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Saturday, November 21, 2009

माघ स्नान की महिमा - डॉ. शालिनी सक्सेना

magh धर्मशास्त्र के अनुसार स्नान नित्यकर्म माना गया है। नित्य स्नान के अतिरिक्त धर्मशास्त्रीय दृष्टि से मेष, तुला एवं मकर के सूर्य में क्रमश: वैशाख, कार्तिक एवं माघ मास में स्नान का विशेष फल प्राप्त होता है। मकर राशि के सूर्य में पौष शुक्ल एकादशी, पूर्णिमा अथवा अमावस्या से माघ स्नान का प्रारंभ होता है। अधिकांशत: पौष की पूर्णिमा से ही माघ स्नान के प्रारंभ की परंपरा है।
पौष शुक्ल पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा तक माघ स्नान करने का शास्त्रीय विधान है, लेकिन ज्यादातर चंद्रमास के अनुसार ही माघ स्नान का विधान किया गया है -
एकादश्यां शुक्लपक्षे पौषमासे समारभेत्।
माघमास में सूर्योदय के समय जल अत्यंत पवित्र होता है और उसमें तीनों प्रकार के पापों के विनाश की शक्ति होती है-
माघमासे रटन्त्याप: किंचिदभ्युदिते रवौ।
ब्रrाघ्नं वा सुरापं वा कं पतन्तं पुनीमहे॥
इस समय तीर्थजल में स्नान से ब्रrाघाती, शराबी और पतित भी पवित्र हो जाते हैं। जो व्यक्ति माघ मास में प्रात: समय सूर्य की किरणों से संतप्त नदी के प्रवाह में स्नान करता है, वह माता-पिता के वंश की सात-सात पीढ़ियों का उद्धार करके स्वयं देवरूप होकर स्वर्ग जाता है।
स्नान का सवरेत्तम समय अरुणोदय (सूर्योदय से एक घंटा छत्तीस मिनट पूर्व) माना गया है। इस समय स्नान करने वाला देवताओं में पूजित होता है। तारों की छांव में स्नान उत्तम, तारे छिपने पर स्नान मध्यम व सूर्योदय होने पर स्नान अधम कहा गया है।
गर्मजल से स्नान पर छह वर्ष के स्नान का फल मिलता है। बावड़ी में स्नान से बारह वषर्, तालाब में स्नान से २४ वषर्, नदी में इसका चौगुना, महानदी में सौ गुना, महानदी संगम में इससे चौगुना, गंगा में हजार गुना और गंगा-यमुना के संगम में स्नान से लाख गुना स्नान का फल प्राप्त होता है।
माघ स्नान को पुण्यदायी माना गया है। पुराण में लिखा है कि पौषशुक्ल एकादशी से लेकर माघ शुक्ल एकादशी तक, मास भर भूमि पर शयन करें, निराहार रहें और तीनों समय स्नान करें। भोग- विलास त्यागकर तीनों समय भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। माघ मास में स्नान से यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस मास में प्रयाग स्नान अति श्रेष्ठ माना गया है। इस स्नान से कई जन्मों के पापों का नाश हो जाता है।
यदि प्रयाग में स्नान संभव न हो तो किसी भी तीर्थ में प्रयाग का स्मरण कर स्नान करने से गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। जो पूरे मास स्नान करने में असमर्थ हो वह शुरू के तीन दिन या आखिर के तीन दिन या कोई भी तीन दिन स्नान कर सकता है। यह स्नान विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
जो मनुष्य माघ में निरंतर भक्ति भाव से स्नान करता है, उसे पौण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। उसके किए पाप स्नान के जल में चले जाते हैं। विष्णु का पूजन कर व्रती तिल से स्नान, उबटन, होम, तर्पण, दान एवं तिल का भोजन करें। पितरों व देवताओं को मूली नहीं चढ़ानी चाहिए और न ही मूली खानी चाहिए। स्नान करने वाले को आग तापना भी निषेध किया गया है।
अग्नि में होम करना चाहिए तथा प्रतिदिन तिल व शक्कर दान करना चाहिए। यह मास तपस्वियों को प्रिय है। इसमें स्नान से महापातकी भी पाप मुक्त हो जाते हैं। माघ स्नान के विषय में कहा गया है कि जो मनुष्य मरने के उपरांत कष्ट नहीं चाहता, उसे यह स्नान करना चाहिए। माघ मास के दौरान जल में देवताओं का तेज विद्यमान रहता है, इसलिए माघ स्नान को बहुफलप्रदायक कहा गया है। यह मास विष्णु उपासना के साथ शिव उपासना के लिए भी श्रेष्ठ है।

