Wednesday, March 31, 2010

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Saturday, March 27, 2010

घर बनाते समय सावधानियां:

आपके घर के आसपास अगर प्राकृतिक रूप से पेड़ उग जाएं अथवा पेड़ों की छाया घर पर पड़े, तो उनका प्रभाव आपके जीवन पर क्या हो सकता है, इसका विश्लेषण भी वास्तु शास्त्र में बहुत अच्छी तरह से किया गया है, जैसे- घर के आगे और पीछे वाले हिस्से में कांटे वाले पेड़ या फिर दूध वाले कैक्टस के पेड़ लगाने से शत्रु का भय और धन का नाश होता है और अगर किसी फलहीन पेड़ की छाया आपके घर पर दोपहर बाद पड़े, तो रोग और अचानक कष्टों का सामना करना पड़ता है।

आइए, एक नजर डालते हैं घर की अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग पेड़ों के होने वाले प्रभाव पर:

घर की पूर्व दिशा :
अगर आपके घर की पूर्व दिशा में पीपल का पेड़ लगा हो, तो इससे घर में भय और निर्धनता व्याप्त हो सकती है।
घर के पूर्व दिशा में बरगद का पेड़ सभी मनोकामना पूरी करता है।
घर के अग्निकोण में अनार का पेड़ शुभ फल देता है, लेकिन इस दिशा में वट, पीपल, पाकड़ और गूलर का पेड़ अगर हो तो पीड़ादायक और मृत्युतुल्य कष्ट देता है।
घर की दक्षिण दिशा में पाकड़ और कांटेदार पेड़ होने से घर में रोग पनपते है और मुकदमे में हार होती है।


घर की दक्षिण दिशा
घर की दक्षिण दिशा में गूलर का पेड़ शुभ फलदायक होता है।
वहीँ, घर के पिछवाड़े या दक्षिण की ओर फलदार वृक्ष शुभ होते हैं।


पश्चिम दिशा:
घर की पश्चिम दिशा में आम और वट वृक्ष होने से सरकारी मुकदमे, घर की औरतों को तकलीफ, बच्चों को तकलीफ और चोरों द्वारा धन नाश का भय होता है।



घर की उत्तरी दिशा :
घर के उत्तर में गूलर और नींबू का पेड़ आंखों की बीमारी देता है। और पूर्व और उत्तर दिशा में फलदार पेड़ लगाने से संतान पीड़ा या बुद्धि का नाश होता है।


तुलसी का पौधा:
तुलसी का पौधा हमेशा घर के पूर्व या उत्तर दिशा की ओर ही लगाना चाहिए। घर के दक्षिण में तुलसी कठोर यातना और कारागार का भय देती है।



फर्नीचर के लिए लकड़ी:
हमें घर का निर्माण करते समय किस प्रकार की लकड़ी घर के फर्नीचर आदि में लगानी चाहिए, इसका उल्लेख आचार्य वराह मिहिर ने अपनी पुस्तक 'वराही संहिता' में किया है। उन्होंने लिखा है कि श्मशान के आसपास लगे पेड़, मेन रोड के आसपास लगे पेड़, देव मंदिर में लगे वृक्ष, दीमक या बिजली गिरने से कटे हुए पेड़, आंधी से उखड़े हुए वृक्ष और साधु-संतों के आश्रम में लगे हुए पेड़ काटकर कभी भी घर का फर्नीचर, दरवाजे और खिड़कियां आदि नहीं बनाने चाहिए।



अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाये तो बहुत सी मुश्किलों से बचा जा सकता है।

Saturday, March 20, 2010

अध्ययन कक्ष हो वास्तु अनुरूप

वार्षिक परीक्षाओं की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। ऐसे में विद्यार्थी अपने अध्ययन कक्ष को वास्तु अनुरूप बनाकर अच्छी सफलता हासिल कर सकते हैं। वास्तु नियम सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और पढ़ाई में रुचि को बढ़ावा देते हैं।

