चेचक के उपचार हेतु वैज्ञानिक एवं डॉक्टरों ने बहुत बल दिया। इसका इलाज औषधियों से ही हो सकता है, किन्तु वे पूर्णत: सफल नहीं हुए। क्योंकि जिस प्रकार कपड़ों में लगी मैल को साबुन धो सकता है किन्तु काई को नहीं छुड़ा पाता है।
यदि कोई मूर्ख तेजाब से कपड़े की काई को निकालने का प्रयास करता है तो परिणाम स्वरूप कपड़ा ही नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार यदि कोई डॉक्टर अपनी दवाओं द्वारा किसी चेचक के रोगी का इलाज करता है तो वह रोगी के जीवन के साथ मजाक करता है। चेचक का रोग शरीर के अंदरूनी भाग से पूरे शरीर पर एक साथ प्रकट होता हे।
ब्राम्ही, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी एवम चामुण्डा ये सात माताएं हैं। इनमें चामुण्डा का स्वरूप सबसे घातक होता है। सात स्टेज वाले इस रोग में प्रथम स्टेज की देवी ब्राम्ही है। चौथे स्टेज तक कोई खतरा नहीं रहता है अर्थात चौथे स्टेज तक जातक के प्राण जाने का खतरा नहीं होता है लेकिन इसके बाद जीवन खतरे में पड़ जाता है।
कौमारी में एक बार विस्फोट होता है, जो नाभि तक दिखाई देता है। वाराही का आक्रमण मंद गति से होता है। अत: इसे मन्थज्वर भी कहते हैं तथा चामुण्डा के आक्रमण से रोगी की दुर्गति हो जाती है। जीभ, आँख, नाक, मुंह पर पूरा प्रकोप होता है। चामुण्डा से आक्रान्त रोगी शव के समान हो जाता है। गधे पर सवार हाथ में झाडू लिए हुए नग्न रूप धारी शीतला माता को हमारा नमस्कार।
Saturday, November 21, 2009
मंत्र साधना से मिलता है परम आनंद - प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी
मंत्र विज्ञान मंत्र एक गूढ़ ज्ञान है। सद्गुरु की कृपा एवं मन को एकाग्र कर जब इसको जान लिया जाता है, तब यह साधक की सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है। मंत्रागम के अनुसार दैवी शक्तियों का गूढ़ रहस्य मंत्र में अंतर्निहित है। व्यक्ति की प्रसुप्त या विलुप्त शक्ति को जगाकर उसका दैवीशक्ति से सामंजस्य कराने वाला गूढ़ ज्ञान मंत्र कहलाता है। यह ऐसी गूढ़ विद्या है जो साधकों को दु:खों से मुक्त कर न केवल उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है, बल्कि उनको परम आनंद तक ले जाती है। मंत्र विद्या विश्व के सभी देशों, मानवजाति, धर्माें एवं संप्रदायों में हजारों-लाखों वर्षो से आस्था एवं विश्वास के साथ प्रचलित है।
मंत्रों के प्रकार
मंत्र दो प्रकार के होते हैं- वैदिक मंत्र एवं तांत्रिक मंत्र। वैदिक संहिताओं की समस्त ऋचाएं वैदिक मंत्र कहलाती हैं और तंत्रागमों में प्रतिपादित मंत्र तांत्रिक मंत्र कहलाते हैं। तांत्रिक मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— बीज मंत्र, नाम मंत्र एवं माला मंत्र। बीज मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं— मौलिक बीज, यौगिक बीज तथा कूट बीज। इसी तरह माला मंत्र दो प्रकार के होते हैंे— लघु माला मंत्र एवं बृहद माला मंत्र।
बीज मंत्र
दैवी या आध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्ति देने वाला संकेताक्षर बीज कहलाता है। इसकी शक्ति एवं रूप अनंत हैं। बीज मंत्र विभिन्न देवताओं, धर्मो एवं उनके संप्रदायों की साधनाओं के माध्यम से साधक को भिन्न-भिन्न प्रकार के रहस्यों से परिचित करवाता है। शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, जैन एवं बौद्ध धर्मो के सभी संप्रदायों में ‘ह्रीं’, ‘कलीं’ एवं ‘श्रीं’ आदि बीजों का मंत्रसाधना में समान रूप से प्रयुक्त होना इसका साक्ष्य है।
बीज मंत्र समस्त अर्थो का वाचक एवं बोधक होने के बावजूद अपने आपमें गूढ़ है। अपने आराध्य देव का समस्त स्वरूप इसके बीज मंत्र में निहित होता है। ये बीज मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— मौलिक, यौगिक व कूट। इनको कुछ आचार्य एकाक्षर, बीजाक्षर एवं घनाक्षर भी कहते हैं। जब बीज अपने मूल रूप में रहता है तब मौलिक बीज कहलाता है, जैसे- ऐं, यं, रं, लं, वं, क्षं आदि। जब यह बीज दो वर्षो के योग से बनता है, तब यौगिक कहलाता है, जैसे- ह्रीं, क्लीं, श्रीं, स्त्रीं, क्ष्रौं आदि।
इसी तरह जब बीज तीन या उससे अधिक वर्षो से बनता है, तब यह कूट बीज कहलाता है। यह श्रीविद्या, जैन एवं बौद्ध मंत्रों में अधिक मिलते हंै। खास बात यह है कि बीज मंत्रों में समग्र शक्ति विद्यमान होते हुए भी गुप्त रहती है।
नाम मंत्र