बदल सकती है किस्मत - मदन मोहन परिहार

मानव अपने-अपने भाग्य व कर्म से ही जीवन यापन करता है। मनुष्य को पूर्व जन्म का फल तो मिलता ही है, लेकिन कभी-कभी वर्तमान कर्मो का फल भी उसे भोगना पड़ता है।
हजारों वर्षो से मनुष्य दु:ख-सुख का अनुभव करता रहा है। उसने विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए कई उपाय किए हैं। लोक जीवन में प्रचलित ऐसे ही उपायों की यहां चर्चा की जा रही है। इन उपायों को अपनाकर जीवन में आने वाले संकटों से बचा जा सकता है। ऐसे में यदि मृत्यु साक्षात सामने खड़ी होगी तो भी आपके इस जन्म के संचित कर्मो से मृत्यु योग टल जाएगा। ये साधन जन्म की तारीख के अनुसार अपनाए जा सकते हैं।
जिनकी जन्म तारीख 1, 10, 19, 28 है अर्थात मूलांक एक है तो उन्हें निम्न साधन का उपयोग करना चाहिए - ज्वार, बाजरी, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन सुबह सात मुट्ठी दाना लेकर तीन माह तक खुद चिड़ी-कबूतर को चुगाएं। जिनकी जन्म तारीख 2, 11, 20, 29 है अर्थात मूलांक दो है तो वे ज्वार, बाजरी, चावल की कणी तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी पक्षियों को खिलाएं। 3, 12, 21, 30 को जन्मे तीन मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, चने की दाल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम मिलाकर सात मुट्ठी लेकर चिड़िया व कबूतर को प्रतिदिन दाना डालें।
४, 1३, 2२, 3१ को जन्मे चार मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, काला तिल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी दाना पक्षियों को खिलाएं। इसी प्रकार ५, 1४, 2३ को जन्मे अर्थात पांच मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मूंग तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ६, 1५, 2४ को जन्मे छह मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, सफेद तिल तथा काला उड़द खिलाएं। ७, 1६, 2५ को जन्मे सात मूलांक वाले प्रतिदिन सात मुट्ठी ज्वार, बाजरी, मोठ तथा साबुत काला उड़द पक्षियों को खिलाएं। ८, 1७, 2६ को जन्मे आठ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, राई तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ९, 1८, 2७ को जन्मे नौ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मसूर दाल तथा साबुत काला उड़द खिलाएं।
जिन व्यक्तियों को अपनी जन्मतिथि याद नहीं है, वे नीचे लिखा प्रयोग करें। उन्हें धन की प्राप्ति होने के साथ-साथ तन-मन के सभी प्रकार के कष्ट व तनाव भी शीघ्र दूर हो जाएंगे। ज्वार, बाजरा, मूंग, चावल-कणी, मसूर की दाल, साबुत काला उड़द, चने की दाल, लाल गेहूं व मोठ एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी चिड़ी-कबूतरों को तीन माह तक खिलाएं।
यह करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी व पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। व्यापार में वृद्धि होगी। इच्छुकों के सगाई-शादी के योग बनेंगे तथा संतान प्राप्ति होगी। सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
धन की प्राप्ति के साथ तन-मन के कष्ट व तनाव शीघ्र दूर करने के लिए ज्वार, बाजरा, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी अनाज लेकर सात बार सिर पर घुमाकर घर से बाहर तीन माह तक पक्षियों को डालें।
सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
यदि कामकाज में मन नहीं लगता, व्यापार में क्षति हो रही है, धन की कमी हो रही है तो इसका अर्थ है कि ग्रह स्थितियां आपके अनुकूल नहीं हैं। समस्त वाह्य हालात ठीक दिखने के बावजूद ग्रह स्थितियां विपरीत होने पर मन की दशा ऐसी हो जाती है, जिसे दूर करने का उपाय भी सरल है।
इस तरह बदलें भाग्य
प्रतिदिन प्रात:काल पक्षियों को दाना डालने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी एवं पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। नौकरी व व्यापार में लाभ होगा।

