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Monday, November 23, 2009

ग्रहों के हाल से जानिए कब्ज का उपचार - पं. पुष्कर राज

कब्ज पेट के रोगों में सबसे आम बीमारी है। पेट का साफ न होना, खुलकर शौच न होना ही कब्ज है। रोग के आरंभ में अपच, आलस्य, सिरदर्द, acidityउल्टी आदि लक्षण प्रकट होते हैं। पानी ज्यादा पीकर व खान-पान में परहेज रखकर इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है।
ज्योतिषीय कारण: जातक ग्रंथों के अनुसार शरीर में अवरोध का कारक ग्रह शनि है। कन्या और तुला राशि पेट से संबंधित कारक राशियों में गिनी जाती है। छठा भाव भी पेट से ही संबंध रखता है। यदि शनि कर्क, कन्या राशि में या छठे भाव में हो तो निश्चित ही कब्ज करने वाला सिद्ध होगा। कन्या या तुला राशि में अशुभ ग्रह हों तो मलावरोध की शिकायत रहेगी। कन्या या तुला राशि में अशुभ ग्रह हों और षष्ठेश से शनि की युति या दृष्टिगत संबंध हो तो भी जातक कब्ज से पीड़ित होगा। शनि अष्टम भाव में दीर्घायु बनाता है, परंतु पेट के रोग का कारक भी सिद्ध होता है।
उपचार : कब्ज की शिकायत वालों को शनि से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। इनमें तिलदान, तेलदान, उड़द की बनी वस्तुएं, काला वस्त्र, छाता, जूते व सिक्के प्रमुख हैं। शनिवार का व्रत और रोजाना ऊं शं शनैश्चराय नम: मंत्र की एक माला संध्याकाल में या रात में आसन पर बैठकर दीपक लगाकर करें। इससे रोग निदान के स्तर तक पहुंचा जा सकेगा। इसके अतिरिक्त सुबह शनि के स्मरण के साथ खाली पेट एक लोटा पानी पीने और खाली पेट ही प्राणायाम करने से भी कब्ज से निजात पाया जा सकता है।

स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं वास्तुदोष - कुलदीप सलूजा

आजकल छोटे या बड़े भवनों की बनावट पहले के भवनों की तुलना में सुंदर व भव्य जरूर हो गई है, लेकिन आर्किटेक्ट मकानों को सुंदरता प्रदान करने के लिए अनियमित आकार को महत्व देने लगे हैं। इस कारण मकान बनाते समय जाने-अनजाने वास्तु सिद्धांतों की अवहेलना हो रही है। महिला हो या पुरुष, उनकी हर प्रकार की बीमारी में वास्तुदोष की अपनी भूमिका रहती है। वास्तुदोष के कारण घर में सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के बीच असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। इस कारण वहां रहने वालों के शारीरिक व मानसिक रोगी बनने की आशंका होती है।
वैसे तो सभी दिशाएं प्रकृति की ही हैं और सभी शुभ हैं। वास्तुशास्त्र तो मात्र प्रकृति में व्याप्त सूर्य की जीवनदायी सकारात्मक ऊर्जा के श्रेष्ठ उपयोग का तरीका बताता है ताकि पृथ्वीवासी स्वस्थ, सुखद व शांतिपूर्वक जीवन जी सकें। वह भवन, जहां पर प्रात:काल की बजाय दोपहर की किरणों आती हैं वहां रहने वालों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। दोपहर के समय पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की नकारात्मक किरणों (अल्ट्रा वायलेट) होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह हैं। इसी कारण वास्तुशास्त्र में दक्षिण व पश्चिम की दीवारों को ऊंचा रखने का प्रावधान है। साथ ही इन दिशाओं में उत्तर व पूर्व की तुलना में कम खिड़की-दरवाजे रखने की सलाह दी गई है ताकि उस घर में रहने वाले सदस्य इन नकारात्मक ऊर्जा से युक्त किरणों के संपर्क में कम से कम आएं तथा ईशान दिशा में स्थित जल स्रोतों पर भी यह किरणों न पड़ सकें।
भवन के ईशान कोण में अधिक खाली जगह रखने का कारण भी सूर्य की गति ही है। जब सूर्य उत्तरायण की तरफ होता है तो दोपहर तक लाभदायक किरणों पृथ्वी पर पड़ती हैं। जब सूर्य दक्षिणायण होता है तो दोपहर के पूर्व ही हानिकारक किरणों पड़नी शुरू हो जाती हैं, क्योंकि दिन छोटे होते जाते हैं। अत: उत्तरायण काल की सूर्य की किरणों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए ही वास्तुशास्त्र में दक्षिण की अपेक्षा उत्तर में ज्यादा खाली जगह छोड़ने की सलाह दी गई है।
जिस घर का नैऋ त्य कोण, किसी भी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का टैंक, कुआं, बोरवेल, सेप्टिक टैंक इत्यादि हो तो वहां रहने वाले के असामयिक मृत्यु का शिकार होने की आशंका रहती है। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक विज्ञान है। घर की बनावट में ही वास्तु अनुकूल परिवर्तन कर वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है। बाकी टोटकों की जरूरत नहीं है।

गहरे रंगों से बचें मूलांक 7 वाले

जिन व्यक्तियों का जन्म किसी भी माह की 7, 16 या 25 तारीख को होता है, उनका मूलांक ‘7’ बनता है। इस मूलांक का मुख्य कारक ग्रह गहरे रंगों से बचें मूलांक 7 वाले नेपच्यून और चंद्रमा है। सात का अंक गुप्त एवं वैज्ञानिक प्रभाव से परिपूर्ण है। सातवां दिन सृष्टि की रचना के उपरांत विश्राम का दिन भी माना गया है। यह अंक सात दिन, सात रंग, सात मुख्य ग्रह, विवाह के अवसर पर सात फेरे से संबंधित है। बाइबल में भी सात को महत्वपूर्ण अंक माना गया है।
स्वभाव : मूलांक 7 वाले व्यक्ति आलसी और क्रियाशील दोनों प्रकार के होते हैं। इनमें दूसरों के मन को भांपने की भी शक्ति होती है। ये सच्चई पसंद व गंभीर प्रवृत्ति के होते हैं। धार्मिक कार्यो में रुचि रखते हैं, परंतु लकीर के फकीर नहीं होते। इनकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है।
स्वास्थ्य : जीवन में जब तक सब ठीक चलता रहता है, ये प्रसन्न रहते हैं। जीवन में थोड़ी बिगड़ी स्थिति भी इनके मन के संतुलन को बिगाड़ देती है। ये अधिक चिंता तथा मानसिक रोगों से ग्रस्त रहते हैं। बदहजमी, फोड़े, मुंह पर झाइयां, आंखों के नीचे काले धब्बे, उदर तथा आंखों के रोग होने की आशंका रहती है। प्रतिवर्ष जनवरी, फरवरी, जुलाई व अगस्त में रोग ग्रस्त होने की अधिक आशंका होती है।
आर्थिक स्थिति : मूलांक 7 वाले धन संग्रह में कम ही सफल होते हैं। ये कम खर्चीले होते हैं, फिर भी इनकी आर्थिक स्थिति विशेष अच्छी नहीं होती। उदार स्वभाव और परोपकारी भावना के कारण पैसा शीघ्र खर्च हो जाता है। दूसरों के हिसाब-किताब की अच्छी व्यवस्था करते हैं, लेकिन निजी मामलों में ज्यादा भाग्यशाली नहीं होते।
व्यवसय व कार्यरुचि : मूलांक 7 वालों का प्रतिनिधि ग्रह विदेशी व्यापार अथवा जहाज संबंधी कार्यो का सूचक माना गया है। आयात-निर्यात के कार्य में इनको विशेष लाभ मिलेगा। इस मूलांक के व्यक्तियों को स्वतंत्र व्यवसाय अपनाना चाहिए।
प्रेमसंबंध एवं संतान : मूलांक 7 के व्यक्ति अपनी संतान से प्रेम तो करते हैं, पर दिखावा कम ही करते हैं। संतान का सुख कम मिलता है। ये एकांतप्रिय होते हैं।
शुभ रंग : इनके लिए दूधिया सफेद रंग विशेष है। हल्का पीला भी शुभ है। गहरे रंग बुरा प्रभाव डालते हैं।
शुभ तिथियां : 7 और २५ शुभ तिथियां हैं। 1,2,4,7,10,11,19 और 20 तिथियां भी अनुकूल हैं।
शुभ दिन : रविवार, सोमवार एवं गुरुवार शुभ दिन होते हैं।
मित्र व शत्रु अंक : मूलांक 2 और 7 अनुकूल और मूलांक 4 और 8 प्रतिकूल प्रभाव देता है।
यात्रा : मूलांक 7 वाले व्यक्तियों को जीवन में काफी यात्राएं करनी पड़ती हैं। ये प्राकृतिक जगहों में घूमना-फिरना पसंद करते हैं।
गुरुमंत्र : मूलांक 7 वाले व्यक्तियों को आलस्य से बचना चाहिए अन्यथा महत्वपूर्ण अवसरों को गंवा सकते हैं। किसी भी तरह के विघ्न, परेशानी तथा अशांति को दूर करने के लिए कुत्तों को रोटी खिलाने से लाभ मिलता है। इनको मोती अथवा मून-स्टोन अति शुभ फल देता है। चमड़ी के रोगों के लिए लहसुनिया पहनना लाभदायक है।

चंद्रमा को जल चढ़ाएं मूलांक २ वाले

अंकtwo ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का किसी भी अंग्रेजी महीने की २, ११, २0, २९ तारीख को जन्म हुआ हो तो उसका जन्म मूलांक ‘२’ माना जाता है। इस अंक का स्वामी चंद्रमा है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह शीतलता एवं कोमलता का प्रतीक है।
स्वभाव :
मूलांक २ जलीय अंक है और चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। ऐसे व्यक्ति मानसिक शक्ति से ओतप्रोत होते हैं। धैर्यवान होने के कारण बड़े-बड़े संकटों में भी लक्ष्य से विमुख नहीं होते। ये सौंदर्यप्रेमी, कलाप्रिय, भावुक और रुमानी विचारधारा के होते हैं।
यह अंक कल्पनाशीलता का प्रतीक है। भिन्न-भिन्न विचारधाराएं मन-मस्तिष्क पर हावी रहती हैं। कोमल भावनाओं के कारण क्षणिक हानि भी इनको विचलित कर देती है। बुद्धि से सफलता हासिल करते हैं।
स्वास्थ्य :
चंद्रमा का फेफड़ों पर विशेष अधिकार है। उम्र के मध्य तक आते-आते ये अजीर्ण के शिकार बन जाते हैं। मूलांक २ वाले व्यक्तियों को टीबी, खांसी, जुकाम, नजला होने की आशंका रहती है। अनिद्रा और अवसाद जैसे मानसिक रोग भी इनके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। मूलांक २ वाली स्त्रियों का मासिक धर्म अक्सर अनियमित होता है।
व्यवसाय एवं कार्यरुचि :
अंक २ के जातक की मानसिक स्थिति परिवर्तनशील रहती है। ये अधिक सोचते हैं, पर काम कम करते हैं। ये अक्सर नकारात्मक सोच रखते हैं। इस अंक से प्रभावित लोगों को मुख्यतया तीन प्रवृत्ति के व्यवसायों में रुचि लेनी चाहिए ; प्रथम- आयात-निर्यात, द्वितीय- ट्रांसपोर्ट और तीसरा- प्रकाशन-लेखन या काव्य सृजन इत्यादि। ऐसे लोगों को सड़क मार्ग की अपेक्षा समुद्री मार्ग से व्यापार लाभदायक रहता है। राजनीति, समाजसेवा तथा फिल्म-व्यवसाय में सदैव लाभ ही होता है।
आर्थिक स्थिति:
आर्थिक स्थिति अनिश्चित रहती है। अकस्मात धन आता है, परंतु सावधानी न बरतने के कारण पूंजी के समाप्त होने का डर हमेशा बना रहता है।
प्रेम संबंध, विवाह और संतान :
जीवन में प्रेम-प्रसंगों की अधिकता रहती है, लेकिन किसी का भी स्थाई प्रभाव नहीं पड़ता। इनका पारिवारिक जीवन सुखद होता है। जीवनसाथी सुंदर, मधुरभाषी व धनी परिवार से होता है। मूलांक २ वाली स्त्रियां अच्छी पत्नियां सिद्ध होती हैं।
यात्राएं :
मूलांक २ वालों को यात्राएं बहुत करनी पड़ती हैं। इन व्यक्तियों का भाग्योदय विदेश में या नदी-समुद्र के किनारे बसे शहरों में अधिक होता है। शुभ रंग : दूधिया रंग विशेष शुभ है। क्रीम, हल्का हरा तथा अंगूरी रंग भी शुभ रहता है। काला रंग अशुभ माना गया है।
मित्र व शत्रु अंक :
१, २, ४, ७ मूलांक वाले व्यक्ति इनके अच्छे मित्र सिद्ध होते हैं। ३ और ६ अंक मध्यम एवं मूलांक ५ और ८ वाले शत्रु अंक माने जाते हैं।
शुभ तिथियां :
मूलांक २ वालों के लिए २, ११, २0 और २९ शुभ तिथियां होती हैं। इनके जीवन में नौकरी, व्यापार तथा अन्य सुखद घटनाएं २६-२७ जून से लेकर २१-२७ जुलाई, २३ अक्टूबर से लेकर नवंबर और १८ फरवरी से लेकर २0-२७ मार्च के बीच होती हैं।
शुभ दिन :
मूलांक २ वालों के लिए रविवार, सोमवार, गुरुवार एवं शुक्रवार के दिन शुभ होते हैं। मंगलवार एवं बुधवार प्रतिकूल सिद्ध होते हैं।
गुरुमंत्र :
मूलांक २ वाले व्यक्ति सोमवार के दिन, सायंकाल में चांदी के लोटे से चंद्रमा को जल अर्पित करें। चिंता, भ्रम, वहम व अनिद्रा निवारण के लिए सोते समय अपने पलंग के सिरहाने किसी बर्तन में पानी रखें। सुबह उठकर यह जल पौधे में डालने से विशेष लाभ होगा। सफेद मोती शुभ फल दे सकता है। सर्दियों में स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। पूर्णिमा की रात को चंद्रमा के समक्ष जल अर्पण करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है।

सूर्य को जल अर्पण करें मूलांक 1 वाले

अंक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का किसी भी अंग्रेजी महीने की 0१,१0,१९, २८ तारीख को जन्म हुआ हो, तो उसका जन्म मूलांक १ (एक) माना जाता है। इस अंक का स्वामी सूर्य है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह अखंडता और पूर्णता का प्रतीक है। इस अंक वाले व्यक्तियों पर सूर्य का पूर्ण प्रभाव रहता है। यह अंक सक्रियता और प्रबल ऊर्जा शक्ति का प्रतीक होता है।
स्वभाव :
मूलांक १ वाले व्यक्ति स्वाभिमानी, आशावादी, दृढ़ निश्चयी, स्वतंत्रता प्रेमी, स्पष्टवादी नेतृत्व की जन्मजात प्रतिभा वाले होते हैं। किसी की अधीनता में कार्य करना उन्हें पसंद नहीं होता। ऐसे लोग दार्शनिक और दूरदर्शी होते हैं। धार्मिक विश्वासों में या तो एकदम कट्टर या इसके एकदम विपरीत अनास्थावादी होते हैं।
स्वास्थ्य :
इस मूलांक में जन्मे व्यक्तियों के स्वास्थ्य को सबसे अधिक खतरा शारीरिक न होकर मानसिक होता है। इनका स्वभाव ही उनकी बीमारी का कारण बनता है। विशेष स्वास्थ्य हानि, जीवन के ४३वें, ५२वें और ६क्वें वर्ष में होती है।
व्यवसाय एवं कार्य रुचि :
मूलांक १ वाले व्यक्ति क्रियाशील मस्तिष्क तथा संघषर्रत रहने की प्रवृत्ति के स्वामी होते हैं। इनके लिए प्रशासनिक सेवा सबसे अच्छा कार्य क्षेत्र है। राजकीय सेवा के अलावा चिकित्सा, स्वर्ण या जवाहरातों का व्यवसाय लाभदायक होता है। ये अच्छे प्रबंधक, डायरेक्टर, नियंत्रक, आईएएस अधिकारी, श्रेष्ठ डॉक्टर, राजदूत, समाचार-पत्रों के प्रमुख और लेखक भी होते हैं। मूलांक १ वाली स्त्रियां, डॉक्टर, किसी संस्था की प्रमुख, डिजाइनर, सभा सोसायटियों की प्रधान तथा नेता बनती हैं।
आर्थिक स्थिति :
मूलांक १ वाले व्यक्ति की आर्थिक स्थिति उच्च स्तर की होती है। ऐशोआराम, शानो-शौकत पर बहुत धन व्यय करते हैं। जुआ, सट्टा और चापलूस लोग अधिकतर इनकी हानि का कारण बनते हैं। १९, २१, २२वें वर्ष की आयु में अधिक क्रियाशील होकर अपनी आर्थिक स्थिति को उत्तम बनाने में अग्रसर हो जाते हैं।
प्रेम-संबंध, विवाह और संतान :
मूलांक १ वाले व्यक्ति ऊपर से भले ही सख्त एवं रूखे से लगते हैं, परंतु मन से कोमल तथा प्रेम के भूखे होते हैं। इनका प्रेम संबंध स्थायी एवं पक्का होता है।
यात्राएं :
इस मूलांक वाले व्यक्ति एक ही स्थान पर कार्य करना पसंद करते हैं फिर भी इन्हें यात्राएं करनी पड़ती हैं।
शुभ रंग :
शुभ रंग नारंगी, सुनहरा, हल्का भूरा, गुलाबी और तांबाई होता है।
मित्र व शत्रु अंक :
इस मूलांक के लिए १, ३, ५, ९ अंक के व्यक्ति मित्र और सहयोगी सिद्ध होते हैं। इनके लिए २, ४, ६, ८ शत्रु अंक माने गए हैं।
शुभ तिथियां :
मूलांक १ के लिए १, १0, १९ शुभ तिथियां होती हैं। तिथि २८ भी शुभ है, परंतु कई बार कार्य में विघ्न पड़ जाता है।
शुभ दिन :
इनके लिए रविवार, सोमवार एवं बृहस्पतिवार शुभ दिन होता है।
गुरु मंत्र :
मूलांक १ वाले व्यक्तियों को प्रात: सूर्यदेव को जल अर्पण एवं नमस्कार करना शुभ फल दिलाता है। उन्नति व नौकरी में परेशानी हो तो बंदरों को गुड़, चना खिलाना लाभदायक होता है। सफलता के लिए माणिक रत्न, सोने या तांबे की अंगूठी में धारण करना लाभदायक होगा। उन्हें लोहे की बनी वस्तुओं का व्यवसाय नहीं करना चाहिए। इनके लिए २00८ और २0१७ चौतरफा फलदायी वर्ष है।

Sunday, November 22, 2009

गोल्डन मनी कैट

फेंगशुई के जानकार इसे बैंक का दर्जा देते हैं। गोल्डन कलर की यह खूबसूरत बिल्ली धन-दौलत और सुरक्षा की सूचक मानी जाती है। कहते हैं कि गोल्डन मनी कैटइसके पंजे में भाग्य को अपने पास रखने की ताकत है। चीनी व्यापारी इसे अपने व्यापार स्थल पर जरूर रखते हैं, जिससे खुशहाली आती है और भाग्य आपका साथ देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसे व्यापार स्थल पर किसी ऊपरी जगह रखा जाना चाहिए। चीनी लोगों का मानना है कि रोजाना इसके पास कुछ न कुछ पैसे जरूर रखना चाहिए। बिल्ली को बुरी नजर और आत्माओं को दूर रखने वाला मानते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह अंधेरे में भी देख सकती है। विशेषज्ञों की मानें तो दौलत बढ़ाने के लिए इसे दक्षिण-पूर्व में और दिमाग को तेज करने के लिए उत्तर-पूर्व में रखिए।

Saturday, November 21, 2009

हमारे जीवन के अदृश्य सहायक - डॉ. अरुण

श्राद्ध का अर्थ है- श्रद्धा व्यक्त करना तथा तर्पण का अर्थ है - तृप्त करना। पितर, वे हैं, जो पिछला शरीर त्याग चुके हैं, लेकिन अभी अगला शरीर प्राप्त नहीं कर सके हैं। इस मध्यवर्ती स्थिति में रहते हुए वे अपना स्तर मनुष्यों जैसा ही अनुभव करते हैं। हिंदू दर्शन की मान्यता है कि जब जीवात्मा स्थूल शरीर छोड़ देती है, तभी मृत्यु होती है।
अंत:करण चातुष्य (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) तथा कारण शरीर यानी भाव शरीर सहित जीवात्मा सूक्ष्म शरीर में ही रहती है, लेकिन अपनी उन्नति के लिए उसे हमेशा हमारे सहयोग की अपेक्षा रहती है। सद्भावनाएं संप्रेषित करने पर बदले में उनसे ऐसा ही भावनात्मक सहयोग प्राप्त होता है।
धर्मशास्त्रों में भी यही कहा गया है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है, वह पितरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव-सुख और धन-धान्य को प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि आश्विन मास के कृष्णपक्ष भर यानी पंद्रह दिनों तक रोजाना नियमपूर्वक स्नान करके पितरों का तर्पण करे और अंतिम दिन पिंडदान श्राद्ध करे।
पितृपक्ष का महत्व इस बात में नहीं है कि हम श्राद्ध कर्म को कितनी धूमधाम से मनाते हैं। इसका वास्तविक महत्व यह है कि हम अपने पितामह आदि गुरुजनों की जीवित अवस्था में ही कितनी सेवा व आज्ञापालन करते हैं। जो व्यक्ति अपने जीवित माता-पिता की सेवा नहीं करते और उनका अपमान करते हैं, बाद में उनका श्राद्ध करना निर्थक ही माना जाएगा। हां, अगर अंदर प्रायश्चित की भावना है तो उनके कोप से जरूर बचेंगे।
भारतीय ज्योतिष में पितृदोष का सबसे अधिक महत्व है। यदि घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं हो रहे हों, रोज नई-नई आफतें आ रही हों, आदमी दीन-हीन होकर भटक रहा हो, संतान नहीं हो रही हो या संतान विकलांग पैदा हो रही हो तो इसका मुख्य कारण यह है कि उसकी कुंडली में पितृदोष है। यदि वह व्यक्ति श्रद्धा-भाव से अपने पूर्वजों के प्रति श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को विधि-विधान से पिंड श्राद्ध एवं तर्पण करता है तो पितृ उससे प्रसन्न हो जाते हैं तथा आशीर्वाद देकर जाते हैं।
श्राद्ध मीमांसा में वर्णन है कि अगर व्यक्ति के पास श्राद्ध करने के लिए कुछ भी न हो तो वह अपने दोनों हाथ से कुशा उठाकर आकाश की ओर दक्षिणमुखी होकर अपने पूर्वजों का ध्यान करके रोने लगे और जोर-जोर से आर्तभाव से कहे- ‘हे मेरे पितरों! मेरे पास कोई धन नहीं है। मैं तुम्हें इन आंसुओं के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सकता’। ऐसा करने पर पितर उसके आंसुओं से ही तृप्त होकर चले जाते हैं।
श्राद्ध में ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस व्यक्ति विशेष के लिए जो वस्तुएं आप खरीद रहे हों या दान रूप में दे रहे हों, वह उनके शीघ्र ही काम आने वाली हों। ऐसा न हो कि आप रुपए खर्च करें और वे वस्तुएं लंबे समय तक बिना काम के पड़ी रहें। इसलिए वैसी ही चीजें खरीदें और लोगों को दान में दें, जो पूर्वजों को पसंद हों।
पूर्वजों को याद करने का यह पक्ष बड़ा ही अद्वितीय है, क्योंकि पितरों को हम श्रद्धा देंगे तो वे हमें शक्ति देंगे। वे हमारे अदृश्य सहायक हैं। जहां तक पितृ पक्ष में नया कार्य करने अथवा न करने का प्रश्न है तो सिर्फ मांगलिक, यज्ञोपवीत आदि कार्य बंद होते हैं, बाकी सारे शुभ कार्य नि:संकोच किए जा सकते हैं।