प्रत्येक धर्मानुष्ठान की शुरुआत संकल्प से होती है। सभी कामनाएं संकल्प मूलक ही हैं। सभी यज्ञ संकल्प के अनंतर ही संपन्न होते हैं।
मानव जीवन पर भावनाओं का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। संकल्प भी अनुष्ठेय कर्म की साधना के प्रति साधक की भावना का मूर्त रूप है। संकल्प लेना जोखिम का काम इसलिए है क्योंकि यदि संकल्प लेकर आपने उसे पूरा नहीं किया तो गलत माना जाता है। हमारे यहां शपथ उठाना बहुत जोखिमभरा काम समझा जाता है।
इसलिए उसे प्राण पर आ बनने की दशा में ही शपथ उठाने को विवश होना पड़ता है। यदि किसी कारणवश एक बार शपथ उठा ली तो फिर रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई के आदर्शानुसार अवसर पड़ने पर स्वयं हंसते-हंसते प्राण पर खेल गए महाराजा दशरथ इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। लेकिन आज लोगों ने शपथ ग्रहण को भी एक रस्मी कार्यवाही मात्र समझ रखा है। देश धर्म और अपने मतदाताओं के प्रति वफादारी की शपथ उठाने वाले ये राष्ट्रीय सांसदों के सदस्य जनमत की अवहेलना कर जनविरोधी कानून की सृष्टि करने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाते।
संकल्प प्रथा का ही विधान किया गया है। शपथ उठाना एक अपमान सूचक प्रथा है। उसे वही व्यक्ति उठाता है जिसकी ईमानदारी में सर्वसाधारण को संदेह हो और वह इस कठिनतम व्यापार द्वारा विश्वास दिलाना चाहता हो। संकल्प प्रथा, शपथ प्रणाली के सर्वथा विपरीत वह अनुष्ठान है कि जिसमें साधक अमुक अनुष्ठेय कर्म के प्रति अपनी दृढ़निष्ठा और आत्मविश्वास की भावना से ताजा होकर कत्र्तव्य पालन में संलग्न हो जाता है। इसके साथ ही वह अनुष्ठान पवित्रता के शीर्ष पर पहुंचकर सामान्य जीवन में हमें पराकाष्ठा तक पहुंचने में मदद भी करता है।
हमारे पूर्वजों ने आज से करोड़ों वर्ष पूर्व सांस्कृतिक जीवन की जिस परंपरा को प्रारंभ किया वह आज भी अक्षुण्ण है। सभी लोग आदरसहित संकल्प के महत्व को जानते समझते और उसकी वंदना भी करते हैं। संध्या वंदन आदि सभी धार्मिक कृत्यों के समय संकल्प को बोलकर हम उसी परंपरा का निर्वाह करते हैं। संध्या वंदन संकल्प का ऐसा अनुष्ठान है जिसकी ऊंचाइयां हमें छोटे-छोटे कर्मो में सदियों से दिखाई देती रही है। इसकी महत्ता से तो विद्वानों के साथ मुनिजन भी मानते आए हैं। वास्तव में ऋषियों और मुनियों ने ही भारतीय समाज में संकल्प के लालित्य और महत्ता से परिचित करवाया है। यदि वे इसकी महत्ता को सदियों पहले जाग्रत नहीं करवाते तो हम भला कैसे संकल्प को अनुष्ठान के रूप में निभा पाते।
संकल्प में जल ग्रहण क्यों?
संकल्प करने का विधान इसलिए है क्योंकि जल में वरुण देव का वास है और उसके साक्ष्य में जो प्रतिज्ञा की जाएगी उसका निर्वाह न करने पर वरुण देव प्रतिज्ञा पालन न करने वाले को ही दंड देंगे। आस्तिक जनों को अपने सभी धार्मिक अनुष्ठान जल को स्पर्श करके ही संकल्प से ही आरंभ करना चाहिए। इससे संकल्प के निमित्त प्रथम ही जल की विद्यमानता हो जाने पर आगे का समस्त क्रिया-कलाप सुचारू रूप से चलता रहता है। यही संकल्प का महत्व है जिसे जानना और समझना जरूरी है।
Saturday, November 21, 2009
परीक्षा में सफलता के सूत्र