Friday, November 20, 2009

ताकि सुखमय हो दांपत्य

हिंदू संस्कृति में सोलह संस्कार हैं जिसमें विवाह संस्कार मुख्य है। विवाह का सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता है। दांपत्य सुख के अभाव के कई कारण हो सकते हैं। इनमें से हम मुख्य ज्योतिष कारणों का ही वर्णन कर रहे हैं।


< स्त्री या पुरुष की जन्म कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेष का पापी ग्रहों जैसे- राहु, मंगल, शनि और केतु से युक्त।
< सप्तमेष का ६वें, ८वें या १२वें भाव में बैठना।
< पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु ग्रह का दूषित होना।
< मंगल दोष का निवारण न होना।
< गुण मिलान के अंतर्गत १८ गुण से कम होना।
< नाड़ी दोष, गण दोष, नुपूर दोष।
< हस्त रेखा के अंतर्गत बुध पर्वत के निकट सबसे लंबी रेखा को विवाह रेखा कहते हैं। इसका दूषित
होना जैसे:

विवाह रेखा आगे चलकर हृदय रेखा से मिल जाए तो संबंध विच्छेद हो सकता है।
विवाह रेखा आगे चल द्विशाखीत हो जाए तो तलाक हो जाता है।
विवाह रेखा बुध पर्वत के मूल में मुड़ जाए तो जातक का कभी विवाह नहीं होता।
विवाह रेखा पर काला तिल, क्रॉस होना अशुभ लक्षण है।
पूर्व जन्म में पत्नी पर किए गए अत्याचार भी दांपत्य दुख का कारण बनते हैं।
सप्तम भाव में अकेला गुरु ग्रह हानिकारक होता है।


उपाय
< स्त्री जातक पुखराज और पुरुष जातक हीरा या ओपल रत्न धारण करें।
< सप्तमेष और सप्तम भाव में स्थित पापी ग्रहों की शांति करवाएं।
< पुरुष जातक निम्न मंत्र का जाप करें:-


पत्नीं मनोरमां देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार सागस्य कुलोद् भवाम



स्त्रियां भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त तस्वीर रखकर मंत्र का जाप करें।

हे गौरि! शंक्डरार्धाड्रि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरू कल्याणि! कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।



या


ऊँ कात्यायनी देवीय नम:।

शिव ही भैरव - जयगोविंद शास्त्री


वेदोक्ति है कि भैरव शिव: शिव: भैरव अर्थात भैरव ही शिव हैं और शिव ही भैरव हैं। इस तत्व में कोई भेद नहीं है। भगवान भैरव के बारे में कहा गया है कि भैरव: पूर्ण रूपो हि शंकरस्य परात्मन। शिवपुराण में भी भैरव को परमात्मा शिव का रूप ही बताया गया है।


पौराणिक कथा के अनुसार जब सुमेरू पर्वत पर सभी देवताओं ने बrाजी से पूछा- हे परमपिता इस चराचर जगत में अविनाशी तत्व कौन है और जिनका आदि-अंत किसी को भी पता न हो, ऐसे देव के बारे में हम देवताओं को बताने का कष्ट करें? इस पर ब्रrाजी ने कहा- चराचर जगत में अविनाशी तत्व तो केवल मैं ही हूं। इस पर विष्णुदेव ने कहा कि इस संसार का भरण-पोषण मैं करता हूं, इसलिए परमशक्तिमान मैं हूं।


इसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए चारों वेदों को बुलाया गया। वे कहने लगे कि जिनके भीतर समस्त भूत, भविष्य और वर्तमान निहित है और जिनका कोई आदि-अंत नहीं है, जो अजन्मा है, वे तो परम शक्तिमान भगवान रुद्र ही हैं। इस पर ब्रrाजी के पांचवे सिर ने भगवान शिव और माता पार्वती के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कहीं, जिससे चारों वेद अत्यंत दु:खी हुए। इसी समय एक दिव्य ज्योति के रूप में नीललोहित भगवान रुद्र प्रकट हुए, जिसे देखकर ब्रrाजी ने कहा- ‘हे चंद्र शंक, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रुद्र रखा है, अत: तुम मेरी सेवा में आ जाओ।’