जीवन को सफल बनाने की दिशा में शिक्षा ही एक उच्च सोपान है, जो जीवन में अंधकार के बंधनों से मुक्ति दिलाने का सामथ्र्य रखती है। शिक्षा के बल पर ही मानव ने आकाश की ऊंचाइयों, समुद्र की गहराइयों, भू-गर्भ और ब्रहमांड में छिपे कई रहस्यों को खोज निकाला है। शिक्षा की अनिवार्यता प्राचीन ग्रंथों में भी मिलती हैं, जिनमें शिक्षा पर जोर देते हुए कहा गया है - माता बैरी पिता शत्रु येन बालों न पाठित:। न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये बको यथा।। अर्थात ऐसे माता-पिता बच्चों के शत्रु के समान हैं, जो उन्हें शिक्षित नहीं करते और वे विद्वानों के मध्य कभी सुशोभित नहीं होते।


शैक्षिक सफलता अध्ययन कक्ष की बनावट पर भी निर्भर करती है। वास्तु ऊर्जा भवन की आत्मा है, जिसके सहारे भवन में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन संवर उठता है चाहे वह अध्ययन का क्षेत्र हो या कोई अन्य। कई होनहार विद्यार्थी मेहनत के बाद भी अपेक्षित फल नहीं प्राप्त कर पाते तथा फेल होने के भय से आत्महत्या जैसे कदम उठाने लगते हैं।

ऐसे मामलों मे कहीं न कहीं नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव देखा जाता है, जिससे विद्यार्थियों के सामने कई विकट समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं जैसे-पढ़ने में रुचि न होना, मन का उलझना, अकारण चिंता, तनाव, असफलता का भय, आत्मग्लानि, मंद बुद्धि, स्मरण शक्ति का अभाव आदि। ऐसे में वास्तु नियमों के अनुरूप सुसज्जित अध्ययन कक्ष में सकारात्मक ऊर्जा की बयार बहती रहती है, जिससे विद्यार्थियों को अच्छी सफलता मिलती है।

सकारात्मक ऊर्जा के नियम

* उत्तर-पूर्व या पूर्व में अध्ययन कक्ष शुभ, प्रेरणाप्रद व पश्चिम में अशुभ और तनाव युक्त रहेगा।

* अध्ययन कक्ष के दरवाजे उत्तर-पूर्व में ही ज्यादा उत्तम माने गए हैं। दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में दरवाजे न रखें। इससे संदेह या भ्रम उत्पन्न होते हैं।

* पढ़ने की मेज चौकोर होनी चाहिए, जो अध्ययन शक्ति व एकाग्रता को बढ़ाती है। दो छोटे-बड़े पाएं, मोटे, टेढ़े व तिकोनी व कटावदार मेज का प्रयोग न करें।

* मेज को दरवाजे या दीवार से न सटाएं। दीवार से मेज का फासला कम से कम चौथाई फुट जरूरी है। इससे विषय याद रहेगा और पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी। लाइट के नीचे या उसकी छाया में मेज सेट न करें, इससे अध्ययन प्रभावित होगा।

* मेज के ऊपर अनावश्यक किताबें न रखें। लैंप को मेज के दक्षिणी कोने में रखें।

* उत्तर-पूर्व में मां सरस्वती, गणोशजी की प्रतिमा और हरे रंग की चित्राकृतियां लगाएं। अध्ययन कक्ष में शांति और सकारात्मक वातावरण होना चाहिए। शोरगुल आदि बिल्कुल भी न हो।

* स्मरण व निर्णय शक्ति के लिए दक्षिण में मेज सेट कर उत्तर या पूर्व की ओर मुंह करके अध्ययन करें। उत्तर-पूर्व दिशा विद्यार्थी को योग्य बनाने में सहायक होती है।

* ट्यूशन के दौरान विद्यार्थी का मुंह पूर्व दिशा में हो। इससे आपसी तालमेल व रुचि बनी रहेगी।

* अध्ययन कक्ष में भारी किताबें, फाइलें और सोफे को दक्षिण या पश्चिम में रखें। कंप्यूटर, म्यूजिक सिस्टम को दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें। अध्ययन कक्ष में टीवी कदापि न रखें।

* अध्ययन कक्ष के मध्य भाग को साफ व खाली रखें, जिससे ऊर्जा का संचार होता रहेगा।

* जिनका मन उचटता हो, उन्हें बगुले का चित्र लगाना चाहिए, जो ध्यान की मुद्रा में हो।