हर विद्यार्थी वर्ष भर अपनी पढ़ाई में कठिन परिश्रम कर परीक्षा में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है। अपने भाग्य और कड़ी मेहनत के बल पर ही कोई विद्यार्थी परीक्षा में श्रेष्ठ अंकों में उत्तीर्ण हो सकता है। शकुन शास्त्र के अनुसार परीक्षा में जाने से पूर्व बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए और मीठे दही में तुलसी का पत्ता मिलाकर उसका सेवन करना चाहिए। हर विद्यार्थी कुछ सामान्य उपाय करके शिक्षा के क्षेत्र में अपना उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकता है। इन उपायों से अनुकूलता सिद्ध होगी।
* विद्यार्थियों को अध्ययन करते समय अपना मुंह पूर्व या उत्तर की ओर रखना चाहिए।
* ब्रम्हा मुहूर्त में उठकर अध्ययन करने से विषय का ज्ञान लंबे समय तक विद्यार्थियों के जेहन में ताजा बना रहता है।
* कठिन विषय की पाठच्य पुस्तकों में गुरुवार के दिन मोरपंख रखें।
* जब आपका सूर्य स्वर (दायां स्वर) नासिका का चल रहा हो, तब कठिन विषय का अध्ययन करें तो वह शीघ्र याद हो जाएगा।
* ब्राम्ही का सेवन करने वाले विद्यार्थी परीक्षा में सफल होते हैं।
* जिन विद्यार्थियों को परीक्षा में उत्तर भूल जाने की आदत हो, उन्हें परीक्षा में अपने पास कपूर और फिटकरी रखनी चाहिए। यह नकारात्मक ऊर्जा को हटाते हैं।
* स्वर शास्त्र के अनुसार जो स्वर चल रहा हो, परीक्षा के लिए जाते हुए वही पैर घर से निकालें। इसी प्रकार परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते समय भी चल रहे स्वर का ध्यान रखकर प्रवेश करें। इससे अनुकूलता सिद्ध होगी और सफलता मिलेगी।
गणोश जी का स्मरण करें
भगवान गणोशजी को हर बुधवार के दिन दूर्वा चढ़ाने से बच्चों में कुशाग्र बुद्धि विकसित होती है।
मां सरस्वती का आह्वान करें
अपनी जिह्वा को तालु में लगाकर मां सरस्वती के बीज मंत्र ‘ऐं’ मंत्र का जाप करने से मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है तथा विद्या-बुद्धि में वृद्धि होती है।
दिन शुभ व्यतीत होगा
परीक्षा में जाने से पूर्व मीठे दही पर तुलसी के पत्ते रखकर ग्रहण करके घर से निकलें।
* विद्यार्थियों को अध्ययन करते समय अपना मुंह पूर्व या उत्तर की ओर रखना चाहिए।
* ब्रम्हा मुहूर्त में उठकर अध्ययन करने से विषय का ज्ञान लंबे समय तक विद्यार्थियों के जेहन में ताजा बना रहता है।
* कठिन विषय की पाठच्य पुस्तकों में गुरुवार के दिन मोरपंख रखें।
* जब आपका सूर्य स्वर (दायां स्वर) नासिका का चल रहा हो, तब कठिन विषय का अध्ययन करें तो वह शीघ्र याद हो जाएगा।
* ब्राम्ही का सेवन करने वाले विद्यार्थी परीक्षा में सफल होते हैं।
* जिन विद्यार्थियों को परीक्षा में उत्तर भूल जाने की आदत हो, उन्हें परीक्षा में अपने पास कपूर और फिटकरी रखनी चाहिए। यह नकारात्मक ऊर्जा को हटाते हैं।
* स्वर शास्त्र के अनुसार जो स्वर चल रहा हो, परीक्षा के लिए जाते हुए वही पैर घर से निकालें। इसी प्रकार परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते समय भी चल रहे स्वर का ध्यान रखकर प्रवेश करें। इससे अनुकूलता सिद्ध होगी और सफलता मिलेगी।
गणोश जी का स्मरण करें
भगवान गणोशजी को हर बुधवार के दिन दूर्वा चढ़ाने से बच्चों में कुशाग्र बुद्धि विकसित होती है।
मां सरस्वती का आह्वान करें
अपनी जिह्वा को तालु में लगाकर मां सरस्वती के बीज मंत्र ‘ऐं’ मंत्र का जाप करने से मां सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है तथा विद्या-बुद्धि में वृद्धि होती है।
दिन शुभ व्यतीत होगा
परीक्षा में जाने से पूर्व मीठे दही पर तुलसी के पत्ते रखकर ग्रहण करके घर से निकलें।
रमल ज्योतिष से जोड़ी मिलान - डॉ.नरेंद्र कुमार
अरबी ज्योतिष. 
