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Tuesday, January 12, 2010

नाम करेगा रोशन जग में राजदुलारा

प्रतिस्पर्धा के दौर में हर माता-पिता का सपना है कि उनकी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर उनका नाम रोशन करे। परीक्षाफल आने के बाद उचित विषयों का चयन करना माता-पिता तथा बच्चों के सामने एक चुनौती होती है। इसके लिए वे शिक्षा विशेषज्ञ तथा ज्योतिषियों से परामर्श भी लेते हैं क्योंकि उचित विषयों का चयन ही बच्चे के भविष्य का निर्णायक होता है।

जन्मकुंडली में शिक्षा प्राप्ति के लिए कारक भाव, द्वितीय भाव व तृतीय भाव - प्रारंभिक शिक्षा, चतुर्थ व पंचम भाव - स्कूल व कालेज शिक्षा तथा पंचम से पंचम नवम भाव जातक की उच्च शिक्षा को बतलाता है। पंचम भाव जातक के मस्तिष्क विकास को भी दर्शाता है। अत: पंचम भाव का बलवान होना जातक की शिक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पंचम से पंचम, नवम भाव जातक के भाग्य का भाव भी है, यदि नवम भाव बलवान है और उसका संबंध चतुर्थ, पंचम व लग्न से हो जाए तो जातक प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिभावान होता है। प्रतिभा के लिए पंचम, नवम, पंचमेश व नवमेश का बलवान होना आवश्यक है। इसी प्रकार विद्या प्राप्ति के कारक ग्रह गुरु -बुद्धि, विवेक, बुध-स्मरण शक्ति तथा चंद्रमा - मन, एकाग्रता के लिए है।

चंद्रमा का पक्ष बलवान होना, शुभ स्थान पर स्थित होना तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट होना एकाग्रता के लिए अति आवश्यक है। दूसरी आवश्यकता है स्मरण शक्ति की। स्मरण शक्ति के लिए बुध की केंद्र में स्थिति तथा शुभ ग्रहों से युति व दृष्टि होनी चाहिए। तीसरी आवश्यकता है बुद्धि व विवेक की। इसके कारक बृहस्पति के बलवान रहने पर जातक उच्च शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता रखता है।

बुध, गुरु, शुक्र यदि केंद्र और त्रिकोण भाव में रहकर परस्पर दृष्टि, युति करे तथा गुरु बलवान हो तो सरस्वती योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धिमान, कार्यकुशल व श्रेष्ठ विद्वान बनाता है। बुध व सूर्य की केंद्र या त्रिकोण में युति, बुध अस्त नहीं होने चाहिए, इससे बना बुध आदित्य योग जातक की प्रखर बुद्धि व विद्या के लिए उत्तम है। यदि पंचमेश तथा षष्ठेश एक दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में तथा शुभ भाव में स्थित हो तो शंख योग का निर्माण होता है जो जातक को उत्तम विद्या प्रदान करता है।

चंद्र से त्रिकोण भाव में गुरु, बुध से त्रिकोण भाव में मंगल तथा बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारदा लक्ष्मी योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धि और विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा धन-वैभव की स्वामिनी लक्ष्मी देवी दोनों की कृपा का पात्र बनाता है।

गुरु, द्वितीय या पंचम भाव में बुध या शुक्र की राशि में बैठा हो और बुध या गुरु से दृष्टि या युति संबंध करें तो कलानिधि योग का निर्माण होता है। यह योग जातक को धनी व उत्तम कलाकार बनाता है। शिक्षा के विभिन्न विषयों के कारकत्व अलग-अलग ग्रहों को प्राप्त है।

सूर्य
अध्यात्म, दार्शनिक शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, नेत्र रोग, कुष्ठ रोग, शल्य चिकित्सा आदि से संबंधित विषयों का कारक है।
चंद्रमा
औषधि, मनोविज्ञान, जलीय पदार्थ, नेवी आदि।
मंगल

शल्य चिकित्सा, कृषि, भवन निर्माण, यांत्रिक शिक्षा, खेलकूद, अपराध विज्ञान आदि।
बुध
तर्क-वितर्क, शिल्प, व्यापार कौशल, शिक्षक, बहीखाते लिखना आदि।
बृहस्पति
साहित्य, कानूनी सलाहकार, वित्त व्यवस्था, अध्यापन, धार्मिक कार्य, अर्थशास्त्र, संतान कारक होने के कारण बालरोग विशेषज्ञ।
शुक्र
संगीत, नाटक, अभिनय, रूप सज्जा, नृत्य, कला आदि।
शनि
इतिहास, पुरातत्व, राजनीति, मशीन संबंधी ज्ञान को दर्शाता है।
राहू
इलेक्ट्रानिक्स, अनुसंधान संक्रमणरोही आदि।

मंगल, शनि, राहू, केतु का द्वितीय, चतुर्थ या पंचम भाव से दृष्टि युति संबंध तकनीकी क्षेत्र में शिक्षा दिलवाता है। पंचम और नवम भाव का परस्पर संबंध अध्यात्म व दर्शनशास्त्र में रुचि देता है क्योंकि पंचम भाव देव भक्ति व मंत्र है तथा नवम भाव धार्मिक आस्था, सत्यनिष्ठा तथा प्रारब्ध दर्शाता है।

बुध या गुरु का संबंध द्वितीय, चतुर्थ, पंचम भाव या इनके स्वामी ग्रह से हो तो जातक वाणिज्य व्यापार की शिक्षा पाता है। चंद्रमा या शुक्र यदि 2, 4, 5 भाव या भावेश से दृष्टि युति करे तो जातक कला संबंधी विषयों में रुचि लेता है। पंचम भाव में स्थित गुरु कानूनी शिक्षा दिलवाता है।

