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Saturday, January 9, 2010

रवि मंत्र के जाप से दूर होती है दरिद्रता

जीवन में धन की कमी या निर्धनता को दरिद्रता कहते हैं। यह एक ऐसा दोष है, जो न केवल मानव जीवन में पग-पग पर कठिनाइयां पैदा करता है, बल्कि यह व्यक्तित्व एवं व्यक्ति की छवि को विकृत भी कर देता है।

‘दारिद्रदोषी गुणराशिनाशी’, दरिद्रता के इस परिणाम का प्रतिपादन करने वाले चिंतकों ने इसकी विवेचना करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया है कि ‘दरिद्रता की मानसिकता का सबसे बड़ा लक्षण आत्मविश्वास का अभाव है, जो दरिद्री की दुविधा, असुविधा, किंकर्तव्यविमूढ़ता एवं निष्क्रियता के भंवरजाल में फंसा होता है। वस्तुत: दरिद्रता के दर्द की टीस संसार में सबसे अधिक दुखदाई है।

दरिद्रता के योग
वैदिक ज्योतिष के प्रवर्तक महर्षि पाराशर के अनुसार व्यक्ति की जन्मकुंडली में त्रिकोणस्थान धन-संपदा एवं लक्ष्मी का स्थान तथा त्रिक (6, 8 एवं १२वां) स्थान दुख एवं दरिद्रता का होता है। व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, रेका, कालसर्प भिक्षु एवं दरिद्री योग जीवन में विपन्नता देते हैं।

महर्षि पाराशर के अनुसार दरिद्रता में जातक के जीवन में हीनता एवं दीनता लगातार बनी रहती है। दरिद्रता के योगों में दो बातें प्रमुख होती हैं,
1. योग के प्रमुख ग्रह का त्रिकोणोश एवं शुभ ग्रह से युत-दृष्ट न होना।
2. उसका त्रिकेश एवं पापग्रह से युत-इष्ट होना या त्रिक स्थान में बैठना।

पाराशरीय ज्योतिष के अनुसार दरिद्रता के सूचक कुछ प्रमुख योग इस प्रकार हैं।

लग्न में चर राशि एवं चर नवांश हो और उस पर शनि तथा नीच राशिगत गुरु की दृष्टि हो।
लग्नेश निर्बल, धनेश अस्तंगत और केंद्र में पापग्रह हो।
धन स्थान में पापग्रह हो और उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तथा धनेश निर्बल हो।
धनेश त्रिक (6, 8 एवं १२वें) स्थान में हो और पापग्रह धन स्थान में हो।
भाग्येश एवं कर्मेश त्रिक में और पापग्रह लग्न में हो।
लग्नेश, व्ययेश एवं सूर्य साथ-साथ हो और पापग्रह से दृष्ट हो।
धनेश व्यय स्थान में, व्ययेश धन स्थान में हो या भाग्येश अष्टम में और अष्टमेश भाग्य स्थान में हो।
भाग्येश एवं कर्मेश निर्बल होकर पापग्रह के साथ हों और लग्नेश त्रिक में हो।
पंचमेश एवं नवमेश षष्ठ या व्यय में और लग्नेश पाप प्रभाव में हो।

दरिद्रतानाशक रवि मंत्र
दरिद्रता के प्रभाववश व्यक्ति में आई हीनता, निष्क्रियता या किंकर्तव्यविमूढ़ता को नियंत्रित कर उसको कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ाने में आत्मविश्वास की भूमिका सबसे प्रमुख है। यह आत्मविश्वास रवि मंत्र के अनुष्ठान से बढ़ता है। रवि मंत्र दरिद्रता को दूर करने की रामबाण दवा है।
रवि मंत्र ऊं ह्रीं घृणिं सूर्य आदित्य श्रीं।

विनियोग
अस्य श्री सूर्य मंत्रस्य भृगऋषि: गायत्रीछन्द:, भगवान सूर्योदेवता, ह्रीं बीजं श्रीं शक्ति: सर्वार्थ सिद्धये जपे विनियोग:।

ऋष्यदिन्यास
ऊं भृगवे ऋषये नम:, शिरसि।
ऊं गायत्री छन्दसे नम:, मुखे।
ऊं सूर्याय देवतायै नम:, हृदि।
ऊं ह्रीं बीजाय नम:, गुह्ये।
ऊं श्रीं शक्तये नम:, पादयो:।

षडड्ग न्यास
सत्यतेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, हृदयाय नम:।
ब्रrातेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, शिरसे स्वाहा।
विष्णुतेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, शिखायै वषट्।
रुद्रतेजो ज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, कवचाय हुम्।
अग्नितेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट्।
सर्वतेजो ज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, अस्त्राय फट्।

ध्यान
शोणाम्भोरुहसंस्थितं त्रिनयनं वेदत्रयी विग्रहं
दानाम्भोजयुगाभयानिदधतं हस्तै: प्रवालप्रभम्।
केयूराड्ंगदहारकंकणधरं कर्णोल्लसत्कुण्डलं,
लोकोत्पत्ति विनाशपालनकरं सरूय गुणाब्धिं भजे।।
अर्थात रक्तकमल पर विराजमान, तीन नेत्र वाले, वेदमूर्ति, चारों हाथों में क्रमश: दानमुद्रा, कमल, पद्म एवं अभयमुद्रा धारण करने वाले, प्रवाल जैसी आभा वाले, केयूर अड्ंगद, हार एवं कंकण आदि आभूषणों से सुशोभित, कानों में कुंडल धारण करने वाले, जगत की उत्पत्ति, पालन एवं विनाश करने वाले, भगवान सूर्य का मैं ध्यान करता हूं।

विधि
नित्य नियम से निवृत्त होकर आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भस्म का त्रिपुण्ड या तिलक लगाएं। आचमन एवं प्राणायाम कर चौकी या पट्टे पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर स्वर्ण पत्र या भोजपत्र पर रक्तचंदन एवं अनार की कलम से श्री सूर्यपूजन यंत्र लिखकर और स्थापित कर विधिवत विनियोग, न्यास एवं ध्यान कर पंचोपचार (गंध-अक्षत, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य) से यंत्र का पूजन कर, एकाग्रतापूर्वक उक्त मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र के अनुष्ठान में जप संख्या १0 लाख तथा लघु अनुष्ठान में सवा लाख है।

इस मंत्र के अनुष्ठान में उगते सूर्य को द्वादश नमस्कार, अघ्र्यदान एवं संध्यावंदन करना तथा जप के बाद आदित्य हृदयस्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायक होता है। इस मंत्र के अनुष्ठान से साधक में आत्मविश्वास का पुनर्विकास होता है, जिससे उसके जीवन में सफलता के नए द्वार खुलते हैं।


प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी


सुखी दांपत्य जीवन : सितारों की भूमिका

हम बता रहे हैं नव वर्ष में सुखी और सुंदर दांपत्य जीवन की मनोकामना पूर्ण करने के लिए कुछ सरल उपाय।

मेष लग्न :

मेष का दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह शुक्र होता है। ये लोग दांपत्य सुख के लिए निम्न उपाय करें - गाय व पक्षियों को चावल खिलाएं। चावल उबालकर, पकाकर देसी घी डालकर पक्षी को दें। गाय को प्रतिदिन दो रोटी तेल लगाकर दें। घर में बुजुर्ग महिलाओं का सम्मान करना चाहिए व आशीर्वाद लेना चाहिए।

वृष लग्न :

वृष लग्न में कारक ग्रह मंगल होता है। वृष लग्न के जातक लाल कपड़े में (सूती, चमकीला न हो) थोड़ी सी सौंफ बांधकर अपने शयनकक्ष में रखें। लाल चंदन का तिलक ललाट पर लगाएं। मंगलवार को हनुमान मंदिर में लाल चंदन दें। नया जूता-चप्पल जनवरी-फरवरी के महीने में न खरीदें।

मिथुन लग्न :

मिथुन लग्न में कारक ग्रह गुरु होता है। दांपत्य सुख के लिए ये गुरुवार का व्रत रखकर एक समय भोजन करें। प्रतिदिन तुलसी के पौधे के समक्ष घी का दीपक संध्या समय दो लौंग डालकर जलाएं व प्रणाम करें। रविवार को यह उपाय न करें। दाम्पत्य सुख के लिए माथे पर गोपीचंदन का टीका लगाना चाहिए।

कर्क लग्न :

कर्क लग्न में कारक ग्रह शनि होता है। इनका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी नहीं कहा जा सकता। दांपत्य सुख के लिए इन्हें प्रत्येक शनिवार को प्रात:काल पीपल वृक्ष के समक्ष तिल्ली के तेल का दीपक जलाना चाहिए। शनिवार व मंगलवार शाम के समय अपने जीवनसाथी के साथ हनुमान मंदिर जरूर जाना चाहिए।

सिंह लग्न :

सिंह लग्न में कारक ग्रह शनि होता है। ऐसे में निम्न उपाय करें-शनिपुष्य योग में नाव की कील का छल्ला बनवाकर मध्यमा उंगली में पहनें। राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने तुलसी का पौधा एवं गंगाजल रखें। उसमें दो पत्ते तुलसी के डाल दें। दीपक, गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। राधाकृष्ण की मूर्ति पर गुलाब का हार चढ़ाएं।

कन्या लग्न :

कन्या लग्न का कारक ग्रह गुरु होता है। ऐसे जातक निम्न उपाय करें- भगवान लक्ष्मीनारायण की आराधना करें। ग्यारह एकादशी में 17 प्रकार के फल, 7 प्रकार की विभिन्न दालें श्रद्धासहित हरिमंदिर यानी लक्ष्मीनारायण भगवान के आगे मंदिर में चढ़ानी चाहिए व एक घी का दीपक जलाना चाहिए।

तुला लग्न :

तुला लग्न का कारक ग्रह मंगल होता है। ये लोग निम्न उपाय करें-प्रथम मंगलवार का व्रत रखें। एक वक्त मीठे से भोजन करें। हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। लाल फूल, चमेली का तेल, चांदी का वर्क, अनार अर्पित करें। 21 मंगलवार तक भगवान शिव पर लाल चंदन का लेप तथा लाल चंदन मंदिर में दान करना चाहिए।

वृश्चिक लग्न :

वृश्चिक लग्न का कारक ग्रह शुक्र होता है। इनके उपाय इस प्रकार हैं-मछलियों को मिश्रीयुक्त उबले चावल चढ़ाएं। राधाकृष्ण के मंदिर में गुरुवार की शाम को सुगंधित इत्र चढ़ाएं। प्रत्येक सोमवार एवं शुक्रवार को भगवान शिव को सफेद सुंगधित पुष्प चढ़ाने चाहिए। शिवलिंग पर सफेद चंदन का लेप करें।

धनु लग्न :

धनु लग्न का कारक ग्रह बुध होता है। दाम्पत्य सुख के लिए जातकों को भगवान गणपति की आराधना करनी चाहिए। हर बुधवार 21 दुर्वा, सिंदूर की डब्बी व पांच लड्डू वर्क लगाकर गणोश मंदिर में अर्पण करें। बुधवार के दिन हरे वस्त्र पहनें। हरे वस्त्र व हरी चूड़ियां बुधवार को किन्नरों को दान करें।

मकर लग्न :

मकर लग्न का कारक ग्रह चंद्रमा होता है। इन जातकों को गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार, प्रदोष, त्रयोदशी, सावन के सोमवार, इन शुभ योगों में धारण करें। चांदी का बना चंद्रमा यंत्र गंगा जल से पवित्र कर पूजा घर में रखें। हर पूर्णिमा पर गंगा जल से यंत्र को स्नान कराएं।

कुंभ लग्न :

कुंभ लग्न का कारक ग्रह सूर्य है। ऐसे जातक को प्रतिदिन सूर्य भगवान को तांबे के पात्र में जल चढ़ाना चाहिए। जल में सात बूंद गुलाब जल की डालें। तांबे का शुद्ध छेदवाला सिक्का शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार को लाल धागे में गले में धारण करें। पुरुष दाहिने हाथ की व स्त्रियां बाएं हाथ की रिंगफिंगर में ब्लू टोपाज रत्न पहनें।

मीन लग्न :

मीन लग्न का कारक ग्रह बुध होता है। इन जातकों को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। बुधवार के दिन कन्याओं को हरे रंग के वस्त्र उपहार स्वरूप भेंट करें। सात अशोक वृक्ष के पत्ते शुक्ल पक्ष में सोमवार को घर के मंदिर में रखें। धूप-दीप से पूजा करें। मुरझाने पर नए पत्ते लाकर पुराने पत्तों को पीपल के नीचे रख दें।



डॉ. उर्वशी बंधु

जल भरे कुंड से लाएं घर में समृद्धि

ईशान कोण को अच्छी जलधारा का केंद्र माना गया है। वास्तु में इसी कोने को पूजास्थल, उपासना स्थल और प्रधान इष्ट देव स्थापना का योग्य कोण भी माना जाता है, किंतु यहां जल स्थान का होना बहुत ही लाभकारी है।

परिवार में सुख और समृद्धि के लिए ईशान कोण स्थित जलस्रोत को हमेशा भरा हुआ ही रखें। उसके पानी का उपयोग भी करें तो बराबर उसमें पूर्ति करते जाएं। यह धनागम के स्रोतों को हमेशा खोले रखता है।

घर के ईशान कोण में जलस्रोत का होना बहुत शुभ है। आजकल इस कोण में बोरिंग करवाने का चलन है, किंतु वहां जलस्रोत या हौज का होना शास्त्र सम्मत है। यह शिव का स्थान है। इसी कारण इसे गंगोद्भव तुल्य माना जाता है।

वास्तु में इसी कोने को पूजा स्थल, उपासना स्थल और इष्ट देव स्थापना योग्य कोण भी माना जाता है, किंतु यहां जल स्थान का होना लाभकारी है। जिन घरों में इस स्थान पर जलस्रोत होता है, वह खुशियों का केंद्र होता है। वैसे तो जल-स्थान के लिए वरुण या पश्चिम दिशा भी अच्छी है, किंतु ईशान कोण अधिक लाभकारी माना गया है।

वास्तुग्रंथों के अतिरिक्त दकार्गल विद्या (भूमिगत जलस्रोत खोजने की कुंजी) में भी शिव के कोने या ईशान कोण को अच्छी जलधारा का केंद्र माना गया है। इस क्षेत्र की जल धारा को शंकरी कहा जाता है। यह प्राय: मीठी और अल्पदाब से जलापूर्ति में सहायक होती है। यदि ईशान के जल-स्रोत को बराबर भरा रखा जाए और उसके जलस्तर को बराबर बनाए रखा जाए तो समृद्धि आती है।

यदि नया घर बनाना हो तो सर्वप्रथम इस कोण में जलस्रोत बनाकर उसे भर दिया जाए और परिसर में गाय को बछड़े सहित लाकर कुछ दिन बांध दिया जाए तो कार्य बिना बाधा के संपन्न होता है। ‘मयमतं’ ग्रंथ में भूमि चयन के साथ ही वहां ‘सवत्सा गो’ बांधने का निर्देश है।

यदि इस जलस्रोत में चांदी की छोटी-सी मछली, शंख, मकर, लघु कलश, कल्पवृक्ष और चांदी का ही कूर्म बनाकर रखा जाए और पूजा के बाद जल भरा जाए तो इच्छित परिणाम मिलता है। यदि इसी दिशा में तुलसी क्यारा और बिल्व वृक्ष हो तो सोने पर सुहागा मानना चाहिए।

डॉ. श्रीकृष्ण


Monday, January 4, 2010

भविष्यफल - जनवरी 2010

मेष ( ARIES):- यह महीना पूर्वार्ध में कर्ज और रोग की वृद्धि करा सकता है। जिन जातकों को शनि या राहु - केतु का जन्मकालीन दुष्प्रभाव झेलना पड़ रहा है उनके लिए समय कुछ अलगाव सूचक स्वजनों एवं परिजनों से मतभेद बढाने वाला , लेकिन दोस्तों के आश्रय से लाभ देने वाला भी होगा। बाद के हिस्से में आपके जूनियर्स और दोस्त बहुत काम आएंगे। साम - दाम - दण्ड - भेद से आप अपने रास्ते के कांटे को हटा सकने में कामयाब रहेंगे। आगे के अच्छे समय की आशा में इस दौरान खूब काम करने की प्रवृत्ति बनेगी।

वृष ( TAURUS):- आजीविका और रोजगार के लिए यह महीना युवा जातकों के लिए भाग्योदयकारी होगा। रोजगार की तलाश पूरी होगी। हाल ही में शुरू किए गए व्यवसाय या छोटे स्तर की सेवा परियोजना से भी आमदनी के आसार नजर आएंगे। काई व्यक्ति आप पर भारी उपकार करेगा। इस महीने के उत्तरार्ध में आप कुछ विस्मयकारी घटनाओं के बीच अपने साहस को देखेंगे और किसी नए जीवन की वरदान राशि को लेकर चमत्कृत होंगे। अनेक महानुभाव अपने परिश्रम और चेष्टाओं के सिद्धकारक परिणाम भी महसूस करेंगे।

मिथुन ( GEMINI):- इस महीने का पहला हिस्सा भी शुभ गोचर से युक्त है। लाभकारी योजनाओं में धन लगाना उचित रहेगा। किसी मांगलिक कार्य या उत्सव में धन खर्च होगा। अच्छे स्वास्थ्य और स्फूर्ति के संचार होने से कष्टप्रद और जोखिम कार्य भी सरलता से बनते नजर आएंगे। बाद के हिस्से में सीनियर्स के प्रति जिम्मेदारियां पूरी होंगी। परन्तु कुछ जातकों का स्वास्थ्य बिगड़ जाने से उनके काम में बाधा आ सकती है। किसी कार्य विशेष के न बन पाने से पैसे की चिंता बनी रहेगी। सामाजिक क्षेत्रों में मान सम्मान की स्थिति यथावत बनी रहेगी। साल का पहला महीना कुछ रुकावटों के बाद भी सुख संतोष से बीत जाएगा।

कर्क ( CANCER):- इस महीने का पहला हिस्सा पत्नी , बेटे और भाइयों की ओर से कुछ आर्थिक संकट देने वाला होगा , फिर भी प्रभावशाली व्यक्ति और अच्छे सम्पर्क आपके काम आएंगे। बिजनस में आर्थिक स्थिति सुधरेगी। सुनियोजित कामों में समय पर लाभ होने लगेगा। महीने के दूसरे हिस्से में अच्छे संदेश और समाचार प्राप्त होंगे। उद्योग व्यापार को नई दिशा मिलेगी। काम बिगाड़ने वाले तत्व रोजमर्रा की जिंदगी से हट जाएंगे। निर्भय होकर आप अपने कामकाज को सफल बनाने में जुट जाएंगे।


सिंह ( LEO):- इस महीने का पहला हिस्सा काफी खर्च लेकर आएगा। शरीर में अचानक विकार या रोग पैदा हो सकते हैं। घर में मेहमान आदि के स्वागत में भी आडम्बरपूर्ण खर्च संभव है। आजीविका आदि में सहयोगियों के साथ तनाव और सीनियर अधिकारियों के बीच बहसबाजी से मान प्रतिष्ठा घट सकती है। इस महीने के दूसरे हिस्से में जब सूर्य आपकी छठी राशि पर संचार करेगा तो लोग आपके वक्तव्य को सत्य वचन कहकर स्वीकार कर लेंगे।