ब्रrाजी की इस वाणी से भगवान शिव ने क्रोधित होकर भैरव नामक पुरुष उत्पन्न किया और कहा कि तुम ब्रrा पर शासन करो। पापभक्षण करने के कारण भक्त तुम्हें पापभक्षक के नाम से भी जानेंगे। भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी पांचवी अंगुली के नख से ब्रrाजी का सिर काट लिया, जिसके कारण इन्हें ब्रrाहत्या के पाप से गुजरना पड़ा। शिवलोक काशी में इन्हें ब्रrाहत्या से मुक्ति मिली थी, जहां पर आज भी ‘कपाल मोचन’ तीर्थ है। यहां दर्शन मात्र से ब्रrाहत्या से मुक्ति मिलती है।


भगवान शिव ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। इसके साथ ही भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रrा राक्षस, बेताल, मारण मोहन, उच्चटन विद्वेषण से इनको अपने भक्तों की रक्षा के लिए इन सभी का अधिकारी नियुक्त किया गया। आज भी इनके भक्त इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए इनकी पूजा-आराधना करते हैं। तांत्रिक जगत में इन्हीं की आराधना विशेष तौर पर की जाती है।


इनकी प्रार्थना का मंत्र है अतिक्रूर महाकाय, कल्पान्त दहनोपम् भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि। इसी मंत्र से मानव मात्र का कल्याण हो जाता है। भगवान भैरव शिव के पांचवे अवतार माने जाते हैं। इनका अवतरण मार्ग शीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ। इस दिन इनकी पूजा-आराधना ब्रrाहत्या से मुक्ति दिलाती है। यथा कामं तथा ध्यानं कारयेत साधकोत्म: अर्थात जैसा कार्य हो, साधक को वैसा ही ध्यान करना चाहिए।


इनका सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक, आयु आरोग्य का कारक तथा मोक्ष देने वाला है। राजसिक ध्यान साधना चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि देने वाला है। जबकि भूत-प्रेत ग्रहादि द्वारा शत्रुओं के शमन को तामसिक कहा गया है। इनकी श्रद्धा और विश्वास से की गई उपासना भक्तों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति दिलाती है।


भैरवजी की प्रार्थना का मंत्र
अतिक्रूर महाकाय,
कल्पान्त दहनोपम्
भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि।
इस मंत्र से मानव मात्र का कल्याण होता है।