बीज रहित मंत्रों को नाम मंत्र कहते हैं, जैसे- ‘ú नम: शिवाय’, ‘ú नमो नारायणाय’ एवं ‘ú नमो भगवते वासुदेवाय’ आदि। इन मंत्रों के शब्द उनके देवता, उनके रूप एवं उनकी शक्ति को अभिव्यक्ति देने में समर्थ होते हैं। इसलिए इन मंत्रों को भक्तिभाव से कभी भी सुमिरन किया जा सकता है।
माला मंत्र कुछ आचार्यो के अनुसार 20 अक्षरों से अधिक और अन्य आचार्यो के अनुसार 32 अक्षरों से अधिक अक्षर वाला मंत्र माला मंत्र कहलाता है, जैसे- ‘ú क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।’
माला मंत्रों के वर्णो की पूर्व मर्यादा २क् या ३२ अक्षर हैं, लेकिन इनकी उत्तर मर्यादा का मंत्रशास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए माला मंत्र कभी-कभी छोटे और कभी-कभी अपेक्षाकृत अधिक लंबे होते हैं।
मंत्रों के प्रकार
मंत्र दो प्रकार के होते हैं- वैदिक मंत्र एवं तांत्रिक मंत्र। वैदिक संहिताओं की समस्त ऋचाएं वैदिक मंत्र कहलाती हैं और तंत्रागमों में प्रतिपादित मंत्र तांत्रिक मंत्र कहलाते हैं। तांत्रिक मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— बीज मंत्र, नाम मंत्र एवं माला मंत्र। बीज मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं— मौलिक बीज, यौगिक बीज तथा कूट बीज। इसी तरह माला मंत्र दो प्रकार के होते हैंे— लघु माला मंत्र एवं बृहद माला मंत्र।
बीज मंत्र
दैवी या आध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्ति देने वाला संकेताक्षर बीज कहलाता है। इसकी शक्ति एवं रूप अनंत हैं। बीज मंत्र विभिन्न देवताओं, धर्मो एवं उनके संप्रदायों की साधनाओं के माध्यम से साधक को भिन्न-भिन्न प्रकार के रहस्यों से परिचित करवाता है। शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, जैन एवं बौद्ध धर्मो के सभी संप्रदायों में ‘ह्रीं’, ‘कलीं’ एवं ‘श्रीं’ आदि बीजों का मंत्रसाधना में समान रूप से प्रयुक्त होना इसका साक्ष्य है।
बीज मंत्र समस्त अर्थो का वाचक एवं बोधक होने के बावजूद अपने आपमें गूढ़ है। अपने आराध्य देव का समस्त स्वरूप इसके बीज मंत्र में निहित होता है। ये बीज मंत्र तीन प्रकार के होते हैं— मौलिक, यौगिक व कूट। इनको कुछ आचार्य एकाक्षर, बीजाक्षर एवं घनाक्षर भी कहते हैं। जब बीज अपने मूल रूप में रहता है तब मौलिक बीज कहलाता है, जैसे- ऐं, यं, रं, लं, वं, क्षं आदि। जब यह बीज दो वर्षो के योग से बनता है, तब यौगिक कहलाता है, जैसे- ह्रीं, क्लीं, श्रीं, स्त्रीं, क्ष्रौं आदि।
इसी तरह जब बीज तीन या उससे अधिक वर्षो से बनता है, तब यह कूट बीज कहलाता है। यह श्रीविद्या, जैन एवं बौद्ध मंत्रों में अधिक मिलते हंै। खास बात यह है कि बीज मंत्रों में समग्र शक्ति विद्यमान होते हुए भी गुप्त रहती है।
नाम मंत्र
बीज रहित मंत्रों को नाम मंत्र कहते हैं, जैसे- ‘ú नम: शिवाय’, ‘ú नमो नारायणाय’ एवं ‘ú नमो भगवते वासुदेवाय’ आदि। इन मंत्रों के शब्द उनके देवता, उनके रूप एवं उनकी शक्ति को अभिव्यक्ति देने में समर्थ होते हैं। इसलिए इन मंत्रों को भक्तिभाव से कभी भी सुमिरन किया जा सकता है।
माला मंत्र कुछ आचार्यो के अनुसार 20 अक्षरों से अधिक और अन्य आचार्यो के अनुसार 32 अक्षरों से अधिक अक्षर वाला मंत्र माला मंत्र कहलाता है, जैसे- ‘ú क्लीं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।’
माला मंत्रों के वर्णो की पूर्व मर्यादा २क् या ३२ अक्षर हैं, लेकिन इनकी उत्तर मर्यादा का मंत्रशास्त्र में उल्लेख नहीं मिलता। इसलिए माला मंत्र कभी-कभी छोटे और कभी-कभी अपेक्षाकृत अधिक लंबे होते हैं।
कुंडली से जानें विद्या-कैरियर के योग - डॉ. रामनरेश त्रिपाठी
ग्रह अध्ययन. बालक हो अथवा बालिका, प्रत्येक जातक का भविष्य ‘आधान’ अर्थात् गर्भधारण के साथ ही सुनिश्चित हो जाता है। उस समय की कुंडली ‘आधान’ कुंडली कहलाती है। जन्म के समय जो ग्रह-नक्षत्र होते है, उस समय की कुंडली ‘जन्म कुंडली’ कही जाती है। इन कुंडलियों के आधार पर ही प्रत्येक जातक की ‘मेधा’ (बुद्धि) सुनिश्चित होती है। माता-पिता तथा अनेक पीढ़ियों के ‘जींस’ भी जातक के भविष्य के साथ जुड़े होते हैं। ‘जातक’ के रक्त तथा उसकी संरचना में इनका प्रभाव देखने को मिलता है। बालक-बालिका के पूर्व जन्म के कर्म, संस्कार, जिस घर में उसका जन्म हुआ है, उसके कुल तथा वर्तमान परिवेश यानी ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव से बुद्धि, आयु, कर्म आदि का निर्धारण होता है।
