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Tuesday, November 24, 2009

गणेश जी दूर करें वास्तुदोष - डॉ. श्रीकृष्ण

भगवान गणेश विघ्न विनाशक माने गए हैं। वास्तुपूजन के अवसर पर गणेश को प्रथम न्योता और पूजा जाता है। जिस घर में गणेश की पूजा होती है, वहां समृद्धि की सिद्धि होती है और लाभ भी प्राप्त होता है।

गणेश जी की स्थापना अपने भवन के द्वार के ऊपर और ईशान कोण में पूजा जा सकता है किंतु गणेश जी को कभी तुलसी नहीं चढ़ाएं। गणेश चतुर्थी पर विनायक की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाने से सुख मिलता है और चमकीला पन्ना चढ़ाने पर पूजक को आरोग्य मिलता है।

अन्य वास्तुप्रयोग >>>

>> यदि भवन में द्वारवेध हो तो वहां रहने वालों में उच्चटन होता है। भवन के द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि के होने पर द्वारवेध माना जाता है। ऐसे में भवन के मुख्य द्वार पर गणोशजी की बैठी हुई प्रतिमा लगानी चाहिए किंतु उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।

>> जिस रविवार को पुष्य नक्षत्र पड़े, तब श्वेतार्क या सफेद मंदार की जड़ के गणेश की स्थापना करनी चाहिए। इसे सर्वार्थ सिद्धिकारक कहा गया है। इससे पूर्व ही गणेश को अपने यहां रिद्धि-सिद्धि सहित पदार्पण के लिए निमंत्रण दे आना चाहिए और दूसरे दिन, रवि-पुष्य योग में लाकर घर के ईशान कोण में स्थापना करनी चाहिए।

>> घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा में हो तो अधिक उपयोगी होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।

>> संयोग से यदि श्वेतार्क की जड़ मिल जाए तो रवि-पुष्य योग में प्रतिमा बनवाएं और पूजन कर अपने यहां लाकर विराजित करें। गणोश की प्रतिमा का मुख नैर्ऋत्य मुखी हो तो इष्टलाभ देती है, वायव्य मुखी होने पर संपदा का क्षरण, ईशान मुखी हो तो ध्यान भंग और आग्नेय मुखी होने पर आहार का संकट खड़ा कर सकती है।

>> पूजा के लिए गणेश जी की एक ही प्रतिमा हो। गणोश प्रतिमा के पास अन्य कोई गणोश प्रतिमा नहीं रखें।

>> गणेश को रोजाना दूर्वा दल अर्पित करने से इष्टलाभ की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाकर समृद्धि की कामना से ऊं गं गणपतये नम: का पाठ लाभकारी माना जाता है। वैसे भी गणपति विघ्ननाशक तो माने ही गए हैं।

ग्रह प्रभाव और रोग

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।

इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।

अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।

चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

मूलांक ‘3’ वाले पहनें पीला पुखराज

अंक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का जन्म किसी भी अंग्रेजी महीने की ३, १२, २१ या ३0 तारीख को हुआ हो तो उसका जन्म मूलांक ‘३’ माना जाता है। इस अंक के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। इस मूलांक वाले स्त्री-पुरुषों पर गुरु का प्रभाव होता है। मूलांक तीन का स्वामी गुरुसभी ग्रहों का भी गुरु है। बृहस्पति दैविक एवं आध्यात्मिक गुणों का प्रतीक है।

स्वभाव :
मूलांक ३ वाले व्यक्ति बृहस्पति ग्रह के प्रभाव से ओत-प्रोत होते हैं। यह उत्तम विचार एवं चरित्र वाले होते हैं। ये ईमानदार, परोपकारी एवं अध्ययनशील होते हैं। नम्र स्वभाव इनके व्यक्तित्व को निखारने में सहायक रहता है। बृहस्पति की स्थिति में कुछ कमी के कारण कभी-कभी इनका एक और स्वरूप भी दिखाई पड़ता है। इनकी मधुर वाणी में झूठ की मात्रा अधिक होती है तथा ये विलासी और बड़े गुरुघंटाल सिद्ध होते हैं।

