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Monday, January 4, 2010

राशियों पर शनि प्रभाव

सिंह: इस राशि को पैरों को उतरती शनि साढ़ेसाती है। जिन महानुभावों ने गत 5-6 वर्षों में अपने जीवन में भारी कष्ट उठाए हैं, उनके लिए अब भी स

मय सावधानी से चलने का है। साढ़ेसाती खत्म होने से कुछ आशाजनक उत्साह का संचार अवश्यंभावी है, फिर भी अभी पूर्णत: निष्कंटक दौर आरंभ नहीं हुआ है। जिन जातकों ने अभी तक अच्छा समय देखा है, उनको भी अप्रैल तक सतर्क एवं सजग रहना आवश्यक होगा। शत्रु के किसी भी छल-कपट और धोखे से सावधान रहें। लापरवाही से चोट और हानि उठाने से बचें। अधिक आत्मविश्वास या अहंकारी प्रवृति के कारण किसी भी संकट में चाहे अनचाहे उलझने का डर है। इसके बाद अनेक महानुभावों को नया जीवन शुरू करने का अवसर मिलेगा। अविवाहितों का विवाह होगा। बेरोजगारों को नौकरी मिलेगी। व्यापार में फेरबदल करके अच्छा लाभ होगा और निष्ठापूर्वक कार्य करने से धन समृद्धि की प्राप्ति होगी। मकान, वाहन व पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी।

कन्या : इस राशि को पूरे साल 2010 में लौह पाद से हृदय पर साढ़े साती रहेगी। उसके बाद पैरों पर उतरती साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा। अनेकों जातकों को स्वास्थ्य संबंधी कष्ट और आजीविका में उतार-चढ़ाव का दौर देखना पडे़गा। कामकाज में मन नहीं लगेगा। कुछ अच्छे कार्यों में धन का निवेश हो सकता है। संतान व मित्रों के लिए खर्च करना होगा। स्टूडेंट्स को परीक्षा, प्रतियोगिता में कठोर परिश्रम के उपरांत आंशिक सफलता मिलेगी। जो सज्जन पहले ही बुरे वक्त के दौर से गुजर चुके हैं, उनके जीवन में अब कुछ ठहराव की अपेक्षा रहेगी। चूंकि हृदय स्थान से शनि विचरण कर रहा है, अत: दिलोदिमाग को वश में रखकर नेक इरादे से आगे बढ़ने की चेष्टा करने से निस्सन्देह अभूतपूर्व सफलता भी अनेक कन्या जातकों को प्राप्त होगी। आर्थिक रूप से समृद्धि बढे़गी व खोया धन भी जमा खाते में दर्ज हो जाएगा।

तुला : पूरे साल सिर पर तांबे के पाए से चढ़ती हुई साढे़साती उन तमाम तुला जातकों पर रहेगी जो पिछले दो-ढाई वर्षों से जीवन में अनेक प्रकार के परिवर्तन महसूस कर रहे हैं। साल में यह ग्रह बारहवें भाव में रहकर जहां लोभ, लालच और अवांछित कार्यों से हानि पहुंचाएगा, वहीं मुकदमे, विवाद से भी धन व चैन की हानि होगी। निष्काम भाव से किए गए परोपकार का फल भी कभी-कभी उल्टा मिलेगा। शरीर में रोग, दुर्घटना या गुप्त पीड़ा से उपचार और दवा का खर्च बढे़गा। कुछ जातक बुरे समय के दौरान भी कहीं-कहीं पर अच्छा प्रभाव महसूस करेंगे। कोई जटिल कार्य सिद्ध हो जाएगा या किसी भारी संकट से मुक्ति मिलेगी।

वृश्चिक : जनवरी से दिसंबर के मध्य तक लाभ स्थान में गतिशील शनि स्वर्णपाद फल नेष्ट है। पूर्वापेक्षा में विशुद्ध लाभ कम होगा। आवश्यक, अनावश्यक झंझटों में धन का अपव्यय होगा। घर, गृहस्थी की समस्या का समाधान देर से होगा। जन्म कुंडली में शनि शुभ पड़ा हो तो थोड़ा लाभ होता है। भाग्य का सितारा चमकता है पर कष्ट भी देता है।