अष्टमेश और तृतीयेश की युति हो तथा दोनों बलवान हो तो ऐसा जातक अनुसंधान व शोधपरक अध्ययन में रुचि लेता है। द्वितीय भाव या द्वितीयेश से बुध, गुरु, शुक्र या इनमें से किन्हीं दो का दृष्टि युति संबंध जातक को वकील या न्यायाधीश बनाता है।

द्वितीय भाव या द्वितीयेश पर सूर्य, राहु, शनि और बुध में किन्हीं तीन ग्रहों का दृष्टि युति प्रभाव डाक्टर, वैद्य अथवा औषधि विज्ञान से धन व यश देता है। तृतीय व दशम भाव का शुक्र से संबंध बहुधा कम्प्यूटर प्रोग्रामर बनाता है।


कविता चैतन्य

Monday, January 11, 2010

धर्म से ज्योतिष तक पूज्य नाग

सूर्य, गौ, वृक्ष, नदी की तरह सर्प भी प्रत्यक्ष देवता हैं। प्राय: बाकी देवता जिनकी परिकल्पना हमारे शास्त्रों ने की है उनका स्वरूप कल्पित है किंतु सर्प साक्षात दर्शन देते हैं। जल की भांति सर्प की उपस्थिति धरती से आकाश तक स्वीकारी गई है। संभवत: पूरी सृष्टि पर एकमात्र सर्प ही हैं जो जल, थल, वृक्ष, झाड़ियों, पहाड़ों, बर्फ, बिल, खेत आदि हर स्थान पर अपना अस्तित्व सिद्ध करते हैं। इतिहास में नाग राजाओं का उल्लेख है तो पुराणों में नाग कन्याओं से कई नायकों-प्रतिनायकों के विवाह या प्रेम संबंधों की चर्चा आती है। नागों का लोक पाताल माना गया है।

इतिहास और पुराण सहित धर्म की सभी धाराओं तथा ज्ञान की शाखाओं में सर्प की चर्चा किसी न किसी रूप में उपलब्ध है जो सर्पो की चिरकालिकता को प्रदर्शित करती है। यही कारण है कि सर्प प्रारंभ से पूजनीय माने गए हैं और उनकी पूजा के निमित्त भारतीय मनीषा में श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन निश्चित किया गया है। पौराणिक, ऐतिहासिक संदर्भो के साथ सर्प के रहस्यमय शारीरिक स्वरूप और उसकी विषधारी वृत्ति ने कालांतर में कई लौकिक-अलौकिक, रहस्य-इंद्रजाल से भरी कथाओं को जन्म दिया और लोकमानस में सर्प के प्रति एक अजीब से भय को भी स्थापित कर दिया। परिणाम यह कि आज भी सर्प हमारे लिए भय, आश्चर्य और रहस्य का केंद्र बने हुए हैं। इसीलिए धर्मालु भारतीय सर्प की पूजा कर उसके संभावित क्रोध से मुक्ति के उपाय खोजते हैं।

श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में सर्प की पूजा के पीछे हमारी अर्थव्यवस्था का दर्शन भी जुड़ा हुआ है। ये दिन बारिश के होते हैं और इसी दौरान खेतों में काम चलता है। आषाढ़ की रिमझिम वर्षा धरती को भिगों पाती है लेकिन जब श्रावण में वर्षा अपना रंग दिखाती है और सर्प के बिल पानी से भर जाते हैं तब सर्प बिल से निकलकर खेतों में आ जाते हैं। तब हमारे सामने दो विकल्प होते हैं - भयभीत होकर सर्प को मार दिया जाए या बड़ी होती फसल की कीटों-चूहों से रक्षा के लिए उसे पर्यावरण का एक अभिन्न अंग स्वीकार कर छोड़ दिया जाए। भारतीय दूसरा विकल्प स्वीकारते हैं और सर्प की पूजा कर उसे अपना मित्र बना लेते हैं। इसीलिए इन्हीं दिनों सर्प की पूजा पंचमी के बहाने की जाती है।

जहां तक ज्योतिष का प्रश्न है, सर्प यहां भी उपस्थित हैं। नवग्रहों में राहु के दोष से पीड़ित सर्प का पूजन करते हैं। ज्योतिष कहता है कि हर ग्रह के दो देवता होते हैं। उदाहरणार्थ सूर्य के अधिदेवता ईश्वर हैं और प्रतिदेवता अग्नि। ठीक इसी तरह राहु के अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प माने गए हैं। यही कारण है कि जिन लोगों की कुंडली में राहु के दोष होता है उन्हें अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प की पूजा कर कालसर्प दोष को दूर करने का उपाय करना पड़ता है। राहु दोष में जिस कालसर्पदोष की चर्चा है उसका आशय है कि यदि वह दोष है तो मनुष्य का स्वभाव चंचल हो जाता है। यानी उसके कार्य विघ्न वाले होते हैं और उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। तब सर्पदोष के निदान के लिए सर्प के उपाय सुगंधित श्वेत वस्तुएं और नैवेद्य चढ़ाकर दोष का शमन करने की परंपरा है।

कहते हैं यदि किसी की कुंडली में कोई दोष हो तो उसे साक्षात ब्रrा भी दूर नहीं कर सकते, किंतु उपायों के माध्यम से उसका शमन अवश्य किया जा सकता है। आशय है कि ज्योतिष में सर्प है। राहु के साथ भी और नक्षत्रों के संदर्भ में भी। 27 नक्षत्रों में अश्लेषा नक्षत्र के देवता के रूप में भी सर्प उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अश्लेषा का स्वामी सर्प ही माना गया है। ठीक इसी तरह बारिश के दिनों में सूर्य जब रोहिणी से हस्त नक्षत्र के बीच गमन करता है तो इन नक्षत्रों में एक का वाहन सर्प भी होता है और इन्हीं वाहनों से ज्योतिषी वर्षा का होना, न होना, कम या ज्यादा होना आदि का आकलन करते हैं।