इसी आधार पर हमें स्कूल-कॉलेजों की परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों के भविष्य का भी अध्ययन करना चाहिए। बच्चों की पढ़ाई में स्थान विशेष का महत्व अधिक होता है। यदि उनका पढ़ाई का कक्ष अध्ययन की दृष्टि से अच्छा नहीं है, उसमें ‘वास्तुदोष’ है तो निश्चय ही इसका उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ेगा। विद्यार्थियों को ऐसे दोषों से बचना चाहिए। उन्हें पूर्व की ओर सिर करके सोना चाहिए, इससे उन्हें विद्या प्राप्त होगी।
प्राक शिर: शयने विद्याद्धन मायुंचदक्षिणो।
पश्चिमे प्रबलाचिंता हानिमृत्युरथोत्तरे।।
दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि, पश्चिम की ओर सिर करके सोना चिन्ताकारक तथा उत्तर में सिर करके सोने से हानि तथा आयु क्षीण होती है, विद्यार्थी इस बात का ध्यान रखें। परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी को पूर्व अथवा ईशान कोण की ओर मुख करके मंजन अथवा दातून करना चाहिए इससे उनमें धैर्य बढ़ेगा एवं शरीर निरोग रहेगा। कामनाओं की सिद्धि होगी।
प्राड्मुखस्य धृति:सौख्यं शरीरारोग्य मेवचं..
पूवरेत्तरें तु दिग्भागें सर्वान्कामान् वाप्नुयात्।।
इसी प्रकार पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से बल और बुद्धि बढ़ेगी। अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा से भयभीत होते हैं। जिन छात्र-छात्राओं का चंद्रमा कमजोर है व पाप ग्रहों के साथ अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि से युक्त है, उन्हें मानसिक दुर्बलता के कारण परीक्षा से भय लगने लगता है। ऐसे विद्यार्थियों को चाहिए कि वे शिव मंदिर में दर्शन कर परीक्षा में जाएं। बेल पत्र, दुग्ध आदि से पूजन कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा। वे मोती भी धारण कर सकते हैं। चौथा घर मेधा तथा पंचम विद्या के आत्मसात करने का है। इन दोनों घरों में किसी पाप ग्रह की दृष्टि है तो उसे दूर कर लेना चाहिए।
वार का दोष निवारण
वार के दोष को दूर करने के लिए सोम को दर्पण में मुख देखना और मंगलवार को धनिया को प्रयोग कर जाना चाहिए। बुध को मीठा, बृहस्पति को राई, शनि को घी आदि का सेवन कार्य में सिद्धि प्रदान करते हैं। परीक्षा में जाने से पूर्व माता-पिता, गुरु का पैर छूकर जाना बल-बुद्धि प्रदान करने में सहायक होता है। प्रात:काल उठकर स्वयं की हथेली का दर्शन करना भी शुभ है। परीक्षा में जाते समय इष्ट देवता को चढ़े हुए फूल को अपनी जेब में रखें, इससे आपके मन का विश्वास बना रहेगा और घबराहट भी नहीं होगी। आप वार की दृष्टि से अपने कपड़े भी पहन सकते हैं। वार का संबंध ग्रहों से है। रविवार को गुलाबी, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरे, गुरुवार को पीले, शुक्रवार को आसमानी व चमकदार सफेद तथा शनिवार को काले वस्त्र धारण कर विद्यार्थी परीक्षा देने जा सकते हैं।
अध्ययन में मुहूर्त का प्रभाव
किसी भी शुभ कार्य में मुहूर्त का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। प्रात:काल चार से छह बजे को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। इस काल में अध्ययन करने से विद्या अर्जन की क्षमता में वृद्धि होती है और वाणी में प्रखरता आती है। बुद्धि के स्वामी गणोश हैं जबकि बुध वाणी का ग्रह है। वाक परीक्षा के लिए जाएं तो गणोश जी का ध्यान करें। राहु इंजीनियरिंग की दिशा में ले जाता है। शुक्र कॉमर्स, व्यावसायिक शिक्षा तथा कला से जोड़ता है। सूर्य प्रशासन, मंगल सेना व पुलिस विभाग से जोड़ता है। इसी तरह गुरु उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायक होता है। शनि व बुध, तकनीकी क्षेत्र व कंप्यूटर आदि से, चंद्रमा रसायन व वनस्पति तथा मंगल व शनि मेडिकल क्षेत्र से संबंधित हैं। विद्यार्थियों को ग्रहों के अनुकू ल ही फल प्राप्त होता है। फल की प्राप्ति नवें घर से मिलती है। परीक्षा में जाते समय वार अर्थात दिन का ध्यान रखें, यदि दिन अच्छा नहीं है तो दोष का परिहार कर दही, पेड़ा का सेवन शुभ माना गया है।
इसी आधार पर हमें स्कूल-कॉलेजों की परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों के भविष्य का भी अध्ययन करना चाहिए। बच्चों की पढ़ाई में स्थान विशेष का महत्व अधिक होता है। यदि उनका पढ़ाई का कक्ष अध्ययन की दृष्टि से अच्छा नहीं है, उसमें ‘वास्तुदोष’ है तो निश्चय ही इसका उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ेगा। विद्यार्थियों को ऐसे दोषों से बचना चाहिए। उन्हें पूर्व की ओर सिर करके सोना चाहिए, इससे उन्हें विद्या प्राप्त होगी।
