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Wednesday, February 17, 2010

जन्म-समय का आप पर प्रभाव

जन्म-समय सुबह 4 से 6 बजे
आपका सूर्य पहले घर में मौजूद है। यह आपको अच्छा स्वास्थ्य और आत्मविश्वास दे रहा है। आप किसी भी बात को लेकर दृढ़ संकल्पित रहते हैं और आपका भविष्य अच्छा है।

जन्म समय सुबह 6 से 8 बजे
आपका सूर्य 12वें घर में है, यह आपकी जिंदगी में ऐसे रहस्यपूर्ण बदलाव लाएगा जिसकी व्याख्या करना मुश्किल है। सख्त दिनचर्या अपनाएं और अपने दिमाग को शांत बनाए रखें। आय के मुकाबले खर्च अधिक हो सकते हैं।

जन्म समय सुबह 8 से 10 बजे
आपका सूर्य 11वें घर में है। इसके मायने हैं कि आपके ढेर सारे दोस्त होंगे, सामाजिक संबंध बनाने के लिए आपको पैसों की जरूरत होगी। ज्यादातर समय शुभचिंतकों और दोस्तों से हाल-चाल जानने में ही बीतेगा। आपको लगेगा कि आप जितने के हकदार हैं, उससे कहीं अधिक हासिल कर रहे हैं।

जन्म समय सुबह 10 से 12 बजे
आपका सूर्य 10वें घर में मौजूद है। पश्चिमी और भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह सूर्य का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। आप अपने प्रोजेक्ट्स और प्लान्स को सफलतापूर्वक पूरा करेंगे। आप सर्वश्रेष्ठ साबित होंगे। शक्ति का दुरुपयोग आपको परेशानी में डाल सकता है।

जन्म समय दोपहर 12 से 2 बजे
आपका सूर्य 9वें घर में है। यह स्थिति आपके यात्रा से भरी जिंदगी जीने, दार्शनिक, धार्मिक, तेज दिमाग, परोपकारी स्वभाव और प्रसिद्ध होने की ओर संकेत करती है। 9वां घर अच्छे भविष्य का है और आप भाग्य को अपने ऊपर मुस्कुराता महसूस कर सकते हैं। आपका स्वभाव परोपकार और दयालुता से भरा है।

जन्म समय दोपहर 2 से शाम 4 बजे
आपका सूर्य आठवें घर में है जो कि मुद्रा संबंधी मामलों जैसे ऋण, ट्रस्ट, सार्वजनिक फंड, बैंक आदि में खास दखल होने का संकेतक है। कई ज्योतिषी इसे सेक्स और दुर्घटनाओं से भी जोड़कर देखते हैं। कानूनी मसलों का सामना करना पड़ सकता है।

जन्म समय शाम 4 से 6 बजे
आपका सूर्य सातवें घर में है, जिसे सामान्यत: साझेदारियों का घर कहा जाता है। शादी आपको दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक प्रभावित करेगी। इसलिए इसे सफल बनाने का प्रयास करें, भले ही इसके लिए आपको कठिन मेहनत क्यों न करनी पड़े। ऐसे पेशे या व्यवसाय को चुनें जो आपको लोगों से सीधे संपर्क करने की आजादी देता हो। चूंकि सातवां घर आपके दुश्मनों का भी है, ऐसे में कानूनी दिक्कत आ सकती हैं।

जन्म समय शाम 6 से रात्रि 8 बजे
आपका सूर्य छठवें घर में है, इसका मतलब यह है कि आपकी जिंदगी का बहुत कुछ साथियों और अधीनस्थों से आपको मिलने वाले सहयोग पर निर्भर करेगा। यह समाजसेवा की ओर भी संकेत करता है और आपको लोगों के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा। अत्यधिक सतर्कता और परिश्रमी होने की आपकी आदत आपको लंबे समय तक कामयाबी और सम्मान दिलाएगी।

जन्म समय रात्रि 8 से 10 बजे
आपका सूर्य पांचवें घर में मौजूद है जो आपको कलाकार वाली क्षमता और कौशल देगा। यह आपको जिंदगी के प्रति आशावादी नजरिया और मौके तलाशने की इच्छाशक्ति देगा। आपकी रुचि व्यवसाय में तब्दील हो सकती है। आप स्टेज और वास्तविक जिंदगी, दोनों में अभिनय करने वाले महान प्रेमी साबित हो सकते हैं, लेकिन इसके अतिरेक से बचें।

जन्म समय रात्रि 10 से 12 बजे
आपका सूर्य चौथे घर में है जो घर और संपत्ति के लिहाज से बेहतरीन स्थान है। आप जमीन, रियल एस्टेट से लाभ अर्जित कर सकते हैं। आपके अभिभावक आपकी जिंदगी को बनाने या बिगाड़ने में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकते हैं।

जन्म समय रात्रि 12 से 2 बजे
आपका सूर्य तीसरे घर में मौजूद है जो आपकी बौद्धिक क्षमता, यात्रा करने की चाहत और उच्च स्तर के रोमांच को दर्शाता है। आप पत्रकारिता या टीवी जर्नलिज्म से जुड़ सकते हैं। आपके भाई-बहन और पड़ोसी या तो आपको बना देंगे या बिगाड़ देंगे, लेकिन यह निश्चित है कि इनका आपके जीवन पर गहरा प्रभाव रहेगा। सूर्य की स्थिति आपको बेहतरीन सामाजिक जीवन देगी।