इतिहास, पुराण, वास्तु, धर्म, ज्योतिष आदि के संदर्भ भले किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के साथ सर्प के स्वरूप, स्वभाव पर फोकस न करें, लेकिन नागपंचमी को सर्पपूजन की परंपरा उसके प्रति आस्था और उसे अपने प्राकृतिक मित्र समझने की परंपरा के पीछे ठोस आधार अवश्य हैं और वह यह कि सर्प भी इस सृष्टि की प्राणी हैं और सृष्टि के सौदंर्य का अंग। हम लाठी उठाएं तो वह शत्रु हैं और शीश झुकाए तो मित्र, देवता। बेहतर होगा हम उसे मित्र मानकर देवता के आसन पर ही रखकर पूजे।


विवेक चौरसिया

मकर संक्रांति : करें सूर्य उपासना

हिंदू पौराणिक शास्त्रों में ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों के बीच संबंधों का व्यापक उल्लेख मिलता है। ग्रहों के आपसी संबंध का असर इंसान पर भी स्पष्ट रूप से होता है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने व्यापक जनहित में त्योहार और पर्व विशेष पर पूजा और दान आदि परंपराओं की व्यवस्था की जिससे आमजन ग्रहों के गोचर में होने वाले परिवर्तनों के कारण उससे होने वाले संभावित नुकसान से बच सकें।

मकर संक्रांति के अवसर पर किए जाने वाले दान-पुण्य की व्यवस्था के पीछे भी यही दूरदृष्टि है। पौराणिक कथाओं में सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है। सूर्य के बगैर इस जगत में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पृथ्वीवासियों के लिए सूर्य ही एकमात्र प्रत्यक्ष देव हैं। इसीलिए सभी धर्मो के अनुयायी किसी न किसी रूप में सूर्य की पूजा करते हैं।



स्कंदपुराण के काशी खंड में वर्णित प्रसंग के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा सूर्य की गर्मी को सहन नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने इससे बचने के लिए अपने तप से अपने ही रूप-रंग और शक्ल की स्त्री छाया बनाई और उससे प्रार्थना की कि वह सूर्य के साथ रहे और सूर्य को यह भेद न दे कि संज्ञा सूर्य से दूर है और छाया संज्ञा की हमशक्ल है। छाया से सूर्य को दो पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुए। उनमें से एक शनि हैं।



शनि महात्म्य के अनुसार शनि का जन्म होते ही उनकी दृष्टि पिता सूर्य पर पड़ी। परिणामस्वरूप तत्काल ही सूर्य कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। उनका सारथी अरुण पंगु हुआ और उनके घोड़े अंधे हो गए। इस प्रकार सूर्य ने महसूस किया कि शनि की दृष्टि महाविनाशकारी है। सूर्य ने अपने गुणों और अपने पुत्र शनि के गुणों की तुलना की और महसूस किया कि कुछ गड़बड़ है। सूर्य ने छाया को प्रताड़ित किया।



यह शनि को सहन नहीं हुआ और शनि सूर्य के परम शत्रु हो गए। यद्यपि सूर्य शनि से बैर भाव नहीं रखते हैं। पिता सूर्य से बदला लेने के लिए शनि ने शिवजी को अपना गुरु बनाया और उनकी तपस्या कर किसी का भी अनिष्ट करने की शक्ति का वरदान प्राप्त कर लिया। भगवान शिव ने शनि की भक्ति से प्रसन्न होकर शनि को न्यायाधीश बनाया और वरदान दिया कि शनि व्यक्ति के कर्मो के अनुसार अच्छे कर्मो के लिए व्यक्ति की उन्नति करेंगे और बुरे कर्मो के लिए उसे प्रताड़ित भी कराएंगे।



ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य वर्षर्पयत मेष से लेकर मीन तक एक-एक माह की अवधि के लिए सभी राशियों में भ्रमण करते हैं। १४ अथवा १५ जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर और कुंभ राशियां सूर्य के पुत्र शनि की राशियां हैं और शनि सूर्य से बैर रखता है।



दुश्मन की राशि मकर में सूर्य के प्रवेश करने और अगले दो महीनों के लिए शनि की मकर और कुंभ राशियों में सूर्य के रहने से और पिता-पुत्र में बैर भाव स्थिति से पृथ्वीवासियों पर किसी प्रकार का कुप्रभाव न पड़े, इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने तीर्थ स्नान, दान और धार्मिक कर्मकांड के उपाय सुझाए हैं। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डुओं का उपयोग करने और उसके दान के पीछे भी यही मंशा है।



ज्योतिष के अनुसार तेल शनि का और गुड़ सूर्य का खाद्य पदार्थ है। तिल तेल की जननी है, यही कारण है कि शनि और सूर्य को प्रसन्न करने के लिए इस दिन लोग तिल-गुड़ के व्यंजनों का सेवन करते हैं। तीर्थो पर स्नान और दान-पुण्य की व्यवस्था भी इसी उद्देश्य से रखी गई है कि पिता-पुत्र के बैर भाव से इस जगत के निवासियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े और भगवान उसे किसी भी बुरी स्थिति से बचाएं।



सूर्य राज, सम्मान और पिता का कारक ग्रह हैं और शनि न्याय और प्रजा का कारक है। जन्म पत्रिका में सूर्य शनि की युति अथवा दृष्टि संबंध से ही पितृ दोष उत्पन्न होता है। लकवा और सिरदर्द जैसे रोगों से पीड़ित लोगों के लिए इस दिन दान-पुण्य वरदान माना गया है। ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव के आधार पर यह व्यवस्थाएं आमजन के लिए प्रतिपादित की हैं। उन्होंने ग्रहों के प्रकोप और उनकी शांति के उपाय भी बताए हैं।