स्वास्थ्य :
जीवन शक्ति उत्तम होती है। यदि ये बीमार भी हो जाएं तो शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को स्वास्थ्य, नाड़ी विकार, गला, चर्म, वात, शुगर, नेत्र विकार तथा स्त्रियों को गर्भ एवं गुप्त रोग, पथरी, कमर दर्द तथा हृदय रोग की आशंका रहती है। फरवरी, सितंबर व दिसंबर में स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका होती है।

व्यवसाय एवं कार्यरुचि :
मूलांक ३ वाले व्यक्ति अनुशासित, अध्ययनशील, बुद्धिमान और मृदुभाषी होते हैं। ये उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। प्रचार-प्रसार तथा लेखन में विशेष सफलता मिलती है। ये वकील, जज, राजदूत, मंत्री, चिकित्सक तथा सफल प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ये अध्यापक, डिजाइनर, अभिनेता तथा ज्योतिषी भी होते हैं।

आर्थिक स्थिति :
महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अधिक धन खर्च करते हैं। कभी-कभी बुद्धिमत्ता के बावजूद धनहानि का सामना करना पड़ता है। आसानी से धन कमाने व संपत्ति जमा करने की लालसा रहती है। बृहस्पति की उच्च स्थिति होने पर भारी दूरदर्शिता और निर्णय क्षमता के कारण अपने काम में हमेशा अपने प्रतिस्पर्धी से एक कदम आगे ही रहते हैं।

प्रेम संबंध, विवाह और संतान :
मूलांक ३ वाले बड़े गुरूघंटाल होते हैं। प्रेम संबंध रखते हैं और पता भी नहीं चलने देते। ये विलासी होते हैं, परंतु अपने मान-सम्मान का पूरा ध्यान रखते हैं। वैवाहिक जीवन सुखी होता है। धार्मिक कार्यो में अधिक रुचि के कारण घर में अशांति आ जाती है। एकाधिक विवाह का योग होता है। इनके एक पुत्र-संतान अवश्य होती है। ३, ६, ७, ९ वाले व्यक्ति इनके अच्छे जीवनसाथी सिद्ध होते हैं।

यात्राएं :
मूलांक ३ वाले व्यक्तियों को अक्सर धार्मिक यात्रा का अवसर मिलता है। विदेश यात्रा से भी लाभ प्राप्त होता है।

शुभ रंग :
पीला रंग अति शुभ है। गुलाबी, हल्का जामुनी, सफेद रंग भी इन्हें लाभ देता है। काला तथा हल्का नीला रंग अशुभ माना गया है।

शुभ तिथियां :
मूलांक ३ वालों के लिए २, ३, ६, ९, २१, २४, २७, ३0, तारीखें शुभ हैं।

शुभ दिन :
मूलांक ३ वालों के लिए गुरुवार, शुक्रवार एवं मंगलवार शुभ होता है।

गुरुमंत्र :
मूलांक ३ वालों को पीली वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। शुभ रत्न- पीला पुखराज है। सवा पांच से सवा छह रत्ती का पीला पुखराज सोने की अंगूठी में जड़कर, तर्जनी में बृहस्पतिवार को धारण करने से लाभ मिलता है। अगर इसका सामथ्र्य न हो तो पीला रुमाल अपने पास रखें एवं गुरुदेव का ध्यान करके ‘ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रों स: गुरुवे नम:’ का जाप करें।

कई महान योगों ने बनाया टाटा को ‘रतन’ - पं. जयगोविंद शास्त्री

tata कर्मप्रधान जीवन में कर्म करते हुए अगर भाग्य का भी साथ मिल जाए तो व्यक्ति ऊंचाइयों के शिखर पर पहुंच जाता है। कुछ इसी तरह का भाग्य उद्योगपति रतन टाटा का है। इनकी जन्मकुंडली में ४६ शुभ योग हैं।

रतन टाटा का जन्म २८ दिसंबर, १९३७ को सुबह ६ बजकर ३0 मिनट पर मुंबई में हुआ। उनके जन्म के समय धनु लग्न और तुला राशि का उदय हो रहा था। अन्य ग्रहों में लग्न में सूर्य, बुध, शुक्र, द्वितीय धन भाव में गुरु तथा तृतीय पराक्रम भाव में पृथ्वीपुत्र मंगल बैठे हैं, जबकि शनि चतुर्थ, केतु छठे, चंद्र ग्यारहवें तथा राहु बारहवें भाव में हैं।

इनकी जन्मकुंडली में ४६ शुभ योगों का निर्माण हुआ है। जिनमें सर्वोत्तम गजकेसरी योग, चार राजयोग, पांच कर्म जीवयोग तथा तीन वेशियोग हैं। इसी के साथ चार पूर्ण आयु योग, महालक्ष्मीवान योग, अत्यंत धनाढ्य योग के साथ-साथ कई धनयोगों का भी निर्माण हुआ है।

धनु लग्न की कुंडली में लग्न के स्वामी बृहस्पति नीच राशिगत मकर में बैठे हैं। साथ ही इस राशि के स्वामी शनि केंद्र भाव में बैठकर नीच भंगयोग का निर्माण कर रहे हैं। महान गजकेसरी योग ने रतन टाटा को दिग्विजयी बनाया। लग्न भाव में ही भाग्य के स्वामी, कर्म के स्वामी और लाभ के स्वामी बैठे हैं।

किसी भी जातक की जन्मकुंडली में यह योग हो तो श्रेष्ठ भाग्य कर्म और लाभ की ओर ले जाता है। यही योग व्यक्ति को विरासत में अथाह धन दिलाता है। लग्नेश गुरु और धनेश शनि का राशि परिवर्तन भी इन्हें अतुल धन दिलाने का संकेत कर रहा है।

रतन टाटा की जन्मकुंडली के पांच कर्म जीव योग, जो दशमेश बुध के द्वारा निर्मित हैं, इन्हें पूर्ण कर्मयोगी बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। २२वें वर्ष से ही भाग्योदय का आनंद लेने वाले रतन का जन्म ही नीचभंग राजयोग बनाने वाले गुरु की महादशा में हुआ।

इनकी जन्मकुंडली में कर्म जीव योगों का अत्यधिक प्रभाव ३२वें वर्ष से हुआ। इनको जनवरी,१९७१ से बुध की महादशा प्रारंभ हुई। यह अवधि इनके जीवन की श्रेष्ठतम अवधियों में से एक रही। यहां से रतन टाटा की ख्याति बढ़नी शुरू हुई।

इस अवधि में ये एक से बढ़कर एक मील के पत्थर पार करते रहे। बुध की महादशा इन पर १९८८ तक रही, उसके बाद योगकारक केतु की महादशा १९९५ तक रही। महान धन, यश और कीर्ति योग का निर्माण करने वाले शुक्र की महादशा इन पर १९९५ से आरंभ हुई। यह योग तब से अब तक रतन टाटा को एक से बढ़कर एक उपलब्धि दिला रहा है।

अत्यंत धनाढ्य योग के साथ-साथ नीच भंग राजयोग बनाने वाले बृहस्पति की अंतरदशा इन पर मार्च, २00५ से नवंबर, २00७ तक रही। इस अवधि में रतन ने एक से बढ़कर एक कारनामे किए और इन्हें विश्वपटल पर अभूतपूर्व ख्याति मिली।

वर्तमान में इन पर धनेश और जनता के कारक शनि की अंतरदशा चल रही है। इसी के फलस्वरूप ये लखटकिया कार बाजार में लाकर जन-जन के चहेते बने हैं। शनि की यह दशा जनवरी, २0११ तक रहेगी। उसके बाद इनकी कुंडली में बुध की अंतरदशा प्रारंभ होगी। यह योग इन्हें आगे भी ढेरों सफलताएं दिलाएगा।

कैसे जानें इष्टकाल को - पं. विनोद राजाभाऊ रावल

ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करने में पंचांगों की जानकारी जितनी अधिक होगी, उतना सही एवं सटीक ज्ञान प्राप्त होगा। जैसा कि पूर्व में उल्लेखित किया गया था कि पंचांग में लघु शब्द-अक्षर का उपयोग अधिक होता है तथा ज्योतिष के साहित्य में भी कई ऐसे शब्द उपयोग में आते हैं जिन्हें समझने में कठिनाई महसूस होती है। कई बार उस शब्द के भ्रम में अर्थ ही नहीं समझ पाते हैं, जैसे सूर्यास्त (सू.अ.) सूर्य के अस्त होने का समय, सूर्योदय (सू.उ.) सूर्य के उदय होने का समय, दिनमान (दि.मा.) सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के समय को दिनमान कहते हैं। यह समय पंचांग में सामान्यत: घटी एवं पल में दिया जाता है।

रात्रिमान सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय के मध्य का समय रात्रिमान कहलाता है। चंद्रस्थिति (च.स्थि.) या चंद्र सचार से लिखा रहता है अर्थात चंद्रमा अमुक राशि में इस समय प्रवेश करेगा।

सर्वक्षय नक्षत्र का मान अर्थात अमुक नक्षत्र अमुक दिन में इतनी घटी एवं इतने पल है।

सोम्यायन सूर्य की उत्तरायण स्थिति को सोम्यायन कहते हैं।

याम्यायनं सूर्य के दक्षिणायन की स्थिति को याम्यायनं कहते हैं। मकर संक्राति (14-15 जनवरी) से सूर्य उत्तरायण होता है तथा कर्क संक्राति (16-17 जुलाई) से मकर संक्राति तक सूर्य दक्षिणायन होता है।

प्रात: सूर्य स्पष्ट (प्रा. सू. स्प.)- प्रात:काल सूर्य की स्थिति जो कि राशि/अंश/कला/विकला(11/29/44/42) में उल्लेखित रहती है। पंचांग में दैनिक या साप्ताहिक ग्रह स्पष्ट रहते हैं। साथ ही दैनिक लग्न सारिणी भी दी जाती है। इसमें प्रवेश अथवा समाप्ति के समय का अवश्य उल्लेख रहता है।

जातक यह शब्द ज्योतिष के साहित्य में अधिक आता है। जिस जन्म लिए बालक-बालिका की चर्चा की जा रही है उसे जातक कहते हैं।

इष्टकाल सूर्योदय से किसी निश्चित (अभीष्ट) समय। घटी पल को इष्टकाल कहेंगे जैसे किसी जातक का जन्म समय दोपहर 2.10 है तो प्रात: सूर्योदय से दोपहर 2.10 तक की समय (जो कि घटी पल में हो) इष्टकाल होगा।

घर का मुख्य द्वार और वास्तु

घर का मुख्य द्वार सभी सुखों को देने वाला होता है। यह भवन का मुख्यांग होने के कारण एक प्रकार से मुखिया है। वास्तुपद रचना के अनुसार यदि द्वार की स्थिति सही हो तो कई दोषों का स्वत: ही निवारण हो जाता है और सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य व यश-कीर्ति में वृद्धि होती है।
वास्तुशास्त्रों में द्वार की रचना पर बहुत जोर दिया गया है। द्वार को जितना सुंदर और मजबूत बनाने पर जोर है, उससे कहीं अधिक बल इस बात पर है कि यह वास्तुपद सम्मत हो। भवन की जो लंबाई चौड़ाई हो, उसे वास्तु पदानुसार आठ-आठ रेखाएं डालकर 64 पदों में बांट दें और दिशानुसार वहां द्वार रखें। यह नियम मुख्य भवन सहित चारदीवारी के प्रधान द्वार के लिए भी लागू होता है।
‘समरांगण सूत्रधार’ और ‘अपराजितपृच्छा’ में द्वार निवेश के बारे में विस्तार से बताया गया है। मयमतं, वास्तुप्रदीप, राजवल्लभ वास्तुशास्त्र, वास्तुमंजरी में भी यही विचार मिलता है। पूर्वकाल में राजमहलों और हवेलियों के निर्माण के समय द्वार निवेश पर प्रमुखता से विचार होता था। यह विचार आज भी सर्वथा प्रासंगिक है।
इस नियम के अनुसार पूर्व के क्रम से ईशान कोण से क्रमश: पहला और दूसरा क्षेत्र छोड़कर तीसरे और चौथे पद पर द्वार रखना चाहिए। ऐसे द्वार धन, धान्यप्रद, सरकार से सम्मान और रोजगार की दृष्टि से सुकून देने वाले होते हैं।
दक्षिण में आग्नेय कोण से क्रमश: तीन पद छोड़कर आगे के तीन पदों पर द्वार रखने से पुत्र-पौत्र, धन और यश की प्राप्ति होती है। पश्चिम में नैऋत्यकोण से दो पद छोड़कर चार पदों पर द्वार निवेश से धन-वैभव, विशेष संपदा और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तर में वायव्य से तीन पद छोड़कर क्रमश: तीन पदों पर द्वार रखने से धन संपदा, सुख और निरंतर आय की प्राप्ति होती है।
द्वार पर लगाया जाने वाला किवाड़ बिल्कुल पतला नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर भुखमरी या अर्थाभाव का सामना करना पड़ सकता है। यदि किवाड़ टेढ़ा-मेढ़ा हो जाए तो अमंगलकारी होता है। इस कारण दिमागी संतुलन बिगड़ सकता है।
यदि किवाड़ में जोड़ गड़बड़ हो तो भवन मालिक कई कष्ट झेलता है। यह पारिवारिक शांति को प्रभावित करता है। यदि किवाड़ भवन के अंदर की ओर लटक जाए तो बहुत कष्टकारी और बाहर की ओर लटका हो तो वहां रहने वाले निरंतर प्रवास पर ही रहते हैं।

रसोईघर का वास्तु - डॉ. श्रीकृष्ण

रसोई को घर के आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) में बनाना चाहिए क्योंकि इसे ही अग्नि का स्थान माना गया है। यहां रसोई होने से अग्नि देव नित्य प्रदीप्त रहते हैं और घर का संतुलन बना रहता है। किंतु, इससे यह भी देखा गया है कि अक्सर दिन में तीन या उससे अधिक बार भोजन बनता है यानी खर्च बना ही रहता है।
ऐसे में एकदम अग्निकोण को छोड़कर पूर्व की ओर रसोई बनाएं। यदि पूर्व की रसोई बनी हुई हो तो चूल्हे को थोड़ा पूर्व की ओर खिसका दें। चूल्हा इस तरह लगाएं कि सिलेंडर भी उसके एकदम नीचे रहे। रसोई तैयार करते समय मुख की स्थिति पूर्व में रहनी चाहिए।
यह भी ध्यान रखें कि यदि रसोई के दक्षिण में एग्जॉस्ट फैन हो तो व्यय की संभावना रहती है। ऐसे में पूर्व की दीवार पर एग्जॉस्ट फैन लगाना चाहिए। रसोई बन जाने के बाद भोजन कभी घर के ब्रrास्थान पर बैठकर नहीं करें। न ही वहां पर झूठा डालें।
इससे रसोई का खर्च बढ़ता है और घर में अनर्गल वार्तालाप भी बढ़ता है। भोजन कभी वायव्य कोण में बैठकर या खड़े-खड़े भी नहीं करें। इससे अधिक खाने की आदत हो जाती है। इसी तरह नैऋत्य कोण में बैठकर भोजन नहीं करें। यह राक्षस कोना है और इससे पेटू हो जाने की आशंका रहती है।
रसोई घर के लिए जरूरी टिप्स.. 1. रसोई घर में अन्नपूर्णा या लक्ष्मीजी का चित्र लगाना चाहिए और रसोई बनाने से पूर्व चित्र पर अगरबत्ती लगानी चाहिए। 2. भोजन बनाकर खाने से पूर्व एकाध कौर आग की ज्वाला में अर्पित कर दें। 3. भोजन करने के बाद एक कौर हर हाल में टिफिन में बचाकर रखें। 4. अपने हाथों से एक रोटी गाय को अवश्य दें। यदि द्वार पर श्वान बैठता हो तो उसे भी रोटी से संतुष्ट करें। 5. यदि भोजन की सामग्री रसोई घर में ही रखी जाती हो तो उसे हटा दें और दक्षिण दिशा में रखने का प्रबंध करें। 6. रसोई को व्यवस्थित रूप से तैयार करें और कम समय के लिए ही एग्जॉस्ट फैन चलाएं।