Wednesday, December 23, 2009
वास्तु दोषों का निवारण करती है गाय
-डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू
हिन्दू धर्म में कलश का महत्व
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।
ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।
कांचन से कीर्ति महान है और सुवर्ण से सुनहरा जीवन श्रेष्ठ है। मंदिर के शिखर पर स्थित कलश वह कीर्ति और वैसा जीवन प्राप्त कर चुका है। अब उसे अपने बारे में हीनभाव रखने का कोई कारण नहीं है। छोटा मानव भी महान कार्य में निमित्त बना हो तो वह जीवन में महानता के शिखरों को प्राप्त कर सकता है। उसके बाद उसे छोटेपन का अनुभव नहीं करना चाहिए।
कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।
प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणोशजी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।
स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होता है उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।
तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।
हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है।
कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।
नए घर में प्रवेश करने से पहले कुंभ रखने की प्रथा प्रचलित है। जलपूर्ण कुंभ की तरह घर भावपूर्ण और नवपल्लवित रहे, ऐसी मंगलकामना इसके पीछे रही है। कलश या कुंभ पर श्रीफल रखने से उसकी शोभा दोगुनी होती है। श्रेष्ठागमन के समय माथे पर श्रीफलयुक्त कलश लेकर खड़ी रहने वाली कुमारिकाओं को हम कई बार देखते हैं।
भावभीने आतिथ्य सत्कार का यह अनोखा प्रकार है। गुजरात में नवरात्रि के प्रसंग पर खेला जाने वाला गरबा कलश या कुंभ का ही स्वरूप है। गरबा सजल होने के बजाय सतेज होता है। स्थाप्तयशास्त्र में भी कलश का अनोखा महत्व है।
सूर्यास्त के बाद अशुभ फल देते हैं नहोराता के ग्रह
इस प्रकार के योग से व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में अस्थिरता, मानसिक शांति और गृहस्थ सुख की कमी जैसे अशुभ प्रभाव आते हैं। सूर्य-शनि की परस्पर ऐसी स्थिति किसी अन्य भाव में चतुर्थ-दशम स्थिति से बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि चौथे घर में सूर्य की स्थिति होने से व्यक्ति का जन्म समय मध्यरात्रि के आसपास का होता है, जिस समय सूर्य निर्बल होता है। वहीं सप्तम भाव का शनि कालपुरुष कुंडली में अपनी उच्चराशि में स्थिर होने से और रात्रि समय जन्म के कारण रात्रि बली होने से सूर्य की अपेक्षा काफी बलवान होता है।
सप्तम में बैठे शनि की दसवीं दृष्टि चौथे घर में बैठे उसके शत्रु सूर्य पर होने से चौथे घर और सूर्य का फल अनेक प्रकार से अशुभ हो जाता है। एक तो चौथे घर का फल यानी हमारी मानसिक शांति और गृहस्थ सुख, दोनों पर शनि का अशुभ प्रभाव और दूसरे शनि की दृष्टि से दूषित सूर्य का चौथे घर पर अपना अशुभ प्रभाव रहता है।
सूर्य की दृष्टि दसवें घर पर होने से उसका प्रभाव कर्मक्षेत्र, नौकरी और व्यवसाय पर भी ठीक नहीं रहता। नहोराता के ग्रहों का अशुभ असर सूर्यास्त के बाद प्रबल होता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की दृष्टि और कार्यक्षेत्र में अधिक रहता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने कैरियर में बहुत दिक्कतें आती हैं और उतार-चढ़ाव बना रहता है। खासतौर पर अगर वे ऐसे कामों में हों, जहां नाइटशिफ्ट में काम करना पड़े। जिन व्यक्तियों की कुंडली में यह योग हो, उन्हें कोई भी नया काम, नया प्रोजेक्ट सूर्यास्त के बाद शुरू नहीं करना चाहिए। किसी नए कार्य की कार्ययोजना भी सूर्यास्त के बाद न बनाएं, अन्यथा ऐसे प्रोजेक्ट्स में बहुत रुकावटें आती हैं और सफलता संदिग्ध ही रहती हैं।
सूर्य-शनि की ऐसी स्थिति व्यक्ति के आत्मबल (सूर्य) और मनोबल (चंद्रमा-चतुर्थ भाव) पर अशुभ असर देती है, जिससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता और संकल्पशक्ति पर प्रभाव पड़ता है।
Friday, December 18, 2009
महायोगों के धनी भगवान झूलेलाल
उनकी आराधना से वरुण देव का मन द्रवित हो उठा। तब नदी की लहरों पर विशाल मछली पर विराजमान, हाथ में माला तथा वेद ग्रंथ लिए एक ब्रrा स्वरूप दिव्य पुरुष दृष्टिगोचर हुए और आकाशवाणी द्वारा अपने प्रकट होने का समाचार सुनाया।
आकाशवाणी के अनुसार विक्रम संवत 1007 ईसवी सन् क्९५१ तदनुसार चैत्र शुक्ल द्वितीय, दिन शुक्रवार, भरणी नक्षत्र में ग्राम नसरपुर जिला सिन्ध (पाकिस्तान) के श्री रतनराय के घर में माता देवकी के गर्भ से भगवान झूलेलाल ने जन्म लिया। इनके जन्म के समय सूर्य कुंडली में लग्न में सूर्य बुध, द्वितीय भाव में चंद्रमा, चतुर्थ भाव में मंगल केतु और सप्तम भाव में शनि विराजमान थे जबकि नवम भाव (भाग्य भाव) में बृहस्पति, दशम (कर्म) भाव में राहु तथा द्वादश भाव में शुक्र बैठे थे।
भगवान झूलेलाल की जन्म कुंडली में ग्यारह महान कर्मजीव योग बने। सूर्य और चंद्र, दोनों कुंडलियों में ६३ महायोगों का निर्माण हुआ। दैवीय शक्ति के बल पर यह बालक शीघ्र जवान हो गया। कुंडली में बने तमाम शुभ योगों के परिणामस्वरूप यह बालक तरह-तरह के चमत्कार दिखाने लगा। महान कर्मजीव योगों के प्रभाव से इन्होंने दुष्ट सम्राट मिरखशाह को इतने चमत्कार दिखाए कि मिरखशाह और उसके अनुयायी भयभीत हो गए। राज्य में महामारी फैल गई, जिसका प्रभाव सिर्फ सम्राट तथा उसके अनुयायियों पर ही हुआ।
चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। इससे घबराकर मिरखशाह और उसके अनुयायियों ने भगवान झूलेलाल के चरणों में गिरकर आत्मसमर्पण कर दिया और क्षमायाचना करने लगे। इस तरह शांति का संदेश देकर भगवान झूलेलाल ने संवत १क्२क् में, भादों के महीने, पूर्णिमा के दिन अपने शिष्य ठाकुर पगर को अपना स्थान सौंपकर हजारों हिन्दु-मुसलमानों के सामने जल समाधि ले ली।
Thursday, December 17, 2009
अभय बनाएं काल भैरव
कालभैरव अष्टमी.भय का हरण करे, वह भैरव - भयहरणं च भैरव:। भैरव की महिमा शास्त्रों में मिलती है। भैरव को जहां शिव के गण के रूप में स्वीकारा गया है, वहीं वे दुर्गा के आगे-पीछे चलने वाले अनुचारी भी माने गए हैं। करोड़ों परिवारों में भैरव की कुलदेवता के रूप में पूजा की जाती है, जो परिवार में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और संबल प्रदान करते हैं।
तंत्र के महान देवता : भूतभावन शिव ने उन्हें वाराणसी में कोतवाल नियुक्त किया। अत: वे प्रथम स्मरणीय भी हुए। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में उनकी वंदना की है। भैरव को उनके अनेक गुणों के कारण ही तंत्र में महान देवता बताया गया है। ग्रंथों में लिखा है कि गृहस्थ को सदा भैरव के सात्विक ध्यान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
मंगल जन्य दोषों के निवारक : स्त्री-पुरुषों की कुंडली में उच्च, नीच मंगल से होने वाले समस्त दोषों का निवारण भैरव को प्रसन्न करने से हो सकता है। महिलाओं की ल्यूकोरिया-प्रदर सहित कई रोगों, मानसिक व्याधियों, तनाव-अवसाद, हिस्टीरिया, उन्माद जैसी बीमारियों का निवारण भैरव की सेवा-साधना से सहज ही संभव है। वैसे जिनको मंगल जन्य कष्ट हो, वे भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, बटुक भैरव ब्रrा कवच, भैरव स्तवराज, भैरव पंजर कवच आदि का नियमित पाठ कर लाभान्वित हो सकते हैं। भैरव कवच का पाठ अकाल मृत्यु, दीर्घ व्याधियों का निवारण करने में भी समर्थ है।
नाम जप से कई बाधाओं से मुक्ति :
कालभैरव के नाम जप से अनेक रोगों से मुक्ति संभव है। वे संतानदाता और आयुवर्धक हैं। एक सौ आठ नामों का नित्य पारायण कई भक्त करते हैं और लाभ उठाते हैं। जिनके घर में प्रेत बाधा या नित्य कलह की आशंका हो, शत्रु परेशानी हो, वहां शनिवार या मंगलवार को भैरव पाठ, काल संकर्षण तंत्रोक्त बटुक भैरव अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र का पारायण करने से इन झंझटों से मुक्ति पाई जा सकती है। भैरव के अनेक स्तोत्र पाठों में रं, कं, गं, भं, क्षं, वै आदि बीजाक्षर मिलते हैं, जिनका उच्चरण बहुत ध्यानपूर्वक करना चाहिए।
Tuesday, December 15, 2009
नवग्रहों के पूजन का महत्व
सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु को नवग्रह कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य-चंद्रमा को नक्षत्रों का स्वामी, मंगल को पृथ्वी पुत्र, बुध को चंद्रमा का पुत्र, बृहस्पति को देव गुरु, शुक्र को दैत्य गुरु, शनि को सूर्य पुत्र एवं राहु-केतु को पृथ्वी का छाया पुत्र माना गया है।
भारतीय संस्कृति में नवग्रह-उपासना का उतना ही महžव है, जितना कि भगवान विष्णु, शिव तथा अन्य देवोपासना का है। जन्म से लेकर उपनयन, विवाह आदि संस्कारों में नवग्रह पूजन का विशेष महžव है।
यज्ञानुष्ठान की क्रिया नवग्रह स्थापना के बिना अपूर्ण ही रहती है क्योंकि यज्ञरक्षा नवग्रहों द्वारा ही होती है। अत: रक्षा-विधान के लिए शास्त्रीय आदेश है कि गणोश, सरस्वती, क्षेत्रपाल की स्थापना के साथ-साथ नवग्रहों की भी स्थापना करनी चाहिए और उन्हें पूजन करके प्रणाम करना चाहिए।
जीवन के संपूर्ण सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय आदि जैसे सभी विषय इन नवग्रहों पर आधारित होते हैं। इसका कारण 27 नक्षत्रों और 12 राशियों पर ये ग्रह भ्रमण करते रहते हैं, जिससे ऋतुएं, वर्ष, मास और दिन-रात बनते हैं।
नवग्रह अपनी-अपनी गति के अनुरूप मंद अथवा तीव्र चाल से एक-एक राशि को पार करते रहते हैं। जब ये सप्तग्रह सूर्य के समीप अंशों में एक ही राशि पर होते हैं तो अस्त माने जाते हैं। इन राशियों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन हैं।
नाम के अनुसार इन्हीं राशियों पर स्थित ग्रहों की चाल देखकर बताया जाता है कि अमुक व्यक्ति के लिए अमुक समय कैसा है। इसे ही जानने के लिए बारह राशियों हेतु नवग्रहों को इनका स्वामी चुना गया है।
मेष व वृश्चिक राशि का स्वामी-मंगल, वृष व तुला राशि का स्वामी-शुक्र, मिथुन व कन्या राशि का स्वामी-बुध, कर्क राशि का स्वामी-चंद्रमा, सिंह राशि का स्वामी-सूर्य, धनु व मीन राशि का स्वामी- गुरु और मकर व कुंभ राशि का स्वामी-शनि को माना गया है।
जन्म कुंडली या वर्ष कुंडली में कौनसा ग्रह किस स्थान में बैठा है, उसका फल क्या मिलेगा? उसी अनुसार उस ग्रह की शांति के लिए पाठ-जप करना, रत्न धारण करना व वस्तुओं का दान करना चाहिए, तभी फल प्राप्त होगा।
Monday, December 14, 2009
ग्रह स्थिति बनाए धनवान
ज्योतिष ग्रंथों में लक्ष्मीवान होने संबंधी अनेक योगों का उल्लेख है। यदि ये योग जातक की कुंडली में हैं तो व्यक्ति निश्चय ही धनी होता है। सामान्य मूल्यांकन करने पर यह देखा जाता है कि कुंडली में चंद्र-मंगल की युति है तो ऐसा जातक जीवन में आर्थिक रूप से संपन्नता प्राप्त करता ही है। इसके अलावा अन्य लक्ष्मी योग हैं - >> यदि द्वितीय स्थान का स्वामी ग्यारहवें भाव में स्थिर होकर द्वितीय भाव को देखता है।>> यदि द्वितीय भाव का स्वामी उच्च का हो तथा उस पर शुक्र, गुरु, चंद्र, बुध की दृष्टि हो।
>> द्वितीय भाव का स्वामी नवम या पंचम में श्रेष्ठ स्थिति में विद्यमान हो।
>> द्वितीय भाव का स्वामी बृहस्पति अपनी उच्च राशि में नवम भाव में (वृश्चिक लग्न में) उपस्थित हो।
>> नवम भाव एवं लग्न अपनी-अपनी उच्च राशि में हो या उत्तम स्थिति में हो।
>> नवम एवं लाभ का राशि परिवर्तन योग हो।
>> लग्न एवं नवम भाव के स्वामी दोनों एक साथ विद्यमान हों या केंद्र त्रिकोण में श्रेष्ठता से युक्त हो।
>> लग्न एवं नवम भाव के स्वामी आपस में देख रहे हों।
>> लग्न का स्वामी लग्न को तथा नवम भाव का स्वामी नवम भाव को अथवा लग्नेश-भाग्येश को तथा भाग्येश लग्न को देख रहा हो।
>> केंद्रों के स्वामी अपनी उच्च स्थिति में विद्यमान हों।
>> नवम एवं लग्न के स्वामी केंद्र में हों तथा उन पर शुभ ग्रहों (गुरु, चंद्र, शुक्र, बुध) की दृष्टि हो।
प्रश्न उठता है कि जिस जातक की कुंडली में उपरोक्त योगों की अनुपलब्धता है तो क्या वे अभाव में रहेंगे? नहीं, इसके अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे योग होते हैं जिनके कारण जातक अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता है। अत: लक्ष्मी योग को ध्यान से देखा जाना चाहिए।
पं. राजाभाऊ रावल