धनु : रजतपाद से भाग्य कुसमय दशम भाव में गतिशील शनि महाराज धनु राशि वालों के लिए व्यवधान कारक है। समय के स्वरूप को देखकर कार्य करें। शनि से जुड़े दानादि भी यथा शक्ति करते रहें। धन और स्वास्थ्य के लिए शनि अंततोगत्वा लाभदायक रहेगा। शुभ मांगलिक कार्यों में खर्च होगा।

मकर : मकर राशि वालों के नवम कर्म क्षेत्र में गतिशील शनि अप्रैल बाद तक लोहपाद श्रेष्ठ है। लाभोन्नति में आश्चर्यजनक बदलाव आएगा। विचाराधीन काम पूरा होगा। आराम प्राप्ति का नया रास्ता खुलेगा। सामाजिक मेलजोल बढे़गा। एकाध नुकसान होगा। पारिवारिक कलह, रोग, बीमारी में इलाज का खर्च बढ़ेगा। अकारण झगड़े विवाद होने से सम्मान को आंच आएगी। सामाजिक प्रतिष्ठा में घट-बढ़ रहेगी।

कुंभ : कुंभ राशि वालों में लघु कल्याणी ढैया मध्यम फलदायक है, बनते-बिगड़ते परिवेश में नए आयाम मिलेंगे। साथी से सचेत रहें। व्यवसाय में उतार-चढ़ाव रहेगा। विघ्न बाधाओं से घर परिवार के सदस्यों का रुख भी उलटा रहेगा। साल के अंत तक कुछ जीविका के साधन उपलबध होंगे और बिगड़े काम बनेंगे।

मीन : सप्तम शनि रजत पाद फल नेष्ट है। मीन राशि वालों को असामान्य विषम परिस्थितियों में से गुजरना पड़ेगा। बनते कार्यों में अड़चनें पैदा होंगी। स्वास्थ्य नरम रहेगा। चांदी का पाया होने से दांपत्य जीवन का सुख-दुख समान मिलेगा। पर्याप्त खर्च के बाद घर-गृहस्थी में उन्नति से हर्षोल्लास होगा। घूमने का अच्छा अवसर मिलेगा। चौपाया या सवारी से भय बना रहेगा।

मेष : पूरे साल तक मेष राशि को छठा शनि भ्रमण फल श्रेष्ठ लाभोन्नति में सहायक रहेगा। वर्ष में जमा खर्च का संतुलन बना रहेगा। पशुधन, भूमि, वाहनादि का लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा। अनेक जातकों को संघर्षपूर्ण हालात का सामना करना पड़ेगा। परिवार या व्यवसाय में उलझनें होंगी। ऋण और कर्ज बढ़ने की आशंका रहेगी। शत्रु भी सिर उठाएंगे। स्वास्थ्य बिगड़ने से मानसिक तनाव रहेगा।

वृष : पूरे वर्ष शनि पंचम भाव में लोहे के पाये से विचरण करेगा। स्टूडेंट्स को उच्च शिक्षा में बाधा आएगी। युवा जातकों को संतान कष्ट झेलना पड़ेगा। लोहे के पाये में शनि होने से पारिवारिक कलह दांपत्य जीवन में मनमुटाव व शत्रु, रोग और ऋण का दबाव बढ़ने से मानसिक अशांति बढ़ती रहेगी। उत्तरार्द्ध में समय श्री वृद्धि में सहायक रहेगा। अच्छी सोच समझ बनाने से भौतिक विकास व आर्थिक प्राप्ति का नया रास्ता खुलेगा। राजनैतिक क्षेत्र में भाग्य का सितारा चमकेगा। स्वास्थ्य कुछ गड़बड़ा जाएगा। सावधानी बरतें।

मिथुन : मिथुन राशि वालों के लिए शनि चौथे भाव से सोने के पाये में रहने से गतिशील शनि की लघु कल्याणी ढैया मध्यम फलदायक है। संघर्ष धन हानि और तनाव के बावजूद शुभ फल भी कभी-कभी उत्साहवर्धन करेंगे। जमीन, जायदाद और पारिवारिक मामलों में ज्यादा खर्च होने से आत्मग्लानि होगी। रोग और शत्रु से विवाद होने से खर्च बढ़ सकते हैं पर साल अंत तक कुछ उपलब्धियां होंगी।

कर्क : तृतीया यानी पराक्रम भाव में भ्रमणशील शनि ताम्रपाद फल नेष्ट है। खर्च की अभिवृद्धि मानसिक चिंता का कारण बनेगी। नए काम की रूपरेखा कठिनाई से सफल होगी। अच्छी व खराब दोनों किस्म की खबर मिलेगी। अधिकांश कर्क जातक जो व्यवसाय या नौकरी से जुड़े हैं, उन्हें कार्यों में सफलता मिलेगी। व्यापार में लाभ भी होगा व वाहन आदि की खरीद होगी पर बिना सोचे विचारे कुछ ऐसे काम भी होंगे जिनके लिए बाद में पश्चाताप हो।

Friday, January 1, 2010

वाहन हादसों से बचा सकता है वास्तु

वास्तु की मान्यताओं के विकास काल में प्राय: हाथी, घोड़ों और उनसे चलने वाले रथ, पालकी आदि वाहनों पर ही विचार किया गया किंतु वे ही मान्यताएं वर्तमान वाहनों के संदर्भ में भी सर्वथा प्रासंगिक है। वाहन दरअसल मानवीय जीवन की अहम आवश्यकता है और सहायक भी कम नहीं हैं। यदि किसी के पास वाहन नहीं हो और वह वाहन की अपेक्षा करता हो तो उसे वेदोक्त ‘पवमान सूक्त’ का संपुट सहित पाठ करना चाहिए। यह पाठ परिवार में शांति व सुख का संचार भी करता है और वाहन जन्य आकस्मिक हादसों से बचाने वाला भी है।

भवन में सामान्यत: वायव्यकोण में वाहनों को रखना चाहिए। आजकल प्राय: भवन निर्माण के समय वाहन के लिए किसी भी एक दिशा में लम्बवत गलियारा छोड़ दिया जाता है और उसके साथ ही दरवाजा भी रख दिया जाता है। यहां यह ज्ञातव्य है कि गृहपति के आने-जाने के दरवाजे के अतिरिक्त वाहन के लिए अलग द्वार होना चाहिए। वास्तु विन्यास की परंपरा में ऐसा आवश्यक है। इसके लिए भवन के सामने के भाग की जो लम्बाई या चौड़ाई हो, उसको नौ भागों में बांट दें और प्राय: दोनों ओर से दो-दो खंडों को छोड़कर वाहन के लिए द्वार रखना चाहिए।

भवन में वायव्य कोण से लेकर नैऋत्य कोण की ओर की दीवार पर नौ-नौ भागों के अनुसार पहले दो और आखिरी दो खंड छोड़कर दरवाजा रखना बहुत शुभ माना जाता है। भवन का निर्माण कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए कि वाहन एकदम उत्तरी दीवार के पास नहीं खड़ा रहे बल्कि उससे दो खंड की दूरी बनी रहे। वायव्यकोण के निकट, दीवार से आगे दो खंड छोड़कर दरवाजा रखने से परिवार में शोक और दु:ख की आशंका नहीं के बराबर रहती है जैसा कि वास्तुप्रदीप का मत है। ऐसे में तीसरे, चौथे खंड पर वाहन के लिए दरवाजा होना बहुत शुभ है। ऐसा होने पर वाहन संचालन में भी उचित समय पर उचित निर्णय होता है और भ्रम या चूक की संभावना नहीं के बराबर रहती है। यहां यह भी नियम है कि कभी वायव्य कोण से लगता हुआ कोई रेंप घर की सीमा से बाहर नहीं बनाए। हां, भवन के भीतर बनाया जा सकता है। बाहर बने रेंप से मतिभ्रम, व्यर्थ विवाद ऐसी स्थितियां देखने में आई हैं।


डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

मकर संक्रांति का त्योहार

मकर संक्रांति का त्योहार पूरे भारत में श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। पंजाब में यह माघी और लोहड़ी के नाम से तो दक्षिण में पोंगल के रूप में जाना जाता है। गंगा और अन्य पवित्र नदियों के तट पर लाखों लोग आज के दिन उदय होते सूर्य की प्रार्थना करते हैं। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य को भगवान का दर्जा दिया गया है।

उत्तर भारत :

हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में इस दिन तिल और खिचड़ी खाने की परंपरा है। लोग सुबह पहले पवित्र सरोवरों में स्नान करते हैं और धर्म स्थलों पर जाते हैं। पंजाब में यह त्योहार माघी के नाम से मनाया जाता है। इससे एक दिन पहले लोहड़ी का त्योहार होता है, जब रेवड़ी, मूंगफली और भुने हुए मक्के के दाने विशेष रूप से खाए और बांटे जाते हैं।

दक्षिण भारत :

कर्नाटक : लोग रंगीन कपड़े पहनकर मित्रों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं। गन्ने, तिल की मिठाइयां, सूखा नारियल, मूंगफलियां और भुने हुए चने एक-दूसरे को देते हैं। इस दिन गाय-बैलों के सींग धोते और रंगते हैं। उन्हें फूल मालाओं से सजाया जाता है। रात को गीत-संगीत होता है। एक जगह आग लगाकर, जानवरों को आग पर से कुदाया जाता है।

तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश :

तेलुगू लोगों के लिए यह एक बड़ा पर्व है। वे इसे पेडा पंडुगा कहते हैं। यहां यह महोत्सव चार दिन चलता है। पहले दिन भोगी, दूसरे दिन संक्रांति, तीसरे दिन कणुमा और चौथे दिन मक्कणुमा कहलाता है।

पूर्व भारत :

पश्चिम बंगाल और बिहार में मकर संक्रांति को नदियों के तट पर स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। कोलकाता में हुगली नदी के किनारे गंगासागर मेला लगता है। देशभर से श्रद्धालु यहां इस दिन स्नान के लिए पहुंचते हैं। इस दिन का स्नान मोक्षदायक माना जाता है।

गुजरात, राजस्थान में उड़ती हैं पतंगें

पश्चिम भारत : महाराष्ट्र :

इस त्योहार पर लोग आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे को मीठे रंगीन अनाज के दाने और भुने हुए तिल देते हैं, साथ ही गाते हैं-तिल गुड़ घया, गुड़-गुड़ बोला। अर्थात हमारे बीच अब मित्रता और अच्छे विचार पनपें।

गुजरात :

हिंदू गृहिणियां इस दिन नए बर्तन खरीदती हैं और उनका इस्तेमाल करती हैं। आकाश पतंगों से भर जाता है।

राजस्थान :

इस दिन पुष्कर में बड़ा मेला लगता है। पतंगें उड़ाई जाती हैं। शेष परंपराएं उत्तर भारत से ही मिलती-जुलती हैं।


शनि से डरें नहीं

शनिदेव को मृत्युलोक का धर्मराज कहा जाता है। पृथ्वी पर होने वाले सत्कर्मो और दुष्कर्मो का लेखा-जोखा रखकर तत्काल दंडित करने के कारण लोग इनसे भयभीत रहते हैं। जन्मकुंडली में वृष और तुला लग्न वालों के लिए शनिदेव परम योगकारक होते हैं, जबकि मकर और कुंभ इनकी अपनी राशि है। तुला राशि पर उच्च और मेष राशि पर इन्हें नीच की संज्ञा प्राप्त है।

कर्क और सिंह वालों के लिए ये मारक होते हैं। मारक अथवा मारकेश का ज्योतिषीय अर्थ है - मरणतुल्य कष्ट देने वाला। अन्य ग्रह यदि मारकेश हैं तो वे अशुभ फल अवश्य देते हैं, किंतु शनि के साथ ऐसा नहीं है। पृथ्वीलोक के दंडाधिकारी होने के कारण शनिदेव अपने भाई यमदेव की ही तरह मर्यादा में बंधे हैं। इस कारण ये चाहे मारक हों या योगकारक, कर्मानुसार ही फल देते हैं। पुराणों में कहा गया है कि शनिदेव के कुप्रभावों से बचने के लिए असहाय लोगों की मदद करें, अभिवादनशील रहें और श्रद्धा-विश्वास के साथ दान-पुण्य करें।

शनि वायु तत्वप्रधान और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। ये आंधी-तूफान, महामारी, अग्निजनित दुर्घटनाओं तथा तमाम प्राकृतिक आपदाओं के स्वामी होते हैं। इनका पृथ्वी के नजदीक आना कुछ इसी तरह की आशंका पैदा करता है, किंतु ये वर्तमान में अग्नितत्व की राशि सिंह में चल रहे हैं, जो इनके पिता सूर्य की राशि है। इस कारण इनके प्रभाव में कोई क्रूरता या परिवर्तन नहीं आएगा। कतिपय ज्योतिषी अपने अध्ययन के आधार पर शनि का नाम लेकर लोगों को डरा रहे हैं। ये लोग विशेषत: सिंह राशि के लोगों को डरा रहे हैं, लेकिन यह सही नहीं है- स्थान हानिकरों जीवो स्थान वृद्धि करौ शनि।

इस सूत्र के अनुसार शनि जिस स्थान (सिंह) पर बैठते हैं, वहां की वृद्धि ही करते हैं। अत: सिंह राशि वालों को शनि से डरने की जरूरत नहीं है। अच्छे कर्म करते चलें। शनि देव के आशीर्वाद से कामयाबी आपके कदम चूमेगी। सिंह राशि ही नहीं, किसी भी राशि के जातक को शनिदेव का कोपभाजन नहीं बनना पड़ेगा।

उत्तर की ओर मुख करके देव-आराधना क्यों?

देवपूजन भारतीय जनजीवन की खास विशिष्टता है। यह इहलोक और परलोक की साधना का महत्वपूर्ण सोपान है। इसका जीवन में महत्व इसलिए भी है कि इससे इष्ट प्रयोजन की सिद्धि होती है।

अपने-अपने आराध्य की पूजा, उपासना करने से मनोबल बढ़ता है, सोचे-विचारे कार्यो की पूर्ति होती है। इसलिए आर्त, अर्थार्ती, ज्ञानी और जिज्ञासु- चारों प्रकार के लोगों द्वारा देवाराधना की परंपरा रही है। स्कंदपुराण के प्रभासखंड में एक नियम उल्लेखित है कि देवपूजन में साधक को हमेशा उत्तराभिमुख होना चाहिए और पितरों का पूजन दक्षिणमुखी होना चाहिए-

उदङ्मुखस्तु देवनां पितृणां दक्षिणामुख:।

उत्तर को उदिच्य और उदक दिशा भी कहा गया है। आराधना में उत्तरमार्ग का महत्व इस अर्थ में भी है कि यह देवमार्ग है, जैसा कि गीता में भी कहा गया है और भीष्म ने भी उत्तरायण में ही प्राणांत करने का निश्चय किया था।

उत्तराभिमुखी होकर पूजन करने से चित्त की शांति तो होती ही है, अर्थसिद्धि के साथ-साथ अन्य इच्छित कार्यो में सफलता भी मिलती है। देवाराधना में देवप्रिय वस्तुओं का चयन जरूर करना चाहिए और त्रुटि न रहे इसका ध्यान रखें। इसी प्रकार देवपूजन में सदा पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। कभी बिना धुला वस्त्र धारण नहीं करे क्योंकि देवाराधना में मन के साथ ही शारीरिक शुद्धि का भी महत्व है, इसके अभाव में साधना और आराधना के मार्ग से पतन हो जाता है।

कैरियर - दशम भाव से तय होता है व्यवसाय

युवा पीढ़ी कैरियर के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो गई है। ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में व्यवसाय का निर्धारण जन्मकुंडली के दशम भाव से किया जाता है। दशम भाव ‘कर्म भाव’ कहलाता है। इसके स्वामी को दशमेश कहते हैं। दशमेश नवांश कुंडली में जिस ग्रह की राशि में होता है उसी ग्रह के कारकत्व अनुरूप व्यवसाय व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है। ग्रहों के कारकत्व निम्न प्रकार है -

सूर्य राज्य, फल-फूल, वृक्ष, पशु, वन, दवा, चिकित्सा, नेत्र, कंबल, लकड़ी, भूषण, मंत्र, भूमि, यात्रा, अग्नि, आत्मा, पिता, लाल चंदन, पराक्रम, धैर्य, साहस, न्याय प्रियता, गेहूं, घी ।

चंद्र जलीय पदार्थ, पशुपालन, डेरी उद्योग, कपड़ा, सुगंधित पदार्थ, कल्पना शक्ति, नेत्र, स्त्री सहयोग, भेड़, बकरी, स्त्री संबंधी पदार्थ, कृषि, गन्ना, चांदी, चावल, सफेद वस्त्र, सिल्क का कपड़ा, चमकीली वस्तु, यात्रा, तालाब, क्षय रोग, खारी वस्तुएं, माता, मन, प्रजा।

मंगल भूमि, अग्नि, गरमी, घाव, राज्य सेवा, पुलिस, फौज, शस्त्र, युद्ध, बिजली, राज दरबार, मिट्टी से बनी वस्तुएं, डैंटिस्ट, अनुशासन, स्पोर्ट्स, तांबा, रक्त चंदन, मसूर, गुड़, ज्वलनशील पदार्थ।

बुध विद्या, गणित ज्ञान, लेखन वृत्ति, काव्यगम, ज्योतिष, हरी वस्तुएं, शिल्प, दलाली, कमीशन, वाक शक्ति, त्वचा, चिकित्सा, वकालत, अध्यापन, संपादन, प्रकाशन, अभिनय, हास परिहास, व्याकरण, रत्न पारखी, कांसा, डाक्टर, गला, नाचना, पुरोहित।

गुरु शिक्षक, तर्क, मंदिर, मठ, देवालय, धर्म, नीतिज्ञ, राजा, सेना, तप, दान, परोपकार, पीला रंग, वेद-पुराण आदि से उपदेश, धन, न्याय, वाहन, परमार्थ, स्वास्थ्य, घी, चने, गेहूं, हल्दी, जौ, प्याज, लहसून, मोम, ऊन, पुखराज।

शुक्र रूप सौंदर्य, भोग विलास एवं सांसारिक सुख, सुगंधित एवं श्रंगारिक प्रसाधन, श्वेत एवं रेशमी वस्त्र, चांदी, आभूषण, गीत-संगीत, नृत्य, गायन, वाद्य, सिनेमा, अभिनेता, उत्तम वस्त्रों का व्यवसाय, मंत्री पद, सलाहकार, जलीय स्थान, दक्षिण पूर्व दिशा।

शनि मजदूर एवं दास वर्ग, शारीरिक परिश्रम, कारखाने, वनस्पति, नौकरी, निंदित कार्यो से धनोपार्जन, हाथी, घोड़ा, चमड़ा, लोहा, मिथ्या भाषण, कृषि, शस्त्रागार, सीसा, तेल, लकड़ी, विष, पशु, ठेकेदारी।

राहु गुप्त धन, लॉटरी, शेयर, विष, तिल, तेल, लोहा, वायुयान संबंधी ज्ञान, मशीनरी, चित्रकारी, फोटोग्राफी, वैद्यक, जासूसी अनुसंधान, कंबल, गोमेद।

केतु गुप्त विद्या, वैराग्य, तीर्थाटन, भिक्षावृत्ति, चर्म रोग, काले वस्त्र, कंबल, विष, शस्त्र, फोड़ा, फुंसी, गर्भपात, चेचक, अत्यंत कठिन कार्य, मंत्रसिद्धि, तत्वज्ञान, दु:ख, शोक, संघर्ष।

कारकत्व शब्दों तक ही सीमित नहीं इनकी परिधि अत्यंत विस्तृत है - जैसे ‘राज्य’ शब्द सूर्य का कारकत्व है। इस छोटे से शब्द में राजा, मंत्री, गवर्नर, राष्ट्रपति, छोटे-मोटे तमाम सरकारी कर्मचारी व अधिकारी, राजनेता, विधायक, सांसद आदि सभी वर्ग जिनका परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप में सरकार से किसी न किसी प्रकार से कोई संबंध है, शामिल हैं। जन्म कुंडली का एकादश भाव ‘आय भाव’ तथा द्वितीय भाव ‘धन भाव’ कहलाता है। इनके स्वामियों के बलाबल और आपस में संबंध के आधार पर व्यवसाय संबंधी आय व धन का विचार किया जाता है।

दशम स्थान स्थित राशि की दिशा में अथवा दशमेश जिस नवांश में होगा, उस नवांश संबंधी राशि की दिशा में व्यवसाय संबंधी लाभ होगा। मेष, सिंह व धनु राशियां ‘पूर्व’ दिशा की स्वामी है। मिथुन, तुला व कुंभ राशियां ‘पश्चिम’ दिशा की स्वामी है। कर्क, वृश्चिक व मीन राशियां ‘उत्तर’ दिशा की स्वामी है तथा वृष, कन्या तथा मकर राशियां ‘दक्षिण’ दिशा की स्वामी है। उपरोक्त विचार ‘लग्न कुंडली’ के साथ ‘चंद्र कुंडली’ व ‘सूर्य कुंडली’ से भी करने पर सूक्ष्म निष्कर्ष पर पहुंचने में काफी सहायता मिलेगी।