विवाह के पूर्व कुंडली मिलान एक ऐसा कार्य है जो लगभग सभी हिंदू परिवारों में किया जाता है। कभी-कभी वर अथवा वधु की कुंडली न होने पर जोड़ी मिलान मुश्किल कार्य होता है। इसका समाधान रमल ज्योतिष से किया जा सकता है, इसमें फलादेश की विधि पांसे पर आधारित है।
रमल शास्त्र में जातक की कुंडली मिलाने का एक विशेष विधान है, जो सप्तम घर से संबंधित रहता है, इसका प्रारंभ पांसे के द्वारा किया जाता है। रमल शास्त्र की शब्दावली को ‘मिलाने-उल-रमल’ के नाम से जाना जाता है। इसमें जातक को स्वयं अथवा उनके माता-पिता को रमलाचार्य के समक्ष प्रश्न करना होता है कि इन दो जातकों की कुंडली मिलाने से शुभ-विवाह का योग बनता है अथवा नहीं।
यदि विवाह होता है तो उनका दांपत्य जीवन कैसा रहेगा? रमल ज्योतिष शास्त्र में यदि जायचे के सप्तम घर में और अन्य घरों के साथ ही भाग्य स्थान में शुभ शक्लें (आकृति) बराबर हों, साथ ही ‘नजर-ए-मिकारना’ हो तो जातक की जन्म कुंडली यानी कि विवाह के लिए भाग्य की स्थिति शुभ व लाभजनक होती है। यानी कि दांपत्य जीवन अंतिम चरण तक मधुर और स्नेहकारी रहेगा।
जातक को ससुराल पक्ष से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक लाभ समयानुसार होता रहेगा, साथ ही शांति और सम्मान भी प्राप्त होगा। जातक को संतान की प्राप्ति होगी और संतान को धन प्राप्त होगा। जातक के परिवार में शोक की स्थिति पैदा नहीं होगी और न ही मन उदास होगा। यदि जातक के सप्तम घर में अशुभ शक्लें व भाग्य भाव में भी अशुभ शक्लें हों।
साथ ही निकटवर्ती और दूरवर्ती साक्षी हो तो परिवार में मानसिक परेशानी होगी और बराबर लाभ प्राप्त नहीं होगा। इस स्थिति में विवाह में देरी हो सकती है और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। जातक का मन उदासीन होगा और ससुराल पक्ष की ओर से सुख-शांति प्राप्त होने की संभावना कम होगी। इस हालत में जातक को मानसिक परेशानी बनी रहेगी।
यदि जातक के सप्तम घर में शक्ल लहियान हो, जो कि गुरु ग्रह की शक्ल है और धनु राशि से संबंधित है। इस शक्ल में एक बिंदु निर्धारित स्थिति में और तीन रेखाएं निर्धारित प्रक्रिया में होती हैं, जबकि नक्षत्र मूल और नक्षत्र पूर्वाषाढ़ से संबंधित हैं।
यह रमल शास्त्र के प्रस्तार यानी कि जायचे के विरोधी तत्व घर में आई है, जो पूर्णत: बलहीन है और कई स्थिति में यह समय-समय पर निर्बलता भी प्रदर्शित करती है। प्रश्न पूछने की यह सारी कार्यप्रणाली रमल विद्वान के समक्ष होती है। यदि विद्वान के समक्ष जातक न हो तो ‘प्रश्न-फॉर्म’ के माध्यम से भी यह कार्य किया जा सकता है।
विवाह के पूर्व कुंडली मिलान एक ऐसा कार्य है जो लगभग सभी हिंदू परिवारों में किया जाता है। कभी-कभी वर अथवा वधु की कुंडली न होने पर जोड़ी मिलान मुश्किल कार्य होता है। इसका समाधान रमल ज्योतिष से किया जा सकता है, इसमें फलादेश की विधि पांसे पर आधारित है।
रमल शास्त्र में जातक की कुंडली मिलाने का एक विशेष विधान है, जो सप्तम घर से संबंधित रहता है, इसका प्रारंभ पांसे के द्वारा किया जाता है। रमल शास्त्र की शब्दावली को ‘मिलाने-उल-रमल’ के नाम से जाना जाता है। इसमें जातक को स्वयं अथवा उनके माता-पिता को रमलाचार्य के समक्ष प्रश्न करना होता है कि इन दो जातकों की कुंडली मिलाने से शुभ-विवाह का योग बनता है अथवा नहीं।
यदि विवाह होता है तो उनका दांपत्य जीवन कैसा रहेगा? रमल ज्योतिष शास्त्र में यदि जायचे के सप्तम घर में और अन्य घरों के साथ ही भाग्य स्थान में शुभ शक्लें (आकृति) बराबर हों, साथ ही ‘नजर-ए-मिकारना’ हो तो जातक की जन्म कुंडली यानी कि विवाह के लिए भाग्य की स्थिति शुभ व लाभजनक होती है। यानी कि दांपत्य जीवन अंतिम चरण तक मधुर और स्नेहकारी रहेगा।
जातक को ससुराल पक्ष से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक लाभ समयानुसार होता रहेगा, साथ ही शांति और सम्मान भी प्राप्त होगा। जातक को संतान की प्राप्ति होगी और संतान को धन प्राप्त होगा। जातक के परिवार में शोक की स्थिति पैदा नहीं होगी और न ही मन उदास होगा। यदि जातक के सप्तम घर में अशुभ शक्लें व भाग्य भाव में भी अशुभ शक्लें हों।