कन्या ( VIRGO) :- यह महीना अनुकूल वक्त और फायदों से भरपूर रहेगा। हालांकि स्वभाव में कुछ चंचलता आएगी , फिर भी आपके कहे गये शब्दों का सर्वत्र सम्मान होगा। आर्थिक पक्ष के अलावा आपका राजनीति दायरा भी इस बीच मजबूत होगा। जनमत और लोकमत के जरिए किसी प्रतिस्पर्धा में भी आप विजयी होंगे। इस महीने का दूसरा हिस्सा कुछ खर्चीला रहेगा और नुकसान भी करा सकता है।

तुला ( LIBRA):- इस महीने के आरंभ में विभिन्न प्रयासों , भरपूर परिश्रम और हितचिन्तकों के सहयोग से ही वांछित लाभ सम्भव होगा। एक साथ कई तरह के व्यापार या काम धन्धों में लाभ होगा। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में आगे निकल जाएंगे। घर परिवार की व्यवस्था संतोषजनक रहेगी। विरोधियों और आलोचना करने वालों के मुंह बन्द रहेंगे। महीने का पिछला हिस्सा भी सुख सौभाग्य बढ़ाने वाला है।

वृश्चिक ( SCORPIO):- इस महीने के आरंभ में रुका धन प्राप्त होगा। नौकरी अथवा आजीविका में बदलाव की संभावना रहेगी। घर के दायरे में भी परिवर्तन की संभावना है। इस महीने के आखिरी हिस्से में निवेश किये गये धन का लाभ मिलेगा। बिजनस में तरक्की होगी। सज्जनों और सन्त महात्माओं के दर्शन लाभ करेंगे। बुजुर्गों और पैतृक संबंधों में सहयोग और प्रोत्साहन मिलेगा। किसी काम में मनोवांछित लाभ कुछ रुक - रुक कर होने से चिंताएं बढेंगी।

धनु ( SAGITTARIUS) :- इस महीने में गिरते कारोबार की ओर ध्यान दें। कार्य क्षेत्र की स्थिति असन्तोषजनक होगी। अधिकारी के व्यवहार से निराशा बढ़ेगी। पार्टनर के साथ वैचारिक मतभेद होगा। सुख में कमी होगी। मेहनत अधिक होगी। व्यस्तता बढ़ेगी। बौद्धिक श्रम बढ़ेगा। महीने के मध्य तक भाग्य साथ देगा। आत्मविश्वास से जिम्मेदारी पूरी कर सकेंगे। खर्च के कारण संतान के विवाह प्रस्तावों में निर्णय लेना कठिन हो सकता है। किसी व्यापारी मित्र से शत्रुता प्रतिष्ठा के लिए चुनौती बन जाएगी। परिश्रम से आय बढ़ेगी। धन - संग्रह होगा।

मकर ( CAPRICORN) :- इस महीने किसी मूल्यवान वस्तु के खर्च हो जाने से निराशा होगी। नये आदेश और काम का बोझ कष्टप्रद सिद्ध होगा। सम्भव है आजीविका बदलने का विचार बने। आपका व्यवहार खीझ भरा रहेगा। जो भी हो रहा है स्वयं को उससे अलग अनुभव करें। अपना ध्यान अन्य विषयों की ओर मोड़ देना ठीक होगा। बिजनस पार्टनर के व्यवहार में अप्रत्याशित बदलाव हो सकता है। सूझबूझ से स्थिति का लाभ उठाएं।

कुंभ ( AQUARIUS):- इस महीने का सम्पूर्ण भाग शक्तिशाली गोचर से युक्त है। देश विदेश की यात्रा या सम्पर्कों के माध्यम से आजीविका और व्यापार में उन्नति अर्जित करेंगे। समतुल्य लोगों में साख बढ़ेगी। किसी नये काम की प्रेरणा से धन और समय का निवेश भी सुनिश्चित होगा। परन्तु सूर्य प्रधान व्यक्ति आलस्य एवं दरिद्रता के शिकार होंगे। घर परिवार के बीच अनावश्यक झगड़े क्लेश आदि से खिन्नता होगी। इसी कारण धन की आवक भी समय पर नहीं हो पाएगी।

मीन ( PISCES) :- इस महीने का पहला हिस्सा व्यक्तिगत जीवन या कार्यक्षेत्र के विवादों को सुलझाने में बीतेगा। सहयोगी और मित्रों के काम और निष्ठा के प्रति शिकायत रहेगी। लापरवाही और अति विश्वास के कारण भी किसी प्रकार की हानि से आर्थिक कष्ट अनुभव करेंगे। सरकारी सर्विस से जुड़े हुए लोग उच्चाधिकारियों से विवाद बढ़ जाने के कारण चिंतित रहेंगे। महीने के दूसरे हिस्से में कार्यक्षेत्र और पराक्रम वृद्धि धीरे - धीरे सहायक होने लगेगी। विशेष प्रकार के कार्यभारों को निपटाने में सक्रियता रहेगी। घर - परिवार के बीच चिंता और अशांति का वातावरण छंट जाएगा।

पं0 केवल आनन्द जोशी
ज्योतिषाचार्य

राशियों पर शनि प्रभाव

सिंह: इस राशि को पैरों को उतरती शनि साढ़ेसाती है। जिन महानुभावों ने गत 5-6 वर्षों में अपने जीवन में भारी कष्ट उठाए हैं, उनके लिए अब भी स

मय सावधानी से चलने का है। साढ़ेसाती खत्म होने से कुछ आशाजनक उत्साह का संचार अवश्यंभावी है, फिर भी अभी पूर्णत: निष्कंटक दौर आरंभ नहीं हुआ है। जिन जातकों ने अभी तक अच्छा समय देखा है, उनको भी अप्रैल तक सतर्क एवं सजग रहना आवश्यक होगा। शत्रु के किसी भी छल-कपट और धोखे से सावधान रहें। लापरवाही से चोट और हानि उठाने से बचें। अधिक आत्मविश्वास या अहंकारी प्रवृति के कारण किसी भी संकट में चाहे अनचाहे उलझने का डर है। इसके बाद अनेक महानुभावों को नया जीवन शुरू करने का अवसर मिलेगा। अविवाहितों का विवाह होगा। बेरोजगारों को नौकरी मिलेगी। व्यापार में फेरबदल करके अच्छा लाभ होगा और निष्ठापूर्वक कार्य करने से धन समृद्धि की प्राप्ति होगी। मकान, वाहन व पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी।

कन्या : इस राशि को पूरे साल 2010 में लौह पाद से हृदय पर साढ़े साती रहेगी। उसके बाद पैरों पर उतरती साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा। अनेकों जातकों को स्वास्थ्य संबंधी कष्ट और आजीविका में उतार-चढ़ाव का दौर देखना पडे़गा। कामकाज में मन नहीं लगेगा। कुछ अच्छे कार्यों में धन का निवेश हो सकता है। संतान व मित्रों के लिए खर्च करना होगा। स्टूडेंट्स को परीक्षा, प्रतियोगिता में कठोर परिश्रम के उपरांत आंशिक सफलता मिलेगी। जो सज्जन पहले ही बुरे वक्त के दौर से गुजर चुके हैं, उनके जीवन में अब कुछ ठहराव की अपेक्षा रहेगी। चूंकि हृदय स्थान से शनि विचरण कर रहा है, अत: दिलोदिमाग को वश में रखकर नेक इरादे से आगे बढ़ने की चेष्टा करने से निस्सन्देह अभूतपूर्व सफलता भी अनेक कन्या जातकों को प्राप्त होगी। आर्थिक रूप से समृद्धि बढे़गी व खोया धन भी जमा खाते में दर्ज हो जाएगा।

तुला : पूरे साल सिर पर तांबे के पाए से चढ़ती हुई साढे़साती उन तमाम तुला जातकों पर रहेगी जो पिछले दो-ढाई वर्षों से जीवन में अनेक प्रकार के परिवर्तन महसूस कर रहे हैं। साल में यह ग्रह बारहवें भाव में रहकर जहां लोभ, लालच और अवांछित कार्यों से हानि पहुंचाएगा, वहीं मुकदमे, विवाद से भी धन व चैन की हानि होगी। निष्काम भाव से किए गए परोपकार का फल भी कभी-कभी उल्टा मिलेगा। शरीर में रोग, दुर्घटना या गुप्त पीड़ा से उपचार और दवा का खर्च बढे़गा। कुछ जातक बुरे समय के दौरान भी कहीं-कहीं पर अच्छा प्रभाव महसूस करेंगे। कोई जटिल कार्य सिद्ध हो जाएगा या किसी भारी संकट से मुक्ति मिलेगी।

वृश्चिक : जनवरी से दिसंबर के मध्य तक लाभ स्थान में गतिशील शनि स्वर्णपाद फल नेष्ट है। पूर्वापेक्षा में विशुद्ध लाभ कम होगा। आवश्यक, अनावश्यक झंझटों में धन का अपव्यय होगा। घर, गृहस्थी की समस्या का समाधान देर से होगा। जन्म कुंडली में शनि शुभ पड़ा हो तो थोड़ा लाभ होता है। भाग्य का सितारा चमकता है पर कष्ट भी देता है।

धनु : रजतपाद से भाग्य कुसमय दशम भाव में गतिशील शनि महाराज धनु राशि वालों के लिए व्यवधान कारक है। समय के स्वरूप को देखकर कार्य करें। शनि से जुड़े दानादि भी यथा शक्ति करते रहें। धन और स्वास्थ्य के लिए शनि अंततोगत्वा लाभदायक रहेगा। शुभ मांगलिक कार्यों में खर्च होगा।

मकर : मकर राशि वालों के नवम कर्म क्षेत्र में गतिशील शनि अप्रैल बाद तक लोहपाद श्रेष्ठ है। लाभोन्नति में आश्चर्यजनक बदलाव आएगा। विचाराधीन काम पूरा होगा। आराम प्राप्ति का नया रास्ता खुलेगा। सामाजिक मेलजोल बढे़गा। एकाध नुकसान होगा। पारिवारिक कलह, रोग, बीमारी में इलाज का खर्च बढ़ेगा। अकारण झगड़े विवाद होने से सम्मान को आंच आएगी। सामाजिक प्रतिष्ठा में घट-बढ़ रहेगी।

कुंभ : कुंभ राशि वालों में लघु कल्याणी ढैया मध्यम फलदायक है, बनते-बिगड़ते परिवेश में नए आयाम मिलेंगे। साथी से सचेत रहें। व्यवसाय में उतार-चढ़ाव रहेगा। विघ्न बाधाओं से घर परिवार के सदस्यों का रुख भी उलटा रहेगा। साल के अंत तक कुछ जीविका के साधन उपलबध होंगे और बिगड़े काम बनेंगे।

मीन : सप्तम शनि रजत पाद फल नेष्ट है। मीन राशि वालों को असामान्य विषम परिस्थितियों में से गुजरना पड़ेगा। बनते कार्यों में अड़चनें पैदा होंगी। स्वास्थ्य नरम रहेगा। चांदी का पाया होने से दांपत्य जीवन का सुख-दुख समान मिलेगा। पर्याप्त खर्च के बाद घर-गृहस्थी में उन्नति से हर्षोल्लास होगा। घूमने का अच्छा अवसर मिलेगा। चौपाया या सवारी से भय बना रहेगा।

मेष : पूरे साल तक मेष राशि को छठा शनि भ्रमण फल श्रेष्ठ लाभोन्नति में सहायक रहेगा। वर्ष में जमा खर्च का संतुलन बना रहेगा। पशुधन, भूमि, वाहनादि का लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडे़गा। अनेक जातकों को संघर्षपूर्ण हालात का सामना करना पड़ेगा। परिवार या व्यवसाय में उलझनें होंगी। ऋण और कर्ज बढ़ने की आशंका रहेगी। शत्रु भी सिर उठाएंगे। स्वास्थ्य बिगड़ने से मानसिक तनाव रहेगा।

वृष : पूरे वर्ष शनि पंचम भाव में लोहे के पाये से विचरण करेगा। स्टूडेंट्स को उच्च शिक्षा में बाधा आएगी। युवा जातकों को संतान कष्ट झेलना पड़ेगा। लोहे के पाये में शनि होने से पारिवारिक कलह दांपत्य जीवन में मनमुटाव व शत्रु, रोग और ऋण का दबाव बढ़ने से मानसिक अशांति बढ़ती रहेगी। उत्तरार्द्ध में समय श्री वृद्धि में सहायक रहेगा। अच्छी सोच समझ बनाने से भौतिक विकास व आर्थिक प्राप्ति का नया रास्ता खुलेगा। राजनैतिक क्षेत्र में भाग्य का सितारा चमकेगा। स्वास्थ्य कुछ गड़बड़ा जाएगा। सावधानी बरतें।

मिथुन : मिथुन राशि वालों के लिए शनि चौथे भाव से सोने के पाये में रहने से गतिशील शनि की लघु कल्याणी ढैया मध्यम फलदायक है। संघर्ष धन हानि और तनाव के बावजूद शुभ फल भी कभी-कभी उत्साहवर्धन करेंगे। जमीन, जायदाद और पारिवारिक मामलों में ज्यादा खर्च होने से आत्मग्लानि होगी। रोग और शत्रु से विवाद होने से खर्च बढ़ सकते हैं पर साल अंत तक कुछ उपलब्धियां होंगी।

कर्क : तृतीया यानी पराक्रम भाव में भ्रमणशील शनि ताम्रपाद फल नेष्ट है। खर्च की अभिवृद्धि मानसिक चिंता का कारण बनेगी। नए काम की रूपरेखा कठिनाई से सफल होगी। अच्छी व खराब दोनों किस्म की खबर मिलेगी। अधिकांश कर्क जातक जो व्यवसाय या नौकरी से जुड़े हैं, उन्हें कार्यों में सफलता मिलेगी। व्यापार में लाभ भी होगा व वाहन आदि की खरीद होगी पर बिना सोचे विचारे कुछ ऐसे काम भी होंगे जिनके लिए बाद में पश्चाताप हो।

Friday, January 1, 2010

वाहन हादसों से बचा सकता है वास्तु

वास्तु की मान्यताओं के विकास काल में प्राय: हाथी, घोड़ों और उनसे चलने वाले रथ, पालकी आदि वाहनों पर ही विचार किया गया किंतु वे ही मान्यताएं वर्तमान वाहनों के संदर्भ में भी सर्वथा प्रासंगिक है। वाहन दरअसल मानवीय जीवन की अहम आवश्यकता है और सहायक भी कम नहीं हैं। यदि किसी के पास वाहन नहीं हो और वह वाहन की अपेक्षा करता हो तो उसे वेदोक्त ‘पवमान सूक्त’ का संपुट सहित पाठ करना चाहिए। यह पाठ परिवार में शांति व सुख का संचार भी करता है और वाहन जन्य आकस्मिक हादसों से बचाने वाला भी है।