दंडाधिकारी शनिदेव

शनि सभी ग्रहों से दूर रहकर तुला राशि को अपना उच्च आसन बनाकर, धर्म-अधर्म को न्याय के तराजू में तौलकर आमजन के लिए दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं।
शनि ग्रह का नाम सुनते ही प्राय: भय पैदा होने लगता है, जबकि शनि लोकतांत्रिक पद्धति के पालक तथा संसार की हर चल-अचल वस्तु से संबद्ध होने से आमजन का ग्रह है। शनि जयंती ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को आती है।
शनि के जन्म को लेकर अनेक पौराणिक कथाएं हैं। शनिदेव राम, कृष्ण, हनुमान, पार्वती आदि को भी अपना प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहे। इन कथाओं में शनिग्रह को नकारात्मक या अनिष्ट कारक ग्रह के रूप में अधिक वर्णित कर दिया गया है, वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है।
शनि नवग्रहों में न्यायाधीश हैं। न्यायाधीश कभी भी किसी व्यक्ति से जल्दी प्रभावित नहीं होते, अपितु दूरियां बनाकर चलते हैं। उसी तरह शनि ग्रह भी सभी ग्रहों से दूर रहकर, तुला राशि को अपना उच्च आसन बनाकर, धर्म-अधर्म को न्याय के तराजू में तौलकर आमजन के लिए दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं।
शनि ग्रह मानव के अंत:करण का प्रतीक है। चर्म, श्वास, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, रक्त प्रवाह, अपच, कब्ज, मनोरोग, प्रेतबाधा, अंधापन, मुंह एवं अन्य अंगों से दरुगध आदि अनेक विकारों का कारण शनि होता है।
देर तक सोने वाले, जुआ, सट्टा, शराब, शेयर, प्रॉपर्टी, खनिज पदार्थ आदि में भी इनका पूर्ण हस्तक्षेप रहता है। वास्तव में शनि एक गरीब बुजुर्ग ग्रह हैं, जो सदैव आशीर्वाद देने को आतुर रहते हैं, लेकिन लोग उनकी उपेक्षा करके अपने आपको संकट में डालते रहते हैं।
हमारे शरीर में ऑक्सीजन रहित रक्त को ले जाने वाली शिराओं का स्वामी शनि ही होता है। शनि की भूमिका तन-मन एवं धन तीनों में महत्वपूर्ण होती है। मानव जीवन के सारे कष्टों को हरने वाला एकमात्र शनि ग्रह ही है। यह अलग बात है कि शनि को प्राय: क्रूर ग्रह ही माना जाता है, जबकि शनि हर राशि को अपनी तरह से सहयोग करते हैं।
वायु पुत्र हनुमान ने भगवान राम को हरसंभव सहयोग किया, तो आमजन को भी वायुग्रह शनि हमेशा सहयोगी ही बना रहता है। धोखेबाज, चोर, झूठ बोलने वाले, दुराचारी, अपराधी आदि के लिए शनि मारक समान रहता है, तो साधु संतों, विद्वानों तथा सदाचरण से चलने वालों के लिए सेवक स्वरूप प्रबल कारक ग्रह रहता है।
मार्गी शनि
शनि १७ मई से सिंह राशि में मार्गी हुआ है तथा ९ सितंबर २क्क्९ को कन्या राशि में भरणी नक्षत्र एवं मेष राषि के चंद्रमा में प्रवेश करेगा। ९ सितंबर से पहले कर्क, सिंह एवं कन्या राशि को साढ़े साती शनि चल रहा है तथा मकर एवं वृष राषि को ढैय्या शनि है।
९ सितंबर २क्क्९ से सिंह, कन्या एवं तुला को साढ़े साती तथा कुंभ एवं मिथुन का ढैय्या शनि प्रारंभ हो जाएगा। मकर एवं वृष राशि को तो ढैय्या शनि भी तांबे के पाये पर होने से श्रेष्ठ फलदायक है साथ ही आगामी सितंबर से सिंह, तुला, कुंभ एवं मीन राशि को शनि की साढ़े साती एवं ढैय्या लगेगी जो श्रेष्ठ रहेगी।
कर्क, सिंह एवं कन्या राशि वालों को शनि की प्रसन्नता के लिए घर में या अड़ोस-पड़ोस में किसी अशक्त बुजुर्ग की सेवा करनी चाहिए। अपंग लोगों की सेवा एवं आशीर्वाद से भी शनि का दुष्प्रभाव नष्ट होता है। शनिवार के दिन चमेली के तेल का दीपक हनुमान मंदिर में सूर्यास्त के समय जलाने से भी शनिदेव प्रसन्न रहते हैं।
शनि के प्रभाव
शनि की साढ़े साती एवं ढैय्या हमेशा खराब नहीं होती। शनि जिस दिन राशि बदलता है, उस दिन चंद्रमा जिस राशि पर हो उसके आधार पर सोना, चांदी, तांबा, लोहा आदि का पाया देखकर शनि की ढैय्या या साढ़े साती के फल को समझना चाहिए। चांदी एवं तांबे के पाये पर जब भी शनि की पनोती लगती है, तब बहुत अच्छा फल देती है। सोने एवं लोहे में भी प्रारंभ पनोती यदि महादशा और अंतर्दशा अच्छी हो तो कष्टदायक नहीं होती है। इसके बावजूद न जाने क्यों आमजन ने शनि ग्रह को बदनाम कर रखा है।
इस मंत्र के 23क्क्क् जप करने से भी शनि का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता है -
ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:॥

कैसे मिले संतान सुख ?

संतान सुख जीवन को स्वर्ग बना देता है और इसका दु:ख नर्क। ज्योतिष के आईने में इस सुख को हासिल करना संभव है। अपनी राशि के लग्न का आंकलन कर और जरूरी उपाय अपनाकर संतान सुख प्राप्त करें।


मेष
मेष राशि वालों को संतान प्राप्ति के लिए निम्न उपाय करने चाहिए। रविवार व्रत रखें। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। शुभ मुहूर्त में शुक्ल पक्ष में माणिक्य धारण करें। सत्रह रुपए की सब्जी चौदह बुधवार तक काली गाय को खिलाएं। भोलेनाथ को हर सोमवार पंचमेवा डालकर खीर मंदिर में दें। 16 सोमवार ऐसा करने के बाद संतान संबंधी खुशखबरी अवश्य मिलेगी।

वृष
वृष लग्न की कुंडली में संतान का कारक ग्रह बुध होता है। ऐसे संतान सुख चाहने वाले जातक संतान गोपाल यंत्र अपने पूजा स्थान में स्थापित करें। नित्य ú नमो भगवते वासुदेवाय का जाप तुलसीमाला से करें। चांदी की एक बांसुरी सोमवार को श्रीकृष्ण को चढ़ाएं। बुधवार के दिन हरे रंग की ग्यारह चूड़ियां एवं हरा वस्त्र किन्नरों को दान में दें। बहते हुए जल में तांबे के सात सिक्के प्रवाहित करें। शीघ्र ही शुभ योग बनेगा।

मिथुन
मिथुन लग्न के जातक संतान हेतु शुक्ल पक्ष के बुधवार को पन्ना, हीरा युक्त रत्न शक्ति लॉकेट पहनें। स्फटिक माला धारण करें। हर शुक्रवार आटे के पेड़े में पनीर भरकर काली गाय को दें। गोपाल सहस्रनाम व हरिवंशपुराण का पाठ करें।

कर्क
कर्क लग्न के जातक संतान प्राप्ति हेतु लाल सूती कपड़े में एक मुट्ठी सौंफ बांधकर मंगलवार को अपने शयनकक्ष में रखें। कार्यसिद्धि यंत्र घर के पूजाकक्ष में शुभ मुहूर्त में स्थापित करें। प्रतिदिन मनोभाव से दर्शन एवं प्रार्थना करें। कुत्ते की भी सेवा करें। दूध, रोटी अवश्य खिलाएं।

सिंह
सिंह लग्न की कुंडली में संतान का कारक गुरु ग्रह होता है। ऐसे जातक भगवान विष्णु की उपासना करें। गुरुवार को भूरी गाय को गुड़ व भीगी चने की दाल खिलाएं। पूर्णिमा को किसी ब्राrाण को जनेऊ दान करें। लड्डू गोपाल मंदिर में रखें। प्रतिदिन दूध का भोग लगाएं। ú नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।

कन्या
कन्या लग्न की कुंडली में संतान का कारक ग्रह शनि होता है। ऐसे जातक शनिवार को रोटी पर तेल लगाकर काले कुत्ते को खिलाएं। संतरे का रस शिवलिंग पर चढ़ाएं। घर में नवग्रह हवन कराएं। पांच वस्त्र दक्षिणा समेत दें। भूरे रंग का कुत्ता न पालें। प्रत्येक सोमवार को शिव से संतान सुख की कामना करें। इच्छा पूर्ण होगी।

तुला
संतान के अभिलाषी तुला राशि के जातक शुक्लपक्ष में शनिवार को या शनि पुष्य योग में नीलम धारण करें। 21 शनिवार शिवजी को सवा पाव गन्ने का रस चढ़ाएं। महीने में एक बार मिट्टी के कुल्हड़ में मशरूम किसी मंदिर में रखें।

वृश्चिक
वृश्चिक लग्न के जातक संतान हेतु शुक्र पक्ष के गुरुवार या गुरु पुष्य योग में तर्जनी में पुखराज पहनें। 21 सोमवार शिव के मंदिर में सवा पाव घी चढ़ाएं। इसके पश्चात भगवान को गुलाब का इत्र अर्पित करें। संतान गोपाल यंत्र शुक्ल पक्ष में सोमवार को घर में पीले रेशमी वस्त्र पर स्थापित करें। शिवालय जाकर शिवलिंग पर प्रत्येक सोमवार को ग्यारह लोटे जल चढ़ाएं।

धनु
धनु लग्न के जातक शुक्लपक्ष के प्रथम मंगलवार को स्वर्ण में मूंगा रत्न दाएं हाथ की अनामिका अंगुली में पहनें। 21 मंगलवार हनुमानजी को पान का बीड़ा चढ़ाएं। एक किलो मसूर की दाल हर मंगलवार बहते जल में बहाएं। लड्डू गोपाल की मूर्ति घर में रखें। शुक्ल पक्ष के सोमवार से ú गोपालाय नम: की पांच माला रोज जाप करें।

मकर
संतान सुख के लिए पन्ना, हीरा, नीलम सहित रत्नशक्ति लॉकेट शुक्ल पक्ष के शुभ योग में गले में धारण करें। शुक्र यंत्र अपने पूजा घर में रखें। हर सोमवार को शिव को सवा पाव दूध चढ़ाएं। शुक्रवार को नौ छतरी, नौ कंबल लाएं और शनिवार को गरीबों को बांट दें।