साथ ही निकटवर्ती और दूरवर्ती साक्षी हो तो परिवार में मानसिक परेशानी होगी और बराबर लाभ प्राप्त नहीं होगा। इस स्थिति में विवाह में देरी हो सकती है और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। जातक का मन उदासीन होगा और ससुराल पक्ष की ओर से सुख-शांति प्राप्त होने की संभावना कम होगी। इस हालत में जातक को मानसिक परेशानी बनी रहेगी।
यदि जातक के सप्तम घर में शक्ल लहियान हो, जो कि गुरु ग्रह की शक्ल है और धनु राशि से संबंधित है। इस शक्ल में एक बिंदु निर्धारित स्थिति में और तीन रेखाएं निर्धारित प्रक्रिया में होती हैं, जबकि नक्षत्र मूल और नक्षत्र पूर्वाषाढ़ से संबंधित हैं।
यह रमल शास्त्र के प्रस्तार यानी कि जायचे के विरोधी तत्व घर में आई है, जो पूर्णत: बलहीन है और कई स्थिति में यह समय-समय पर निर्बलता भी प्रदर्शित करती है। प्रश्न पूछने की यह सारी कार्यप्रणाली रमल विद्वान के समक्ष होती है। यदि विद्वान के समक्ष जातक न हो तो ‘प्रश्न-फॉर्म’ के माध्यम से भी यह कार्य किया जा सकता है।
आयुर्वेद और तंत्रशास्त्र में रावण का योगदान
दशानन
अपने युग के प्रकांड पंडित ही नहीं, वैज्ञानिक भी थे। आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। इंद्रजाल जैसी अथर्ववेद मूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया। उनके पास सुषेण जैसे वैद्य थे, जो देश-विदेश में पाई जाने वाली जीवन रक्षक औषधियों की जानकारी स्थान, गुण-धर्म आदि के अनुसार जानते थे।
चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण के ये ग्रंथ चर्चित हैं-
1. दस शतकात्मक अर्कप्रकाश, 2. दस पटलात्मक उड्डीशतंत्र, 3. कुमारतंत्र, और 4. नाड़ीपरीक्षा।
रावण ने अंगूठे के मूल में चलने वाली धमनी को जीवननाड़ी बताया है जो सर्वाग-स्थिति व सुख-दु:ख को बताती है। उनका निर्देश है कि औरतों में वाम हाथ व पांव तथा पुरुषों में दक्षिण हाथ व पांव की नाड़ियों का परीक्षण करना चाहिए। यह परीक्षण तीन अंगुलियों से होता है।
नाड़ियां तीन प्रकार की होती हैं। तर्जनी के नीचे चलने वाली पहली नाड़ी वात व्याधि को, मध्यमा अंगुली के नीचे चलने वाली दूसरी नाड़ी पित्त व्याधि को और तीसरी अंगुली के नीचे प्रवाहमान अंतिम नाड़ी कफ जन्य व्याधि को बताती है। इन्हीं के आधार पर समस्त रोगों के पूर्व-वर्तमान लक्षण और भविष्य कथन संभव हैं।
शिशु-स्वास्थ्य योजना का विचारक ‘अर्कप्रकाश’ को रावण ने मंदोदरी के प्रश्नों के उत्तर के रूप में लिखा है। इसमें गर्भस्थ शिशु को कष्ट, रोग, काल, राक्षस आदि व्याधियों से मुक्त रखने के उपाय बताए गए हैं। लता, गुल्म, शाखा, पादप और प्रसर के रूप में मिलने वाली सैकड़ों औषधियों का उपयोग करने की विधियां भी इसमें हैं।
इसी प्रकार ‘कुमारतंत्र’ में मातृकाओं को पूजा आदि देकर घर-परिवार को स्वस्थ रखने का वर्णन है। इसमें चेचक, छोटीमाता, बड़ी माता जैसी मातृ व्याधियों के लक्षण व बचाव के उपाय बताए गए हैं।
इसमें नंदना, सुनंदा, पूतना, मुखमंडिका, कंटपूतना, शकुनिका, शुष्करेवती, आर्यका, भूसूतिका, निर्ऋता, पिलिपिच्छा, कामुका जैसी मातृकाओं के मंत्रों को भी लिखा गया है। इनमें से कुछ मातृकाएं वास्तुपुरुष के साथ की हैं जिनकी शांति के उपाय मयमतम्, अपराजितपृच्छा, राजवल्लभ आदि वास्तुग्रंथों में भी मिलते हैं।
चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण के ये ग्रंथ चर्चित हैं-
1. दस शतकात्मक अर्कप्रकाश, 2. दस पटलात्मक उड्डीशतंत्र, 3. कुमारतंत्र, और 4. नाड़ीपरीक्षा।
रावण ने अंगूठे के मूल में चलने वाली धमनी को जीवननाड़ी बताया है जो सर्वाग-स्थिति व सुख-दु:ख को बताती है। उनका निर्देश है कि औरतों में वाम हाथ व पांव तथा पुरुषों में दक्षिण हाथ व पांव की नाड़ियों का परीक्षण करना चाहिए। यह परीक्षण तीन अंगुलियों से होता है।
नाड़ियां तीन प्रकार की होती हैं। तर्जनी के नीचे चलने वाली पहली नाड़ी वात व्याधि को, मध्यमा अंगुली के नीचे चलने वाली दूसरी नाड़ी पित्त व्याधि को और तीसरी अंगुली के नीचे प्रवाहमान अंतिम नाड़ी कफ जन्य व्याधि को बताती है। इन्हीं के आधार पर समस्त रोगों के पूर्व-वर्तमान लक्षण और भविष्य कथन संभव हैं।
शिशु-स्वास्थ्य योजना का विचारक ‘अर्कप्रकाश’ को रावण ने मंदोदरी के प्रश्नों के उत्तर के रूप में लिखा है। इसमें गर्भस्थ शिशु को कष्ट, रोग, काल, राक्षस आदि व्याधियों से मुक्त रखने के उपाय बताए गए हैं। लता, गुल्म, शाखा, पादप और प्रसर के रूप में मिलने वाली सैकड़ों औषधियों का उपयोग करने की विधियां भी इसमें हैं।
इसी प्रकार ‘कुमारतंत्र’ में मातृकाओं को पूजा आदि देकर घर-परिवार को स्वस्थ रखने का वर्णन है। इसमें चेचक, छोटीमाता, बड़ी माता जैसी मातृ व्याधियों के लक्षण व बचाव के उपाय बताए गए हैं।
इसमें नंदना, सुनंदा, पूतना, मुखमंडिका, कंटपूतना, शकुनिका, शुष्करेवती, आर्यका, भूसूतिका, निर्ऋता, पिलिपिच्छा, कामुका जैसी मातृकाओं के मंत्रों को भी लिखा गया है। इनमें से कुछ मातृकाएं वास्तुपुरुष के साथ की हैं जिनकी शांति के उपाय मयमतम्, अपराजितपृच्छा, राजवल्लभ आदि वास्तुग्रंथों में भी मिलते हैं।
मूलांक 6 वाले पहनें सफेद वस्त्र
जिन व्यक्तियों का जन्म किसी भी माह की 6, 15 या 24 तारीख को होता है, उनका मूलांक ‘6’ बनता है। मूलांक 6 का स्वामी ग्रह शुक्र है, जो
कला, सौंदर्य और द्रव्य का कारक है। यदि ये तारीखें 20 अप्रैल से 27 मई तक और 20 सितंबर से 27 अक्टूबर के बीच हों तो शुक्र का जीवन में विशेष प्रभाव होता है। इन व्यक्तियों की शारीरिक बनावट आकषर्क होती है। इनका व्यक्तित्व चुंबकीय होता है। ये स्वयं अच्छे कलाकार होते हैं। पहली ही मुलाकात में सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। दूसरे मूलांकों की तुलना में इनके मित्रों की संख्या अधिक होती है। मित्र मंडली का सानिध्य इनके जीने के लिए पर्याप्त होता है।
स्वभाव : मूलांक 6 वाले व्यक्तियों का मन सदैव सुंदर वस्तुओं, कविता, संगीत, नृत्य, कला आदि विषयों में लगता है। ये बहुत लोकप्रिय होते हैं। प्रसन्नतापूर्वक जीना ही इनका लक्ष्य है। असुर लोगों के गुरु ग्रह (शुक्र) के प्रभाव में आने वाला अंक होने के कारण इस मूलांक वाले जातक तंत्र-मंत्र, तपस्या व कार्यसिद्धि के लिए भगवान की प्रार्थना करने की इच्छा रखते हैं। इन व्यक्तियों में मिलनसारिता तथा आकषर्ण शक्ति खूब होती है। ये कोमल, प्रिय, तथा शांतिप्रिय होते हैं। स्वभाव से हठी भी होते हैं।
स्वास्थ्य : मूलांक 6 का कारक ग्रह शुक्र मनुष्य के शरीर में गले, मूत्राशय व गर्दन पर शासन करता है। प्रारंभिक वषरें में शरीर बहुत स्वस्थ रहता है, लेकिन भोग-विलास का जीवन बिताने के बाद अस्वस्थ होने की आशंका रहती है। इन व्यक्तियों को गले, श्वांस नलिका, फेफड़ों की परेशानी, छाती, कंधे, भुजाओं तथा पांवों में घाव व चोट की आशंका बनी रहती है। आमतौर से ये स्वस्थ ही दिखते है।
आर्थिक स्थिति : बचपन बीतते ही मूलांक 6 वाले भाग्य को अपने पक्ष में महसूस करते हैं। आर्थिक मामलों में ये धोखा भी खाते हैं। इन्हें रुपया-पैसा, उपहार और कीमती रत्न अप्रत्याशित ढंग से मिलते हैं, परंतु खर्चीले स्वभाव के कारण इस मूलांक के व्यक्तियों को बुढ़ापे में धन की कमी महसूस होती है।
व्यवसाय व कार्यरुचि : असुर गुरु शुक्र का प्रभाव मूलांक 6 वाले व्यक्तियों को जीवनर्पयत समाज में विशिष्ट स्थान दिलाता है। जीवन में ये व्यक्ति हर क्षेत्र में, जिसका सीधा संबंध जनसंपर्क से हो, में सफल रहते हैं। एक महान दार्शनिक, कवि, उपन्यासकार, धार्मिक नेता और लेखक के रूप में ख्याति अर्जित करते हैं। पहली श्रेणी में इस मूलांक के लोग कलाकार, मॉडल, अभिनेता, नट-नर्तक होते हैं। दूसरी श्रेणी में वास्तुकार, इंजीनियर, चिकित्सक व राजनीतिज्ञ आते हैं। तीसरी श्रेणी में व्यवसायी और उद्योगपति भी आते हैं। संसार में जितने भी कलाकार हैं, उनमें बहुसंख्या मूलांक 6 से संबंधित है।
प्रेम-संबंध, विवाह एवं संतान :
मूलांक 6 वाले व्यक्ति सही अर्थो में प्रेम करते हैं। इनका मूलांक 3, 6, 9, 2 वालों की ओर विशेष झुकाव होता है। वैवाहिक जीवन सुखी होता है। संतानसुख सामान्य ही होता है।
यात्रा : मूलांक 6 वाले यात्राएं कम ही करते हैं। ये व्यक्ति एक जगह रहकर जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। यात्राओं से प्राय: लाभ कम ही होता है। कई बार विदेश जाते-जाते रह जाते हैं।
शुभ रंग : मूलांक 6 वालों का शुभ रंग सफेद है। इनको हल्का नीला और हल्का गुलाबी रंग भी लाभ देता है। हरा एवं सतरंगी मिला हुआ रंग भी शुभ होता है।
शुभ तिथियां : मूलांक ६ वालों को 6, 14, 24 तारीखें शुभ रहती हैं। इनको 3, 12, 21, 30 तथा 9,18,27 तारीखें भी विशेष लाभदायक होती हैं।
शुभ दिन : मूलांक 6 वालों के लिए सोमवार, मंगलवार, बुधवार एवं शुक्रवार शुभ दिन होते हैं। शुक्रवार किसी भी प्रमुख कार्य के लिए लाभदायक होता है।
गुरुमंत्र : मूलांक 6 वालों को किशोरावस्था में गलत लोगों की संगति के कारण यौनरोगों की आशंका रहती है। इन्हें अपनी मानसिक शक्ति पर नियंत्रण रखना चाहिए। रोगों के प्रभाव को कम करने के लिए प्रत्येक शुक्रवार को सुगंधित वस्तुओं, इत्र, चंदन और सफेद खाद्य पदार्थो का दान करना चाहिए। ये सामर्थय अनुसार मध्यमा में हीरा धारण करें, इसके अभाव में जर्किन एवं ओपल भी धारण कर सकते हैं। सफेद व हल्के गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना लाभदायक होगा।
स्वभाव : मूलांक 6 वाले व्यक्तियों का मन सदैव सुंदर वस्तुओं, कविता, संगीत, नृत्य, कला आदि विषयों में लगता है। ये बहुत लोकप्रिय होते हैं। प्रसन्नतापूर्वक जीना ही इनका लक्ष्य है। असुर लोगों के गुरु ग्रह (शुक्र) के प्रभाव में आने वाला अंक होने के कारण इस मूलांक वाले जातक तंत्र-मंत्र, तपस्या व कार्यसिद्धि के लिए भगवान की प्रार्थना करने की इच्छा रखते हैं। इन व्यक्तियों में मिलनसारिता तथा आकषर्ण शक्ति खूब होती है। ये कोमल, प्रिय, तथा शांतिप्रिय होते हैं। स्वभाव से हठी भी होते हैं।
स्वास्थ्य : मूलांक 6 का कारक ग्रह शुक्र मनुष्य के शरीर में गले, मूत्राशय व गर्दन पर शासन करता है। प्रारंभिक वषरें में शरीर बहुत स्वस्थ रहता है, लेकिन भोग-विलास का जीवन बिताने के बाद अस्वस्थ होने की आशंका रहती है। इन व्यक्तियों को गले, श्वांस नलिका, फेफड़ों की परेशानी, छाती, कंधे, भुजाओं तथा पांवों में घाव व चोट की आशंका बनी रहती है। आमतौर से ये स्वस्थ ही दिखते है।
आर्थिक स्थिति : बचपन बीतते ही मूलांक 6 वाले भाग्य को अपने पक्ष में महसूस करते हैं। आर्थिक मामलों में ये धोखा भी खाते हैं। इन्हें रुपया-पैसा, उपहार और कीमती रत्न अप्रत्याशित ढंग से मिलते हैं, परंतु खर्चीले स्वभाव के कारण इस मूलांक के व्यक्तियों को बुढ़ापे में धन की कमी महसूस होती है।
व्यवसाय व कार्यरुचि : असुर गुरु शुक्र का प्रभाव मूलांक 6 वाले व्यक्तियों को जीवनर्पयत समाज में विशिष्ट स्थान दिलाता है। जीवन में ये व्यक्ति हर क्षेत्र में, जिसका सीधा संबंध जनसंपर्क से हो, में सफल रहते हैं। एक महान दार्शनिक, कवि, उपन्यासकार, धार्मिक नेता और लेखक के रूप में ख्याति अर्जित करते हैं। पहली श्रेणी में इस मूलांक के लोग कलाकार, मॉडल, अभिनेता, नट-नर्तक होते हैं। दूसरी श्रेणी में वास्तुकार, इंजीनियर, चिकित्सक व राजनीतिज्ञ आते हैं। तीसरी श्रेणी में व्यवसायी और उद्योगपति भी आते हैं। संसार में जितने भी कलाकार हैं, उनमें बहुसंख्या मूलांक 6 से संबंधित है।
प्रेम-संबंध, विवाह एवं संतान :
मूलांक 6 वाले व्यक्ति सही अर्थो में प्रेम करते हैं। इनका मूलांक 3, 6, 9, 2 वालों की ओर विशेष झुकाव होता है। वैवाहिक जीवन सुखी होता है। संतानसुख सामान्य ही होता है।
यात्रा : मूलांक 6 वाले यात्राएं कम ही करते हैं। ये व्यक्ति एक जगह रहकर जीवन का आनंद लेना चाहते हैं। यात्राओं से प्राय: लाभ कम ही होता है। कई बार विदेश जाते-जाते रह जाते हैं।
शुभ रंग : मूलांक 6 वालों का शुभ रंग सफेद है। इनको हल्का नीला और हल्का गुलाबी रंग भी लाभ देता है। हरा एवं सतरंगी मिला हुआ रंग भी शुभ होता है।
शुभ तिथियां : मूलांक ६ वालों को 6, 14, 24 तारीखें शुभ रहती हैं। इनको 3, 12, 21, 30 तथा 9,18,27 तारीखें भी विशेष लाभदायक होती हैं।
शुभ दिन : मूलांक 6 वालों के लिए सोमवार, मंगलवार, बुधवार एवं शुक्रवार शुभ दिन होते हैं। शुक्रवार किसी भी प्रमुख कार्य के लिए लाभदायक होता है।
गुरुमंत्र : मूलांक 6 वालों को किशोरावस्था में गलत लोगों की संगति के कारण यौनरोगों की आशंका रहती है। इन्हें अपनी मानसिक शक्ति पर नियंत्रण रखना चाहिए। रोगों के प्रभाव को कम करने के लिए प्रत्येक शुक्रवार को सुगंधित वस्तुओं, इत्र, चंदन और सफेद खाद्य पदार्थो का दान करना चाहिए। ये सामर्थय अनुसार मध्यमा में हीरा धारण करें, इसके अभाव में जर्किन एवं ओपल भी धारण कर सकते हैं। सफेद व हल्के गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना लाभदायक होगा।
मंत्र चिकित्सा के चमत्कार - डॉ. अनुराग विजयवर्गीय
मंत्र से विविध शारीरिक एवं मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। यह बात अब विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि मनुष्य के शरीर के साथ-साथ यह समग्र सृष्टि ही वैदिक स्पंदनों से निर्मित है। शरीर में जब भी वायु-पित्त-कफ नामक त्रिदोषों में विषमता से विकार पैदा होता है तो मंत्र चिकित्सा द्वारा उसका सफलता पूर्वक उपचार किया जाना संभव है।
अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार कैंसरयुक्त फेफड़ों, आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया तो कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई। इसके विपरीत तेज गति वाले पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई।
मंत्र चिकित्सा के लगभग पचास रोगों के पांच हजार मरीजों पर किए गए क्लीनिकल परीक्षणों के अनुसार दमा, अस्थमा रोग में सत्तर प्रतिशत, स्त्री रोगों में 65 प्रतिशत, त्वचा एवं चिंता संबंधी रोगों में साठ प्रतिशत, उच्च रक्तदाब, हाइपरटेंशन से पीड़ितों में पचपन प्रतिशत, आर्थराइटिस में इक्यावन प्रतिशत, डिस्क संबंधी समस्याओं में इकतालीस प्रतिशत, आंखों के रोगों में इकतालीस प्रतिशत तथा एलर्जी की विविध अवस्थाओं में चालीस प्रतिशत औसत लाभ हुआ। निश्चित ही मंत्र चिकित्सा उन लोगों के लिए तो वरदान ही है जो पुराने और जीर्ण क्रॉनिक रोगों से ग्रस्त हैं।
कहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 प्रकार का होता है। जब कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500 प्रकार का प्रकंपन होता है लेकिन जर्मन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि दक्षिण भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया, तो यंत्रों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के जो अनुभव हुए, वे 700 प्रकार के थे।
जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पाठ नहीं भी करे, सिर्फ पाठ सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मनुष्य की आकृति का छोटा सा यंत्र बनाया और उस आकृति में जगह-जगह कुछ छोटी-छोटी लाइटें लगा दी गईं। लाइट लगाने के बाद यंत्र के आगे लिख दिया कि यहां पर खड़ा होकर कोई आदमी किसी भी तरह की आवाजें निकालें तो उस आवाज के हिसाब से लाइटें मनुष्य की आकृति में जलती नजर आएंगी, लेकिन अगर किसी ने जाकर गायत्री मंत्र बोल दिया तो पांव से लेकर सिर तक सारी की सारी लाइटें एक साथ जलने लग जाती है। दुनियाभर के मंत्र और किसी भी प्रकार की आवाजें निकालने से यह सारी की सारी लाइटें नहीं जलतीं। एक गायत्री मंत्र बोलने से सब जलने लग जाती हैं क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अद्भुत है।
अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार कैंसरयुक्त फेफड़ों, आंत, मस्तिष्क, स्तन, त्वचा और फाइब्रो ब्लास्ट की लाइनिंग्स पर जब सामवेद के मंत्रों और हनुमान चालीसा के पाठ का प्रभाव परखा गया तो कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि में भारी गिरावट आई। इसके विपरीत तेज गति वाले पाश्चात्य और तेज ध्वनि वाले रॉक संगीत से कैंसर की कोशिकाओं में तेजी के साथ बढ़ोतरी हुई।
कहा गया है कि जब भी कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र का पाठ करता है तो अनेक प्रकार की संवेदनाएं इस मंत्र से होती हुई व्यक्ति के मस्तिष्क को प्रभावित करती हैं। जर्मन वैज्ञानिक कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मुंह से कुछ बोलता है तो उसके बोलने में आवाज का जो स्पंदन और कंपन होता है, वह 175 प्रकार का होता है। जब कोई कोयल पंचम स्वर में गाती है तो उसकी आवाज में 500 प्रकार का प्रकंपन होता है लेकिन जर्मन वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि दक्षिण भारत के विद्वानों से जब विधिपूर्वक गायत्री मंत्र का पाठ कराया गया, तो यंत्रों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि गायत्री मंत्र का पाठ करने से संपूर्ण स्पंदन के जो अनुभव हुए, वे 700 प्रकार के थे।
जर्मन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पाठ नहीं भी करे, सिर्फ पाठ सुन भी ले तो भी उसके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मनुष्य की आकृति का छोटा सा यंत्र बनाया और उस आकृति में जगह-जगह कुछ छोटी-छोटी लाइटें लगा दी गईं। लाइट लगाने के बाद यंत्र के आगे लिख दिया कि यहां पर खड़ा होकर कोई आदमी किसी भी तरह की आवाजें निकालें तो उस आवाज के हिसाब से लाइटें मनुष्य की आकृति में जलती नजर आएंगी, लेकिन अगर किसी ने जाकर गायत्री मंत्र बोल दिया तो पांव से लेकर सिर तक सारी की सारी लाइटें एक साथ जलने लग जाती है। दुनियाभर के मंत्र और किसी भी प्रकार की आवाजें निकालने से यह सारी की सारी लाइटें नहीं जलतीं। एक गायत्री मंत्र बोलने से सब जलने लग जाती हैं क्योंकि इसके अंदर जो वाइब्रेशन है, वह अद्भुत है।
भूमि पर शयन करने से भाग्य में वृद्धि - डॉ. अमित व्यास
प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग आधा घंटे के लिए फर्श पर (जिस पर किसी प्रकार का कारपेट न बिछा हो) जरूर सोना चाहिए। यह सर्वविदित तथ्य है कि पृथ्वी एक चुंबक है। चुंबकीय सिद्धांत के अनुसार हर पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना होता है। इन्हें चुंबकीय अणु कहते हैं। भौतिक शास्त्री बेवर के सिद्धांत से यह भी सिद्ध होता है कि चुंबक की तरह ही चुंबकीय अणु में भी उत्तर और दक्षिण दो ध्रुव होते हैं।
उसका व्यवहार भी चुंबक की तरह ही होता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि पृथ्वी का प्रत्येक कण चुंबकीय गुणों से भरा होता है। चुंबकीय तत्व आयनीकरण का कारक होता है। हमारा रक्त लौह तत्व से युक्त होता है। विज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि पृथ्वी के अधिकाधिक संपर्क में रहने वाला व्यक्ति पृथ्वी के चुंबकत्व को ग्रहण करता है। उसमें ऋण आवेशित आयन्स की वृद्धि होती है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग आधा घंटे के लिए फर्श पर जरूर सोना चाहिए। पीठ या शरीर का ज्यादातर हिस्सा जमीन से लगा रहना चाहिए। ऐसा करने से ये फायदे होते हैं।
शरीर में विशेष प्रकार की ऊर्जा का विकास होता है। उसमें रोगाणुओं के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न होता है और शरीर स्वस्थ रहता है।
शरीर में विशिष्ट प्रकार की स्फूर्ति का विकास होता है। मस्तिष्क में उदासीनता और खिन्नता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है और मस्तिष्क प्रफुल्लित बना रहता है।
एन चुंबक का उत्तर ध्रुव
एस चुंबक का दक्षिण ध्रुव
शरीर में इस प्रकार के सूक्ष्म आयन विकसित हो जाते हैं। ये अन्य ग्रहों से आने वाले ऋणात्मक विकिरणों का शमन करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार व्यक्तिपर किसी भी ग्रह से होने वाली पीड़ा में कमी आती है। इससे सेहत अच्छी रहती है। शरीर का भी विकास होता है। जमीन पर नंगे पैर चलने से भी फायदा होता है।
उसका व्यवहार भी चुंबक की तरह ही होता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि पृथ्वी का प्रत्येक कण चुंबकीय गुणों से भरा होता है। चुंबकीय तत्व आयनीकरण का कारक होता है। हमारा रक्त लौह तत्व से युक्त होता है। विज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि पृथ्वी के अधिकाधिक संपर्क में रहने वाला व्यक्ति पृथ्वी के चुंबकत्व को ग्रहण करता है। उसमें ऋण आवेशित आयन्स की वृद्धि होती है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग आधा घंटे के लिए फर्श पर जरूर सोना चाहिए। पीठ या शरीर का ज्यादातर हिस्सा जमीन से लगा रहना चाहिए। ऐसा करने से ये फायदे होते हैं।
शरीर में विशेष प्रकार की ऊर्जा का विकास होता है। उसमें रोगाणुओं के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न होता है और शरीर स्वस्थ रहता है।
शरीर में विशिष्ट प्रकार की स्फूर्ति का विकास होता है। मस्तिष्क में उदासीनता और खिन्नता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है और मस्तिष्क प्रफुल्लित बना रहता है।
एन चुंबक का उत्तर ध्रुव
एस चुंबक का दक्षिण ध्रुव
शरीर में इस प्रकार के सूक्ष्म आयन विकसित हो जाते हैं। ये अन्य ग्रहों से आने वाले ऋणात्मक विकिरणों का शमन करने में सक्षम होते हैं। इस प्रकार व्यक्तिपर किसी भी ग्रह से होने वाली पीड़ा में कमी आती है। इससे सेहत अच्छी रहती है। शरीर का भी विकास होता है। जमीन पर नंगे पैर चलने से भी फायदा होता है।
Subscribe to:
Posts (Atom)