वी. एन. शर्मा

साधना का आधार है मंत्रशास्त्र

मन के ऊपर जमी विकारों की मैली परतों को धोने के लिए शास्त्र का जल सशक्त साधन है। मंत्रसाधना की समस्त जानकारी देने वाले ज्ञान को मंत्रशास्त्र साधना का आधार है मंत्रशास्त्र कहते हैं। इस शास्त्र की दो विशेषताएं हैं— पहली यह कि विधि-निषेधों के माध्यम से साधना की विधि की जानकारी देकर यह मंत्रसाधना में साधक की सहायता करता है और दूसरी यह कि यह साधक के अंत:करण में गुह्य रूप से विद्यमान रहता है। मंत्रद्रष्टा ऋषियों का मत है कि ऐसा कोई ज्ञान किसी भी व्यक्ति को मात्र बुद्धि या अनुभव से नहीं सिखाया जा सकता, जो उसके अंत:करण में पहले से संस्कार या बीज के रूप में विद्यमान न हो। यदि अंत:करण में विद्यमान उस ज्ञान को औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता होती तो एकलव्य, कालिदास और कबीर, जिन्होंने किसी गुरुकुल या विद्यालय में औपचारिक शिक्षा नहीं पाई थी, अपने-अपने क्षेत्र में सिद्ध-हस्त नहीं बन पाते।

मंत्रशास्त्र के भेद
मंत्रशास्त्र का गूढ़ ज्ञान दो रूपों में मिलता है— लिखित मंत्रशास्त्र के ग्रंथों के रूप में और गुरुओं के परंपरागत मौखिक उपदेश के रूप में। यह शास्त्र साधन, साधना एवं साध्य के बारे में समग्र जानकारी देकर साधकों की सर्वाधिक सहायता करता है। साधक की पात्रता, उसका अधिकार, साधन का चयन, साधना का मार्ग, उसका विधि-विधान एवं उसका परिणाम, इन सबका वर्णन इस शास्त्र में है।

मंत्रशास्त्र की विशेषताएं
मंत्रशास्त्र एक गूढ़ ज्ञान है, लेकिन सुपात्र या सुयोग्य साधकों के लिए यह उतना दुरूह नहीं है, क्योंकि इस शास्त्र में मंत्रसाधना का प्रत्येक मार्ग सुनिश्चित माना जाता है। इस स्थिति में साधक के सामने न तो कोई असमंजस रहता है और न ही किसी प्रकार की असुविधा। यह एक ओर प्राचीन अनुभवों को अपनाता है, तो दूसरी ओर वर्तमान एवं भविष्य की परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बनाता है।

कई मंत्र हैं साधना के आधार
मंत्र शास्त्र जीवन के समस्त पहलुओं को अपने अंदर समेटता है। इसकी भूमिका एक ऐसे मार्ग ढूंढ़ने वाले पथिक जैसी है, जो निर्जन एवं गहन जंगल में अपना रास्ता बनाता चल रहा है। इस सबका प्रमुख कारण यह है कि समय के परिवर्तन के साथ न केवल परिस्थितियों में ही परिवर्तन होता है, बल्कि मानव मात्र की क्षमता एवं मन:स्थिति में भी अंतर आ जाता है, इसीलिए हमारे महर्षियों ने वैदिक मंत्रों के रहते हुए भी समय एवं परिस्थितियों के अनुसार ‘तांत्रिक मंत्रों’ को और नई परिस्थितियों में ‘साबर मंत्रों’ को साधना का आधार बनाया। यदि शास्त्र एवं परंपरा में ऐसा परिवर्तन स्वीकार्य न होता तो प्रत्येक देवता का एक ही मंत्र, एक ही संप्रदाय, एक ही स्त्रोत एवं साधना की एक ही विधि होती।

मंत्रशास्त्र में अनेक ग्रंथ, अनेक संप्रदाय, एक देवता के अनेक मंत्र और उसकी स्तुति के लिए अनेक स्त्रोतों का होना इस बात का साक्ष्य है कि मंत्रसाधना में समय एवं परिस्थिति के अनुसार साधक को परिवर्तन एवं नए चयन की स्वतंत्रता है।


प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी