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Friday, January 1, 2010

शनि से डरें नहीं

शनिदेव को मृत्युलोक का धर्मराज कहा जाता है। पृथ्वी पर होने वाले सत्कर्मो और दुष्कर्मो का लेखा-जोखा रखकर तत्काल दंडित करने के कारण लोग इनसे भयभीत रहते हैं। जन्मकुंडली में वृष और तुला लग्न वालों के लिए शनिदेव परम योगकारक होते हैं, जबकि मकर और कुंभ इनकी अपनी राशि है। तुला राशि पर उच्च और मेष राशि पर इन्हें नीच की संज्ञा प्राप्त है।

कर्क और सिंह वालों के लिए ये मारक होते हैं। मारक अथवा मारकेश का ज्योतिषीय अर्थ है - मरणतुल्य कष्ट देने वाला। अन्य ग्रह यदि मारकेश हैं तो वे अशुभ फल अवश्य देते हैं, किंतु शनि के साथ ऐसा नहीं है। पृथ्वीलोक के दंडाधिकारी होने के कारण शनिदेव अपने भाई यमदेव की ही तरह मर्यादा में बंधे हैं। इस कारण ये चाहे मारक हों या योगकारक, कर्मानुसार ही फल देते हैं। पुराणों में कहा गया है कि शनिदेव के कुप्रभावों से बचने के लिए असहाय लोगों की मदद करें, अभिवादनशील रहें और श्रद्धा-विश्वास के साथ दान-पुण्य करें।

शनि वायु तत्वप्रधान और पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। ये आंधी-तूफान, महामारी, अग्निजनित दुर्घटनाओं तथा तमाम प्राकृतिक आपदाओं के स्वामी होते हैं। इनका पृथ्वी के नजदीक आना कुछ इसी तरह की आशंका पैदा करता है, किंतु ये वर्तमान में अग्नितत्व की राशि सिंह में चल रहे हैं, जो इनके पिता सूर्य की राशि है। इस कारण इनके प्रभाव में कोई क्रूरता या परिवर्तन नहीं आएगा। कतिपय ज्योतिषी अपने अध्ययन के आधार पर शनि का नाम लेकर लोगों को डरा रहे हैं। ये लोग विशेषत: सिंह राशि के लोगों को डरा रहे हैं, लेकिन यह सही नहीं है- स्थान हानिकरों जीवो स्थान वृद्धि करौ शनि।

इस सूत्र के अनुसार शनि जिस स्थान (सिंह) पर बैठते हैं, वहां की वृद्धि ही करते हैं। अत: सिंह राशि वालों को शनि से डरने की जरूरत नहीं है। अच्छे कर्म करते चलें। शनि देव के आशीर्वाद से कामयाबी आपके कदम चूमेगी। सिंह राशि ही नहीं, किसी भी राशि के जातक को शनिदेव का कोपभाजन नहीं बनना पड़ेगा।

उत्तर की ओर मुख करके देव-आराधना क्यों?

देवपूजन भारतीय जनजीवन की खास विशिष्टता है। यह इहलोक और परलोक की साधना का महत्वपूर्ण सोपान है। इसका जीवन में महत्व इसलिए भी है कि इससे इष्ट प्रयोजन की सिद्धि होती है।

अपने-अपने आराध्य की पूजा, उपासना करने से मनोबल बढ़ता है, सोचे-विचारे कार्यो की पूर्ति होती है। इसलिए आर्त, अर्थार्ती, ज्ञानी और जिज्ञासु- चारों प्रकार के लोगों द्वारा देवाराधना की परंपरा रही है। स्कंदपुराण के प्रभासखंड में एक नियम उल्लेखित है कि देवपूजन में साधक को हमेशा उत्तराभिमुख होना चाहिए और पितरों का पूजन दक्षिणमुखी होना चाहिए-

उदङ्मुखस्तु देवनां पितृणां दक्षिणामुख:।

उत्तर को उदिच्य और उदक दिशा भी कहा गया है। आराधना में उत्तरमार्ग का महत्व इस अर्थ में भी है कि यह देवमार्ग है, जैसा कि गीता में भी कहा गया है और भीष्म ने भी उत्तरायण में ही प्राणांत करने का निश्चय किया था।

उत्तराभिमुखी होकर पूजन करने से चित्त की शांति तो होती ही है, अर्थसिद्धि के साथ-साथ अन्य इच्छित कार्यो में सफलता भी मिलती है। देवाराधना में देवप्रिय वस्तुओं का चयन जरूर करना चाहिए और त्रुटि न रहे इसका ध्यान रखें। इसी प्रकार देवपूजन में सदा पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। कभी बिना धुला वस्त्र धारण नहीं करे क्योंकि देवाराधना में मन के साथ ही शारीरिक शुद्धि का भी महत्व है, इसके अभाव में साधना और आराधना के मार्ग से पतन हो जाता है।

कैरियर - दशम भाव से तय होता है व्यवसाय

युवा पीढ़ी कैरियर के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो गई है। ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में व्यवसाय का निर्धारण जन्मकुंडली के दशम भाव से किया जाता है। दशम भाव ‘कर्म भाव’ कहलाता है। इसके स्वामी को दशमेश कहते हैं। दशमेश नवांश कुंडली में जिस ग्रह की राशि में होता है उसी ग्रह के कारकत्व अनुरूप व्यवसाय व्यक्ति के लिए लाभदायक होता है। ग्रहों के कारकत्व निम्न प्रकार है -

सूर्य राज्य, फल-फूल, वृक्ष, पशु, वन, दवा, चिकित्सा, नेत्र, कंबल, लकड़ी, भूषण, मंत्र, भूमि, यात्रा, अग्नि, आत्मा, पिता, लाल चंदन, पराक्रम, धैर्य, साहस, न्याय प्रियता, गेहूं, घी ।

चंद्र जलीय पदार्थ, पशुपालन, डेरी उद्योग, कपड़ा, सुगंधित पदार्थ, कल्पना शक्ति, नेत्र, स्त्री सहयोग, भेड़, बकरी, स्त्री संबंधी पदार्थ, कृषि, गन्ना, चांदी, चावल, सफेद वस्त्र, सिल्क का कपड़ा, चमकीली वस्तु, यात्रा, तालाब, क्षय रोग, खारी वस्तुएं, माता, मन, प्रजा।

मंगल भूमि, अग्नि, गरमी, घाव, राज्य सेवा, पुलिस, फौज, शस्त्र, युद्ध, बिजली, राज दरबार, मिट्टी से बनी वस्तुएं, डैंटिस्ट, अनुशासन, स्पोर्ट्स, तांबा, रक्त चंदन, मसूर, गुड़, ज्वलनशील पदार्थ।

बुध विद्या, गणित ज्ञान, लेखन वृत्ति, काव्यगम, ज्योतिष, हरी वस्तुएं, शिल्प, दलाली, कमीशन, वाक शक्ति, त्वचा, चिकित्सा, वकालत, अध्यापन, संपादन, प्रकाशन, अभिनय, हास परिहास, व्याकरण, रत्न पारखी, कांसा, डाक्टर, गला, नाचना, पुरोहित।

गुरु शिक्षक, तर्क, मंदिर, मठ, देवालय, धर्म, नीतिज्ञ, राजा, सेना, तप, दान, परोपकार, पीला रंग, वेद-पुराण आदि से उपदेश, धन, न्याय, वाहन, परमार्थ, स्वास्थ्य, घी, चने, गेहूं, हल्दी, जौ, प्याज, लहसून, मोम, ऊन, पुखराज।

शुक्र रूप सौंदर्य, भोग विलास एवं सांसारिक सुख, सुगंधित एवं श्रंगारिक प्रसाधन, श्वेत एवं रेशमी वस्त्र, चांदी, आभूषण, गीत-संगीत, नृत्य, गायन, वाद्य, सिनेमा, अभिनेता, उत्तम वस्त्रों का व्यवसाय, मंत्री पद, सलाहकार, जलीय स्थान, दक्षिण पूर्व दिशा।

शनि मजदूर एवं दास वर्ग, शारीरिक परिश्रम, कारखाने, वनस्पति, नौकरी, निंदित कार्यो से धनोपार्जन, हाथी, घोड़ा, चमड़ा, लोहा, मिथ्या भाषण, कृषि, शस्त्रागार, सीसा, तेल, लकड़ी, विष, पशु, ठेकेदारी।

राहु गुप्त धन, लॉटरी, शेयर, विष, तिल, तेल, लोहा, वायुयान संबंधी ज्ञान, मशीनरी, चित्रकारी, फोटोग्राफी, वैद्यक, जासूसी अनुसंधान, कंबल, गोमेद।

केतु गुप्त विद्या, वैराग्य, तीर्थाटन, भिक्षावृत्ति, चर्म रोग, काले वस्त्र, कंबल, विष, शस्त्र, फोड़ा, फुंसी, गर्भपात, चेचक, अत्यंत कठिन कार्य, मंत्रसिद्धि, तत्वज्ञान, दु:ख, शोक, संघर्ष।

कारकत्व शब्दों तक ही सीमित नहीं इनकी परिधि अत्यंत विस्तृत है - जैसे ‘राज्य’ शब्द सूर्य का कारकत्व है। इस छोटे से शब्द में राजा, मंत्री, गवर्नर, राष्ट्रपति, छोटे-मोटे तमाम सरकारी कर्मचारी व अधिकारी, राजनेता, विधायक, सांसद आदि सभी वर्ग जिनका परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप में सरकार से किसी न किसी प्रकार से कोई संबंध है, शामिल हैं। जन्म कुंडली का एकादश भाव ‘आय भाव’ तथा द्वितीय भाव ‘धन भाव’ कहलाता है। इनके स्वामियों के बलाबल और आपस में संबंध के आधार पर व्यवसाय संबंधी आय व धन का विचार किया जाता है।

दशम स्थान स्थित राशि की दिशा में अथवा दशमेश जिस नवांश में होगा, उस नवांश संबंधी राशि की दिशा में व्यवसाय संबंधी लाभ होगा। मेष, सिंह व धनु राशियां ‘पूर्व’ दिशा की स्वामी है। मिथुन, तुला व कुंभ राशियां ‘पश्चिम’ दिशा की स्वामी है। कर्क, वृश्चिक व मीन राशियां ‘उत्तर’ दिशा की स्वामी है तथा वृष, कन्या तथा मकर राशियां ‘दक्षिण’ दिशा की स्वामी है। उपरोक्त विचार ‘लग्न कुंडली’ के साथ ‘चंद्र कुंडली’ व ‘सूर्य कुंडली’ से भी करने पर सूक्ष्म निष्कर्ष पर पहुंचने में काफी सहायता मिलेगी।


वी. एन. शर्मा

साधना का आधार है मंत्रशास्त्र

मन के ऊपर जमी विकारों की मैली परतों को धोने के लिए शास्त्र का जल सशक्त साधन है। मंत्रसाधना की समस्त जानकारी देने वाले ज्ञान को मंत्रशास्त्र साधना का आधार है मंत्रशास्त्र कहते हैं। इस शास्त्र की दो विशेषताएं हैं— पहली यह कि विधि-निषेधों के माध्यम से साधना की विधि की जानकारी देकर यह मंत्रसाधना में साधक की सहायता करता है और दूसरी यह कि यह साधक के अंत:करण में गुह्य रूप से विद्यमान रहता है। मंत्रद्रष्टा ऋषियों का मत है कि ऐसा कोई ज्ञान किसी भी व्यक्ति को मात्र बुद्धि या अनुभव से नहीं सिखाया जा सकता, जो उसके अंत:करण में पहले से संस्कार या बीज के रूप में विद्यमान न हो। यदि अंत:करण में विद्यमान उस ज्ञान को औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता होती तो एकलव्य, कालिदास और कबीर, जिन्होंने किसी गुरुकुल या विद्यालय में औपचारिक शिक्षा नहीं पाई थी, अपने-अपने क्षेत्र में सिद्ध-हस्त नहीं बन पाते।

मंत्रशास्त्र के भेद
मंत्रशास्त्र का गूढ़ ज्ञान दो रूपों में मिलता है— लिखित मंत्रशास्त्र के ग्रंथों के रूप में और गुरुओं के परंपरागत मौखिक उपदेश के रूप में। यह शास्त्र साधन, साधना एवं साध्य के बारे में समग्र जानकारी देकर साधकों की सर्वाधिक सहायता करता है। साधक की पात्रता, उसका अधिकार, साधन का चयन, साधना का मार्ग, उसका विधि-विधान एवं उसका परिणाम, इन सबका वर्णन इस शास्त्र में है।

मंत्रशास्त्र की विशेषताएं
मंत्रशास्त्र एक गूढ़ ज्ञान है, लेकिन सुपात्र या सुयोग्य साधकों के लिए यह उतना दुरूह नहीं है, क्योंकि इस शास्त्र में मंत्रसाधना का प्रत्येक मार्ग सुनिश्चित माना जाता है। इस स्थिति में साधक के सामने न तो कोई असमंजस रहता है और न ही किसी प्रकार की असुविधा। यह एक ओर प्राचीन अनुभवों को अपनाता है, तो दूसरी ओर वर्तमान एवं भविष्य की परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बनाता है।

कई मंत्र हैं साधना के आधार
मंत्र शास्त्र जीवन के समस्त पहलुओं को अपने अंदर समेटता है। इसकी भूमिका एक ऐसे मार्ग ढूंढ़ने वाले पथिक जैसी है, जो निर्जन एवं गहन जंगल में अपना रास्ता बनाता चल रहा है। इस सबका प्रमुख कारण यह है कि समय के परिवर्तन के साथ न केवल परिस्थितियों में ही परिवर्तन होता है, बल्कि मानव मात्र की क्षमता एवं मन:स्थिति में भी अंतर आ जाता है, इसीलिए हमारे महर्षियों ने वैदिक मंत्रों के रहते हुए भी समय एवं परिस्थितियों के अनुसार ‘तांत्रिक मंत्रों’ को और नई परिस्थितियों में ‘साबर मंत्रों’ को साधना का आधार बनाया। यदि शास्त्र एवं परंपरा में ऐसा परिवर्तन स्वीकार्य न होता तो प्रत्येक देवता का एक ही मंत्र, एक ही संप्रदाय, एक ही स्त्रोत एवं साधना की एक ही विधि होती।

मंत्रशास्त्र में अनेक ग्रंथ, अनेक संप्रदाय, एक देवता के अनेक मंत्र और उसकी स्तुति के लिए अनेक स्त्रोतों का होना इस बात का साक्ष्य है कि मंत्रसाधना में समय एवं परिस्थिति के अनुसार साधक को परिवर्तन एवं नए चयन की स्वतंत्रता है।


प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी

Wednesday, December 23, 2009

वास्तु दोषों का निवारण करती है गाय

जिस प्लॉट पर भवन, घर का निर्माण करना हो यदि वहां पर बछड़े वाली गाय को लाकर बांधा जाए तो वहां संभावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता है। कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएं नहीं आतीं। गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। गो-सेवा को एक कत्र्तव्य के रूप में माना गया है। पशु रूप में गाय सृष्टिमातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिए निवेदन के प्रसंग बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘समरांगण सूत्रधार’ जैसा प्रसिद्ध वृहद् वास्तु ग्रंथ गो रूप में पृथ्वी-ब्रrादि के समागम-संवाद से ही आरंभ होता है। वास्तुग्रंथ ‘मयमतम्’ में कहा गया है कि भवन निर्माण का शुभारंभ करने से पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बांधना चाहिए जो सवत्सा या बछड़े वाली हो। नवजात बछड़े को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमि पर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वहां होने वाले समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही मान्यता वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि में भी आई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयतापूर्वक सांस लेती है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है- निविष्टं गोकुलं यत्र श्वांस मुंचति निर्भयम्। विराजयति तं देशं पापं चास्याप कर्षति॥ यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा हो, वहां पुत्र-पौत्र, धन, विद्या, सुखादि जो भी चाहिए, मिल सकता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आई है। अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे होगा? गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। ऐसे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गए तो नंद दंपती ने गाय की पूंछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भय का निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन लेकर जाने से कार्य सिद्ध होता है। पद्मपुराण, और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लांघकर नहीं जाना चाहिए। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिए जाते समय गाय के रंभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान लाभ के लिए घर में गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है। शिवपुराण व स्कंदपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पांव की धूली काभी अपना महत्व है। यह पाप विनाशक है, ऐसा गरुड़पुराण और पद्मपुराण का मत है।

-डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू

हिन्दू धर्म में कलश का महत्व

भ्रात: कान्चलेपगोपितबहिस्ताम्राकृते सर्वतो।
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।
ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।

कांचन से कीर्ति महान है और सुवर्ण से सुनहरा जीवन श्रेष्ठ है। मंदिर के शिखर पर स्थित कलश वह कीर्ति और वैसा जीवन प्राप्त कर चुका है। अब उसे अपने बारे में हीनभाव रखने का कोई कारण नहीं है। छोटा मानव भी महान कार्य में निमित्त बना हो तो वह जीवन में महानता के शिखरों को प्राप्त कर सकता है। उसके बाद उसे छोटेपन का अनुभव नहीं करना चाहिए।

कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।

प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणोशजी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।

स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होता है उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।

तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।

हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है।

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।

नए घर में प्रवेश करने से पहले कुंभ रखने की प्रथा प्रचलित है। जलपूर्ण कुंभ की तरह घर भावपूर्ण और नवपल्लवित रहे, ऐसी मंगलकामना इसके पीछे रही है। कलश या कुंभ पर श्रीफल रखने से उसकी शोभा दोगुनी होती है। श्रेष्ठागमन के समय माथे पर श्रीफलयुक्त कलश लेकर खड़ी रहने वाली कुमारिकाओं को हम कई बार देखते हैं।

भावभीने आतिथ्य सत्कार का यह अनोखा प्रकार है। गुजरात में नवरात्रि के प्रसंग पर खेला जाने वाला गरबा कलश या कुंभ का ही स्वरूप है। गरबा सजल होने के बजाय सतेज होता है। स्थाप्तयशास्त्र में भी कलश का अनोखा महत्व है।

सूर्यास्त के बाद अशुभ फल देते हैं नहोराता के ग्रह

लाल किताब ज्योतिष में अंधे ग्रहों की कुंडली के अलावा एक और सिद्धांत है नहोराता के ग्रह। इन्हें रात्रि में अंधे ग्रहों या रतांध ग्रहों का टेवा भी कहा नहोराता के ग्रह जाता है। इस परिभाषा में केवल दो ग्रहों का ही जिक्र है यानी चौथे घर में सूर्य हो और सातवें घर में शनि तो ऐसा टेवा रतांध ग्रहों का टेवा कहलाएगा।

इस प्रकार के योग से व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में अस्थिरता, मानसिक शांति और गृहस्थ सुख की कमी जैसे अशुभ प्रभाव आते हैं। सूर्य-शनि की परस्पर ऐसी स्थिति किसी अन्य भाव में चतुर्थ-दशम स्थिति से बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि चौथे घर में सूर्य की स्थिति होने से व्यक्ति का जन्म समय मध्यरात्रि के आसपास का होता है, जिस समय सूर्य निर्बल होता है। वहीं सप्तम भाव का शनि कालपुरुष कुंडली में अपनी उच्चराशि में स्थिर होने से और रात्रि समय जन्म के कारण रात्रि बली होने से सूर्य की अपेक्षा काफी बलवान होता है।

सप्तम में बैठे शनि की दसवीं दृष्टि चौथे घर में बैठे उसके शत्रु सूर्य पर होने से चौथे घर और सूर्य का फल अनेक प्रकार से अशुभ हो जाता है। एक तो चौथे घर का फल यानी हमारी मानसिक शांति और गृहस्थ सुख, दोनों पर शनि का अशुभ प्रभाव और दूसरे शनि की दृष्टि से दूषित सूर्य का चौथे घर पर अपना अशुभ प्रभाव रहता है।

सूर्य की दृष्टि दसवें घर पर होने से उसका प्रभाव कर्मक्षेत्र, नौकरी और व्यवसाय पर भी ठीक नहीं रहता। नहोराता के ग्रहों का अशुभ असर सूर्यास्त के बाद प्रबल होता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की दृष्टि और कार्यक्षेत्र में अधिक रहता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने कैरियर में बहुत दिक्कतें आती हैं और उतार-चढ़ाव बना रहता है। खासतौर पर अगर वे ऐसे कामों में हों, जहां नाइटशिफ्ट में काम करना पड़े। जिन व्यक्तियों की कुंडली में यह योग हो, उन्हें कोई भी नया काम, नया प्रोजेक्ट सूर्यास्त के बाद शुरू नहीं करना चाहिए। किसी नए कार्य की कार्ययोजना भी सूर्यास्त के बाद न बनाएं, अन्यथा ऐसे प्रोजेक्ट्स में बहुत रुकावटें आती हैं और सफलता संदिग्ध ही रहती हैं।

सूर्य-शनि की ऐसी स्थिति व्यक्ति के आत्मबल (सूर्य) और मनोबल (चंद्रमा-चतुर्थ भाव) पर अशुभ असर देती है, जिससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता और संकल्पशक्ति पर प्रभाव पड़ता है।