मकर संक्रांति के दिन से लोग मलमास के बंधन से मुक्त हो जाएंगे। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यो के लिए लोगों को इस दिन का बेताबी से इंतजार रहता है। ज्योतिष शास्त्र में मलमास के दौरान शुभ कार्य अनिष्ट कारक माने जाते हैं। मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं।


पं. केके शर्मा

वर्ष भर सुख-समृद्धि के कुछ उपाय

नववर्ष में सभी सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। ज्योतिष के मुताबिक धनेश का छठे, आठवें, बारहवें भाव में स्थित होना धन बाधा योग का निर्माण करता है। कुछ छोटे-छोटे उपाय अपनाकर इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है। वर्ष भर आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहे इसलिए कुछ उपाय दिए जा रहे हैं, जो छोटे होते हुए बड़े काम के साबित होंगे।


मेष


मंगलवार के दिन लाल चंदन, लाल गुलाब के दो फूल, रोली का पैकेट लाल कपड़े में बांधें। प्रणाम करें और धूप-दीप दिखाकर तिजोरी में रख दें, इससे धन वृद्धि होगी।
चांदी का ‘श्री’ बनवाकर उसके चारों ओर सफेद तथा नीले जरकन जड़वा कर लॉकेट बनवाएं। शुद्ध कर शुक्रवार को श्रीमंत्र की तीन माला जाप के बाद गले में धारण करें।
श्रीगणोश यंत्र घर के पूजन स्थल पर रखकर नित्य दर्शन व पूजन करें। ओम गं गणपतये नम: का मूंगे की माला से तीन माला जाप करें, वर्ष भर दौलत कदम चूमेगी।


वृष


सोने या चांदी में श्री बनवा लें। हरा ऑनेक्स लगवाकर शुक्रवार को गले में धारण करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
कमलगट्टे की माला पर श्रीयंत्र घर में स्थापित करें।
ओम गोपालाय उत्तरध्वजाय नम: का एक माला जाप करें। हरे रंग का रूमाल अपने पास रखें। गाय को प्रतिदिन तेल लगी रोटी दें।
वट वृक्ष के पत्ते पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। उस पर साबुत चावल व एक सुपारी रखकर माता लक्ष्मी के मंदिर में चढ़ा दें। इस उपाय से आर्थिक समृद्धि प्राप्त होगी।


मिथुन


धनदा यंत्र घर में स्थापित कर नित्य दर्शन करें तो आशातीत लाभ होगा।
भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर या मूर्ति के सम्मुख ú क्लीं कृष्णाय नम: का एक माला जाप तुलसी की माला से प्रतिदिन करें।
चांदी के पतरे पर चंद्र यंत्र तथा मंगल यंत्र बनवाकर क्रमश: मोती व मूंगा लगवाकर घर के मंदिर में बुधवार को स्थापित करें। जिनके ऊपर ऋण हो वह इस यंत्र के आगे ऋण्हर्ता मंगल स्तोत्र का पाठ करेंगे तो ऋण उतरने लगेगा।
पक्षियों को गुड़ के साथ सतनाजा डालें।


कर्क


चांदी की दो गायों की किसी विद्वान से प्राण प्रतिष्ठित कराकर एक गाय विद्वान को दक्षिणा सहित दान दें। दूसरी गाय कामधेनु दैव्ये की तरह घर के पूजन स्थल में रख कर नित्य दर्शन व पूजन करें, जो मांगेंगे वही प्राप्त होगा।
शिवयंत्र को घर के पूजन स्थल पर स्थापित करें व प्रतिदिन ú नम: शिवाय का एक रुद्राक्ष माला जप करें।
सुबह आजीविका संबंधी कार्य से पहले ú हिरण्यगर्भाय अव्यक्त रूपिणो नम: का मोती की माला से जाप करें।
ग्यारह रविवार दोपहर दही-भात का भोग लगाकर खाएं।


सिंह


दुर्गा मां की तस्वीर के आगे देवी के 108 नामों का नित्य स्मरण करें। यह कार्य वर्ष भर करें।
हरे गणपति (हकीक या ऑनेक्स के बने) घर के पूजन स्थल में स्थापित करें। ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र का पाठ करें। यदि ऋण है तो जल्द ही ऋण मुक्त हो जाएंगे।
ओम हीं घृणि सूर्य आदित्य श्री का नित्य सूर्य उदय के समय तीन माला जाप लाल चंदन की माला से करें।
मां लक्ष्मी को प्रतिदिन लाल पुष्प अर्पित करें। दूध से निर्मित नैवेद्य का भोग लगाएं। धन लाभ होगा।


कन्या


कूर्म पृष्ठ पर बने श्रीयंत्र या महालक्ष्मी यंत्र को घर के पूजा स्थल में स्थापित करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
चांदी के पतरे पर गुरुमंत्र पर सुनहला लगवा कर शुद्ध करें। बुधवार को धूप-दीप दिखा कर गले में धारण करें।
सफेद गुंजा को लक्ष्मी मंत्रों से अभिमंत्रित कर चांदी की डिबिया में शहद में डुबो कर पूजा स्थल या तिजोरी में रखें।
तीन गोमती चक्र, तीन पीली कौड़ियां तथा तीन हल्दी की गांठें पीले कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। घर में धन वृद्धि व बरकत होगी।