जन्म समय रात्रि 2 से तड़के 4 बजे
आपका सूर्य दूसरे घर में है। यह वित्त और परिवार का घर है। इसका मतलब है कि आप पैसे बनाने में कामयाब होंगे, भले ही आप इसे संभाल न पाएं। भारतीय ज्योतिष में दूसरे घर को वाककला और भोजन का घर माना जाता है। आप एक महान वक्ता हो सकते हैं, आपके पास पैसा भी होगा।

Tuesday, February 16, 2010

व्यवस्थित घर में आती है सुख और संपदा

व्यवस्थित घर सुख ही नहीं, बल्कि समृद्धि भी देता है जबकि अव्यवस्थित घर न केवल परेशानियां देता है बल्कि झगड़ों, स्वास्थ्य समस्याओं समेत बेवजह धन और ऊर्जा का अपव्यय भी करवाता है। अत: घर में कभी फालतू चीजें नहीं रखें, सामान को बिखराकर नहीं रखें।

हमारी सनातन परंपरा में घर को आश्रम का दर्जा दिया गया है। गृहस्थी को साधना से कम नहीं माना गया है। जिस घर में साजो सामान व्यवस्थित हो, जो चीज जहां चाहिए, वहीं हो तो ऐसा व्यवस्थित घर सुख ही नहीं, बल्कि समृद्धि भी देता है जबकि अव्यवस्थित घर न केवल परेशानियां देता है बल्कि झगड़ों, सिरदर्द, बेवजह दिक्कतों के साथ-साथ धन और ऊर्जा का अपव्यय भी करवाता है।

वास्तुशास्त्र वस्तुत: गृह-निर्माण में संतुलन पर सर्वाधिक जोर देता है। निर्माण के समय दिशा, काल और स्थान के अनुसार जो चीज जहां पर होनी चाहिए, तद्नुसार ही नियमों का निर्देश किया गया है। घर से बड़ा कोई स्वर्ग नहीं, ऋषि-मुनि ही नहीं, देवता तक गृहस्थ के आश्रित कहे गए हैं। गृहस्थ को यह निर्देश है कि वह परिवार में स्थान, वस्तुओं के संतुलन के साथ ही वैचारिक समरसता भी बनाए रखें।

वास्तुमंडनम् के दूषणभूषणाध्याय में गृह और गृहस्थी के नियमों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया है कि घर में कभी फालतू चीजें नहीं रखें, सामान को बिखराकर नहीं रखें। रसोई के बर्तनों से लेकर पुस्तकों, बनाव-श्रंगार के सामान, कांच, कंघी तक को व्यवस्थित रखें। इनके बिखरे होने पर संपत्ति का क्षय होता है। जिस घर में महिलाओं के केश उड़ते रहते हैं, वहां मर्यादा का उल्लंघन होता और लक्ष्मी रुष्ट हो जाती है।

जहां बार-बार नमक बिखरता हो, वहां परस्पर विवाद होते हैं और बच्चे आपस में भिड़ते हैं, पति-पत्नी में विवाद होता है। जहां बर्तन बेतरतीब पड़े रहते हैं, वहां झगड़े अधिक होते हैं। जिस घर में नियमित बिल-छिद्रों का भरण नहीं होता और चूहे-चींटियां निकलते हों, उस घर से संपदा का क्षरण होता है और बच्चों पर संकट आता है। यदि घर की सुंदरता पर ध्यान दिया जाए तो लक्ष्मी को मनाया जा सकता है। इस कार्य में महिलाओं की भागीदारी की बात महाभारत के अनुशासन पर्व में भी आई है-
प्रकीर्ण भांडामनवेक्ष्य कारिणीं सदा च भतरु: प्रतिकूल वादिनीम्। परस्य वेश्माभिरतामलज्जामेवं विधा ता परिवर्जयामि।

फेंगशुई में भी ऐसी अव्यवस्थाओं को नकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने वाली कहा गया है। साथ ही सकारात्मक विचारों के लिए घर को नियमित और पूरी तरह व्यवस्थित करने पर जोर दिया जाता है, मूलत: यह विचार भारतीय आदर्श से प्रेरित है। इसीलिए हमारे यहां पर्व-त्योहार आदि के आगमन के मद्देनजर सर्वप्रथम घर की साज-संभाल करने का विचार निहित है। वस्तुत: यह नियमित होना चाहिए। इसमें सुख और समृद्धि का गहरा राज छिपा है।


डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू'

ज्योतिषियों की सलाह पर चलती जिंदगी

साइंस और टैक्नोलॉजी के इस युग में भी छोटे से लेकर बड़े-बड़े निर्णय ज्योतिषियों से पूछ कर ही लिए जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी कॉपरेरेट कंपनियां नए ऑफिस के लिए जगह खरीदने से पहले, भूमि-पूजन, बिल्डिंग का निर्माण, नए ऑफिस में शिफ्ट होने से पहले ज्योतिषियों और वास्तु विशेषज्ञों की राय लेना नहीं भूलतीं। ऑफिस का कलर कंबीनेशन, फर्नीचर, बॉस के बैठने की जगह आदि सबकुछ वास्तु विशेषज्ञ और ज्योतिषि ही तय करते हैं।