* लक्ष्य प्राप्ति हेतु एकलव्य या अजरुन की चित्राकृतियां लगानी चाहिए।

* मेज पर सफेद रंग की चादर बिछाएं। विद्या की देवी मां सरस्वती को प्रणाम कर अध्ययन शुरू करें। जिन विद्यार्थियों को अधिक नींद आती हो, उन्हें श्वान का चित्र लगाना चाहिए।

* दरवाजे के सामने या पीठ करके न बैठें।

* बीम के नीचे बैठकर न पढ़ें। अध्ययन कक्ष की दीवारों के रंग गहरे नहीं होने चाहिए। हरे, क्रीम, सफेद व हल्के गुलाबी रंग स्मरण शक्ति बढ़ाते हैं व एकाग्रता प्रदान करते हैं।

* अध्ययन कक्ष के पर्दे भी हल्के हरे रंग, विशेषकर हल्के पीले रंग के उत्तम माने जाते हैं।

* बिस्तर पर बैठकर न पढ़ें। कमरे में किताबों या अन्य वस्तुओं को अव्यवस्थित नहीं होना चाहिए।

* रात को सोते समय विद्यार्थी पूर्व की तरफ सिर करके सोएं। पूर्वी दीवारों पर उगते हुए सूर्य की फोटो लगाना उत्तम है।

* बेड के सामने वाली दीवार पर हरियाली वाली फोटो उत्तम मानी गई है।


उक्त वास्तु नियमों को अपनाकर प्रतिभाशाली व प्रखर बुद्धि वाले विद्यार्थी तैयार किए जा सकते हैं। विद्यार्थी अपने अध्ययन कक्ष को वास्तु अनुकूल बनाकर सफलता के सर्वोच्च शिखर को छूने का गौरव हासिल कर सकते हैं।

कैसे बनाएँ घर को वास्तु के अनुकूल?


घर केवल ईंट, चूने और पत्थर की आकृति वाले घरौंदे का नाम ही नहीं है। 'घर' का अर्थ उस स्थान से है जहाँ परिवार चैन-सुकून की तलाश करता है। यदि वास्तु को ध्यान में रखकर घर का निर्माण किया जाए तो वास्तुदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है।

वर्तमान के बदलते दौर में वास्तु का महत्व दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। आजकल कई बड़े-बड़े बिल्डर व इंटीरियर डेकोरेटर भी घर बनाते व सजाते समय वास्तु का विशेष ध्यान रखते हैं। वास्तु के अनुसार ही वे कमरे की बनावट, उनमें सामानों की साज-सज्जा करते हैं। इससे घर की खूबसूरती बढ़ने के साथ-साथ सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रवाह होता है।

वास्तु के अनुसार घर की सजावट करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें :-
1) घर के प्रवेश द्वार पर स्वस्तिक अथवा 'ॐ' की आकृति लगाने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
2) जिस भूखंड या मकान पर मंदिर की पीठ पड़ती है, वहाँ रहने वाले दिन-ब-दिन आर्थिक व शारीरिक परेशानियों में घिरते रहते है।
3) समृद्धि की प्राप्ति के लिए नार्थ-ईस्ट दिशा में पानी का कलश अवश्य रखना चाहिए।
4) घर में ऊर्जात्मक वातावरण बनाने में सूर्य की रोशनी का विशेष महत्व होता है इसलिए घर की आंतरिक साज-सज्जा ऐसी होनी चाहिए कि सूर्य की रोशनी घर में पर्याप्त रूप में प्रवेश करे।
5) घर में कलह अथवा अशांति का वातावरण हो तो ड्राइंग रूम में फूलों का गुलदस्ता रखना श्रेष्ठ होता है।
6) अशुद्ध वस्त्रों को घर के प्रवेश द्वार के मध्य में नहीं रखना चाहिए।
7) वास्तु के अनुसार रसोईघर में देवस्थान नहीं होना चाहिए।
8) गृहस्थ के बेडरूम में भगवान के चित्र अथवा धार्मिक महत्व की वस्तुएँ नहीं लगी होना चाहिए।
9) घर में देवस्थान की दीवार से शौचालय की दीवार का संपर्क नहीं होना चाहिए।