तुला


श्रीलक्ष्मी सिद्ध यंत्र घर में स्थापित करें। रोज दर्शन कर ú लक्ष्मीनारायणाय नम: का स्फटिक माला से जाप करें।
यदि अचानक धनहानि होती हो, तो किसी भी मंदिर में कम से कम 40 शनि व सरस्वती चालीसा रखवाएं।
गरीब सुहागिन स्त्री को अपनी पत्नी के द्वारा सुहाग सामग्री दिलवाएं। सामग्री में कोई भी इत्र अवश्य रखें।
महीने में एक बार मिट्टी के कुल्हड़ में मशरूम भरकर किसी भी धार्मिक स्थान में रख आएं। मिट्टी के कुल्हड़ पर मिट्टी का ढक्कन अवश्य लगाएं।


वृश्चिक


श्रीहनुमान जी का यंत्र स्थापित कर नित्य पूजन-दर्शन करें।
धनदा यंत्र भी स्थापित कर नित्य दर्शन करें। ú नमो नारायणाय का तीन माला जाप चमत्कार से कम नहीं रहेगा।
इष्टदेव का स्मरण कर केसर का तिलक प्रतिदिन नाभि, कंठ व माथे पर लगाएं।
छह-छह ग्राम की चार ठोस चांदी की गोलियां सफेद कपड़े में लपेटकर हमेशा पास रखें। इससे समृद्धि के साथ-साथ शांति भी बनी रहेगी।


धनु


लाजवर्त नग को चांदी की अंगूठी में जड़वा श्रीमंत्र के जाप के साथ शुक्रवार को मध्यमा अंगुली में धारण करें।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप स्फटिक माला से करें।
अशोक के वृक्ष की जड़ का पूजन कर तिजोरी में रखें। धन-संपत्ति की प्रचुरता वर्ष भर बनी रहेगी।
धन-संपदा के लिए तिजोरी के नीचे या तिजोरी के अंदर काली गुंजा के ग्यारह दाने रखें। नववर्ष के विशेष मुहूर्त में यह उपाय अवश्य करें।


मकर


सात पीपल के पत्ते लेकर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। फिर कलावे से एक साथ सारे पत्तों को लपेटकर वीरान स्थान पर फेंक दें। आर्थिक संकट दूर हो जाएगा।
कुत्ते को पंद्रह दिन तक प्रतिदिन दूध पिलाएं। इन्हीं पंद्रह दिनों में मंदिर में भी दूध का दान दें।
प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं व रविवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
घर में समृद्धि पोटली लगाएं। लाल रंग का रिबन, तांबे के सिक्के के साथ मुख्य द्वार पर बांधें।


कुंभ


सोने का गुरुयंत्र शुद्ध करके शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को गले में धारण करें। साथ ही चांदी की गाय घर के मंदिर में स्थापित करें व नित्य नियम से दर्शन करें।
ओम श्री उपेन्द्राय अच्युताय नम: का रुद्राक्ष की एक माला से नित्य जाप करें। धन की कोई समस्या नहीं रहेगी।
पंडितजी से पूर्णिमा को घर में सत्यनारायण कथा कराएं, उन्हें पांच वस्त्र, पांच फल, पांच मिठाई दक्षिणा सहित दें व आशीर्वाद पाएं।
कार्य सिद्धि यंत्र घर में स्थापित करें।


मीन


नववर्ष में मूंगे के गणपति स्थापित करें। ú एकदन्ताय विद्यमहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात मंत्र का जाप मूंगे की माला से नियमित करें।
मत्स्य यंत्र अवश्य स्थापित करें। नित्य विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, धन की कमी नहीं होगी।
ड्रॉईंग रूम में उत्तर या पूर्व दिशा में एक्वेरियम रखें।
काली मिर्च के 5 दाने अपने सिर से 7 बार उतारकर 4 दाने चारों दिशाओं में फेंक दें तथा पांचवे दाने को आकाश की ओर उछाल दें। इससे आकस्मिक धन लाभ होगा।

Sunday, January 10, 2010

भाग्यशाली लोगों को होता है कन्या संतान योग

कन्या संतान उन्हीं लोगों के होती है जो परम भाग्यवादी योग वाले होते हैं, साथ ही अगले जन्म में कन्यादान के महापुण्य के कारण पुण्यलोक को प्राप्त कर आनंदित रहते हैं। भारतीय संस्कृति में कहा गया है यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता, जहां नारी की पूजा होती है वहीं देवता निवास करते हैं। आज स्थिति यह आ पहुंची है कि कन्या के गर्भ में आते ही उसकी हत्या कर दी जाती है। धर्मशास्त्र में भ्रूण हत्या और विशेषकर कन्याभ्रूण हत्या महापाप माना जाता है और महापाप करने वाला कभी जीवन में खुश नहीं रह सकता। चाहे उसके पास भौतिक संसाधन कितने ही हो जाएं।

ज्योतिषशास्त्र में भी स्त्री एवं पुरुष भाग में बारह राशियां एवं सारे ग्रह विभाजित हैं। सूर्य, मंगल, गुरु पुरुष ग्रह हैं तो चंद्रमा, शुक्र, शनि स्त्रीग्रह हैं। बुध नपुंसक है तथा जिसके साथ बैठ जाता है वैसा ही फल प्रदान करने लग जाता है। राशियां भी छह स्त्री और छह पुरुष होती हैं। प्रकृति एवं ब्रrांड में सभी जगह दो शक्तियों का संतुलन बना रहता है। यही संतुलन ही आनंद देता है, असंतुलन तो अशांति प्रदान करता है।