टेस्ट और फैशन की दुनिया में भी ज्योतिषियों की घुसपैठ है। यही नहीं कुछ लोग रोगों का निवारण भी ज्योतिषि की सलाह पर कर रहे हैं। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने खान-पान और सेहत की तरफ प्रॉपर ध्यान नहीं दे पाते। यही कारण है कि उनका विश्वास ज्योतिषियों पर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

लोगों की ड्रैस तक ज्योतिषि तय कर रहे हैं। हर न्यूज चैनल से लेकर अखबारों में पंडितों की राय के न्यूज पैकेज दिए जा रहे हैं। इसमें राशियों के हिसाब से इंसान की पसंद के खान-पान, ड्रैस, रंग और कई ऑस्पैक्ट बताए जा रहे हैं। इंटरव्यू और एग्जाम के लिए ड्रैस भी ज्योतिषि डिसाइड कर रहे हैं।

राशि के हिसाब से खरीदें ड्रैस
मुंबई का लाइफ स्टाइल चेने स्टोर्स एक ऐसा बुकलेट तैयार कर रहा है, जिसमें लोगों की राशि के हिसाब से ड्रैस कलर दिए गए हैं। इसमें 27 डिजाइनर, ज्योतिषियों से सलाह-मशवरा करके ड्रैसेज तैयार कर रहे हैं। पंडित विनय जेतली का कहना है कि मीन राशि के लोगों को पीले, सफेद और लाल रंग के परिधान पहननें चाहिए। वहीं वृश्चिक राशि के लोगों के लिए लाल और पीले परिधान सेहत के लिए बिलकुल ठीक रहेंगे।

सिंह राशि के लोग नारंगी, पीले और गेहूं रंग के परिधान धारण करे, तो ये उनकी सेहत और स्वभाव का भी ध्यान रखते हैं। इसी तरह हर राशि के लोगों के लिए अलग-अलग परिधानों को पहनने से उनकी नकारात्मक किरणों का प्रभाव कम रहता है और पॉजीटिव एनर्जी मिलती है।

पार्टनर का चुनाव राशि के आधार पर
ज्योतिषि परषोतम साहनी ने बताया कि आजकल बिजनेस पार्टनर का चुनाव भी राशि के आधार पर किया जा रहा है। बिजनेस शुरू करने से पहले वे इस बात का पता करते हैं कि किस राशि से संबंधित व्यक्ति से उनमें आपसी तालमेल के साथ बिजनेस में मुनाफा होगा।

विदेश जाने से पहले लेते हैं सलाह
पंडित लक्ष्मी नारायण का कहना है कि विदेश में सेट होने और बिना रुकावट विदेश पहुंचने के लिए लोग पहले उनसे सलाह लेते हैं कि ग्रह-नक्षत्रों के हिसाब से वह किस दिन और किस समय घर से निकलें, ताकि कारोबार के साथ-साथ उनकी विदेश यात्रा भी सफल रहे। पंडित विजय कुमार भोला ने बताया कि उनके पास ऐसे बहुत से लोग आते हैं जो अपने करियर और जॉब को लेकर सलाह लेते हैं। इनमें कई बड़े स्तर के अधिकारी भी शामिल हैं।

मैडिकल एस्ट्रोलॉजी से बीमारी दूर
मैडिकल एस्ट्रोलॉजर रचना शर्मा ने बताया कि 15 साल से मैडिकल एस्ट्रोलॉजी करते हुए उन्होंने कई लोगों को ठीक किया है। उन्होनें बताया कि दिल की नसें ब्लॉक होने वालों को सनेबहराव पहनना चाहिए। जिन लोगों का ब्लड प्रैशर लो है, उन्हें तांबे का कड़ा पहनना चाहिए, किडनी की बीमारी वालों को दाना फिंरग चांदी में डालकर पहनने से काफी आराम मिलेगा। अस्थमा के पेशेंट्स को सुच्चा मोती और पन्ना पहनना चाहिए।

अल्सर ठीक हो गया
अमित ने बताया कि उन्हें अल्सर था। मैडिकल एस्ट्रोलॉजर की सलाह पर उन्होंने सफेद मूंगा और सुच्चे मोती को धारण किया, जिससे उन्हें काफी आराम मिला। अब वह बिलकुल ठीक हैं।

हाउस वाइफ अनीता ने बताया कि उनकी एक फ्रैंड ने जब उन्हें बताया कि राशि के हिसाब से आजकल ज्योतिषि ड्रैस कलर का सुझाव देते हैं, तो उन्होंने भी काफी समय से ज्योतिषि की सलाह पर ही ड्रैस कलर चूज करना शुरू किया। इससे उन्हें काफी फायदा भी मिला है।

Tuesday, January 12, 2010

नाम करेगा रोशन जग में राजदुलारा

प्रतिस्पर्धा के दौर में हर माता-पिता का सपना है कि उनकी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर उनका नाम रोशन करे। परीक्षाफल आने के बाद उचित विषयों का चयन करना माता-पिता तथा बच्चों के सामने एक चुनौती होती है। इसके लिए वे शिक्षा विशेषज्ञ तथा ज्योतिषियों से परामर्श भी लेते हैं क्योंकि उचित विषयों का चयन ही बच्चे के भविष्य का निर्णायक होता है।

जन्मकुंडली में शिक्षा प्राप्ति के लिए कारक भाव, द्वितीय भाव व तृतीय भाव - प्रारंभिक शिक्षा, चतुर्थ व पंचम भाव - स्कूल व कालेज शिक्षा तथा पंचम से पंचम नवम भाव जातक की उच्च शिक्षा को बतलाता है। पंचम भाव जातक के मस्तिष्क विकास को भी दर्शाता है। अत: पंचम भाव का बलवान होना जातक की शिक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पंचम से पंचम, नवम भाव जातक के भाग्य का भाव भी है, यदि नवम भाव बलवान है और उसका संबंध चतुर्थ, पंचम व लग्न से हो जाए तो जातक प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिभावान होता है। प्रतिभा के लिए पंचम, नवम, पंचमेश व नवमेश का बलवान होना आवश्यक है। इसी प्रकार विद्या प्राप्ति के कारक ग्रह गुरु -बुद्धि, विवेक, बुध-स्मरण शक्ति तथा चंद्रमा - मन, एकाग्रता के लिए है।

चंद्रमा का पक्ष बलवान होना, शुभ स्थान पर स्थित होना तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट होना एकाग्रता के लिए अति आवश्यक है। दूसरी आवश्यकता है स्मरण शक्ति की। स्मरण शक्ति के लिए बुध की केंद्र में स्थिति तथा शुभ ग्रहों से युति व दृष्टि होनी चाहिए। तीसरी आवश्यकता है बुद्धि व विवेक की। इसके कारक बृहस्पति के बलवान रहने पर जातक उच्च शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता रखता है।

बुध, गुरु, शुक्र यदि केंद्र और त्रिकोण भाव में रहकर परस्पर दृष्टि, युति करे तथा गुरु बलवान हो तो सरस्वती योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धिमान, कार्यकुशल व श्रेष्ठ विद्वान बनाता है। बुध व सूर्य की केंद्र या त्रिकोण में युति, बुध अस्त नहीं होने चाहिए, इससे बना बुध आदित्य योग जातक की प्रखर बुद्धि व विद्या के लिए उत्तम है। यदि पंचमेश तथा षष्ठेश एक दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में तथा शुभ भाव में स्थित हो तो शंख योग का निर्माण होता है जो जातक को उत्तम विद्या प्रदान करता है।

चंद्र से त्रिकोण भाव में गुरु, बुध से त्रिकोण भाव में मंगल तथा बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारदा लक्ष्मी योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धि और विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा धन-वैभव की स्वामिनी लक्ष्मी देवी दोनों की कृपा का पात्र बनाता है।

गुरु, द्वितीय या पंचम भाव में बुध या शुक्र की राशि में बैठा हो और बुध या गुरु से दृष्टि या युति संबंध करें तो कलानिधि योग का निर्माण होता है। यह योग जातक को धनी व उत्तम कलाकार बनाता है। शिक्षा के विभिन्न विषयों के कारकत्व अलग-अलग ग्रहों को प्राप्त है।

सूर्य
अध्यात्म, दार्शनिक शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, नेत्र रोग, कुष्ठ रोग, शल्य चिकित्सा आदि से संबंधित विषयों का कारक है।
चंद्रमा
औषधि, मनोविज्ञान, जलीय पदार्थ, नेवी आदि।
मंगल

शल्य चिकित्सा, कृषि, भवन निर्माण, यांत्रिक शिक्षा, खेलकूद, अपराध विज्ञान आदि।
बुध
तर्क-वितर्क, शिल्प, व्यापार कौशल, शिक्षक, बहीखाते लिखना आदि।
बृहस्पति
साहित्य, कानूनी सलाहकार, वित्त व्यवस्था, अध्यापन, धार्मिक कार्य, अर्थशास्त्र, संतान कारक होने के कारण बालरोग विशेषज्ञ।
शुक्र
संगीत, नाटक, अभिनय, रूप सज्जा, नृत्य, कला आदि।
शनि
इतिहास, पुरातत्व, राजनीति, मशीन संबंधी ज्ञान को दर्शाता है।
राहू
इलेक्ट्रानिक्स, अनुसंधान संक्रमणरोही आदि।

मंगल, शनि, राहू, केतु का द्वितीय, चतुर्थ या पंचम भाव से दृष्टि युति संबंध तकनीकी क्षेत्र में शिक्षा दिलवाता है। पंचम और नवम भाव का परस्पर संबंध अध्यात्म व दर्शनशास्त्र में रुचि देता है क्योंकि पंचम भाव देव भक्ति व मंत्र है तथा नवम भाव धार्मिक आस्था, सत्यनिष्ठा तथा प्रारब्ध दर्शाता है।

बुध या गुरु का संबंध द्वितीय, चतुर्थ, पंचम भाव या इनके स्वामी ग्रह से हो तो जातक वाणिज्य व्यापार की शिक्षा पाता है। चंद्रमा या शुक्र यदि 2, 4, 5 भाव या भावेश से दृष्टि युति करे तो जातक कला संबंधी विषयों में रुचि लेता है। पंचम भाव में स्थित गुरु कानूनी शिक्षा दिलवाता है।

अष्टमेश और तृतीयेश की युति हो तथा दोनों बलवान हो तो ऐसा जातक अनुसंधान व शोधपरक अध्ययन में रुचि लेता है। द्वितीय भाव या द्वितीयेश से बुध, गुरु, शुक्र या इनमें से किन्हीं दो का दृष्टि युति संबंध जातक को वकील या न्यायाधीश बनाता है।

द्वितीय भाव या द्वितीयेश पर सूर्य, राहु, शनि और बुध में किन्हीं तीन ग्रहों का दृष्टि युति प्रभाव डाक्टर, वैद्य अथवा औषधि विज्ञान से धन व यश देता है। तृतीय व दशम भाव का शुक्र से संबंध बहुधा कम्प्यूटर प्रोग्रामर बनाता है।


कविता चैतन्य

Monday, January 11, 2010

धर्म से ज्योतिष तक पूज्य नाग

सूर्य, गौ, वृक्ष, नदी की तरह सर्प भी प्रत्यक्ष देवता हैं। प्राय: बाकी देवता जिनकी परिकल्पना हमारे शास्त्रों ने की है उनका स्वरूप कल्पित है किंतु सर्प साक्षात दर्शन देते हैं। जल की भांति सर्प की उपस्थिति धरती से आकाश तक स्वीकारी गई है। संभवत: पूरी सृष्टि पर एकमात्र सर्प ही हैं जो जल, थल, वृक्ष, झाड़ियों, पहाड़ों, बर्फ, बिल, खेत आदि हर स्थान पर अपना अस्तित्व सिद्ध करते हैं। इतिहास में नाग राजाओं का उल्लेख है तो पुराणों में नाग कन्याओं से कई नायकों-प्रतिनायकों के विवाह या प्रेम संबंधों की चर्चा आती है। नागों का लोक पाताल माना गया है।

इतिहास और पुराण सहित धर्म की सभी धाराओं तथा ज्ञान की शाखाओं में सर्प की चर्चा किसी न किसी रूप में उपलब्ध है जो सर्पो की चिरकालिकता को प्रदर्शित करती है। यही कारण है कि सर्प प्रारंभ से पूजनीय माने गए हैं और उनकी पूजा के निमित्त भारतीय मनीषा में श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन निश्चित किया गया है। पौराणिक, ऐतिहासिक संदर्भो के साथ सर्प के रहस्यमय शारीरिक स्वरूप और उसकी विषधारी वृत्ति ने कालांतर में कई लौकिक-अलौकिक, रहस्य-इंद्रजाल से भरी कथाओं को जन्म दिया और लोकमानस में सर्प के प्रति एक अजीब से भय को भी स्थापित कर दिया। परिणाम यह कि आज भी सर्प हमारे लिए भय, आश्चर्य और रहस्य का केंद्र बने हुए हैं। इसीलिए धर्मालु भारतीय सर्प की पूजा कर उसके संभावित क्रोध से मुक्ति के उपाय खोजते हैं।

श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में सर्प की पूजा के पीछे हमारी अर्थव्यवस्था का दर्शन भी जुड़ा हुआ है। ये दिन बारिश के होते हैं और इसी दौरान खेतों में काम चलता है। आषाढ़ की रिमझिम वर्षा धरती को भिगों पाती है लेकिन जब श्रावण में वर्षा अपना रंग दिखाती है और सर्प के बिल पानी से भर जाते हैं तब सर्प बिल से निकलकर खेतों में आ जाते हैं। तब हमारे सामने दो विकल्प होते हैं - भयभीत होकर सर्प को मार दिया जाए या बड़ी होती फसल की कीटों-चूहों से रक्षा के लिए उसे पर्यावरण का एक अभिन्न अंग स्वीकार कर छोड़ दिया जाए। भारतीय दूसरा विकल्प स्वीकारते हैं और सर्प की पूजा कर उसे अपना मित्र बना लेते हैं। इसीलिए इन्हीं दिनों सर्प की पूजा पंचमी के बहाने की जाती है।

जहां तक ज्योतिष का प्रश्न है, सर्प यहां भी उपस्थित हैं। नवग्रहों में राहु के दोष से पीड़ित सर्प का पूजन करते हैं। ज्योतिष कहता है कि हर ग्रह के दो देवता होते हैं। उदाहरणार्थ सूर्य के अधिदेवता ईश्वर हैं और प्रतिदेवता अग्नि। ठीक इसी तरह राहु के अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प माने गए हैं। यही कारण है कि जिन लोगों की कुंडली में राहु के दोष होता है उन्हें अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प की पूजा कर कालसर्प दोष को दूर करने का उपाय करना पड़ता है। राहु दोष में जिस कालसर्पदोष की चर्चा है उसका आशय है कि यदि वह दोष है तो मनुष्य का स्वभाव चंचल हो जाता है। यानी उसके कार्य विघ्न वाले होते हैं और उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। तब सर्पदोष के निदान के लिए सर्प के उपाय सुगंधित श्वेत वस्तुएं और नैवेद्य चढ़ाकर दोष का शमन करने की परंपरा है।

कहते हैं यदि किसी की कुंडली में कोई दोष हो तो उसे साक्षात ब्रrा भी दूर नहीं कर सकते, किंतु उपायों के माध्यम से उसका शमन अवश्य किया जा सकता है। आशय है कि ज्योतिष में सर्प है। राहु के साथ भी और नक्षत्रों के संदर्भ में भी। 27 नक्षत्रों में अश्लेषा नक्षत्र के देवता के रूप में भी सर्प उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अश्लेषा का स्वामी सर्प ही माना गया है। ठीक इसी तरह बारिश के दिनों में सूर्य जब रोहिणी से हस्त नक्षत्र के बीच गमन करता है तो इन नक्षत्रों में एक का वाहन सर्प भी होता है और इन्हीं वाहनों से ज्योतिषी वर्षा का होना, न होना, कम या ज्यादा होना आदि का आकलन करते हैं।

इतिहास, पुराण, वास्तु, धर्म, ज्योतिष आदि के संदर्भ भले किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के साथ सर्प के स्वरूप, स्वभाव पर फोकस न करें, लेकिन नागपंचमी को सर्पपूजन की परंपरा उसके प्रति आस्था और उसे अपने प्राकृतिक मित्र समझने की परंपरा के पीछे ठोस आधार अवश्य हैं और वह यह कि सर्प भी इस सृष्टि की प्राणी हैं और सृष्टि के सौदंर्य का अंग। हम लाठी उठाएं तो वह शत्रु हैं और शीश झुकाए तो मित्र, देवता। बेहतर होगा हम उसे मित्र मानकर देवता के आसन पर ही रखकर पूजे।


विवेक चौरसिया

मकर संक्रांति : करें सूर्य उपासना

हिंदू पौराणिक शास्त्रों में ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों के बीच संबंधों का व्यापक उल्लेख मिलता है। ग्रहों के आपसी संबंध का असर इंसान पर भी स्पष्ट रूप से होता है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने व्यापक जनहित में त्योहार और पर्व विशेष पर पूजा और दान आदि परंपराओं की व्यवस्था की जिससे आमजन ग्रहों के गोचर में होने वाले परिवर्तनों के कारण उससे होने वाले संभावित नुकसान से बच सकें।

मकर संक्रांति के अवसर पर किए जाने वाले दान-पुण्य की व्यवस्था के पीछे भी यही दूरदृष्टि है। पौराणिक कथाओं में सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है। सूर्य के बगैर इस जगत में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पृथ्वीवासियों के लिए सूर्य ही एकमात्र प्रत्यक्ष देव हैं। इसीलिए सभी धर्मो के अनुयायी किसी न किसी रूप में सूर्य की पूजा करते हैं।



स्कंदपुराण के काशी खंड में वर्णित प्रसंग के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा सूर्य की गर्मी को सहन नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने इससे बचने के लिए अपने तप से अपने ही रूप-रंग और शक्ल की स्त्री छाया बनाई और उससे प्रार्थना की कि वह सूर्य के साथ रहे और सूर्य को यह भेद न दे कि संज्ञा सूर्य से दूर है और छाया संज्ञा की हमशक्ल है। छाया से सूर्य को दो पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुए। उनमें से एक शनि हैं।



शनि महात्म्य के अनुसार शनि का जन्म होते ही उनकी दृष्टि पिता सूर्य पर पड़ी। परिणामस्वरूप तत्काल ही सूर्य कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। उनका सारथी अरुण पंगु हुआ और उनके घोड़े अंधे हो गए। इस प्रकार सूर्य ने महसूस किया कि शनि की दृष्टि महाविनाशकारी है। सूर्य ने अपने गुणों और अपने पुत्र शनि के गुणों की तुलना की और महसूस किया कि कुछ गड़बड़ है। सूर्य ने छाया को प्रताड़ित किया।



यह शनि को सहन नहीं हुआ और शनि सूर्य के परम शत्रु हो गए। यद्यपि सूर्य शनि से बैर भाव नहीं रखते हैं। पिता सूर्य से बदला लेने के लिए शनि ने शिवजी को अपना गुरु बनाया और उनकी तपस्या कर किसी का भी अनिष्ट करने की शक्ति का वरदान प्राप्त कर लिया। भगवान शिव ने शनि की भक्ति से प्रसन्न होकर शनि को न्यायाधीश बनाया और वरदान दिया कि शनि व्यक्ति के कर्मो के अनुसार अच्छे कर्मो के लिए व्यक्ति की उन्नति करेंगे और बुरे कर्मो के लिए उसे प्रताड़ित भी कराएंगे।



ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य वर्षर्पयत मेष से लेकर मीन तक एक-एक माह की अवधि के लिए सभी राशियों में भ्रमण करते हैं। १४ अथवा १५ जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर और कुंभ राशियां सूर्य के पुत्र शनि की राशियां हैं और शनि सूर्य से बैर रखता है।



दुश्मन की राशि मकर में सूर्य के प्रवेश करने और अगले दो महीनों के लिए शनि की मकर और कुंभ राशियों में सूर्य के रहने से और पिता-पुत्र में बैर भाव स्थिति से पृथ्वीवासियों पर किसी प्रकार का कुप्रभाव न पड़े, इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने तीर्थ स्नान, दान और धार्मिक कर्मकांड के उपाय सुझाए हैं। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डुओं का उपयोग करने और उसके दान के पीछे भी यही मंशा है।