भवन में सामान्यत: वायव्यकोण में वाहनों को रखना चाहिए। आजकल प्राय: भवन निर्माण के समय वाहन के लिए किसी भी एक दिशा में लम्बवत गलियारा छोड़ दिया जाता है और उसके साथ ही दरवाजा भी रख दिया जाता है। यहां यह ज्ञातव्य है कि गृहपति के आने-जाने के दरवाजे के अतिरिक्त वाहन के लिए अलग द्वार होना चाहिए। वास्तु विन्यास की परंपरा में ऐसा आवश्यक है। इसके लिए भवन के सामने के भाग की जो लम्बाई या चौड़ाई हो, उसको नौ भागों में बांट दें और प्राय: दोनों ओर से दो-दो खंडों को छोड़कर वाहन के लिए द्वार रखना चाहिए।

भवन में वायव्य कोण से लेकर नैऋत्य कोण की ओर की दीवार पर नौ-नौ भागों के अनुसार पहले दो और आखिरी दो खंड छोड़कर दरवाजा रखना बहुत शुभ माना जाता है। भवन का निर्माण कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए कि वाहन एकदम उत्तरी दीवार के पास नहीं खड़ा रहे बल्कि उससे दो खंड की दूरी बनी रहे। वायव्यकोण के निकट, दीवार से आगे दो खंड छोड़कर दरवाजा रखने से परिवार में शोक और दु:ख की आशंका नहीं के बराबर रहती है जैसा कि वास्तुप्रदीप का मत है। ऐसे में तीसरे, चौथे खंड पर वाहन के लिए दरवाजा होना बहुत शुभ है। ऐसा होने पर वाहन संचालन में भी उचित समय पर उचित निर्णय होता है और भ्रम या चूक की संभावना नहीं के बराबर रहती है। यहां यह भी नियम है कि कभी वायव्य कोण से लगता हुआ कोई रेंप घर की सीमा से बाहर नहीं बनाए। हां, भवन के भीतर बनाया जा सकता है। बाहर बने रेंप से मतिभ्रम, व्यर्थ विवाद ऐसी स्थितियां देखने में आई हैं।


डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

मकर संक्रांति का त्योहार

मकर संक्रांति का त्योहार पूरे भारत में श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। पंजाब में यह माघी और लोहड़ी के नाम से तो दक्षिण में पोंगल के रूप में जाना जाता है। गंगा और अन्य पवित्र नदियों के तट पर लाखों लोग आज के दिन उदय होते सूर्य की प्रार्थना करते हैं। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य को भगवान का दर्जा दिया गया है।

उत्तर भारत :

हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में इस दिन तिल और खिचड़ी खाने की परंपरा है। लोग सुबह पहले पवित्र सरोवरों में स्नान करते हैं और धर्म स्थलों पर जाते हैं। पंजाब में यह त्योहार माघी के नाम से मनाया जाता है। इससे एक दिन पहले लोहड़ी का त्योहार होता है, जब रेवड़ी, मूंगफली और भुने हुए मक्के के दाने विशेष रूप से खाए और बांटे जाते हैं।

दक्षिण भारत :

कर्नाटक : लोग रंगीन कपड़े पहनकर मित्रों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं। गन्ने, तिल की मिठाइयां, सूखा नारियल, मूंगफलियां और भुने हुए चने एक-दूसरे को देते हैं। इस दिन गाय-बैलों के सींग धोते और रंगते हैं। उन्हें फूल मालाओं से सजाया जाता है। रात को गीत-संगीत होता है। एक जगह आग लगाकर, जानवरों को आग पर से कुदाया जाता है।

तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश :

तेलुगू लोगों के लिए यह एक बड़ा पर्व है। वे इसे पेडा पंडुगा कहते हैं। यहां यह महोत्सव चार दिन चलता है। पहले दिन भोगी, दूसरे दिन संक्रांति, तीसरे दिन कणुमा और चौथे दिन मक्कणुमा कहलाता है।

पूर्व भारत :

पश्चिम बंगाल और बिहार में मकर संक्रांति को नदियों के तट पर स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। कोलकाता में हुगली नदी के किनारे गंगासागर मेला लगता है। देशभर से श्रद्धालु यहां इस दिन स्नान के लिए पहुंचते हैं। इस दिन का स्नान मोक्षदायक माना जाता है।

गुजरात, राजस्थान में उड़ती हैं पतंगें

पश्चिम भारत : महाराष्ट्र :

इस त्योहार पर लोग आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे को मीठे रंगीन अनाज के दाने और भुने हुए तिल देते हैं, साथ ही गाते हैं-तिल गुड़ घया, गुड़-गुड़ बोला। अर्थात हमारे बीच अब मित्रता और अच्छे विचार पनपें।

गुजरात :

हिंदू गृहिणियां इस दिन नए बर्तन खरीदती हैं और उनका इस्तेमाल करती हैं। आकाश पतंगों से भर जाता है।

राजस्थान :

इस दिन पुष्कर में बड़ा मेला लगता है। पतंगें उड़ाई जाती हैं। शेष परंपराएं उत्तर भारत से ही मिलती-जुलती हैं।