शनि की बारह राशियों का परिभ्रमण 30 वर्ष में होता है और दो परिभ्रमण 60 वर्षो में पूरे होते हैं। सूर्य शनि का पिता है लेकिन शत्रुभाव रखता है और इसीलिए जब भी शनि सूर्य की राशि पर द्वितीय परिभ्रमण में आता है तो स्त्री-पुरुष का अनुपात व्यापक पैमाने पर गड़बड़ाने लगता है। आजकल भी शनि सूर्य की राशि सिंह पर ही परिभ्रमण कर रहा है। यह द्वितीय परिभ्रमण पूरा होने जा रहा है और इसीलिए सन् २क्क्७ से आगामी 60 वर्ष तक स्त्री वर्ग का वर्चस्व बढ़ता ही चला जाएगा।

ज्योतिष शास्त्र में भी स्त्रीग्रह बलवान तभी माने जाते हैं जब उनका संबंध पुरुष ग्रहों से रहता है। चाहे स्थान संबंध हो, दृष्टि संबंध या अन्योन्याश्रय संबंध। ठीक वैसे ही समाज में भी परिवार एवं व्यक्ति की शोभा तब तक ही है, जब तक दाम्पत्य में खुशहाली हो और गृहलक्ष्मी परम प्रसन्न हो। ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों के संबंध भी हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों की तरह नाजुक होते हैं। जैसे ग्रहयोग होते हैं हमारी चित्तवृत्ति भी वैसी ही बन जाती है। यही कारण है कि आजकल रिश्तों की मधुरता एवं मर्यादा में धर्मशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, व्यावहारिक शास्त्र आदि की महत्ता को हमने समाप्त कर दिया है। शास्त्रों में तो कहा गया है - दस कुएं बनाने पर जो पुण्य मिलता है वह एक बावड़ी बनाने पर मिल जाता है।

दस बावड़ी बनाने पर जो पुण्य मिलता है वह एक तालाब बनाने पर मिल जाता है और दस तालाब बनाने पर जो पुण्य मिलता है वह एक कन्यादान से मिल जाता है।

पुण्य कोई सुगंधित या सुंदर दिखने वाला पदार्थ नहीं होता है। यह आनंद अनुभूति की पराकाष्ठा होती है। उसकी निरंतरता तब ही संभव हो पाती जब दानपुण्य चलते रहते हैं। कन्यादान भी वही भाग्यशाली स्त्री-पुरुष कर पाते हैं जिनके संतान स्थान पर तृतीय स्थान, एकादश या व्यय भाव के स्वामी की दृष्टि पड़ रही हो अर्थात दान भाव के अधिपति एवं संतान भाव में संबंध बन रहा हो। तृतीय एवं एकादश भाव दान के कारक स्थान होते हैं और उनका संबंध पंचमेश, नवमेश से हो जाए तो कन्यादान के महापुण्य की प्रबल संभावना बन जाती है। इसीलिए कन्या संतान ही जन्म-जन्मांतर से मुक्ति दिलाने वाली होती है। कहा गया है,

श्रुत्वा कन्या प्रदातारं पितर: स पितामहा:। विमुक्त्वा सर्वपापेभ्यो ब्रrालोकं ब्रजन्ति ते॥

अत: पितामहों सहित पितर लोग कन्यादान देने वाले से अपने वंश को सुनकर सब पापों से मुक्त होकर ब्रrालोक को जाते हैं। पुत्र की कामना वाले दहेज लोभ के साथ कन्या लाते हैं। ऐसे लोग दोहरा दान ग्रहण करने से पातकी श्रेणी में आ जाते हैं और कन्यादान से ही उस ऋण से मुक्ति संभव हो पाती है। इसीलिए पुत्र प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण योग कन्या प्राप्ति का होता है। पंचम, सप्तम एवं नवम भाव पर पुरुष ग्रहों की स्थिति कन्या संतान प्रदान करती है और स्त्री ग्रहों की युति पुरुष संतान प्रदान करती है। कन्या प्राप्ति के बिना मोक्ष संभव नहीं है और इसीलिए शनि का आगामी चक्र जनमानस में यह प्रबल धारणा बना देगा कि पुत्र संतान की अपेक्षा कन्या संतान पुण्य प्रदायिनी होती है।

जिन लोगों की पुरुष राशियां बलवान होती है उन्हें भी कन्या संतान की प्राप्ति होती है। यह विपरीत योग हुआ करता है। ऐसी स्थिति में मानसिक शांति एवं समृद्धि कन्या योग में ही होती है। कन्या ही देवी है, लक्ष्मी है, सरस्वती है और उसके विनाश का प्रयास उसे महाकाली के रूप में पैदा करने का निमंत्रण देता है।


डॉ. विनोद शास्त्री

कारोबारी परेशानियों से बचाता है ‘श्री लक्ष्मी गणेश मंत्र’

मानव जीवन के घटनाचक्र को जानने एवं पूर्वानुमान की प्रक्रिया बतलाने वाले महर्षि पाराशर ने व्यापार एवं आर्थिक स्थिति का विचार बड़े ही तर्कसंगत ढंग से किया है। उनका मानना है कि जन्मकुंडली में लग्न, पंचम एवं नवम भाव लक्ष्मी के स्थान होने के कारण धनदायक होते हैं यथा -
‘लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं स्यात्’ तथा
‘प्रथमं नवमं चैव धनमित्युच्यते बुधै:’।

कुंडली में चतुर्थ एवं दशम स्थान इच्छाशक्ति एवं कर्मठता के सूचक होने के कारण धन कमाने में सहायक होते हैं। दूसरी ओर षष्ठ, अष्टम एवं व्यय भाव, जो कर्ज, अनिष्ट एवं हानि के सूचक हैं, व्यापार में हानि और परेशानी देने वाले होते हैं।

कारोबार में परेशानी सूचक योग
महर्षि पाराशर ने अपनी कालजयी रचना ‘मध्यपाराशरी’ में व्यापार में हानि एवं परेशानी के सूचक निम्न योग बताए हैं-
* लग्नेश षष्ठभाव में और षष्ठेश लग्न या सप्तम भाव में हो तथा वह मारकेश से दृष्ट हो।
* लग्नेश एवं चंद्रमा, दोनों केतु के साथ हों और मारकेश से युत या दृष्ट हों।
* लग्नेश पाप ग्रह के साथ छठे, आठवें या 12 वें स्थान में मौजूद हो।
* पंचमेश एवं नवमेश षष्ठ या अष्टम भाव में हों।
* लग्नेश, पंचमेश या नवमेश का त्रिकेश के साथ परिवर्तन हो।
* लग्नेश जिस नवांश में हो, उसका स्वामी त्रिक स्थान में मारकेश के साथ हो।
* कुंडली में भाग्येश ही अष्टमेश या पंचमेश ही षष्ठेश हो और वह व्ययेश से युत या दृष्ट हो।
* जातक की कुंडली में केमद्रुम, रेका, दरिद्री, या भिक्षुक योग हो।

परेशानी से बचने का उपाय
वैदिक चिंतनधारा में व्यक्ति के विचार एवं निर्णयों को विकृत करने वाला तत्व ‘विघ्न’ तथा उसके काम-धंधे में रुकावटें डालने वाला तत्व बाधा कहलाता है। इन विघ्न-बाधाओं को दूर करने की क्षमता भगवान श्रीगणोश जी में है। मां लक्ष्मी तो स्वभाव से ही धन, संपत्ति एवं वैभव स्वरूपा हैं, इसीलिए व्यापार एवं काम-धंधे में आने वाली विघ्न-बाधाओं को दूर कर धन-संपत्ति प्राप्त करने के लिए श्रीलक्ष्मी गणोशजी के पूजन की परंपरा हमारे यहां आदिकाल से है।

श्री लक्ष्मीविनायक मंत्र :
ऊं श्रीं गं सौम्याय गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

विनियोग :
ऊं अस्य श्री लक्ष्मी विनायक मंत्रस्य अंतर्यामी ऋषि:गायत्री छन्द: श्री लक्ष्मी विनायको देवता श्रीं बीजं स्वाहा शक्ति: सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोग:।

करन्यास - अंगन्यास
ऊं श्रीं गां अंगुष्ठाभ्यां नम:। - ऊं श्रीं गां हृदयाय नम:।
ऊं श्रीं गीं तर्जनीभ्यां नम:। - ऊं श्रीं गीं शिरसे स्वाहा।
ऊं श्रीं गूं मध्यमाभ्यां नम:। - ऊं श्रीं गूं शिखायै वषट्।
ऊं श्रीं गैं अनामिकाभ्यां नम:। - ऊं श्रीं गैं कवचाय हुम्।
ऊं श्रीं गौं कनिष्ठकाभ्यां नम:। - ऊं श्रीं गौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
ऊं श्रीं ग: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:। ऊं श्रीं ग: अस्त्रायं फट्।

ध्यान
दन्ताभये चक्रदरौदधानं कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
धृताब्जयालिंगितमब्धिपु˜या लक्ष्मीगणोशं कनकाभमीडे ।।

विधि
नित्य नियम से निवृत्त होकर आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर आचमन एवं प्राणायाम कर श्रीलक्ष्मी विनायक मंत्र के अनुष्ठान का संकल्प करना चाहिए। तत्पश्चात चौकी या पटरे पर लाल कपड़ा बिछाएं। भोजपत्र/रजत पत्र पर असृगंध एवं चमेली की कलम से लिखित इस लक्ष्मी विनायक मंत्र पर पंचोपचार या षोडशोपचार से भगवान लक्ष्मी गणोश जी का पूजन करना चाहिए। इसके बाद विधिवत विनियोग, न्यास एवं ध्यान कर एकाग्रतापूर्वक मंत्र का जप करना चाहिए। इस अनुष्ठान में जपसंख्या सवा लाख से चार लाख तक है।

अनुष्ठान के नियम
* साधक स्नान कर रेशमी वस्त्र धारण करे। भस्म का त्रिपुंड या तिलक लगाकर रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला पर जप करना चाहिए। इस जप को परेशानियों का नाश करने वाला माना गया है।
* पूजन में लाल चंदन, दूर्वा, रक्तकनेर, कमल के पुष्प, मोदक एवं पंचमेवा अर्पित किए जाते हैं।
* भक्ति भाव से पूजन, मनोयोगपूर्वक जप एवं श्रद्धा सहित हवन करने से सभी कामनाएं पूरी होती हैं।
* अनुष्ठान के दिनों में गणपत्यथर्वशीर्षसूक्त, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त कनकधारास्तोत्र आदि का पाठ करना फलदायक है।


प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी

Saturday, January 9, 2010

रवि मंत्र के जाप से दूर होती है दरिद्रता

जीवन में धन की कमी या निर्धनता को दरिद्रता कहते हैं। यह एक ऐसा दोष है, जो न केवल मानव जीवन में पग-पग पर कठिनाइयां पैदा करता है, बल्कि यह व्यक्तित्व एवं व्यक्ति की छवि को विकृत भी कर देता है।

‘दारिद्रदोषी गुणराशिनाशी’, दरिद्रता के इस परिणाम का प्रतिपादन करने वाले चिंतकों ने इसकी विवेचना करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया है कि ‘दरिद्रता की मानसिकता का सबसे बड़ा लक्षण आत्मविश्वास का अभाव है, जो दरिद्री की दुविधा, असुविधा, किंकर्तव्यविमूढ़ता एवं निष्क्रियता के भंवरजाल में फंसा होता है। वस्तुत: दरिद्रता के दर्द की टीस संसार में सबसे अधिक दुखदाई है।