ज्योतिष के अनुसार तेल शनि का और गुड़ सूर्य का खाद्य पदार्थ है। तिल तेल की जननी है, यही कारण है कि शनि और सूर्य को प्रसन्न करने के लिए इस दिन लोग तिल-गुड़ के व्यंजनों का सेवन करते हैं। तीर्थो पर स्नान और दान-पुण्य की व्यवस्था भी इसी उद्देश्य से रखी गई है कि पिता-पुत्र के बैर भाव से इस जगत के निवासियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े और भगवान उसे किसी भी बुरी स्थिति से बचाएं।



सूर्य राज, सम्मान और पिता का कारक ग्रह हैं और शनि न्याय और प्रजा का कारक है। जन्म पत्रिका में सूर्य शनि की युति अथवा दृष्टि संबंध से ही पितृ दोष उत्पन्न होता है। लकवा और सिरदर्द जैसे रोगों से पीड़ित लोगों के लिए इस दिन दान-पुण्य वरदान माना गया है। ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव के आधार पर यह व्यवस्थाएं आमजन के लिए प्रतिपादित की हैं। उन्होंने ग्रहों के प्रकोप और उनकी शांति के उपाय भी बताए हैं।



मकर संक्रांति के दिन से लोग मलमास के बंधन से मुक्त हो जाएंगे। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यो के लिए लोगों को इस दिन का बेताबी से इंतजार रहता है। ज्योतिष शास्त्र में मलमास के दौरान शुभ कार्य अनिष्ट कारक माने जाते हैं। मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं।


पं. केके शर्मा

वर्ष भर सुख-समृद्धि के कुछ उपाय

नववर्ष में सभी सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। ज्योतिष के मुताबिक धनेश का छठे, आठवें, बारहवें भाव में स्थित होना धन बाधा योग का निर्माण करता है। कुछ छोटे-छोटे उपाय अपनाकर इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है। वर्ष भर आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहे इसलिए कुछ उपाय दिए जा रहे हैं, जो छोटे होते हुए बड़े काम के साबित होंगे।


मेष


मंगलवार के दिन लाल चंदन, लाल गुलाब के दो फूल, रोली का पैकेट लाल कपड़े में बांधें। प्रणाम करें और धूप-दीप दिखाकर तिजोरी में रख दें, इससे धन वृद्धि होगी।
चांदी का ‘श्री’ बनवाकर उसके चारों ओर सफेद तथा नीले जरकन जड़वा कर लॉकेट बनवाएं। शुद्ध कर शुक्रवार को श्रीमंत्र की तीन माला जाप के बाद गले में धारण करें।
श्रीगणोश यंत्र घर के पूजन स्थल पर रखकर नित्य दर्शन व पूजन करें। ओम गं गणपतये नम: का मूंगे की माला से तीन माला जाप करें, वर्ष भर दौलत कदम चूमेगी।


वृष


सोने या चांदी में श्री बनवा लें। हरा ऑनेक्स लगवाकर शुक्रवार को गले में धारण करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
कमलगट्टे की माला पर श्रीयंत्र घर में स्थापित करें।
ओम गोपालाय उत्तरध्वजाय नम: का एक माला जाप करें। हरे रंग का रूमाल अपने पास रखें। गाय को प्रतिदिन तेल लगी रोटी दें।
वट वृक्ष के पत्ते पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। उस पर साबुत चावल व एक सुपारी रखकर माता लक्ष्मी के मंदिर में चढ़ा दें। इस उपाय से आर्थिक समृद्धि प्राप्त होगी।


मिथुन


धनदा यंत्र घर में स्थापित कर नित्य दर्शन करें तो आशातीत लाभ होगा।
भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर या मूर्ति के सम्मुख ú क्लीं कृष्णाय नम: का एक माला जाप तुलसी की माला से प्रतिदिन करें।
चांदी के पतरे पर चंद्र यंत्र तथा मंगल यंत्र बनवाकर क्रमश: मोती व मूंगा लगवाकर घर के मंदिर में बुधवार को स्थापित करें। जिनके ऊपर ऋण हो वह इस यंत्र के आगे ऋण्हर्ता मंगल स्तोत्र का पाठ करेंगे तो ऋण उतरने लगेगा।
पक्षियों को गुड़ के साथ सतनाजा डालें।


कर्क


चांदी की दो गायों की किसी विद्वान से प्राण प्रतिष्ठित कराकर एक गाय विद्वान को दक्षिणा सहित दान दें। दूसरी गाय कामधेनु दैव्ये की तरह घर के पूजन स्थल में रख कर नित्य दर्शन व पूजन करें, जो मांगेंगे वही प्राप्त होगा।
शिवयंत्र को घर के पूजन स्थल पर स्थापित करें व प्रतिदिन ú नम: शिवाय का एक रुद्राक्ष माला जप करें।
सुबह आजीविका संबंधी कार्य से पहले ú हिरण्यगर्भाय अव्यक्त रूपिणो नम: का मोती की माला से जाप करें।
ग्यारह रविवार दोपहर दही-भात का भोग लगाकर खाएं।


सिंह


दुर्गा मां की तस्वीर के आगे देवी के 108 नामों का नित्य स्मरण करें। यह कार्य वर्ष भर करें।
हरे गणपति (हकीक या ऑनेक्स के बने) घर के पूजन स्थल में स्थापित करें। ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र का पाठ करें। यदि ऋण है तो जल्द ही ऋण मुक्त हो जाएंगे।
ओम हीं घृणि सूर्य आदित्य श्री का नित्य सूर्य उदय के समय तीन माला जाप लाल चंदन की माला से करें।
मां लक्ष्मी को प्रतिदिन लाल पुष्प अर्पित करें। दूध से निर्मित नैवेद्य का भोग लगाएं। धन लाभ होगा।


कन्या


कूर्म पृष्ठ पर बने श्रीयंत्र या महालक्ष्मी यंत्र को घर के पूजा स्थल में स्थापित करें। श्री सूक्त का पाठ करें।
चांदी के पतरे पर गुरुमंत्र पर सुनहला लगवा कर शुद्ध करें। बुधवार को धूप-दीप दिखा कर गले में धारण करें।
सफेद गुंजा को लक्ष्मी मंत्रों से अभिमंत्रित कर चांदी की डिबिया में शहद में डुबो कर पूजा स्थल या तिजोरी में रखें।
तीन गोमती चक्र, तीन पीली कौड़ियां तथा तीन हल्दी की गांठें पीले कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें। घर में धन वृद्धि व बरकत होगी।


तुला


श्रीलक्ष्मी सिद्ध यंत्र घर में स्थापित करें। रोज दर्शन कर ú लक्ष्मीनारायणाय नम: का स्फटिक माला से जाप करें।
यदि अचानक धनहानि होती हो, तो किसी भी मंदिर में कम से कम 40 शनि व सरस्वती चालीसा रखवाएं।
गरीब सुहागिन स्त्री को अपनी पत्नी के द्वारा सुहाग सामग्री दिलवाएं। सामग्री में कोई भी इत्र अवश्य रखें।
महीने में एक बार मिट्टी के कुल्हड़ में मशरूम भरकर किसी भी धार्मिक स्थान में रख आएं। मिट्टी के कुल्हड़ पर मिट्टी का ढक्कन अवश्य लगाएं।


वृश्चिक


श्रीहनुमान जी का यंत्र स्थापित कर नित्य पूजन-दर्शन करें।
धनदा यंत्र भी स्थापित कर नित्य दर्शन करें। ú नमो नारायणाय का तीन माला जाप चमत्कार से कम नहीं रहेगा।
इष्टदेव का स्मरण कर केसर का तिलक प्रतिदिन नाभि, कंठ व माथे पर लगाएं।
छह-छह ग्राम की चार ठोस चांदी की गोलियां सफेद कपड़े में लपेटकर हमेशा पास रखें। इससे समृद्धि के साथ-साथ शांति भी बनी रहेगी।


धनु


लाजवर्त नग को चांदी की अंगूठी में जड़वा श्रीमंत्र के जाप के साथ शुक्रवार को मध्यमा अंगुली में धारण करें।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप स्फटिक माला से करें।
अशोक के वृक्ष की जड़ का पूजन कर तिजोरी में रखें। धन-संपत्ति की प्रचुरता वर्ष भर बनी रहेगी।
धन-संपदा के लिए तिजोरी के नीचे या तिजोरी के अंदर काली गुंजा के ग्यारह दाने रखें। नववर्ष के विशेष मुहूर्त में यह उपाय अवश्य करें।


मकर


सात पीपल के पत्ते लेकर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। फिर कलावे से एक साथ सारे पत्तों को लपेटकर वीरान स्थान पर फेंक दें। आर्थिक संकट दूर हो जाएगा।
कुत्ते को पंद्रह दिन तक प्रतिदिन दूध पिलाएं। इन्हीं पंद्रह दिनों में मंदिर में भी दूध का दान दें।
प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं व रविवार को गाय को गुड़ खिलाएं।
घर में समृद्धि पोटली लगाएं। लाल रंग का रिबन, तांबे के सिक्के के साथ मुख्य द्वार पर बांधें।


कुंभ


सोने का गुरुयंत्र शुद्ध करके शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को गले में धारण करें। साथ ही चांदी की गाय घर के मंदिर में स्थापित करें व नित्य नियम से दर्शन करें।
ओम श्री उपेन्द्राय अच्युताय नम: का रुद्राक्ष की एक माला से नित्य जाप करें। धन की कोई समस्या नहीं रहेगी।
पंडितजी से पूर्णिमा को घर में सत्यनारायण कथा कराएं, उन्हें पांच वस्त्र, पांच फल, पांच मिठाई दक्षिणा सहित दें व आशीर्वाद पाएं।
कार्य सिद्धि यंत्र घर में स्थापित करें।


मीन


नववर्ष में मूंगे के गणपति स्थापित करें। ú एकदन्ताय विद्यमहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात मंत्र का जाप मूंगे की माला से नियमित करें।
मत्स्य यंत्र अवश्य स्थापित करें। नित्य विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, धन की कमी नहीं होगी।
ड्रॉईंग रूम में उत्तर या पूर्व दिशा में एक्वेरियम रखें।
काली मिर्च के 5 दाने अपने सिर से 7 बार उतारकर 4 दाने चारों दिशाओं में फेंक दें तथा पांचवे दाने को आकाश की ओर उछाल दें। इससे आकस्मिक धन लाभ होगा।