कुंभ लग्न
कुंभ लग्न वाले जातक संतान सुख के लिए शुक्ल पक्ष के बुधवार को चांदी में पन्ना दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में पहनें। संतान गोपाल यंत्र पूजा घर में स्थापित करें। संतान गणपति स्तोत्र का पाठ करें। मोदक का भोग लगाएं व 21 दूर्वा चढ़ाएं। शुक्ल पक्ष के बुधवार के दिन हरे वस्त्र व हरे रंग की ग्यारह चूड़ियां, ग्यारह केले व ग्यारह रुपए किन्नरों को दान में दें। रोज दो रोटी तेल लगाकर गाय को दें।

मीन
मीन लग्न के जातक संतान सुख के लिए शुक्ल पक्ष के सोमवार को दाएं हाथ की छोटी उंगली में शुद्ध चांदी का मोती पहनें। संतान गोपाल मंत्र का जाप करें। मंत्र एक लाख बार जपने से सिद्ध होगा। संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए शुभ योग में वटवृक्ष के पत्ते पर हल्दी से लिखकर बहते जल में छोड़ दें। होली के दिन से प्रतिदिन हनुमानजी को पांच लाल पुष्प व एक अनार चढ़ाएं।

Sunday, November 15, 2009

सोमवती अमावस्या का महत्व

सोमवार और अमावस्या का योग कभी-कभी बनता है। शास्त्रों में सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन भगवान शिव के दर्शन एवं जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है। सोलह नवंबर 2009 विशाखा नक्षत्र में अमावस्या सोमवार प्रात: 11 बजकर 11 मिनट पर धनु लग्न में प्रवेश करेगी।


इस दिन सोमवती अमावस्या और मार्गशीर्ष संक्रांति एक साथ होने से तीर्थो पर स्नान, दान-जाप आदि का महात्म्य बढ़ जाता है। धर्मनिष्ठ लोग इस दिन व्रत का संकल्प लेकर अपने इष्टदेव एवं भगवान विष्णु एवं शिव पूजन करने से आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। अशुभ ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए पीपल वृक्ष की सफाई और गंगाजल युक्त दुग्ध से सींचकर धूप-दीप आदि से पूजन करके कम से कम 7 बार प्रदक्षिणा करना कल्याणकारी होगा।


सुबह संक्रांति की शुभ बेला में ब्राrाणों को दक्षिणा सहित भोजन, वस्त्र, फलों का दान करने का सुअवसर प्राप्त होगा। मार्गशीर्ष माह में पांच मंगलवार, राहु-केतु का राशि परिवर्तन और सूर्य के राशि परिवर्तन से विभिन्न राशियों के जातकों पर भिन्न-भिन्न असर पड़ेगा। ग्रहों का शुभ व अशुभ प्रभाव जीवन को पूर्ण प्रभावित करता है। ग्रह ईश्वर के प्रतिनिधि हैं जो जीवात्माओं के कर्म फल का भुगतान कर जीवात्मा को शुद्ध व पवित्र बनाने का कार्य करते हैं। ग्रहों द्वारा अशांति व अनिष्टों से छुटकारा पाने के लिए हमें ईश्वर ने कई अवसर प्रदान किए हैं। सोमवती अमावस्या एवं संक्रांति बेला एक साथ आकर यह सुअवसर प्रदान कर रही है।


सोमवती अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करके तुलसीजी, शंकर-पार्वतीजी की विधि-विधान सहित पूजा करके मां गौरी को सिंदूर चढ़ा श्रंगार की वस्तुएं श्रद्धापूर्वक भेंट करनी चाहिए। पूजा के बाद चढ़ाए हुए सिंदूर में से थोड़ा लेकर सुहागिनें अपनी मांग में भरकर मां पार्वतीजी से अखंड सुहाग एवं सौभाग्य के लिए प्रार्थना करें। यह पुण्यकाल देवताओं को भी दुर्लभ होता है। इस दिन व्रत करने वाले प्रात:काल उठकर स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पीपल वृक्ष के समीप जाकर उसकी जड़ सहित भगवान विष्णु का पूजन करें।



गोविंदजी के पूजन में पीले वस्त्र, अक्षत, फूल, फल तथा नैवेद्य इत्यादि पदार्थो का प्रयोग किया जाता है। इस समय कई प्रकार के रत्न, सोना, चांदी, हीरा-मोती मणियों को हाथ में लेकर भी पूजा की जाती है। यदि सामथ्र्य न हो तो फल, पुष्प, नैवेद्य, वस्त्रादि से तांबे का पात्र या एक सुपारी से भी 107 प्रदक्षिणा पूर्ण की जा सकती हैं। पूजा के समापन पर सभी वस्तुएं ब्राrाण को दान कर देनी चाहिए। इस प्रकार किए गए व्रत से कुंवारी कन्याओं को अच्छा वर एवं सुहागिन स्त्रियों को सुपुत्र एवं धन की प्राप्ति होती है।


मां गौरी को ऐसे करें प्रसन्न


विभिन्न राशियों के जातक कुछ उपयोगी उपाय करके ग्रहों की अशुभता को दूर कर सकते हैं। भगवान शिव-पार्वती व विष्णु की आराधना कर अखंड सौभाग्य एवं निरोगी काया प्राप्त करें।

मेष- मां पार्वती को लाल चुनरी व श्रंगार की वस्तुएं अर्पित करें। गुड़ व मसूर की दाल की पोटली बनाकर संध्या के समय किसी गरीब या भिखारी को दें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व पीले पुष्प अर्पित करें।


वृष- मां पार्वती को गुलाबी रंग की चुनरी भेंट करें। चांदी के लोटे में गंगाजल व तुलसी के पत्ते को डालकर भगवान विष्णु को जल अर्पण करें। सफेद चावल सफेद कपड़े में बांधकर एक पोटली सुबह किसी गरीब स्त्री को दान करें। सफेद बर्फी का भगवान विष्णु को भोग लगाएं।


मिथुन- मां पार्वती को हरे रंग की चुनरी और मेंहदी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला अर्पण करना शुभ होगा। मिश्री और इलायची का भोग लगाएं। पोटली में मूंग की दाल बांधकर प्रात:काल ब्राrाण को दान करें।


कर्क- मां पार्वती को लाल रंग की चुनरी और पीली चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को चंदन का टीका व पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। दूध और पोटली में चावल या चीनी का दान किसी ब्राrाणी को करें।


सिंह- सुनहरी या नारंगी रंग की चुनरी मां पार्वती को भेंट करें। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पण करें। बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। एक पोटली में गुड़ व गेहूं बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।


कन्या- मां गौरी को हरे रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला व पेठा भोग लगाएं। मिश्री और इलायची भी भेंट करें। हरी मूंग व पांच इलायची हरी पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।


तुला- मां गौरी को गुलाबी या आसमानी रंग की चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को मिश्री व तुलसी के पत्ते अर्पण करें। चावल व चीनी सफेद वस्त्र में बांधकर किसी महिला या ब्राrाणी को दान करें। बर्फी का भोग लगाकर पांच कन्याओं को प्रसाद भी दें।


वृश्चिक- मां गौरी को लाल या पीली चुनरी भेंट करें। भगवान विष्णु को लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। गुड़ व गेहूं एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें। भगवान विष्णु को पीले पुष्प अर्पण करें।


धनु- मां गौरी को पीली चुनरी, लाल चूड़ियां भेंट करें। भगवान विष्णु को बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं। पीतांबरी वस्त्र भेंट करें। पीली चने की दाल, हल्दी की गांठ, गुड़ पीले वस्त्र में बांधकर विद्वान ब्राrाण को दान करें ।


मकर- हरी चुनरी और मेंहदी मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते व मिश्री भेंट करें। तुलसी की माला भेंट करें। उड़द की दाल व गुड़ पोटली में बांधकर किसी असहाय गरीब व्यक्ति को दान करें।


कुंभ- हरी चुनरी और हरी चूड़ियां मां गौरी को भेंट करें। भगवान विष्णु को तुलसी के पत्तों की माला चढ़ाएं। बर्फी का भोग लगाएं। उड़द की दाल व गुड़ किसी गरीब भिखारी को दान करें।

मीन- मां गौरी को पीले या लाल रंग की चुनरी चढ़ाएं। भगवान विष्णु को पीले फूलों की माला अर्पित करें। बेसन की बर्फी का भोग लगाएं। पीली चने की दाल, गुड़ व हल्दी एक पोटली में बांधकर किसी ब्राrाण को दान करें।