- गायत्री शर्मा

वाहन हादसों से बचा सकता है वास्तु


वास्तु की मान्यताओं के विकास काल में प्राय: हाथी, घोड़ों और उनसे चलने वाले रथ, पालकी आदि वाहनों पर ही विचार किया गया किंतु वे ही मान्यताएं वर्तमान वाहनों के संदर्भ में भी सर्वथा प्रासंगिक है। वाहन दरअसल मानवीय जीवन की अहम आवश्यकता है और सहायक भी कम नहीं हैं। यदि किसी के पास वाहन नहीं हो और वह वाहन की अपेक्षा करता हो तो उसे वेदोक्त ‘पवमान सूक्त’ का संपुट सहित पाठ करना चाहिए। यह पाठ परिवार में शांति व सुख का संचार भी करता है और वाहन जन्य आकस्मिक हादसों से बचाने वाला भी है।

भवन में सामान्यत: वायव्यकोण में वाहनों को रखना चाहिए। आजकल प्राय: भवन निर्माण के समय वाहन के लिए किसी भी एक दिशा में लम्बवत गलियारा छोड़ दिया जाता है और उसके साथ ही दरवाजा भी रख दिया जाता है। यहां यह ज्ञातव्य है कि गृहपति के आने-जाने के दरवाजे के अतिरिक्त वाहन के लिए अलग द्वार होना चाहिए। वास्तु विन्यास की परंपरा में ऐसा आवश्यक है। इसके लिए भवन के सामने के भाग की जो लम्बाई या चौड़ाई हो, उसको नौ भागों में बांट दें और प्राय: दोनों ओर से दो-दो खंडों को छोड़कर वाहन के लिए द्वार रखना चाहिए।

भवन में वायव्य कोण से लेकर नैऋत्य कोण की ओर की दीवार पर नौ-नौ भागों के अनुसार पहले दो और आखिरी दो खंड छोड़कर दरवाजा रखना बहुत शुभ माना जाता है। भवन का निर्माण कुछ इस तरह से किया जाना चाहिए कि वाहन एकदम उत्तरी दीवार के पास नहीं खड़ा रहे बल्कि उससे दो खंड की दूरी बनी रहे। वायव्यकोण के निकट, दीवार से आगे दो खंड छोड़कर दरवाजा रखने से परिवार में शोक और दु:ख की आशंका नहीं के बराबर रहती है जैसा कि वास्तुप्रदीप का मत है। ऐसे में तीसरे, चौथे खंड पर वाहन के लिए दरवाजा होना बहुत शुभ है। ऐसा होने पर वाहन संचालन में भी उचित समय पर उचित निर्णय होता है और भ्रम या चूक की संभावना नहीं के बराबर रहती है। यहां यह भी नियम है कि कभी वायव्य कोण से लगता हुआ कोई रेंप घर की सीमा से बाहर नहीं बनाए। हां, भवन के भीतर बनाया जा सकता है। बाहर बने रेंप से मतिभ्रम, व्यर्थ विवाद ऐसी स्थितियां देखने में आई हैं।


-डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

पोलियो का ज्योतिषीय निदान

पोलियो बाल्यावस्था में होने वाली ऐसी बीमारी है जिसका दंश जीवनभर झेलना पड़ता है। इसमें हड्डियां सूखकर वक्रीय हो जाती है। पिछले कुछ वर्षो से विश्वभर में पोलियो उन्मूलन के प्रयास चल रहे हैं। शिशु को जन्म से पांच साल तक की उम्र में पोलियोरोधी खुराक पिलाने से इस रोग की आशंका लगभग समाप्त हो जाती है।

इस रोग के मूल में शनि को भी देखना चाहिए। ज्योतिषीय दृष्टि से इसके कारणों में शनि और उसकी राशियों मकर एवं कुंभ पर पाप ग्रह का प्रभाव होना है। उक्त राशियों में मौजूद चंद्रमा पर पाप दृष्टि हो, शनि यदि अस्तगत, नीचत्व प्राप्त हो व त्रिक्भाव में त्रिकेशों के साथ हो अथवा मेष राशि में पापी ग्रह हो तो पोलियो की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे जातक को विशेष रूप से पूर्वोपचार करना चाहिए। इसी प्रकार जातक की कुंडली के पांचवें, सातवें और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रह भी इस रोग के सहायक हो सकते हैं।

कारण : पोलियो पीड़ितों की कुंडली देखने से प्रतीत होता है कि शनि अपनी नीच राशि मेष में आठवें भाव में स्थित है और त्रिकेश मंगल से भी पीड़ित है। चंद्रमा शनि की कुंभ राशि में राहु के साथ है और कोई शुभ दृष्टि नहीं होने से जातक आजीवन पोलियोजन्य त्रासदी भोगता है।

ज्योतिषीय परामर्श : पोलियोरोधी खुराक पिलाना सबसे उचित है। इसके अलावा जिसकी कुंडली में ऊपर दर्शाए गए ग्रह योग बने हों, उसके परिजनों और जिनको यह रोग हो चुका हो, उनको शनि व चंद्रमा की वस्तुओं का दान करना चाहिए। साथ ही इन ग्रहों के मंत्रों का जाप भी करना या करवाना चाहिए।

रोज शाम या रात्रि के समय महामृत्युंजय महामंत्र की एक माला करनी चाहिए। यह जाप ऊनी आसन पर बैठकर शिव आराधना के साथ करना बहुत प्रभावी माना गया है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में आया है कि दूध में लहसुन का प्रयोग करें। आधा किलो दूध में पांच कली लहसुन कूटकर डालें और तब तक उबालते रहें, जब तक कि दूध आधी कटोरी रह जाए। इसमें कुछ शक्कर डालकर पंद्रह दिनों तक सुबह पीने से लाभ मिलता है। यह प्रयोग शनिवार से करना चाहिए।


-पं. पुष्कर राज

Friday, March 19, 2010

जल भरे कुंड से लाएं घर में समृद्धि

eshan ईशान कोण को अच्छी जलधारा का केंद्र माना गया है। वास्तु में इसी कोने को पूजास्थल, उपासना स्थल और प्रधान इष्ट देव स्थापना का योग्य कोण भी माना जाता है, किंतु यहां जल स्थान का होना बहुत ही लाभकारी है।

परिवार में सुख और समृद्धि के लिए ईशान कोण स्थित जलस्रोत को हमेशा भरा हुआ ही रखें। उसके पानी का उपयोग भी करें तो बराबर उसमें पूर्ति करते जाएं। यह धनागम के स्रोतों को हमेशा खोले रखता है।

घर के ईशान कोण में जलस्रोत का होना बहुत शुभ है। आजकल इस कोण में बोरिंग करवाने का चलन है, किंतु वहां जलस्रोत या हौज का होना शास्त्र सम्मत है। यह शिव का स्थान है। इसी कारण इसे गंगोद्भव तुल्य माना जाता है।

वास्तु में इसी कोने को पूजा स्थल, उपासना स्थल और इष्ट देव स्थापना योग्य कोण भी माना जाता है, किंतु यहां जल स्थान का होना लाभकारी है। जिन घरों में इस स्थान पर जलस्रोत होता है, वह खुशियों का केंद्र होता है। वैसे तो जल-स्थान के लिए वरुण या पश्चिम दिशा भी अच्छी है, किंतु ईशान कोण अधिक लाभकारी माना गया है।

वास्तुग्रंथों के अतिरिक्त दकार्गल विद्या (भूमिगत जलस्रोत खोजने की कुंजी) में भी शिव के कोने या ईशान कोण को अच्छी जलधारा का केंद्र माना गया है। इस क्षेत्र की जल धारा को शंकरी कहा जाता है। यह प्राय: मीठी और अल्पदाब से जलापूर्ति में सहायक होती है। यदि ईशान के जल-स्रोत को बराबर भरा रखा जाए और उसके जलस्तर को बराबर बनाए रखा जाए तो समृद्धि आती है।

यदि नया घर बनाना हो तो सर्वप्रथम इस कोण में जलस्रोत बनाकर उसे भर दिया जाए और परिसर में गाय को बछड़े सहित लाकर कुछ दिन बांध दिया जाए तो कार्य बिना बाधा के संपन्न होता है। ‘मयमतं’ ग्रंथ में भूमि चयन के साथ ही वहां ‘सवत्सा गो’ बांधने का निर्देश है।

यदि इस जलस्रोत में चांदी की छोटी-सी मछली, शंख, मकर, लघु कलश, कल्पवृक्ष और चांदी का ही कूर्म बनाकर रखा जाए और पूजा के बाद जल भरा जाए तो इच्छित परिणाम मिलता है। यदि इसी दिशा में तुलसी क्यारा और बिल्व वृक्ष हो तो सोने पर सुहागा मानना चाहिए।


-डॉ. श्रीकृष्ण