प्राक शिर: शयने विद्याद्धन मायुंचदक्षिणो।
पश्चिमे प्रबलाचिंता हानिमृत्युरथोत्तरे।।
दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि, पश्चिम की ओर सिर करके सोना चिन्ताकारक तथा उत्तर में सिर करके सोने से हानि तथा आयु क्षीण होती है, विद्यार्थी इस बात का ध्यान रखें। परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी को पूर्व अथवा ईशान कोण की ओर मुख करके मंजन अथवा दातून करना चाहिए इससे उनमें धैर्य बढ़ेगा एवं शरीर निरोग रहेगा। कामनाओं की सिद्धि होगी।
प्राड्मुखस्य धृति:सौख्यं शरीरारोग्य मेवचं..
पूवरेत्तरें तु दिग्भागें सर्वान्कामान् वाप्नुयात्।।
इसी प्रकार पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से बल और बुद्धि बढ़ेगी। अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा से भयभीत होते हैं। जिन छात्र-छात्राओं का चंद्रमा कमजोर है व पाप ग्रहों के साथ अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि से युक्त है, उन्हें मानसिक दुर्बलता के कारण परीक्षा से भय लगने लगता है। ऐसे विद्यार्थियों को चाहिए कि वे शिव मंदिर में दर्शन कर परीक्षा में जाएं। बेल पत्र, दुग्ध आदि से पूजन कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा। वे मोती भी धारण कर सकते हैं। चौथा घर मेधा तथा पंचम विद्या के आत्मसात करने का है। इन दोनों घरों में किसी पाप ग्रह की दृष्टि है तो उसे दूर कर लेना चाहिए।
वार का दोष निवारण
वार के दोष को दूर करने के लिए सोम को दर्पण में मुख देखना और मंगलवार को धनिया को प्रयोग कर जाना चाहिए। बुध को मीठा, बृहस्पति को राई, शनि को घी आदि का सेवन कार्य में सिद्धि प्रदान करते हैं। परीक्षा में जाने से पूर्व माता-पिता, गुरु का पैर छूकर जाना बल-बुद्धि प्रदान करने में सहायक होता है। प्रात:काल उठकर स्वयं की हथेली का दर्शन करना भी शुभ है। परीक्षा में जाते समय इष्ट देवता को चढ़े हुए फूल को अपनी जेब में रखें, इससे आपके मन का विश्वास बना रहेगा और घबराहट भी नहीं होगी। आप वार की दृष्टि से अपने कपड़े भी पहन सकते हैं। वार का संबंध ग्रहों से है। रविवार को गुलाबी, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरे, गुरुवार को पीले, शुक्रवार को आसमानी व चमकदार सफेद तथा शनिवार को काले वस्त्र धारण कर विद्यार्थी परीक्षा देने जा सकते हैं।
अध्ययन में मुहूर्त का प्रभाव
किसी भी शुभ कार्य में मुहूर्त का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। प्रात:काल चार से छह बजे को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। इस काल में अध्ययन करने से विद्या अर्जन की क्षमता में वृद्धि होती है और वाणी में प्रखरता आती है। बुद्धि के स्वामी गणोश हैं जबकि बुध वाणी का ग्रह है। वाक परीक्षा के लिए जाएं तो गणोश जी का ध्यान करें। राहु इंजीनियरिंग की दिशा में ले जाता है। शुक्र कॉमर्स, व्यावसायिक शिक्षा तथा कला से जोड़ता है। सूर्य प्रशासन, मंगल सेना व पुलिस विभाग से जोड़ता है। इसी तरह गुरु उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायक होता है। शनि व बुध, तकनीकी क्षेत्र व कंप्यूटर आदि से, चंद्रमा रसायन व वनस्पति तथा मंगल व शनि मेडिकल क्षेत्र से संबंधित हैं। विद्यार्थियों को ग्रहों के अनुकू ल ही फल प्राप्त होता है। फल की प्राप्ति नवें घर से मिलती है। परीक्षा में जाते समय वार अर्थात दिन का ध्यान रखें, यदि दिन अच्छा नहीं है तो दोष का परिहार कर दही, पेड़ा का सेवन शुभ माना गया है।
माघ स्नान की महिमा - डॉ. शालिनी सक्सेना
पौष शुक्ल पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा तक माघ स्नान करने का शास्त्रीय विधान है, लेकिन ज्यादातर चंद्रमास के अनुसार ही माघ स्नान का विधान किया गया है -
एकादश्यां शुक्लपक्षे पौषमासे समारभेत्।
माघमास में सूर्योदय के समय जल अत्यंत पवित्र होता है और उसमें तीनों प्रकार के पापों के विनाश की शक्ति होती है-
माघमासे रटन्त्याप: किंचिदभ्युदिते रवौ।
ब्रrाघ्नं वा सुरापं वा कं पतन्तं पुनीमहे॥
इस समय तीर्थजल में स्नान से ब्रrाघाती, शराबी और पतित भी पवित्र हो जाते हैं। जो व्यक्ति माघ मास में प्रात: समय सूर्य की किरणों से संतप्त नदी के प्रवाह में स्नान करता है, वह माता-पिता के वंश की सात-सात पीढ़ियों का उद्धार करके स्वयं देवरूप होकर स्वर्ग जाता है।