दरिद्रता के योग
वैदिक ज्योतिष के प्रवर्तक महर्षि पाराशर के अनुसार व्यक्ति की जन्मकुंडली में त्रिकोणस्थान धन-संपदा एवं लक्ष्मी का स्थान तथा त्रिक (6, 8 एवं १२वां) स्थान दुख एवं दरिद्रता का होता है। व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम, रेका, कालसर्प भिक्षु एवं दरिद्री योग जीवन में विपन्नता देते हैं।

महर्षि पाराशर के अनुसार दरिद्रता में जातक के जीवन में हीनता एवं दीनता लगातार बनी रहती है। दरिद्रता के योगों में दो बातें प्रमुख होती हैं,
1. योग के प्रमुख ग्रह का त्रिकोणोश एवं शुभ ग्रह से युत-दृष्ट न होना।
2. उसका त्रिकेश एवं पापग्रह से युत-इष्ट होना या त्रिक स्थान में बैठना।

पाराशरीय ज्योतिष के अनुसार दरिद्रता के सूचक कुछ प्रमुख योग इस प्रकार हैं।

लग्न में चर राशि एवं चर नवांश हो और उस पर शनि तथा नीच राशिगत गुरु की दृष्टि हो।
लग्नेश निर्बल, धनेश अस्तंगत और केंद्र में पापग्रह हो।
धन स्थान में पापग्रह हो और उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तथा धनेश निर्बल हो।
धनेश त्रिक (6, 8 एवं १२वें) स्थान में हो और पापग्रह धन स्थान में हो।
भाग्येश एवं कर्मेश त्रिक में और पापग्रह लग्न में हो।
लग्नेश, व्ययेश एवं सूर्य साथ-साथ हो और पापग्रह से दृष्ट हो।
धनेश व्यय स्थान में, व्ययेश धन स्थान में हो या भाग्येश अष्टम में और अष्टमेश भाग्य स्थान में हो।
भाग्येश एवं कर्मेश निर्बल होकर पापग्रह के साथ हों और लग्नेश त्रिक में हो।
पंचमेश एवं नवमेश षष्ठ या व्यय में और लग्नेश पाप प्रभाव में हो।

दरिद्रतानाशक रवि मंत्र
दरिद्रता के प्रभाववश व्यक्ति में आई हीनता, निष्क्रियता या किंकर्तव्यविमूढ़ता को नियंत्रित कर उसको कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ाने में आत्मविश्वास की भूमिका सबसे प्रमुख है। यह आत्मविश्वास रवि मंत्र के अनुष्ठान से बढ़ता है। रवि मंत्र दरिद्रता को दूर करने की रामबाण दवा है।
रवि मंत्र ऊं ह्रीं घृणिं सूर्य आदित्य श्रीं।

विनियोग
अस्य श्री सूर्य मंत्रस्य भृगऋषि: गायत्रीछन्द:, भगवान सूर्योदेवता, ह्रीं बीजं श्रीं शक्ति: सर्वार्थ सिद्धये जपे विनियोग:।

ऋष्यदिन्यास
ऊं भृगवे ऋषये नम:, शिरसि।
ऊं गायत्री छन्दसे नम:, मुखे।
ऊं सूर्याय देवतायै नम:, हृदि।
ऊं ह्रीं बीजाय नम:, गुह्ये।
ऊं श्रीं शक्तये नम:, पादयो:।

षडड्ग न्यास
सत्यतेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, हृदयाय नम:।
ब्रrातेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, शिरसे स्वाहा।
विष्णुतेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, शिखायै वषट्।
रुद्रतेजो ज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, कवचाय हुम्।
अग्नितेजोज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट्।
सर्वतेजो ज्वालामणो हुं फट् स्वाहा, अस्त्राय फट्।

ध्यान
शोणाम्भोरुहसंस्थितं त्रिनयनं वेदत्रयी विग्रहं
दानाम्भोजयुगाभयानिदधतं हस्तै: प्रवालप्रभम्।
केयूराड्ंगदहारकंकणधरं कर्णोल्लसत्कुण्डलं,
लोकोत्पत्ति विनाशपालनकरं सरूय गुणाब्धिं भजे।।
अर्थात रक्तकमल पर विराजमान, तीन नेत्र वाले, वेदमूर्ति, चारों हाथों में क्रमश: दानमुद्रा, कमल, पद्म एवं अभयमुद्रा धारण करने वाले, प्रवाल जैसी आभा वाले, केयूर अड्ंगद, हार एवं कंकण आदि आभूषणों से सुशोभित, कानों में कुंडल धारण करने वाले, जगत की उत्पत्ति, पालन एवं विनाश करने वाले, भगवान सूर्य का मैं ध्यान करता हूं।

विधि
नित्य नियम से निवृत्त होकर आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भस्म का त्रिपुण्ड या तिलक लगाएं। आचमन एवं प्राणायाम कर चौकी या पट्टे पर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर स्वर्ण पत्र या भोजपत्र पर रक्तचंदन एवं अनार की कलम से श्री सूर्यपूजन यंत्र लिखकर और स्थापित कर विधिवत विनियोग, न्यास एवं ध्यान कर पंचोपचार (गंध-अक्षत, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य) से यंत्र का पूजन कर, एकाग्रतापूर्वक उक्त मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र के अनुष्ठान में जप संख्या १0 लाख तथा लघु अनुष्ठान में सवा लाख है।

इस मंत्र के अनुष्ठान में उगते सूर्य को द्वादश नमस्कार, अघ्र्यदान एवं संध्यावंदन करना तथा जप के बाद आदित्य हृदयस्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायक होता है। इस मंत्र के अनुष्ठान से साधक में आत्मविश्वास का पुनर्विकास होता है, जिससे उसके जीवन में सफलता के नए द्वार खुलते हैं।


प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी