमवार से ú गोपालाय नम: की पांच माला रोज जाप करें।

मकर
संतान सुख के लिए पन्ना, हीरा, नीलम सहित रत्नशक्ति लॉकेट शुक्ल पक्ष के शुभ योग में गले में धारण करें। शुक्र यंत्र अपने पूजा घर में रखें। हर सोमवार को शिव को सवा पाव दूध चढ़ाएं। शुक्रवार को नौ छतरी, नौ कंबल लाएं और शनिवार को गरीबों को बांट दें।

कुंभ लग्न
कुंभ लग्न वाले जातक संतान सुख के लिए शुक्ल पक्ष के बुधवार को चांदी में पन्ना दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में पहनें। संतान गोपाल यंत्र पूजा घर में स्थापित करें। संतान गणपति स्तोत्र का पाठ करें। मोदक का भोग लगाएं व 21 दूर्वा चढ़ाएं। शुक्ल पक्ष के बुधवार के दिन हरे वस्त्र व हरे रंग की ग्यारह चूड़ियां, ग्यारह केले व ग्यारह रुपए किन्नरों को दान में दें। रोज दो रोटी तेल लगाकर गाय को दें।

मीन
मीन लग्न के जातक संतान सुख के लिए शुक्ल पक्ष के सोमवार को दाएं हाथ की छोटी उंगली में शुद्ध चांदी का मोती पहनें। संतान गोपाल मंत्र का जाप करें। मंत्र एक लाख बार जपने से सिद्ध होगा। संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए शुभ योग में वटवृक्ष के पत्ते पर हल्दी से लिखकर बहते जल में छोड़ दें। होली के दिन से प्रतिदिन हनुमानजी को पांच लाल पुष्प व एक अनार चढ़ाएं।

Sunday, November 15, 2009

सोमवती अमावस्या का महत्व

सोमवार और अमावस्या का योग कभी-कभी बनता है। शास्त्रों में सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान शिव के दर्शन एवं जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है। सोलह नवंबर 2009 विशाखा नक्षत्र में अमावस्या सोमवार प्रात: 11 बजकर 11 मिनट पर धनु लग्न में प्रवेश करेगी।


इस दिन सोमवती अमावस्या और मार्गशीर्ष संक्रांति एक साथ होने से तीर्थो पर स्नान, दान-जाप आदि का महात्म्य बढ़ जाता है। धर्मनिष्ठ लोग इस दिन व्रत का संकल्प लेकर अपने इष्टदेव एवं भगवान विष्णु एवं शिव पूजन करने से आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए पीपल वृक्ष की सफाई और गंगाजल युक्त दुग्ध से सींचकर धूप-दीप आदि से पूजन करके कम से कम 7 बार प्रदक्षिणा करना कल्याणकारी होगा।


सुबह संक्रांति की शुभ बेला में ब्राrाणों को दक्षिणा सहित भोजन, वस्त्र, फलों का दान करने का सुअवसर प्राप्त होगा। मार्गशीर्ष माह में पांच मंगलवार, राहु-केतु का राशि परिवर्तन और सूर्य के राशि परिवर्तन से विभिन्न राशियों के जातकों पर भिन्न-भिन्न असर पड़ेगा। ग्रहों का शुभ व अशुभ प्रभाव जीवन को पूर्ण प्रभावित करता है। ग्रह ईश्वर के प्रतिनिधि हैं जो जीवात्माओं के कर्म फल का भुगतान कर जीवात्मा को शुद्ध व पवित्र बनाने का कार्य करते हैं। ग्रहों द्वारा अशांति व अनिष्टों से छुटकारा पाने के लिए हमें ईश्वर ने कई अवसर प्रदान किए हैं। सोमवती अमावस्या एवं संक्रांति बेला एक साथ आकर यह सुअवसर प्रदान कर रही है।


सोमवती अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करके तुलसीजी, शंकर-पार्वतीजी की विधि-विधान सहित पूजा करके मां गौरी को सिंदूर चढ़ा श्रंगार की वस्तुएं श्रद्धापूर्वक भेंट करनी चाहिए। पूजा के बाद चढ़ाए हुए सिंदूर में से थोड़ा लेकर सुहागिनें अपनी मांग में भरकर मां पार्वतीजी से अखंड सुहाग एवं सौभाग्य के लिए प्रार्थना करें। यह पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ होता है। इस दिन व्रत करने वाले प्रात:काल उठकर स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पीपल वृक्ष के समीप जाकर उसकी जड़ सहित भगवान विष्णु का पूजन करें।



गोविंदजी के पूजन में पीले वस्त्र, अक्षत, फूल, फल तथा नैवेद्य इत्यादि पदार्थो का प्रयोग किया जाता है। इस समय कई प्रकार के रत्न, सोना, चांदी, हीरा-मोती मणियों को हाथ में लेकर भी पूजा की जाती है। यदि सामथ्र्य न हो तो फल, पुष्प, नैवेद्य, वस्त्रादि से तांबे का पात्र या एक सुपारी से भी 107 प्रदक्षिणा पूर्ण की जा सकती हैं। पूजा के समापन पर सभी वस्तुएं ब्राrाण को दान कर देनी चाहिए। इस प्रकार किए गए व्रत से कुंवारी कन्याओं को अच्छा वर एवं सुहागिन स्त्रियों को सुपुत्र एवं धन की प्राप्ति होती है।


मां गौरी को ऐसे करें प्रसन्न


विभिन्न राशियों के जातक कुछ उपयोगी उपाय करके ग्रहों की अशुभता को दूर कर सकते हैं। भगवान शिव-पार्वती व विष्णु की आराधना कर अखंड सौभाग्य एवं निरोगी काया प्राप्त करें।

मेष- मां पार्वती को लाल चुनरी व श्रंगार की वस्तुएं अर्पित करें। गुड़ व मसूर की दाल की पोटली बनाकर संध्या के समय किसी गरीब या भिखारी को दें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व पीले पुष्प अर्पित करें।


वृष- मां पार्वती को गुलाबी रंग की चुनरी भेंट करें। चांदी के लोटे में गंगाजल व तुलसी के पत्ते को डालकर भगवान विष्णु को जल अर्पण करें। सफेद चावल सफेद कपड़े में बांधकर एक पोटली सुबह किसी गरीब स्त्री को दान करें। सफेद बर्फी का भगवान विष्णु को भोग लगाएं।


मिथुन- मां पार्वती को हरे रंग की चुनरी और मेंहदी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला अर्पण करना शुभ होगा। मिश्री और इलायची का भोग लगाएं। पोटली में मूंग की दाल बांधकर प्रात:काल ब्राrाण को दान करें।


कर्क- मां पार्वती को लाल रंग की चुनरी और पीली चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को चंदन का टीका व पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। दूध और पोटली में चावल या चीनी का दान किसी ब्राrाणी को करें।


सिंह- सुनहरी या नारंगी रंग की चुनरी मां पार्वती को भेंट करें। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पण करें। बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। एक पोटली में गुड़ व गेहूं बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।


कन्या- मां गौरी को हरे रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला व पेठा भोग लगाएं। मिश्री और इलायची भी भेंट करें। हरी मूंग व पांच इलायची हरी पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।


तुला- मां गौरी को गुलाबी या आसमानी रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को मिश्री व तुलसी के पत्ते अर्पण करें। चावल व चीनी सफेद वस्त्र में बांधकर किसी महिला या ब्राrाणी को दान करें। बर्फी का भोग लगाकर पांच कन्याओं को प्रसाद भी दें।


वृश्चिक- मां गौरी को लाल या पीली चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। गुड़ व गेहूं एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प अर्पण करें।


धनु- मां गौरी को पीली चुनरी, लाल चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। पीली चने की दाल, हल्दी की गांठ, गुड़ पीले वस्त्र में बांधकर विद्वान ब्राrाण को दान करें ।


मकर- हरी चुनरी और मेंहदी मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व मिश्री भेंट करें। तुलसी की माला भेंट करें। उड़द की दाल व गुड़ पोटली में बांधकर किसी असहाय गरीब व्यक्ति को दान करें।


कुंभ- हरी चुनरी और हरी चूड़ियां मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला चढ़ाएं। बर्फी का भोग लगाएं। उड़द की दाल व गुड़ किसी गरीब भिखारी को दान करें।

मीन- मां गौरी को पीले या लाल रंग की चुनरी चढ़ाएं। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पित करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। पीली चने की दाल, गुड़ व हल्दी एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।

Saturday, October 24, 2009

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव - डॉ. विनोद शास्त्री

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे। माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।।

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।

ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगोंे की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए। जो चतुर्दशी में पारणा करता है, वह समस्त तीर्थो के स्नान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिवरात्रि का उपवास नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं।

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प अति प्रिय हैं। अत: पूजन में इनका उपयोग करें। जो इस व्रत को हमेशा करने में असमर्थ है, उन्हें इसे बारह या चौबीस वर्ष करना चाहिए। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।

Thursday, October 15, 2009

पंच महोत्सव दीपावली पर्व - पं. गौरव शर्मा

धनतेरस
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। इस दिन भगवान धन्वन्तरि ने लोगों के दु:ख और रोगों को हरने के लिए आयुर्वेद की रचना की थी। यह दिन अतिशुभ है। कोई भी नया कार्य इस दिन प्रारंभ करें तो सफलता निश्चित ही मिलती है। यह अबूझ मुहूर्त है। इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, बर्तन खरीदने चाहिए।
रूपचौदस
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या रूपचौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व सुगंधित तेल से मालिश कर ठंडे जल से स्नान करना चाहिए। इससे मनुष्य स्वस्थ रहता है, जो स्त्रियां इस दिन सजती-संवरती हैं, उनको अगले जन्म में सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है। इस दिन तेल में लक्ष्मीजी का और जल में गंगा का वास रहता है। भगवान कृष्ण ने इस दिन नरकासुर का वध किया था। इस दिन अपने घर के बाहर या दक्षिण दिशा में चौमुखी दीपक जलाना चाहिए।
दीपावली
दीपावली को महानिशा और शुभ रात्रि माना गया है। इस रात में सूर्य और चंद्रमा की युति शुक्र की तुला राशि में होती है जो कि भौतिक सुखों और संपन्नता को प्रदान करती हैं। श्रीसूक्त और भविष्यपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी का वास बिल्ववृक्ष में माना गया है। दीपावली की रात के तीसरे और चौथे प्रहर में मंत्र और यंत्रों को सिद्ध करके संपन्नता प्राप्त की जा सकती है। लक्ष्मी पूजा स्थिर लग्न में ही करनी चाहिए।
गोवर्धन पूजा
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव होता है। सायंकाल मंदिरों में अन्नकूट महोत्सव होता है।
यम द्वितीया
यमद्वितीया भैया दूज के दिन पुरुषों को अपने घर भोजन न कर अपनी बहन के यहां भोजन करना चाहिए। इस दिन यमुना ने भी अपने भाई यमराज को घर पर बुलाकर भोजन कराया था। इस दिन यमुना में कच्च दूध, तिल और गंगा जल चढ़ाने से भाई-बहन के रिश्ते में अटूट प्रेम, मधुर संबंध बना रहता है। अगर बहन भाई को इस दिन भोजन कराती है तो उनके भाई की उम्र बढ़ती है। उन्हें धन-धान्य की प्राप्ति होती है। प्रात:काल चंद्रमा के दर्शन करने चाहिए।
दीपावली की रात्रि को निम्न उपाय करें
>> इस दिन श्रीयंत्र को स्थापित कर गन्ने के रस और अनार के रस से अभिषेक करके लक्ष्मी मंत्रों का जाप करें।
>> दीपावली की रात्रि को पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें। उसके दूर जाने की प्रतीक्षा करें। इससे आर्थिक संकट दूर होंगे।
>> लक्ष्मी पूजन के समय अपने बहीखातों व कलम-दवात का पूजन करना चाहिए।
>> दीपावली को रात्रि में हात्थाजोड़ी को सिंदूर में भरकर तिजोरी में रखने से धन में वृद्धि होती है।
>> सात गोमती चक्र और काली कोड़ियों को व्यापार वाले स्थान में रखने से निरंतर व्यापार में वृद्धि होती रहती है।
>> घर पर हमेशा बैठी हुई लक्ष्मीजी की और व्यापारिक स्थल पर खड़ी हुई लक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
>> लक्ष्मीजी को गन्ना, अनार, सीताफल अवश्य चढ़ाएं।
>> इस दिन पूजा स्थल में एकाक्षी नारियल की स्थापना करें। यह साक्षात लक्ष्मी का ही स्वरूप माना गया है। जिस घर में एकाक्षी नारियल की पूजा होती हो, वहां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।
>> दीपावली की रात्रि में श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र एवं गोपाल सहस्रनाम का पाठ करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

Sunday, October 11, 2009

समर्पण एवं भक्ति का मास - कार्तिक (पं. प्रहलाद कुमार)

का र्तिक मास भगवान विष्णु के प्रति हमारे समर्पण, निष्ठा एवं भक्ति का मास है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि -
मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन:। र्तीथ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ॥
अर्थात - भगवान विष्णु के सदृश्य ही कार्तिक मास श्रेष्ठ है। इस मास का महत्व पद्म पुराण, स्कन्द पुराण एवं अन्य पुराणों में विस्तार से लिखा गया है। इस माह में प्राय: सूर्य तुला राशि में रहते है और शीतकाल रहता है। अत: इस माह में पुरुष और स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ब्रrा मुहूर्त में उठकर जलाशय, नदी, तालाब आदि में स्नान कर भगवान राधा दमोदर की पूजा अर्चना करते है। शास्त्रों में कार्तिक मास के व्रत को मोक्ष प्रदान करने वाला मास माना गया है। इस समय के किए गए व्रत उपवास से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति बताई गई है।
कार्तिक मास के कर्म
व्रत एवं स्नान कार्तिक मास का स्नान व्रत करने वाले लोगों को अनेक प्रकार से संयम, नियम का पालन करना पड़ता है। संपूर्ण माह में व्रत और उपवास रखकर राधा दमोदर की पूजा की जाती है। इसमें व्रतोपवास करने से रोगों का विनाश होता है और प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती है। सद्बुद्धि प्राप्त करके मनुष्य दीघायरु एवं लक्ष्मी प्राप्त करता है।
दीपदान कार्तिक मास में व्रत उपवास रखने वाले साधक को प्रतिदिन दीप का दान करना चाहिए। तुलसी सेवा तुलसी का पौधा लगाना, तुलसी को जल सिंचन और तुलसी का सेवना निर्दिष्ट है। आयुर्वेद शास्त्र में भी तुलसी को एंटीबायटिक कहा गया है और इसके द्वारा पर्यावरण की शुद्धि होती है। भगवान को तुलसी पत्र और मंजरी अर्पण करने के साथ स्वयं भी तुलसी सेवन करने से व्यक्ति रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है। भगवान विष्णु को तुलसी अति प्रिय है।
भूमि पर शयन शास्त्र में उल्लेख है कि कार्तिक मास का व्रत करने वाले व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। इसके कारण एक ओर जहां मनुष्य शरीर में पृथ्वी तत्व की वृद्धि होती है वहीं भगवान के प्रति आस्थावान होकर व्यक्ति भय से मुक्त होता है।
ब्रrाचर्य का पालन तथा आहार पर नियंत्रण कार्तिक मास के नियमों के अंर्तगत ब्रrाचर्य का पालन करना नितांत आवश्यक है। साथ ही उड़द, मूंग, चना, मटर आदि द्वि-दल, दलहन एवं तेल आदि का परित्याग करना निर्देशित है। भगवान नाम का संकीर्तन करना और भगवान विष्णु की कथाओं का श्रवण करना श्रीमद्भगवदगीता, भागवत पुराण आदि का अध्ययन या श्रवण करना सत्य, अहिंसा पर चलकर धर्माचरण करना भी निर्देशित है। इस माह में पीपल, तुलसी, आंवला, गौ-पूजा, स्नान और गोवर्धन पूजा आदि का प्रावधान किया गया है।
जिसके कारण व्यक्ति इस लोक में धन ऐश्वर्य, बुद्धि, बल और यश प्राप्त करके अंत में मोक्ष प्राप्त करें। कार्तिक मास में काशी में निवास करके गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि व्रती को गंगा, विष्णु, शिव तथा सूर्य का स्मरण करके जल में प्रवेश कर नाभि पर्यंत जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। आंवला और काला तिल शरीर पर मलना चाहिए किंतु संन्यासियों को तुलसी के पौधें की जड़ में लगी हुई मृत्तिका लगाकार स्नान करना चाहिए। व्रत की समाप्ति पर पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करके बांस की टोकरी में अन्न और कांसे के पात्र में पुएं रखकर वस्त्र, स्वर्ण आदि का दान करना चाहिए।
कार्तिक मास के महत्वपूर्ण व्रतोत्सव
करवा चौथ, अहोई अष्टमी, गौवत्स द्वादशी, धन तेरस, गोत्रिरात्र व्रत, नरक चतरुदशी, दीपावली, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, यमद्वितीया, सूर्य षष्ठी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थापनी एकादशी, तुलसी विवाह, बैंकुंठ चतुर्दशी, विष्णु पंचक व्रत तथा कार्तिक पूर्णिमा। स्पष्ट है कि संपूर्ण कार्तिक मास में अनके महत्वपूर्ण व्रत एवं त्योहार संपन्न होते हैं। कार्तिक स्नान करने वाले व्रर्ती को प्रत्येक व्रत दिवस पर शास्त्र निर्धारित पद्धतियों के साथ व्रत का अनुशीलन करना चाहिये, जिससे व्रत के सहज फल प्राप्त होते हैं।

आप कैसी लक्ष्मी चाहते हैं - श्रीमती सविता

लक्ष्मी दो प्रकार से आती हैं एक गरुड़ वाहनी जो भगवान विष्णु के साथ आती हैं। यह सद्कर्म से अर्जित की गई लक्ष्मी के रूप में आती हैं। इस लक्ष्मी के आने पर व्यक्ति के कार्य, व्यवहार, आचरण में कहीं कोई कमी नहीं झलकती है बल्कि वह विनम्रता से संपन्न होकर समाजसेवी, परोपकारी, दरिद्र नारायण की सेवा करने वाला होता है। उसकी लोकप्रियता समाज-देश में बढ़ती ही चली जाती है। इसके विपरीत उल्लू वाहिनी लक्ष्मी का आगमन अनैतिक कर्म के द्वारा होता है।
उसके आने के साथ ही उल्लू का आगमन भी घर में हो जाता है। फलस्वरूप उस व्यक्ति में तामसी प्रवृत्ति वाले दुगरुण भी आते हैं। जिस प्रकार उल्लू रात में जागता है एवं दिन में सोता है, ठीक उसी प्रकार वह भी देर से उठने एवं देर रात तक कार्य करने में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसे जातकों की संतान भी संस्कार विहीन हो जाती है। वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है कि अनैतिकता से प्राप्त की गई सफलता व समृद्धि लंबे समय तक साथ नहीं देती है।
लक्ष्मी की परिभाषा में आमजन केवल धन को ही मानते हैं जबकि लक्ष्मी आठ प्रकार की होती हैं - आद्य लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी, अमृत लक्ष्मी, काम लक्ष्मी, सत्य लक्ष्मी, भोग लक्ष्मी, योग लक्ष्मी। जैसा कि नाम से ही अर्थ स्पष्ट हो रहा है। ये सभी लक्षण लक्ष्मीवान के होते हैं अर्थात उपरोक्त में से एक भी लक्ष्मी व्यक्ति को समर्थ एवं सुखी बना सकती है।
अत: व्यक्ति को धन की चाह के बजाय आदर्श परिवार की ओर उन्मुख होना चाहिए ताकि जीवन में सभी सुख मिल सकें और वह उनका उपभोग भी कर सके। लक्ष्मी जी ने स्वयं कहा है - सत्य, दान, व्रत, तप, धर्म, पराक्रमी, सरल व्यक्ति के यहां मैं निवास करती हूं तथा जहां आलस्य, निद्रा, असंतोष, अधर्मी, संतान का पालन विधिवत न हो रहा हो, उस स्थान को मैं छोड़ देती हूं।
लक्ष्मी पानी की भांति चंचल होती हैं। फिर भी लक्ष्मी को स्थायी रूप से रोकने के लिए स्थायी प्रयास प्रतिवर्ष करने पड़ते हैं। दीपावली के दिन लक्ष्मीजी की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। शुभ मुहुर्त में एक कंबल के आसन पर बैठ कर सम्मुख पाटे पर पीले या लाल वस्त्र पर पीले चावल रखकर उस पर श्रीयंत्र की स्थापना करें। दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती जलाएं, मन में श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी का ध्यान करें।
आह्वान हेतु चावल चढ़ाएं, फिर श्रीयंत्र को जल से उसके बाद पंचामृत से, पुन: जल से स्नान कराएं। पुन: पटिए पर स्थापित करें। केसर, चंदन, कंकू, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी, सिंदूर, अक्षत, फूल, वस्त्र, सेंट, दूर्वा, धूप, दीप, बेसन की मिठाई, फल, सूखा मेवा, लोंग, इलायची, दक्षिणा भेंट करें। पश्चात निम्न मंत्र की तीन माला का जाप करें।
ú यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धन धान्य मे समृद्धि देहि दापय स्वाहा: जाप पूर्ण होने पर जल छोड़ें, दीपक, कपूर से आरती करें। आरती लें, प्रणाम करें एवं प्रार्थना करें कि हे माता आप कुबेर के खजाने ऋषि-सिद्धि सहित यहां विराजमान रहें। श्रीयंत्र को स्नान कराया हुआ जल अपने घर-कार्यालय और प्रतिष्ठान में छिड़कें।