स्नान का सवरेत्तम समय अरुणोदय (सूर्योदय से एक घंटा छत्तीस मिनट पूर्व) माना गया है। इस समय स्नान करने वाला देवताओं में पूजित होता है। तारों की छांव में स्नान उत्तम, तारे छिपने पर स्नान मध्यम व सूर्योदय होने पर स्नान अधम कहा गया है।
गर्मजल से स्नान पर छह वर्ष के स्नान का फल मिलता है। बावड़ी में स्नान से बारह वषर्, तालाब में स्नान से २४ वषर्, नदी में इसका चौगुना, महानदी में सौ गुना, महानदी संगम में इससे चौगुना, गंगा में हजार गुना और गंगा-यमुना के संगम में स्नान से लाख गुना स्नान का फल प्राप्त होता है।
माघ स्नान को पुण्यदायी माना गया है। पुराण में लिखा है कि पौषशुक्ल एकादशी से लेकर माघ शुक्ल एकादशी तक, मास भर भूमि पर शयन करें, निराहार रहें और तीनों समय स्नान करें। भोग- विलास त्यागकर तीनों समय भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। माघ मास में स्नान से यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस मास में प्रयाग स्नान अति श्रेष्ठ माना गया है। इस स्नान से कई जन्मों के पापों का नाश हो जाता है।
यदि प्रयाग में स्नान संभव न हो तो किसी भी तीर्थ में प्रयाग का स्मरण कर स्नान करने से गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है। जो पूरे मास स्नान करने में असमर्थ हो वह शुरू के तीन दिन या आखिर के तीन दिन या कोई भी तीन दिन स्नान कर सकता है। यह स्नान विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
जो मनुष्य माघ में निरंतर भक्ति भाव से स्नान करता है, उसे पौण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। उसके किए पाप स्नान के जल में चले जाते हैं। विष्णु का पूजन कर व्रती तिल से स्नान, उबटन, होम, तर्पण, दान एवं तिल का भोजन करें। पितरों व देवताओं को मूली नहीं चढ़ानी चाहिए और न ही मूली खानी चाहिए। स्नान करने वाले को आग तापना भी निषेध किया गया है।
अग्नि में होम करना चाहिए तथा प्रतिदिन तिल व शक्कर दान करना चाहिए। यह मास तपस्वियों को प्रिय है। इसमें स्नान से महापातकी भी पाप मुक्त हो जाते हैं। माघ स्नान के विषय में कहा गया है कि जो मनुष्य मरने के उपरांत कष्ट नहीं चाहता, उसे यह स्नान करना चाहिए। माघ मास के दौरान जल में देवताओं का तेज विद्यमान रहता है, इसलिए माघ स्नान को बहुफलप्रदायक कहा गया है। यह मास विष्णु उपासना के साथ शिव उपासना के लिए भी श्रेष्ठ है।
बदल सकती है किस्मत - मदन मोहन परिहार
मानव अपने-अपने भाग्य व कर्म से ही जीवन यापन करता है। मनुष्य को पूर्व जन्म का फल तो मिलता ही है, लेकिन कभी-कभी वर्तमान कर्मो का फल भी उसे भोगना पड़ता है।
हजारों वर्षो से मनुष्य दु:ख-सुख का अनुभव करता रहा है। उसने विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए कई उपाय किए हैं। लोक जीवन में प्रचलित ऐसे ही उपायों की यहां चर्चा की जा रही है। इन उपायों को अपनाकर जीवन में आने वाले संकटों से बचा जा सकता है। ऐसे में यदि मृत्यु साक्षात सामने खड़ी होगी तो भी आपके इस जन्म के संचित कर्मो से मृत्यु योग टल जाएगा। ये साधन जन्म की तारीख के अनुसार अपनाए जा सकते हैं।
जिनकी जन्म तारीख 1, 10, 19, 28 है अर्थात मूलांक एक है तो उन्हें निम्न साधन का उपयोग करना चाहिए - ज्वार, बाजरी, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन सुबह सात मुट्ठी दाना लेकर तीन माह तक खुद चिड़ी-कबूतर को चुगाएं। जिनकी जन्म तारीख 2, 11, 20, 29 है अर्थात मूलांक दो है तो वे ज्वार, बाजरी, चावल की कणी तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी पक्षियों को खिलाएं। 3, 12, 21, 30 को जन्मे तीन मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, चने की दाल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम मिलाकर सात मुट्ठी लेकर चिड़िया व कबूतर को प्रतिदिन दाना डालें।
४, 1३, 2२, 3१ को जन्मे चार मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, काला तिल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी दाना पक्षियों को खिलाएं। इसी प्रकार ५, 1४, 2३ को जन्मे अर्थात पांच मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मूंग तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ६, 1५, 2४ को जन्मे छह मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, सफेद तिल तथा काला उड़द खिलाएं। ७, 1६, 2५ को जन्मे सात मूलांक वाले प्रतिदिन सात मुट्ठी ज्वार, बाजरी, मोठ तथा साबुत काला उड़द पक्षियों को खिलाएं। ८, 1७, 2६ को जन्मे आठ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, राई तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ९, 1८, 2७ को जन्मे नौ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मसूर दाल तथा साबुत काला उड़द खिलाएं।
जिन व्यक्तियों को अपनी जन्मतिथि याद नहीं है, वे नीचे लिखा प्रयोग करें। उन्हें धन की प्राप्ति होने के साथ-साथ तन-मन के सभी प्रकार के कष्ट व तनाव भी शीघ्र दूर हो जाएंगे। ज्वार, बाजरा, मूंग, चावल-कणी, मसूर की दाल, साबुत काला उड़द, चने की दाल, लाल गेहूं व मोठ एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी चिड़ी-कबूतरों को तीन माह तक खिलाएं।
यह करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी व पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। व्यापार में वृद्धि होगी। इच्छुकों के सगाई-शादी के योग बनेंगे तथा संतान प्राप्ति होगी। सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
धन की प्राप्ति के साथ तन-मन के कष्ट व तनाव शीघ्र दूर करने के लिए ज्वार, बाजरा, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी अनाज लेकर सात बार सिर पर घुमाकर घर से बाहर तीन माह तक पक्षियों को डालें।
सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
यदि कामकाज में मन नहीं लगता, व्यापार में क्षति हो रही है, धन की कमी हो रही है तो इसका अर्थ है कि ग्रह स्थितियां आपके अनुकूल नहीं हैं। समस्त वाह्य हालात ठीक दिखने के बावजूद ग्रह स्थितियां विपरीत होने पर मन की दशा ऐसी हो जाती है, जिसे दूर करने का उपाय भी सरल है।
इस तरह बदलें भाग्य
प्रतिदिन प्रात:काल पक्षियों को दाना डालने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी एवं पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। नौकरी व व्यापार में लाभ होगा।
हजारों वर्षो से मनुष्य दु:ख-सुख का अनुभव करता रहा है। उसने विषम परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए कई उपाय किए हैं। लोक जीवन में प्रचलित ऐसे ही उपायों की यहां चर्चा की जा रही है। इन उपायों को अपनाकर जीवन में आने वाले संकटों से बचा जा सकता है। ऐसे में यदि मृत्यु साक्षात सामने खड़ी होगी तो भी आपके इस जन्म के संचित कर्मो से मृत्यु योग टल जाएगा। ये साधन जन्म की तारीख के अनुसार अपनाए जा सकते हैं।
जिनकी जन्म तारीख 1, 10, 19, 28 है अर्थात मूलांक एक है तो उन्हें निम्न साधन का उपयोग करना चाहिए - ज्वार, बाजरी, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन सुबह सात मुट्ठी दाना लेकर तीन माह तक खुद चिड़ी-कबूतर को चुगाएं। जिनकी जन्म तारीख 2, 11, 20, 29 है अर्थात मूलांक दो है तो वे ज्वार, बाजरी, चावल की कणी तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी पक्षियों को खिलाएं। 3, 12, 21, 30 को जन्मे तीन मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, चने की दाल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम मिलाकर सात मुट्ठी लेकर चिड़िया व कबूतर को प्रतिदिन दाना डालें।
४, 1३, 2२, 3१ को जन्मे चार मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, काला तिल तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी दाना पक्षियों को खिलाएं। इसी प्रकार ५, 1४, 2३ को जन्मे अर्थात पांच मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मूंग तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ६, 1५, 2४ को जन्मे छह मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, सफेद तिल तथा काला उड़द खिलाएं। ७, 1६, 2५ को जन्मे सात मूलांक वाले प्रतिदिन सात मुट्ठी ज्वार, बाजरी, मोठ तथा साबुत काला उड़द पक्षियों को खिलाएं। ८, 1७, 2६ को जन्मे आठ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, राई तथा साबुत काला उड़द चिड़ी-कबूतरों को डालें। ९, 1८, 2७ को जन्मे नौ मूलांक वाले ज्वार, बाजरी, मसूर दाल तथा साबुत काला उड़द खिलाएं।
जिन व्यक्तियों को अपनी जन्मतिथि याद नहीं है, वे नीचे लिखा प्रयोग करें। उन्हें धन की प्राप्ति होने के साथ-साथ तन-मन के सभी प्रकार के कष्ट व तनाव भी शीघ्र दूर हो जाएंगे। ज्वार, बाजरा, मूंग, चावल-कणी, मसूर की दाल, साबुत काला उड़द, चने की दाल, लाल गेहूं व मोठ एक-एक किलोग्राम लेकर, सबको मिलाकर प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी चिड़ी-कबूतरों को तीन माह तक खिलाएं।
यह करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी व पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। व्यापार में वृद्धि होगी। इच्छुकों के सगाई-शादी के योग बनेंगे तथा संतान प्राप्ति होगी। सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
धन की प्राप्ति के साथ तन-मन के कष्ट व तनाव शीघ्र दूर करने के लिए ज्वार, बाजरा, लाल गेहूं तथा साबुत काला उड़द एक-एक किलोग्राम लेकर सबको साथ मिला दें। प्रतिदिन प्रात: सात मुट्ठी अनाज लेकर सात बार सिर पर घुमाकर घर से बाहर तीन माह तक पक्षियों को डालें।
सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति के लिए घास (रिजके) की दो पूली प्रतिदिन गाय-बैल को अपने हाथों से दें तथा थोड़े गुड़ के साथ दो रोटी गौरी गाय को प्रतिदिन खिलाएं तो धन में वृद्धि होगी, नौकरी में उन्नति होगी, नए काम मिलेंगे व शेयर व अन्य कारोबार में लाभ होगा।
यदि कामकाज में मन नहीं लगता, व्यापार में क्षति हो रही है, धन की कमी हो रही है तो इसका अर्थ है कि ग्रह स्थितियां आपके अनुकूल नहीं हैं। समस्त वाह्य हालात ठीक दिखने के बावजूद ग्रह स्थितियां विपरीत होने पर मन की दशा ऐसी हो जाती है, जिसे दूर करने का उपाय भी सरल है।
इस तरह बदलें भाग्य
प्रतिदिन प्रात:काल पक्षियों को दाना डालने से लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, आपसी विवाद सुलझेंगे, नौकरी मिलेगी तथा रुके हुए सभी प्रकार के सरकारी एवं पारिवारिक कार्य पूर्ण होंगे। असाध्य रोगों का निवारण होगा। नौकरी व व्यापार में लाभ होगा।
Friday, November 20, 2009
ताकि सुखमय हो दांपत्य
हिंदू संस्कृति में सोलह संस्कार हैं जिसमें विवाह संस्कार मुख्य है। विवाह का सौभाग्य सभी को प्राप्त नहीं होता है। दांपत्य सुख के अभाव के कई कारण हो सकते हैं। इनमें से हम मुख्य ज्योतिष कारणों का ही वर्णन कर रहे हैं।
< स्त्री या पुरुष की जन्म कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेष का पापी ग्रहों जैसे- राहु, मंगल, शनि और केतु से युक्त।
< सप्तमेष का ६वें, ८वें या १२वें भाव में बैठना।
< पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु ग्रह का दूषित होना।
< मंगल दोष का निवारण न होना।
< गुण मिलान के अंतर्गत १८ गुण से कम होना।
< नाड़ी दोष, गण दोष, नुपूर दोष।
< हस्त रेखा के अंतर्गत बुध पर्वत के निकट सबसे लंबी रेखा को विवाह रेखा कहते हैं। इसका दूषित
होना जैसे:
विवाह रेखा आगे चलकर हृदय रेखा से मिल जाए तो संबंध विच्छेद हो सकता है।
विवाह रेखा आगे चल द्विशाखीत हो जाए तो तलाक हो जाता है।
विवाह रेखा बुध पर्वत के मूल में मुड़ जाए तो जातक का कभी विवाह नहीं होता।
विवाह रेखा पर काला तिल, क्रॉस होना अशुभ लक्षण है।
पूर्व जन्म में पत्नी पर किए गए अत्याचार भी दांपत्य दुख का कारण बनते हैं।
सप्तम भाव में अकेला गुरु ग्रह हानिकारक होता है।
उपाय
< स्त्री जातक पुखराज और पुरुष जातक हीरा या ओपल रत्न धारण करें।
< सप्तमेष और सप्तम भाव में स्थित पापी ग्रहों की शांति करवाएं।
< पुरुष जातक निम्न मंत्र का जाप करें:-
पत्नीं मनोरमां देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार सागस्य कुलोद् भवाम
स्त्रियां भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त तस्वीर रखकर मंत्र का जाप करें।
हे गौरि! शंक्डरार्धाड्रि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरू कल्याणि! कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।
या
ऊँ कात्यायनी देवीय नम:।
< स्त्री या पुरुष की जन्म कुंडली में सप्तम भाव और सप्तमेष का पापी ग्रहों जैसे- राहु, मंगल, शनि और केतु से युक्त।
< सप्तमेष का ६वें, ८वें या १२वें भाव में बैठना।
< पुरुष की कुंडली में शुक्र और स्त्री की कुंडली में गुरु ग्रह का दूषित होना।
< मंगल दोष का निवारण न होना।
< गुण मिलान के अंतर्गत १८ गुण से कम होना।
< नाड़ी दोष, गण दोष, नुपूर दोष।
< हस्त रेखा के अंतर्गत बुध पर्वत के निकट सबसे लंबी रेखा को विवाह रेखा कहते हैं। इसका दूषित
होना जैसे:
विवाह रेखा आगे चलकर हृदय रेखा से मिल जाए तो संबंध विच्छेद हो सकता है।
विवाह रेखा आगे चल द्विशाखीत हो जाए तो तलाक हो जाता है।
विवाह रेखा बुध पर्वत के मूल में मुड़ जाए तो जातक का कभी विवाह नहीं होता।
विवाह रेखा पर काला तिल, क्रॉस होना अशुभ लक्षण है।
पूर्व जन्म में पत्नी पर किए गए अत्याचार भी दांपत्य दुख का कारण बनते हैं।
सप्तम भाव में अकेला गुरु ग्रह हानिकारक होता है।
उपाय
< स्त्री जातक पुखराज और पुरुष जातक हीरा या ओपल रत्न धारण करें।
< सप्तमेष और सप्तम भाव में स्थित पापी ग्रहों की शांति करवाएं।
< पुरुष जातक निम्न मंत्र का जाप करें:-
पत्नीं मनोरमां देहि मनो वृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसार सागस्य कुलोद् भवाम
स्त्रियां भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त तस्वीर रखकर मंत्र का जाप करें।
हे गौरि! शंक्डरार्धाड्रि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरू कल्याणि! कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।
या
ऊँ कात्यायनी देवीय नम:।
शिव ही भैरव - जयगोविंद शास्त्री
पौराणिक कथा के अनुसार जब सुमेरू पर्वत पर सभी देवताओं ने बrाजी से पूछा- हे परमपिता इस चराचर जगत में अविनाशी तत्व कौन है और जिनका आदि-अंत किसी को भी पता न हो, ऐसे देव के बारे में हम देवताओं को बताने का कष्ट करें? इस पर ब्रrाजी ने कहा- चराचर जगत में अविनाशी तत्व तो केवल मैं ही हूं। इस पर विष्णुदेव ने कहा कि इस संसार का भरण-पोषण मैं करता हूं, इसलिए परमशक्तिमान मैं हूं।
इसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए चारों वेदों को बुलाया गया। वे कहने लगे कि जिनके भीतर समस्त भूत, भविष्य और वर्तमान निहित है और जिनका कोई आदि-अंत नहीं है, जो अजन्मा है, वे तो परम शक्तिमान भगवान रुद्र ही हैं। इस पर ब्रrाजी के पांचवे सिर ने भगवान शिव और माता पार्वती के बारे में कुछ अपमानजनक बातें कहीं, जिससे चारों वेद अत्यंत दु:खी हुए। इसी समय एक दिव्य ज्योति के रूप में नीललोहित भगवान रुद्र प्रकट हुए, जिसे देखकर ब्रrाजी ने कहा- ‘हे चंद्र शंक, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम रुद्र रखा है, अत: तुम मेरी सेवा में आ जाओ।’
ब्रrाजी की इस वाणी से भगवान शिव ने क्रोधित होकर भैरव नामक पुरुष उत्पन्न किया और कहा कि तुम ब्रrा पर शासन करो। पापभक्षण करने के कारण भक्त तुम्हें पापभक्षक के नाम से भी जानेंगे। भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी पांचवी अंगुली के नख से ब्रrाजी का सिर काट लिया, जिसके कारण इन्हें ब्रrाहत्या के पाप से गुजरना पड़ा। शिवलोक काशी में इन्हें ब्रrाहत्या से मुक्ति मिली थी, जहां पर आज भी ‘कपाल मोचन’ तीर्थ है। यहां दर्शन मात्र से ब्रrाहत्या से मुक्ति मिलती है।
भगवान शिव ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। इसके साथ ही भूत-प्रेत, पिशाच, ब्रrा राक्षस, बेताल, मारण मोहन, उच्चटन विद्वेषण से इनको अपने भक्तों की रक्षा के लिए इन सभी का अधिकारी नियुक्त किया गया। आज भी इनके भक्त इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए इनकी पूजा-आराधना करते हैं। तांत्रिक जगत में इन्हीं की आराधना विशेष तौर पर की जाती है।
इनकी प्रार्थना का मंत्र है अतिक्रूर महाकाय, कल्पान्त दहनोपम् भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि। इसी मंत्र से मानव मात्र का कल्याण हो जाता है। भगवान भैरव शिव के पांचवे अवतार माने जाते हैं। इनका अवतरण मार्ग शीर्ष कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ। इस दिन इनकी पूजा-आराधना ब्रrाहत्या से मुक्ति दिलाती है। यथा कामं तथा ध्यानं कारयेत साधकोत्म: अर्थात जैसा कार्य हो, साधक को वैसा ही ध्यान करना चाहिए।
इनका सात्विक ध्यान अपमृत्यु का निवारक, आयु आरोग्य का कारक तथा मोक्ष देने वाला है। राजसिक ध्यान साधना चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि देने वाला है। जबकि भूत-प्रेत ग्रहादि द्वारा शत्रुओं के शमन को तामसिक कहा गया है। इनकी श्रद्धा और विश्वास से की गई उपासना भक्तों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति दिलाती है।
भैरवजी की प्रार्थना का मंत्र
अतिक्रूर महाकाय,
कल्पान्त दहनोपम्
भैरव नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातु मर्हसि।
इस मंत्र से मानव मात्र का कल्याण होता है।
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