Wednesday, December 23, 2009

वास्तु दोषों का निवारण करती है गाय

जिस प्लॉट पर भवन, घर का निर्माण करना हो यदि वहां पर बछड़े वाली गाय को लाकर बांधा जाए तो वहां संभावित वास्तु दोषों का स्वत: निवारण हो जाता है। कार्य निर्विघ्न पूरा होता है और समापन तक आर्थिक बाधाएं नहीं आतीं। गाय के प्रति भारतीय आस्था को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। गो-सेवा को एक कत्र्तव्य के रूप में माना गया है। पशु रूप में गाय सृष्टिमातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिए निवेदन के प्रसंग बहुत प्रसिद्ध हैं। ‘समरांगण सूत्रधार’ जैसा प्रसिद्ध वृहद् वास्तु ग्रंथ गो रूप में पृथ्वी-ब्रrादि के समागम-संवाद से ही आरंभ होता है। वास्तुग्रंथ ‘मयमतम्’ में कहा गया है कि भवन निर्माण का शुभारंभ करने से पूर्व उस भूमि पर ऐसी गाय को लाकर बांधना चाहिए जो सवत्सा या बछड़े वाली हो। नवजात बछड़े को जब गाय दुलारकर चाटती है तो उसका फेन भूमि पर गिरकर उसे पवित्र बनाता है और वहां होने वाले समस्त दोषों का निवारण हो जाता है। यही मान्यता वास्तुप्रदीप, अपराजितपृच्छा आदि में भी आई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि गाय जहां बैठकर निर्भयतापूर्वक सांस लेती है, उस स्थान के सारे पापों को खींच लेती है- निविष्टं गोकुलं यत्र श्वांस मुंचति निर्भयम्। विराजयति तं देशं पापं चास्याप कर्षति॥ यह भी कहा गया है कि जिस घर में गाय की सेवा हो, वहां पुत्र-पौत्र, धन, विद्या, सुखादि जो भी चाहिए, मिल सकता है। यही मान्यता अत्रिसंहिता में भी आई है। अत्रि ने तो यह भी कहा है कि जिस घर में सवत्सा धेनु नहीं हो, उसका मंगल-मांगल्य कैसे होगा? गाय का घर में पालन करना बहुत लाभकारी है। ऐसे घरों में सर्वबाधाओं और विघ्नों का निवारण हो जाता है। बच्चों में भय नहीं रहता। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण पूतना के दुग्धपान से डर गए तो नंद दंपती ने गाय की पूंछ घुमाकर उनकी नजर उतारी और भय का निवारण किया। सवत्सा गाय के शकुन लेकर जाने से कार्य सिद्ध होता है। पद्मपुराण, और कूर्मपुराण में कहा गया है कि कभी गाय को लांघकर नहीं जाना चाहिए। किसी भी साक्षात्कार, उच्च अधिकारी से भेंट आदि के लिए जाते समय गाय के रंभाने की ध्वनि कान में पड़ना शुभ है। संतान लाभ के लिए घर में गाय की सेवा अच्छा उपाय कहा गया है। शिवपुराण व स्कंदपुराण में कहा गया है कि गो सेवा और गोदान से यम का भय नहीं रहता। गाय के पांव की धूली काभी अपना महत्व है। यह पाप विनाशक है, ऐसा गरुड़पुराण और पद्मपुराण का मत है।

-डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू

हिन्दू धर्म में कलश का महत्व

भ्रात: कान्चलेपगोपितबहिस्ताम्राकृते सर्वतो।
मा भैषी: कलश: स्थिरो भव चिरं देवालयस्योपरि।।
ताम्रत्वं गतमेव कांचनमयी कीर्ति: स्थिरा ते धुना।
नान्स्तत्त्वविचारणप्रणयिनो लोका बहिबरुद्धय:।।

कांचन से कीर्ति महान है और सुवर्ण से सुनहरा जीवन श्रेष्ठ है। मंदिर के शिखर पर स्थित कलश वह कीर्ति और वैसा जीवन प्राप्त कर चुका है। अब उसे अपने बारे में हीनभाव रखने का कोई कारण नहीं है। छोटा मानव भी महान कार्य में निमित्त बना हो तो वह जीवन में महानता के शिखरों को प्राप्त कर सकता है। उसके बाद उसे छोटेपन का अनुभव नहीं करना चाहिए।

कलश भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है इसलिए तो महत्वपूर्ण सभी शुभ प्रसंगों में पुण्याहवाचन कलश की साक्षी में तथा सान्निध्य में होता है।

प्रत्येक शुभ प्रसंग या कार्य के आरंभ में जिस तरह विघ्नहर्ता गणोशजी की पूजा की जाती है उसी तरह कलश की भी पूजा होती है। देवपूजा के स्थान पर इस कलश को अग्रस्थान प्राप्त होता है। पहले इसका पूजन, फिर इसे नमस्कार और बाद में विघ्नहर्ता गणपति को नमस्कार! ऐसा प्राधान्यप्राप्त कलश और उसके पूजन के पीछे अति सुंदर भाव छिपा हुआ है।

स्वस्तिक चिह्न अंकित करते ही जिस तरह सूर्य आकर उस पर आसनस्थ होता है उसी तरह कलश को सजाते ही वरुणदेव उसमें विराजमान होते हैं। जो संबंध कमल-सूर्य का है वही संबंध कलश वरुण का है। वास्तव में कलश यानी लोटे में भरा हुआ या घड़े में भरा हुआ साधारण जल। परंतु कलश की स्थापना के बाद उसके पूजन के बाद वह जल सामान्य जल न रहकर दिव्य ओजस्वी बन जाता है।

तत्वायामि ब्रह्मणा वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेळमानो वरुणोहबोध्यु रुशंसा मा न आयु: प्रमोषी:।।

हे वरुणदेव! तुम्हें नमस्कार करके मैं तुम्हारे पास आता हूं। यज्ञ में आहुति देने वाले की याचना करता हूं कि तुम हम पर नाराज मत होना। हमारी उम्र कम नहीं करना आदि वैदिक दिव्य मंत्रों से भगवान वरुण का आवाहन करके उनकी प्रस्थापना की जाती है और उस दिव्य जल का अंग पर अभिषेक करके रक्षा के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश पूजन की प्रार्थना के श्लोक भी भावपूर्ण हैं। उसकी प्रार्थना के बाद वह कलश केवल कलश नहीं रहता, किंतु उसमें पिंड ब्रह्मांड की व्यापकता समाहित हो जाती है।

कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्र: समाश्रित:।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा।
ऋग्वेदोअथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण:।।
अंगैच्श सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:।
अत्र गायत्री सावित्री शांतिपृष्टिकरी तथा।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।
सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।
आयांतु मम शांत्यर्थ्य दुरितक्षयकारका:।।

हमारे ऋषियों ने छोटे से पानी के लोटे में सभी देवता, वेद, समुद्र, नदियां, गायत्री, सावित्री आदि की स्थापना कर पापक्षय और शांति की भावना से सभी को एक ही प्रतीक में लाकर जीवन में समन्वय साधा है। बिंदु में सिंधु के दर्शन कराए हैं।

नए घर में प्रवेश करने से पहले कुंभ रखने की प्रथा प्रचलित है। जलपूर्ण कुंभ की तरह घर भावपूर्ण और नवपल्लवित रहे, ऐसी मंगलकामना इसके पीछे रही है। कलश या कुंभ पर श्रीफल रखने से उसकी शोभा दोगुनी होती है। श्रेष्ठागमन के समय माथे पर श्रीफलयुक्त कलश लेकर खड़ी रहने वाली कुमारिकाओं को हम कई बार देखते हैं।

भावभीने आतिथ्य सत्कार का यह अनोखा प्रकार है। गुजरात में नवरात्रि के प्रसंग पर खेला जाने वाला गरबा कलश या कुंभ का ही स्वरूप है। गरबा सजल होने के बजाय सतेज होता है। स्थाप्तयशास्त्र में भी कलश का अनोखा महत्व है।

सूर्यास्त के बाद अशुभ फल देते हैं नहोराता के ग्रह

लाल किताब ज्योतिष में अंधे ग्रहों की कुंडली के अलावा एक और सिद्धांत है नहोराता के ग्रह। इन्हें रात्रि में अंधे ग्रहों या रतांध ग्रहों का टेवा भी कहा नहोराता के ग्रह जाता है। इस परिभाषा में केवल दो ग्रहों का ही जिक्र है यानी चौथे घर में सूर्य हो और सातवें घर में शनि तो ऐसा टेवा रतांध ग्रहों का टेवा कहलाएगा।

इस प्रकार के योग से व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में अस्थिरता, मानसिक शांति और गृहस्थ सुख की कमी जैसे अशुभ प्रभाव आते हैं। सूर्य-शनि की परस्पर ऐसी स्थिति किसी अन्य भाव में चतुर्थ-दशम स्थिति से बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि चौथे घर में सूर्य की स्थिति होने से व्यक्ति का जन्म समय मध्यरात्रि के आसपास का होता है, जिस समय सूर्य निर्बल होता है। वहीं सप्तम भाव का शनि कालपुरुष कुंडली में अपनी उच्चराशि में स्थिर होने से और रात्रि समय जन्म के कारण रात्रि बली होने से सूर्य की अपेक्षा काफी बलवान होता है।

सप्तम में बैठे शनि की दसवीं दृष्टि चौथे घर में बैठे उसके शत्रु सूर्य पर होने से चौथे घर और सूर्य का फल अनेक प्रकार से अशुभ हो जाता है। एक तो चौथे घर का फल यानी हमारी मानसिक शांति और गृहस्थ सुख, दोनों पर शनि का अशुभ प्रभाव और दूसरे शनि की दृष्टि से दूषित सूर्य का चौथे घर पर अपना अशुभ प्रभाव रहता है।

सूर्य की दृष्टि दसवें घर पर होने से उसका प्रभाव कर्मक्षेत्र, नौकरी और व्यवसाय पर भी ठीक नहीं रहता। नहोराता के ग्रहों का अशुभ असर सूर्यास्त के बाद प्रबल होता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की दृष्टि और कार्यक्षेत्र में अधिक रहता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने कैरियर में बहुत दिक्कतें आती हैं और उतार-चढ़ाव बना रहता है। खासतौर पर अगर वे ऐसे कामों में हों, जहां नाइटशिफ्ट में काम करना पड़े। जिन व्यक्तियों की कुंडली में यह योग हो, उन्हें कोई भी नया काम, नया प्रोजेक्ट सूर्यास्त के बाद शुरू नहीं करना चाहिए। किसी नए कार्य की कार्ययोजना भी सूर्यास्त के बाद न बनाएं, अन्यथा ऐसे प्रोजेक्ट्स में बहुत रुकावटें आती हैं और सफलता संदिग्ध ही रहती हैं।

सूर्य-शनि की ऐसी स्थिति व्यक्ति के आत्मबल (सूर्य) और मनोबल (चंद्रमा-चतुर्थ भाव) पर अशुभ असर देती है, जिससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता और संकल्पशक्ति पर प्रभाव पड़ता है।

Friday, December 18, 2009

महायोगों के धनी भगवान झूलेलाल

अधर्म पर धर्म की विजय पताका फहराने के लिए भगवान ने समय-समय पर अवतार लिया है और आसुरी शक्तियों का संहार करके दुनिया को शांति का संदेश दिया है। दसवीं शताब्दी में जब सिंध (पाकिस्तान) प्रांत के क्रूर सम्राट मिरखशाह ने अधर्म और अत्याचार को बढ़ावा दिया तब सनातन धर्मियों ने सिंधु नदी के तट पर उपवास रखकर वरुण देवता की श्रद्धा भावना से आराधना की।

उनकी आराधना से वरुण देव का मन द्रवित हो उठा। तब नदी की लहरों पर विशाल मछली पर विराजमान, हाथ में माला तथा वेद ग्रंथ लिए एक ब्रrा स्वरूप दिव्य पुरुष दृष्टिगोचर हुए और आकाशवाणी द्वारा अपने प्रकट होने का समाचार सुनाया।

आकाशवाणी के अनुसार विक्रम संवत 1007 ईसवी सन् क्९५१ तदनुसार चैत्र शुक्ल द्वितीय, दिन शुक्रवार, भरणी नक्षत्र में ग्राम नसरपुर जिला सिन्ध (पाकिस्तान) के श्री रतनराय के घर में माता देवकी के गर्भ से भगवान झूलेलाल ने जन्म लिया। इनके जन्म के समय सूर्य कुंडली में लग्न में सूर्य बुध, द्वितीय भाव में चंद्रमा, चतुर्थ भाव में मंगल केतु और सप्तम भाव में शनि विराजमान थे जबकि नवम भाव (भाग्य भाव) में बृहस्पति, दशम (कर्म) भाव में राहु तथा द्वादश भाव में शुक्र बैठे थे।

भगवान झूलेलाल की जन्म कुंडली में ग्यारह महान कर्मजीव योग बने। सूर्य और चंद्र, दोनों कुंडलियों में ६३ महायोगों का निर्माण हुआ। दैवीय शक्ति के बल पर यह बालक शीघ्र जवान हो गया। कुंडली में बने तमाम शुभ योगों के परिणामस्वरूप यह बालक तरह-तरह के चमत्कार दिखाने लगा। महान कर्मजीव योगों के प्रभाव से इन्होंने दुष्ट सम्राट मिरखशाह को इतने चमत्कार दिखाए कि मिरखशाह और उसके अनुयायी भयभीत हो गए। राज्य में महामारी फैल गई, जिसका प्रभाव सिर्फ सम्राट तथा उसके अनुयायियों पर ही हुआ।

चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। इससे घबराकर मिरखशाह और उसके अनुयायियों ने भगवान झूलेलाल के चरणों में गिरकर आत्मसमर्पण कर दिया और क्षमायाचना करने लगे। इस तरह शांति का संदेश देकर भगवान झूलेलाल ने संवत १क्२क् में, भादों के महीने, पूर्णिमा के दिन अपने शिष्य ठाकुर पगर को अपना स्थान सौंपकर हजारों हिन्दु-मुसलमानों के सामने जल समाधि ले ली।

Thursday, December 17, 2009

अभय बनाएं काल भैरव

कालभैरव अष्टमी.भय का हरण करे, वह भैरव - भयहरणं च भैरव:। भैरव की महिमा शास्त्रों में मिलती है। भैरव को जहां शिव के गण के रूप में स्वीकारा गया है, वहीं वे दुर्गा के आगे-पीछे चलने वाले अनुचारी भी माने गए हैं। करोड़ों परिवारों में भैरव की कुलदेवता के रूप में पूजा की जाती है, जो परिवार में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और संबल प्रदान करते हैं।

तंत्र के महान देवता : भूतभावन शिव ने उन्हें वाराणसी में कोतवाल नियुक्त किया। अत: वे प्रथम स्मरणीय भी हुए। तुलसीदास ने विनय पत्रिका में उनकी वंदना की है। भैरव को उनके अनेक गुणों के कारण ही तंत्र में महान देवता बताया गया है। ग्रंथों में लिखा है कि गृहस्थ को सदा भैरव के सात्विक ध्यान को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मंगल जन्य दोषों के निवारक : स्त्री-पुरुषों की कुंडली में उच्च, नीच मंगल से होने वाले समस्त दोषों का निवारण भैरव को प्रसन्न करने से हो सकता है। महिलाओं की ल्यूकोरिया-प्रदर सहित कई रोगों, मानसिक व्याधियों, तनाव-अवसाद, हिस्टीरिया, उन्माद जैसी बीमारियों का निवारण भैरव की सेवा-साधना से सहज ही संभव है। वैसे जिनको मंगल जन्य कष्ट हो, वे भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, बटुक भैरव ब्रrा कवच, भैरव स्तवराज, भैरव पंजर कवच आदि का नियमित पाठ कर लाभान्वित हो सकते हैं। भैरव कवच का पाठ अकाल मृत्यु, दीर्घ व्याधियों का निवारण करने में भी समर्थ है।

नाम जप से कई बाधाओं से मुक्ति :

कालभैरव के नाम जप से अनेक रोगों से मुक्ति संभव है। वे संतानदाता और आयुवर्धक हैं। एक सौ आठ नामों का नित्य पारायण कई भक्त करते हैं और लाभ उठाते हैं। जिनके घर में प्रेत बाधा या नित्य कलह की आशंका हो, शत्रु परेशानी हो, वहां शनिवार या मंगलवार को भैरव पाठ, काल संकर्षण तंत्रोक्त बटुक भैरव अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र का पारायण करने से इन झंझटों से मुक्ति पाई जा सकती है। भैरव के अनेक स्तोत्र पाठों में रं, कं, गं, भं, क्षं, वै आदि बीजाक्षर मिलते हैं, जिनका उच्चरण बहुत ध्यानपूर्वक करना चाहिए।

पं. पुष्कर राज

Tuesday, December 15, 2009

नवग्रहों के पूजन का महत्व

सभी प्रकार की पूजाओं में नवग्रह पूजन का विशेष महžव है। यज्ञानुष्ठान की क्रिया नवग्रह स्थापना के बिना अपूर्ण ही रहती है क्योंकि यज्ञरक्षा नवग्रहों द्वारा ही होती है। अत: रक्षा-विधान के लिए शास्त्रीय आदेश है कि गणोश, सरस्वती, क्षेत्रपाल की स्थापना के साथ-साथ नवग्रहों की भी स्थापना करनी चाहिए।

सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु को नवग्रह कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य-चंद्रमा को नक्षत्रों का स्वामी, मंगल को पृथ्वी पुत्र, बुध को चंद्रमा का पुत्र, बृहस्पति को देव गुरु, शुक्र को दैत्य गुरु, शनि को सूर्य पुत्र एवं राहु-केतु को पृथ्वी का छाया पुत्र माना गया है।

भारतीय संस्कृति में नवग्रह-उपासना का उतना ही महžव है, जितना कि भगवान विष्णु, शिव तथा अन्य देवोपासना का है। जन्म से लेकर उपनयन, विवाह आदि संस्कारों में नवग्रह पूजन का विशेष महžव है।

यज्ञानुष्ठान की क्रिया नवग्रह स्थापना के बिना अपूर्ण ही रहती है क्योंकि यज्ञरक्षा नवग्रहों द्वारा ही होती है। अत: रक्षा-विधान के लिए शास्त्रीय आदेश है कि गणोश, सरस्वती, क्षेत्रपाल की स्थापना के साथ-साथ नवग्रहों की भी स्थापना करनी चाहिए और उन्हें पूजन करके प्रणाम करना चाहिए।

जीवन के संपूर्ण सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय आदि जैसे सभी विषय इन नवग्रहों पर आधारित होते हैं। इसका कारण 27 नक्षत्रों और 12 राशियों पर ये ग्रह भ्रमण करते रहते हैं, जिससे ऋतुएं, वर्ष, मास और दिन-रात बनते हैं।

नवग्रह अपनी-अपनी गति के अनुरूप मंद अथवा तीव्र चाल से एक-एक राशि को पार करते रहते हैं। जब ये सप्तग्रह सूर्य के समीप अंशों में एक ही राशि पर होते हैं तो अस्त माने जाते हैं। इन राशियों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन हैं।

नाम के अनुसार इन्हीं राशियों पर स्थित ग्रहों की चाल देखकर बताया जाता है कि अमुक व्यक्ति के लिए अमुक समय कैसा है। इसे ही जानने के लिए बारह राशियों हेतु नवग्रहों को इनका स्वामी चुना गया है।

मेष व वृश्चिक राशि का स्वामी-मंगल, वृष व तुला राशि का स्वामी-शुक्र, मिथुन व कन्या राशि का स्वामी-बुध, कर्क राशि का स्वामी-चंद्रमा, सिंह राशि का स्वामी-सूर्य, धनु व मीन राशि का स्वामी- गुरु और मकर व कुंभ राशि का स्वामी-शनि को माना गया है।

जन्म कुंडली या वर्ष कुंडली में कौनसा ग्रह किस स्थान में बैठा है, उसका फल क्या मिलेगा? उसी अनुसार उस ग्रह की शांति के लिए पाठ-जप करना, रत्न धारण करना व वस्तुओं का दान करना चाहिए, तभी फल प्राप्त होगा।

Monday, December 14, 2009

ग्रह स्थिति बनाए धनवान

ज्योतिष ग्रंथों में लक्ष्मीवान होने संबंधी अनेक योगों का उल्लेख है। यदि ये योग जातक की कुंडली में हैं तो व्यक्ति निश्चय ही धनी होता है। सामान्य मूल्यांकन करने पर यह देखा जाता है कि कुंडली में चंद्र-मंगल की युति है तो ऐसा जातक जीवन में आर्थिक रूप से संपन्नता प्राप्त करता ही है। इसके अलावा अन्य लक्ष्मी योग हैं - >> यदि द्वितीय स्थान का स्वामी ग्यारहवें भाव में स्थिर होकर द्वितीय भाव को देखता है।>> यदि द्वितीय भाव का स्वामी उच्च का हो तथा उस पर शुक्र, गुरु, चंद्र, बुध की दृष्टि हो।

>> द्वितीय भाव का स्वामी नवम या पंचम में श्रेष्ठ स्थिति में विद्यमान हो।

>> द्वितीय भाव का स्वामी बृहस्पति अपनी उच्च राशि में नवम भाव में (वृश्चिक लग्न में) उपस्थित हो।

>> नवम भाव एवं लग्न अपनी-अपनी उच्च राशि में हो या उत्तम स्थिति में हो।

>> नवम एवं लाभ का राशि परिवर्तन योग हो।

>> लग्न एवं नवम भाव के स्वामी दोनों एक साथ विद्यमान हों या केंद्र त्रिकोण में श्रेष्ठता से युक्त हो।

>> लग्न एवं नवम भाव के स्वामी आपस में देख रहे हों।

>> लग्न का स्वामी लग्न को तथा नवम भाव का स्वामी नवम भाव को अथवा लग्नेश-भाग्येश को तथा भाग्येश लग्न को देख रहा हो।

>> केंद्रों के स्वामी अपनी उच्च स्थिति में विद्यमान हों।

>> नवम एवं लग्न के स्वामी केंद्र में हों तथा उन पर शुभ ग्रहों (गुरु, चंद्र, शुक्र, बुध) की दृष्टि हो।

प्रश्न उठता है कि जिस जातक की कुंडली में उपरोक्त योगों की अनुपलब्धता है तो क्या वे अभाव में रहेंगे? नहीं, इसके अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे योग होते हैं जिनके कारण जातक अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता है। अत: लक्ष्मी योग को ध्यान से देखा जाना चाहिए।


पं. राजाभाऊ रावल

Sunday, December 13, 2009

शक्ति की उपासना नवदुर्गा

निगम एवं आगम के तत्ववेत्ता ऋषियों के अनुसार वह परमतत्व आदि, मध्य एवं अंत से हीन है। वह निराकार, निर्गुण, निरुपाधि, निरञ्जन, नित्य, शुद्ध एवं बुद्ध है। वह एक है, विभु है, चिदानन्द है, अद्भुत है, सबका स्वामी एवं सर्वत्र है। फिर भी वह लीला के लिए अनेक रूपों में अवतरित होकर लोक कल्याण करता है।

शक्तितत्व : देवी भागवत के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवती से पूछा - ‘कासि त्वं महादेवि’ -हे महादेवी, आप कौन हैं? तब देवी ने उत्तर दिया - ‘मैं और ब्रrा - हम दोनों सदैव या शाश्वत एकत्व हैं। जो वह है, सो मैं हूं और जो मैं हूं, सो वह है। हममें भेद मानना मतिभ्रम है।

शक्ति की उपासना का प्रयोजन :

संसार का प्रत्येक प्राणी भय, भ्रांति एवं अभाव से किसी न किसी मात्रा में ग्रस्त रहता है। परिणामस्वरूप वह संसार में घात-प्रतिघात से त्रस्त रहता है। शाक्तागमों के अनुसार शक्ति सांसारिक दु:खों के दलदल में फंसे व्यक्ति को उससे निकालकर सुख, शांति और अंत्तोगत्वा मुक्ति देती है।

अत: उसकी कृपा पाने के लिए उसी की उपासना करनी चाहिए। वह स्वयं एक एवं अद्वितीय होते हुए भी अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए कभी महालक्ष्मी, महाकाली या महासरस्वती के रूप में अवतरित होती है तो कभी काली, तारा, षोडशी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, भुवनेश्वरी एवं कमला - इन दशमहाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती है और वही आद्याशक्ति अपने उपासकों की मनोकामना पूर्ति के लिए शैलपुत्री, ब्रrाचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री - इन नवदुर्गाओं के रूप में प्रकट होती है।

वस्तुत: इस जगत का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली वह आद्याशक्ति एक ही है। उसके लोककल्याणकारी रूप को दुर्गा कहते हैं। तंत्रागम के अनुसार वह संसार के प्राणियों को दुर्गति से निकालती है, अत: ‘दुर्गा’ कहलाती है।

मंत्र, तंत्र एवं यंत्रों के माध्यम से उस शक्तितत्व की साधना के रहस्यों का उद्घाटन करने वाले ऋषियों का मत है कि उसकी उपासना से पुत्रार्थी को पुत्र, विद्यार्थी को विद्या, धनार्थी को धन एवं मोक्षार्थी को मोक्ष मिलता है।

शक्ति उपासना का काल -

नवरात्रि की मूल संकल्पना एवं आधारभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले वैदिक ज्योतिष के प्रणोताओं ने हमारे एक वर्ष को देवी देवताओं का एक ‘अहोरात्र’ (दिन-रात) माना है। ज्योतिष शास्त्र के कालगणना के नियमों के अनुसार मेष संक्राति को देवी-देवताओं का प्रात:काल, कर्क संक्राति को उनका मध्याह्न् काल, तुला संक्राति को उनका सायंकाल तथा मकर संक्राति को उनका निशीथकाल होता है।

इसी आधार पर शाक्ततंत्रों ने मेष संक्राति के आसपास आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से वासंतिक नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्रि और मकर संक्राति के आसपास माघ शुक्ल प्रतिपदा से पुन: गुप्त नवरात्रि का निर्धारण किया गया है। इन नवरात्रियों को शक्ति की उपासना के लिए प्रशस्त माना गया है।

इन चारों नवरात्रियों में आद्या शक्ति की साधना एवं उपासना की महिमा अपरंपार है। यही कारण है कि आसाम, बंगाल एवं बिहार से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक पूरे पूर्वी भारत में इन दिनों ‘दुर्गापूजा’ का महोत्सव पूरी श्रद्धा, भक्ति एवं धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि में शक्ति उपासना का फल : शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा महापूजा कहलाती है।

इस समय में श्री दुर्गासप्तशती का पाठ, मंत्र का जप, दश महाविद्याओं की साधना, ललिता सहस्रनाम या दुर्गा सहस्रनाम का पाठ, नवरात्रि का व्रत, दुर्गा पूजा एवं कन्या पूजन करने से मनुष्य सभी बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य एवं पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त करते हैं।


प्रो. शुकदेव

Friday, December 11, 2009

पोलियो का ज्योतिषीय निदान

पोलियो बाल्यावस्था में होने वाली ऐसी बीमारी है जिसका दंश जीवनभर झेलना पड़ता है। इसमें हड्डियां सूखकर वक्रीय हो जाती है। पिछले कुछ वर्षो से विश्वभर में पोलियो उन्मूलन के प्रयास चल रहे हैं। शिशु को जन्म से पांच साल तक की उम्र में पोलियोरोधी खुराक पिलाने से इस रोग की आशंका लगभग समाप्त हो जाती है।

इस रोग के मूल में शनि को भी देखना चाहिए। ज्योतिषीय दृष्टि से इसके कारणों में शनि और उसकी राशियों मकर एवं कुंभ पर पाप ग्रह का प्रभाव होना है। उक्त राशियों में मौजूद चंद्रमा पर पाप दृष्टि हो, शनि यदि अस्तगत, नीचत्व प्राप्त हो व त्रिक्भाव में त्रिकेशों के साथ हो अथवा मेष राशि में पापी ग्रह हो तो पोलियो की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे जातक को विशेष रूप से पूर्वोपचार करना चाहिए। इसी प्रकार जातक की कुंडली के पांचवें, सातवें और ग्यारहवें भाव में पापी ग्रह भी इस रोग के सहायक हो सकते हैं।

कारण : पोलियो पीड़ितों की कुंडली देखने से प्रतीत होता है कि शनि अपनी नीच राशि मेष में आठवें भाव में स्थित है और त्रिकेश मंगल से भी पीड़ित है। चंद्रमा शनि की कुंभ राशि में राहु के साथ है और कोई शुभ दृष्टि नहीं होने से जातक आजीवन पोलियोजन्य त्रासदी भोगता है।

ज्योतिषीय परामर्श : पोलियोरोधी खुराक पिलाना सबसे उचित है। इसके अलावा जिसकी कुंडली में ऊपर दर्शाए गए ग्रह योग बने हों, उसके परिजनों और जिनको यह रोग हो चुका हो, उनको शनि व चंद्रमा की वस्तुओं का दान करना चाहिए। साथ ही इन ग्रहों के मंत्रों का जाप भी करना या करवाना चाहिए।

रोज शाम या रात्रि के समय महामृत्युंजय महामंत्र की एक माला करनी चाहिए। यह जाप ऊनी आसन पर बैठकर शिव आराधना के साथ करना बहुत प्रभावी माना गया है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में आया है कि दूध में लहसुन का प्रयोग करें। आधा किलो दूध में पांच कली लहसुन कूटकर डालें और तब तक उबालते रहें, जब तक कि दूध आधी कटोरी रह जाए। इसमें कुछ शक्कर डालकर पंद्रह दिनों तक सुबह पीने से लाभ मिलता है। यह प्रयोग शनिवार से करना चाहिए।

पं. पुष्कर राज

Thursday, December 10, 2009

ज्योतिष और विज्ञान

सूर्य इस दिन धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। यह राशि उनके पुत्र शनि की राशि है। पिता-पुत्र में मैत्रीभाव नहीं है मगर घर आए पिता का सम्मान सवरेपरि है। काल पुरुष की कुंडली में मकर दशम भाव है।

अगर कुंडली का ग्लोब का प्रतीक मानें तो यह राशि दक्षिण दिशा की द्योतक है। चूंकि ज्योतिष पृथ्वी के सापेक्ष पूरे अंतरिक्ष (नौ ग्रहों और १२ तारामंडलों) का अध्ययन है, इसलिए इसमें सभी १२ संक्रांतियां, जब सूर्य राशि बदलता है या अन्य ग्रहों की संक्रांतियां भी अपना समान महत्व रखती हैं।

सूर्य प्रतिदिन करीब एक अंश आगे बढ़ता है और पूरे वर्ष में सभी 12 राशियों से गुजरते हुए 360 डिग्री का चक्र पूरा करता है। इस तरह जब यह उत्तर की ओर बढ़ता है तो इसका स्थिति बल भी भारत के लिए बढ़ता जाता है।

सूरज का सच पृथ्वी से दूरी

१४९६ङ्ग१क्११मी.

प्रकाश वर्ष में दूरी

८.३१ मिनट

गुरुत्वाकर्षण २७.९४

तापमान सतह ५७७८ च्य

किनारे १५७ङ्ग१क्६ च्य

भ्रमणकाल २५.२८ दिन

भ्रमण वेग ७२८४ङ्ग१क्३किमी/घं व्यास १३९२ङ्ग१क्९ मी. (पृथ्वी से 109 गुना)

द्रव्यमान १९८९१ङ्ग१क्३क् किग्रा. (पृथ्वी से 332946 गुना)

घनत्व १४१२२ङ्ग१क्२७ मी.३. (पृथ्वी से 1300000 गुना)

इनसे बना है सूरज

हाइड्रोजन 73.46

हीलियम 24.85

ऑक्सीजन 0.77

कार्बन 0.29

आयरन 0.16

सल्फर 0.12

नियोन 0.12 नाइट्रोजन 0.09

सिलिकन 0.07

मैग्नीशियम 0.05

गैलीलियो से पहले यह समझा जाता था कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर काटता है। नया विचार देने के लिए गैलीलियो को दंडित किया गया था।

सूर्य से जुड़े मिथक नौका पर सवार सूर्य : प्राचीन मिस्र में यह मिथक था। सूर्य की नौका को ‘खूफू शिप’ कहा जाता था। गीजा के विशाल पिरामिड में इसे दर्शाया गया है। मिथक के अनुसार भगवान ‘रा’ ४३.६ मीटर लंबी अपनी नौका में एक भूमिगत नदी से रोज रात को पश्चिम से पूर्व की ओर आते हैं और अगले दिन पूर्व से उदय होते हैं।

सूर्य का रथ :

इंडो यूरोपीय संस्कृति में सूर्य को रथ पर सवार माना गया है। भारतीय मिथक के अनुसार इसके रथ में सात घोड़े जुते हैं।

चीन का मिथक :

शुरू में आकाश में १क् सूर्य थे। तब दुनिया बहुत गर्म थी। एक नायक होयू यी ने अपने धनुष-बाण से ९ सूरजों को नष्टकर दुनिया को रहने लायक बनाया।

Tuesday, December 8, 2009

9 मूलांक वाले करें हनुमान पूजन

अंक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का जन्म किसी भी अंग्रेजी महीने की ९, १८, २७ तारीख को हुआ हो तो उसका मूलांक ‘९’ माना जाता है। इस अंक का स्वामी ग्रह मंगल है। यह शौर्य, आवेश और हिंसा का प्रतीक है।

स्वभाव : मनुष्य की मानसिक शक्ति भी ग्रहों और जन्म अंकों के अनुसार तय होती है। यही कारण है कि मूलांक ९ के अधीन जन्म लेने वाले मानसिक रूप से बहुत परिपक्व होते हैं। साहसी कार्यो को अंजाम देने में मूलांक ९ के जातकों से कोई स्पर्धा नहीं कर सकता।

ये क्रोधी, हठी स्वभाव के तथा बहादुर होते हैं। इनके स्वभाव में अक्खड़ता, जल्दबाजी तथा फुर्ती होती है। ये स्वतंत्र मन के होते हैं। इस स्वभाव के कारण इनके शत्रु अधिक बन जाते हैं।

स्वास्थ्य : इनका शरीर तगड़ा और फुर्तीला होता है, लेकिन अकस्मात तापमान बढ़ने और बुखार चढ़ने की प्रवृत्ति रहती है। दुर्घटनाओं का डर रहता है। ऐसे व्यक्ति उच्च रक्तचाप, दिल की बीमारी और पक्षाघात के भी शिकार हो सकते हैं।

व्यवसाय एवं कार्यो में रुचि : मूलांक ९ वाले व्यक्ति जोखिम, अनुशासन, शासन एवं तीक्ष्ण बुद्धि वाले रोजगारों एवं व्यवसायों में अधिक होते हैं। ये इंजीनियर, डॉक्टर, ड्राइवर, सर्जन, कैमिस्ट आदि पेशों में सफल रहते हैं। ये सफल प्रबंधक एवं अधिकारी होते हैं। पब्लिशिंग, प्रिंटिंग, टूरिज्म, थिएटर, लेक्चरर व चिकित्सा के क्षेत्र में भी सफल होते हैं।

आर्थिक स्थिति : मूलांक ९ वालों की आर्थिक स्थिति परिवर्तनशील होती है। आर्थिक मामलों में या तो भारी सफलता मिलती है या भारी विफलता। सभी प्रकार के व्यापार तथा सांगठनिक कार्यो से धन कमाने की योग्यता होती है।

प्रेम-संबंध, विवाह और संतान : मूलांक ९ वाले व्यक्ति के प्रेम संबंध स्थायी नहीं होते। ये सुशील, सुंदर व अधिक आज्ञाकारी जीवनसाथी चाहते हैं। गृहस्थ जीवन ठीक रहता है, परंतु क्रोधी स्वभाव के कारण घर में तकरार हो जाती है। ये विलासी प्रवृत्ति के होते हैं। संतानसुख सामान्य रहता है। यात्रा : मूलांक ९ वाले व्यक्ति सैर-सपाटे के शौकीन होते हैं। देश-विदेश में घूमते हैं। यात्रा से इनको लाभ भी होते हैं। ये हर वर्ग के लोगों से मिलना पसंद करते हैं।

शुभ रंग : मूलांक ९ वालों के लिए लाल और गुलाबी रंग शुभ है।

मित्र व शत्रु अंक : इनके लिए ३, ६, ९ मूलांक वाले लोग मित्र एवं ५ और ८ मूलांक वाले लोग शत्रु माने गए हैं।

शुभ तिथियां : मूलांक ९ वाले व्यक्ति के लिए ३,६,९,१२,१५,१८ और २७ तिथियां विशेष शुभ होती हैं।

शुभ दिन : रविवार, सोमवार, मंगलवार एवं गुरुवार शुभ दिन हैं।

गुरुमंत्र : मूलांक ९ वाले रक्तविकार से बचने के लिए उन पदार्थो को भोजन में सम्मिलित करें, जो रक्तशुद्धि में सहायक हों। मंगलवार को जानवरों को मीठी रोटियां खिलाएं और हनुमान जी की पूजा करें। प्रात:भ्रमण भी स्वास्थ्य के लिए उत्तम है। शुभ रत्न मूंगा है।

सविता शर्मा ‘संयम’

Sunday, December 6, 2009

संतुलित ईशान से सारी शान

घर में ईशान कोण (दक्षिण-पूर्व) को सदैव संतुलित रखना चाहिए। शारीरिक व्याधियों, खासकर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर इस कोण को संतुलित रखना निहायत जरूरी है। इस कोने में जलस्थान, देवस्थान और अध्ययन के अतिरिक्त अन्य कोई गतिविधि नहीं होनी चाहिए।

ऐसे कई कारण सामने आए हैं जहां ईशान कोण के दूषित होने या असंतुलित होने के कारण परिवार में महिला सदस्याओं का स्वास्थ्य ख़राब हुआ है, उनके एक से अधिक ऑपरेशन, नित्य व्याधियां रहने और मरण या मरण तुल्य कष्ट की नौबत तक आई है।

वास्तुग्रन्थों में ईशान कोण को बहुत महत्व दिया गया है। सव्य क्रम यानी परिक्रमा पथ की शुरुआत ईशान से ही होती है। यह आस्थाओं का पोषण-पल्लवन करने वाला है। यह निर्देश है कि ईशान कोण का बढ़ा होना परिवार में न केवल स्वास्थ्य-संपदा को बनाए रखता है बल्कि नई पीढ़ी में संस्कारों के बीजारोपण और आस्थाओं को बलवान करता है। पूर्व में प्लॉट का झुकाव ईशान से ही शुरू होता है जो आग्नेय कोण तक रहता है और आग्नेय से नैर्ऋत्य कोण तक उठाव ठीक रहता है। जिन घरों में ईशान कोण कटा हुआ या कम होता है, वहां दैविक आपदाएं देखी गई हैं। नास्तिक विचारों के पोषण में भी इस कोण का नहीं होना सहायक रहता है और इसी कारण परिजनों के विचारों में तालमेल का अभाव रहता है। पति-पत्नी ही नहीं, पिता-पुत्र के विचार भी मेल नहीं खाते। न पिता पुत्र की इच्छाओं की पूर्ति कर पाता है न ही पुत्र पिता के कहने पर चलता है। ऐसे परिवार में पत्नी हमेशा सुख और सुकून की खोज में ही रहती है जबकि उस पर कार्य का दबाव सर्वाधिक रहता है।

क्या करें संतुलन के लिए

ईशान कोण को संतुलित रखने के लिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह कटा हुआ नहीं हो। हां, बाहर निकला हुआ हो तो लाभकारी होगा। एकदम ईशान में द्वार नहीं हो। ईशान से आग्नेय कोण तक प्लॉट की जो लंबाई हो, उसमें आठ या नौ का भाग दें और ईशान से दो हिस्से छोड़कर आवाजाही के लिए द्वार रखना चाहिए। वास्तु ग्रंथों में इसे जयंत का पद कहा गया है। यह समृद्धि का द्वार होता है।

यदि यहां द्वार रखकर आना-जाना किया जाए तो परिवार में आय के नए व स्थायी स्रोत खुलेंगे और न केवल घर में बल्कि मित्रों, व्यवसाय स्थल पर भी विश्वास का वातावरण बनेगा। हां, यहां पर वाहन को खड़ा नहीं करें बल्कि तुलसी, अश्वगंधा, मरुवाक की पौध लगा दें। ईशान में फु लवारी हो तो विचारों में उथल-पुथल बनी रहती है।

ईशान कोण में जल स्रोत इस तरह बनाएं कि यदि नैर्ऋत्य से ईशान तक रेखा खींची जाए तो जलस्रोत विभाजित नहीं होता दीखे यानी थोड़ा दूर हो। घर की नाली या नाला ईशान में नहीं रखें। वहां से अंदर जल आता हो तो शुभ है।

इसी कोण में अपने इष्टदेव का पूजा स्थल बनाए तथा वहां गंगाजल से भरा पात्र, शंख, आदि भी रखकर उसे जल से पूर्ण रखना चाहिए और पूजा के बाद शंखोदक को अपने ऊपर छिड़कना चाहिए।

ईशान में दीपक को अखंड नहीं, पूजा के समय या कुछ बाद तक ही रहे, ऐसा प्रबंध करना चाहिए। ईशान में चौबीस घंटे दीपक कई बार सिरदर्द का कारण सिद्ध हाता है।

विवाह मुहूर्त में आवश्यक त्रिबल शुद्धि

विवाह मुहूर्त के लिए मुहूर्त शास्त्रों में शुभ नक्षत्रों और तिथियों का विस्तार से विवेचन किया गया है। उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद,रोहिणी, मघा, मृगशिरा, मूल, हस्त, अनुराधा, स्वाति और रेवती नक्षत्र में, 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13, 15 तिथि तथा शुभ वार में तथा मिथुन, मेष, वृष, मकर, कुंभ और वृश्चिक के सूर्य में विवाह शुभ होते हैं। मिथुन का सूर्य होने पर आषाढ़ के तृतीयांश में, मकर का सूर्य होने पर चंद्र पौष माह में, वृश्चिक का सूर्य होने पर कार्तिक में और मेष का सूर्य होने पर चंद्र चैत्र में भी विवाह शुभ होते हैं। जन्म लग्न से अथवा जन्म राशि से अष्टम लग्न तथा अष्टम राशि में विवाह शुभ नहीं होते हैं। विवाह लग्न से द्वितीय स्थान पर वक्री पाप ग्रह तथा द्वादश भाव में मार्गी पाप ग्रह हो तो कर्तरी दोष होता है, जो विवाह के लिए निषिद्ध है। इन शास्त्रीय निर्देशों का सभी पालन करते हैं, लेकिन विवाह मुहूर्त में वर और वधु की त्रिबल शुद्धि का विचार करके ही दिन एवं लग्न निश्चित किया जाता है। कहा भी गया है—

स्त्रीणां गुरुबलं श्रेष्ठं पुरुषाणां रवेर्बलम्।

तयोश्चन्द्रबलं श्रेष्ठमिति गर्गेण निश्चितम्।।


अत: स्त्री को गुरु एवं चंद्रबल तथा पुरुष को सूर्य एवं चंद्रबल का विचार करके ही विवाह संपन्न कराने चाहिए। सूर्य, चंद्र एवं गुरु के प्राय: जन्मराशि से चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश होने पर विवाह श्रेष्ठ नहीं माना जाता। सूर्य जन्मराशि में द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं नवम राशि में होने पर पूजा विधान से शुभफल प्रदाता होता है। गुरु द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम एवं एकादश शुभ होता है तथा जन्म का तृतीय, षष्ठ व दशम पूजा से शुभ हो जाता है।

विवाह के बाद गृहस्थ जीवन के संचालन के लिए तीन बल जरूरी हैं— देह, धन और बुद्धि बल। देह तथा धन बल का संबंध पुरुष से होता है, लेकिन इन बलों को बुद्धि ही नियंत्रित करती है। बुद्धि बल का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि इसके संवर्धन में गुरु की भूमिका खास होती है। यदि गृहलक्ष्मी का बुद्धि बल श्रेष्ठ है तो गृहस्थी सुखद होती है, इसलिए कन्या के गुरु बल पर विचार किया जाता है। चंद्रमा मन का स्वामी है और पति-पत्नी की मन:स्थिति श्रेष्ठ हो तो सुख मिलता है, इसीलिए दोनों का चंद्र बल देखा जाता है। सूर्य को नवग्रहों का बल माना गया है। सूर्य एक माह में राशि परिवर्तन करता है, चंद्रमा 2.25 दिन में, लेकिन गुरु एक वर्ष तक एक ही राशि में रहता है। यदि कन्या में गुरु चतुर्थ, अष्टम या द्वादश हो जाता है तो विवाह में एक वर्ष का व्यवधान आ जाता है।

चंद्र एवं सूर्य तो कुछ दिनों या महीने में राशि परिवर्तन के साथ शुद्ध हो जाते हैं, लेकिन गुरु का काल लंबा होता है। सूर्य, चंद्र एवं गुरु के लिए ज्योतिषशास्त्र के मुहूर्त ग्रंथों में कई ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिनमें इनकी विशेष स्थिति में यह दोष नहीं लगता। गुरु-कन्या की जन्मराशि से गुरु चतुर्थ, अष्टम तथा द्वादश स्थान पर हो और यदि अपनी उच्च राशि कर्क में, अपने मित्र के घर मेष तथा वृश्चिक राशि में, किसी भी राशि में होकर धनु या मीन के नवमांश में, वर्गोत्तम नवमांश में, जिस राशि में बैठा हो उसी के नवमांश में अथवा अपने उच्च कर्क राशि के नवमांश में हो तो शुभ फल देता है।

सिंह राशि भी गुरु की मित्र राशि है, लेकिन सिंहस्थ गुरु वर्जित होने से मित्र राशि में गणना नहीं की गई है। भारत की जलवायु में प्राय: 12 वर्ष से 14 वर्ष के बीच कन्या रजस्वला होती है। अत: बारह वर्ष के बाद या रजस्वला होने के बाद गुरु के कारण विवाह मुहूर्त प्रभावित नहीं होता है।

डॉ. विनोद शास्त्री

पंचांग के पांच अंग

पंचांग में पांच अंग होते हैं। ये हैं-तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण। एक मास में 30 तिथियां होती हैं कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या (१५ तिथि) तथा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक (15 तिथि)। वार 7होते हैं, 60 घटी (24 घंटे) का एक वार होता है।

रविवार से लेकर शनिवार तक 7 वार होते हैं। इनमें सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार को शुभ तथा रविवार, मंगल, शनिवार को क्रूर वार की संज्ञा दी गई है। सोमवार को चंद्र, मंगल को भौम, गुरु को बृहस्पति/वीर, शुक्रवार को भृगु एवं शनिवार को मंदवासरे से भी जाना जाता है।

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। नक्षत्र 27 होते हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। यह नक्षत्र उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के अंतिम चरण (१५ घटी) एवं श्रवण नक्षत्र की प्रथम 4 घटी से मिलकर बनता है। पंचाग में उपरोक्त नक्षत्रों का पूर्ण नाम नहीं लिखकर संकेत स्वरूप नाम का प्रथम अक्षर जैसे अश्विनी के लिए ‘अ’, भरणी के लिए ‘भ’, उत्तराषाढ़ के लिए ‘उ षा’ लिख दिया जाता है। ठीक इसी प्रकार वार के लिए भी प्रथम अक्षर जैसे गुरुवार के लिए गु- लिखा जाता है।

सूर्य-चंद्र की विभिन्न स्थितियों को योग कहते हैं। योग 27 होते हैं। एक तिथि में दो करण होते हैं एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी (१४) के उत्तरार्ध में शकुनि,अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किस्तुध्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं तथा भद्रा में शुभ कार्य वर्जित हैं।

नक्षत्र, योग एवं करण के सम्मुख पंचांग में घटी पल (२४/१२) दर्शाते हैं अर्थात उस दिन वह नक्षत्र/योग/करण सूर्योदय (सूर्य के उदय होने का समय) के पश्चात 24 घटी एवं 12 पल तक रहेगा जबकि पंचांग में चंद्र के सम्मुख लिखे हुए घटी पल उस राशि में प्रवेश का समय होता है, अर्थात २४ घटी 12 पल पर चंद्रमा इस राशि में प्रवेश करेगा।


पं. विनोद राजाभाऊ

शैतानी शक्तियों का नाशक - हीरा

प्राचीन समय से ही हीरा राजा-महाराजाओं की शान रहा है। आज के समय में हीरा हर घर, हर वर्ग को आकर्षित कर रहा है। महिलाओं के श्रंगार में हीरे जड़ित आभूषणों से तो उनका सौंदर्य और निखरता है। सभी रत्नों में हीरा सबसे कठोर एवं चमकीला है। यह एक स्वतंत्र खनिज है व घनाकार स्वरूप में हमें प्राप्त होता है। यह अच्छी पारदर्शिता के साथ सभी रंगों में आता है।

हीरे का मूल्य इसके भार, शुद्धता, रंग तथा पारदर्शिता को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। इसकी आंतरिक शुद्धता एवं रंग की श्रेणी का एक पैमाना होता है। वैसे तो हीरे के बहुत से कट होते हैं, किंतु गोल डबल कट सबसे ज्यादा चलन में है। इस कट में ५७ फलक होते हैं। इस कारण इसकी दीप्ति आकर्षक एवं सम्मोहित करने वाली होती है। हीरा शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र सभी ग्रहों में सबसे चमकीला है।

मूलांक ६ वाले जातक भी इस रत्न को धारण कर सकते हैं। हीरा पहनने से शैतानी शक्तियां नष्ट होती हैं। यह जातक के विचारों में दृढ़ता लाता है और उसके व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता है। इससे दांपत्य जीवन में मधुरता आती है। हीरे का रासायनिक गठन कार्बन है। इसे इंग्लिश में डायमंड कहते हैं।

डायबिटीज का ज्योतिषीय उपचार

मधुमेह (डायबिटीज) एक वंशानुगत रोग भी है। शरीर में जब इंसुलिन की कमी हो जाती है, तो यह रोग होता है। दवाओं से इसको काबू किया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जलीय राशि कर्क, वृश्चिक या मीन एवं शुक्र की राशि तुला में दो अथवा अधिक पापी ग्रह हों तो इस रोग की आशंका होती है। शुक्र के साथ ही बृहस्पति या चंद्रमा के दूषित होने, त्रिक् भाव में होने तथा शत्रु राशि या क्रूर ग्रहों (राहु, शनि, सूर्य व मंगल) से दृष्ट होने से भी यह रोग होता है।

प्रमुख कारण :ज्योतिष के अनुसार यदि मीन राशि में बुध पर सूर्य की दृष्टि हो या बृहस्पति लग्नेश के साथ छठे भाव में हो या फिर दशम भाव में मंगल-शनि की युति या मंगल दशम स्थान पर शनि से दृष्ट हो, तो यह रोग होता है। इसके अतिरिक्त लग्नेश शत्रु राशि में, नीच का या लग्न व लग्नेश पाप ग्रहों से दृष्ट हो व शुक्र अष्टम में विद्यमान हो। कुछ मामलों में चतुर्थ भाव में वृश्चिक राशि में शनि-शुक्र की युति भी डायबिटीज का कारण होती है।

अनुभूत ग्रह स्थितियां : कई बार ऐसे जातक भी देखने में आए हैं जिनकी कुंडली में लग्न पर शनि-केतु की पाप दृष्टि होती है। चतुर्थ स्थान में वृश्चिक राशि में शुक्र-शनि की युति, मीन पर सूर्य व मंगल की दृष्टि और तुला राशि पर राहु स्थित होकर चंद्रमा पर दृष्टि रखे, ऐसे में जातक प्रतिष्ठित, लेकिन डायबिटीज से भी पीड़ित होता है।

ज्योतिषीय उपाय : मधुमेह होने पर शुक्रवार को सफेद कपड़े में श्रद्धानुसार सफेद चावल का सोलह शुक्रवार तक दान करना चाहिए। यह दान किसी मंदिर या जरूरतमंद व्यक्ति को करना चाहिए। साथ ही त्नú शुं शुक्राय नम:त्न मंत्र की एक माला निरंतर करनी चाहिए। इसी प्रकार बृहस्पति व चंद्रमा की वस्तुओं का दान किया जाना चाहिए। शाम को या रात्रि में महामृत्युंजय मंत्र की माला करनी चाहिए। पुष्य नक्षत्र में संग्रह किए गए जामुन का सेवन करने व करेले का पाउडर सुबह दूध के साथ लेने से लाभ होता है।

शुभ नक्षत्रों में औषधि सेवन और हवन :नवीन औषधि का आरंभ अश्विनी, पुष्य, हस्त और अभिजीत नक्षत्रों में करना शुभ है। गोचरीय ग्रहों की अशुभता को शुभ करने के लिए औषधीय स्नान करना चाहिए। ग्रहों के दूषित होने पर हवन करवाना शुभ है। सूर्य की शांति के लिए समिधा, आक या मंदार की डाली ग्रहण करनी चाहिए। चंद्रमा के लिए पलाश, मंगल के लिए खदिर या खैर, बुध के लिए अपामार्ग या चिचिढ़ा, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए उदुम्बर या गूलर, शनि के लिए खेजड़ी या शमी, राहु के लिए दूर्वा तथा केतु के लिए कुशा की समिधा, सरल, स्निग्ध डाली हवन के लिए ग्रहण करनी चाहिए और ग्रहों के मंत्रों के साथ यज्ञाहुतियां देनी चाहिए।

नवग्रहों के न्यायाधीश

मानव के अंत:करण का प्रतीक शनि है। यह मनुष्य की बाह्य चेतना और अंत:चेतना को मिलाने में सेतु का काम करता है। पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति मंे भी शनि ग्रह की ही महती भूमिका रहती है। शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रह तो दूसरी राशि एवं ग्रहों के प्रभाव में पड़कर अपना फल देना भूल जाते हैं लेकिन शनि अपनी मौलिकता को कभी भी नहीं भूलता है।

शनि वात प्रधान ग्रह है। आयुर्वेद में वात पित्त एवं कफ प्रकृति के अनेक रोगों का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त व्यापार, यात्रा, संचार माध्यम, न्यायपालिका, वकील, चिकित्सा, चिकित्सालय, शेयर्स, सट्टा, वायदा, काल्पनिक चिंतन, लेखन, अभिव्यक्ति, राजनीति, प्राचीन शिक्षा, पुरा महत्व की वस्तुएं, इतिहास, रसायन, उद्योग-धंधे, वाहन, ट्रांसपोर्ट व्यवसाय, प्राचीन एवं परंपरागत कला, सेना एवं पुलिस के सामान्य सदस्य एवं सहायक उपकरण, शास्त्र, विस्फोटक पदार्थ आदि के अतिरिक्त भी अनेक कार्यक्षेत्र यथा जमीन जायदाद, ठेकेदारी, संन्यासी व नौकरियां शनि के अधीन रहती हैं। इसी के साथ मनोरोग, अस्थि रोग, वात रोग, जोड़ों के दर्द, नसों से संबंधी रोग, खून की कमी, खून में लौह तत्व की कमी, दमा, हृदय, कैंसर, क्षयरोग, दंतरोग, गुप्तरोग, ज्वर आदि भी शनि से नियंत्रित होते हैं।

आयुर्वेद शास्त्र में शरीर की रचना में अन्न से रस, रस से रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र का निर्माण बताया गया है।

शनि अस्थि का कारक ग्रह है। आयुर्वेद एवं ज्योतिष शास्त्र में शनि के गुणधर्म प्रभाव रोग एवं निदान एक जैसे ही होते हैं। मनुष्य के शरीर में रोग होने के कारण, रोग के निदान, रोग के लक्षण, औषधि, औषधि के प्रभाव एवं स्वभाव आदि सभी में एकरूपता दिखाई देती है।

आयुर्वेद एवं ज्योतिषशास्त्र में शनि को समान रूप से वर्णित किया गया है जिन्हें पांच भागों में विभक्त किया गया है

निष्पति साधम्र्य

ज्योतिष शास्त्र में शनि की उत्पत्ति सूर्य पत्नी छाया से मानी गई है तथा वात की उत्पत्ति आयुर्वेद के अनुसार आकाश एवं वायु महाभूत से मानी गई है। छाया भी शीत प्रधान एवं आकाश प्रधान है। अत: दोनों की उत्पत्ति एक ही स्थान से हुई है।

प्रकृति साधम्र्य

ज्योतिष शास्त्र में शनि की प्रकृति धूल-धूसरित केश, मोटे दांत, कृश, दीर्घ आदि वर्णित है, वहीं आयुर्वेद में वात की प्रकृति बतलाई गई है। अष्टांगहृदय में कहा गया है: दोषात्मका: स्फुटितधूसरकेशगात्रा।

स्थान साधम्र्य

ज्योतिष शास्त्र में शनि का स्थान शरीर में कमर, जंघा, पिंडली, कान एवं अस्थि आदि है। चरक संहिता में भी इन्हीं स्थानों को वात प्रधान बताया गया है।

व्याधि साधम्र्य

आयुर्वेद में वात का स्थान विशेष रूप से अस्थि माना गया है। शनि वात प्रधान रोगों की उत्पत्ति करता है आयुर्वेद में जिन रोगों का कारण वात को बताया गया है उन्हें ही ज्योतिष शास्त्र में शनि के दुष्प्रभाव से होना बताया गया है। शनि के दुष्प्रभाव से केश, लोम, नख, दंत, जोड़ों आदि में रोग उत्पन्न होता है। आयुर्वेद अनुसार वात विकार से ये स्थितियां उत्पन्न होती हैं।

प्रशमन एवं निदान साधम्र्य

ज्योतिष शास्त्र में शनि के दुष्प्रभावों से बचने के लिए दान आदि बताए गए हैं

माषाश्च तैलं विमलेन्दुनीलं तिल: कुलत्था महिषी च लोहम्।

कृष्णा च धेनु: प्रवदन्ति नूनं दुष्टाय दानं रविनन्दनाय॥

तेलदान, तेलपान, नीलम, लौहधारण आदि उपाय बताए गए हैं, वे ही आयुर्वेद में अष्टांगहृदय में कहे गए हैं। अत: चिकित्सक यदि ज्योतिष शास्त्र का सहयोग लें तो शनि के कारण उत्पन्न होने वाले विकारों को आसानी से पहचान सकते हैं। इस प्रकार शनि से उत्पन्न विकारों की चिकित्सा आसान हो जाएगी।

शनि ग्रह रोग के अतिरिक्त आम व्यवहार में भी बड़ा प्रभावी रहता है लेकिन इसका डरावना चित्र प्रस्तुत किया जाता है जबकि यह शुभफल प्रदान करने वाला ग्रह है। शनि की प्रसन्नता तेलदान, तेल की मालिश करने से, हरी सब्जियों के सेवन एवं दान से, लोहे के पात्रों व उपकरणों के दान से, निर्धन एवं मजदूर लोगों की दुआओं से होती है।

मध्यमा अंगुली को तिल के तेल से भरे लोहे के पात्र में डुबोकर प्रत्येक शनिवार को निम्न शनि मंत्र का 108 जप करें तो शनि के सारे दोष दूर हो जाते हैं तथा मनोकामना पूर्ण हो जाती है। ढैया सा साढ़े साती शनि होने पर भी पूर्ण शुभ फल प्राप्त होता है।

शनि मंत्र : ú प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।


डॉ. विनोद शास्त्री

पूजा हमें रिचार्ज करती है

हजारों वर्षो से जन्म और ईश्वर को लेकर जो स्वरूप और विचार सामने आया है उसमें मतभेद, विवाद, अस्वीकृ ति बनी ही रही है। कई लोगों का मानना है कि ईश्वर की सत्ता को सवीकार करने का अर्थ है स्वयं के कर्मयोगी स्वरूप को नकारना। अनेक पुरूषार्थी लोग यह कहते हैं कि जब हम ही करने वाले हैं, हम ही भोगने वाले हैं तो भगवान की क्या जरूरत, उस परम सत्ता के चक्कर में तो हम अपनी सत्ता से भी हाथ धो बैठेंगे।

दरअसल में ऐसे विचार इसलिए उठते हैं कि हम उस परम सत्ता से ठीक से जुड़ नहीं पाते। ईश्वर से जुड़ने के लिए सबसे सरल माध्यम है पूजा। कर्मकांड में जब भावना अपना महत्व बढ़ाने लगे तो वह पूजा का सही स्वरूप है। जीवन प्रबंधन का चौथे सूत्र पूजा से मनुष्य में चार गुण स्थापित होंगे। अनुशासन, परिश्रम, धर्य और दूरदर्शिता। इसीलिए न सिर्फ हिंदुओं ने बल्कि सभी धर्मो ने पूजा की एक निश्चित ड्रिल बनाई है। कब, क्या, कितना करना इसमें एक अनुशासन छिपा है।

आज केवल हिंदू धर्म की बात करें तो सबसे पहले सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। सूर्य को जल चढ़ाना धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है असल में प्रकृति के तेज को प्रतिदिन अपने भीतर आमंत्रित करने की क्रिया है। तुलसी को प्रतिदिन जल चढ़ाया जाए। तुलसी प्रकृति का वह पौधा है जिसमें शांति के तत्व बसे हैं, यह वनस्पति विज्ञान का घोषित तथ्य है। जिनके आंगन में तुलसी है समझ लें उन्होंने शांति को आमंत्रण दे रखा है। गाय को गोग्रास देने का अर्थ है एक निश्छल आत्मा को अपने भीतर उतारना।

जीवविज्ञान का यह मान्य तथ्य है कि गाय जैसी शुद्ध आत्मा और किसी पशु की नहीं है। पंचदेव पूजा यह अपने आप में पृथक विषय है जिसका विस्तार इसी स्तंभर में फिर कभी। लेकिन देवपूजा का अर्थ है अपने पुरूषार्थ के साथ किसी और परमशक्ति पर भरोसा करना जो बिल्कुल भी अनुचित नहीं है।

नित्यपूजा का अगला क्रम है किसी न किसी ग्रथ का पाठ प्रतिदिन किया जाए। शुभ साहित्य के शब्द आपके चिंतन को सकारात्मक और सृजनशील बनाएंगे। इसके बाद जीवित माता-पिता, वृद्धजन तथा दिवंगत पितृजनों को प्रतिदिन प्रणाम करने का अर्थ है अपने भीतर की ऊर्जा को उपर उठाना। बड़े-बूढ़े हमारे इस व्यक्तित्वरूपी वृक्ष के ये बीज हैं और कोई भी पेड़ कभी बीज से बड़ा नहीं होता। नित्यपूजा की अंतिम गतिविधि है प्रतिदिन किसी भी मंदिर जाया जाए। मंदिरों को केवल ईंट और गारे का ढांचा न माना जाए ये उर्जा के केंद्र हैं। हमारी दैहिक ऊर्जा यहां की प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमाओं से रिचार्ज होगी ही।

नित्य पूजा का यह अनुशासन, परिश्रम हमारे भीतर उस धर्य और दूरदर्शिता को बढ़ता है जिसकी जरूरत आज हर क्षेत्र में है ही और यदि किसी दिन ऐसा न भी कर पाएं तो एक काम जरूर करें जरा मुस्कुराएं......।

पं. विजयशंकर मेहता

कर्मो से बनाएं मंद ग्रहों को बलशाली

वैदिक ज्योतिषbook के अनुरूप लाल किताब में भी कर्म की महत्ता है। संचित कर्म और भाग्य का गहरा संबंध है और कर्मो का फल मनुष्य को अवश्य भोगना पड़ता है। कुंडली के ग्रहों का शुभ-अशुभ प्रभाव जन्मकुंडली में उनकी स्थिति, बल, दृष्टि तथा प्रभाव के आधार पर निर्धारित होता है।

लाल किताब ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति और दृष्टि आदि के आधार पर मंदा और शुभ फल देने का वर्णन है। मंद ग्रहों के घर में या राहु, बुध या शुक्र के साथ मंदा माना गया है। चंद्रमा के साथ उसके शत्रु ग्रह जैसे राहु, केतु या शनि हों या किसी प्रकार का दृष्टि संबंध हो तो भी चंद्र का फल अशुभ हो जाता है।

लाल किताब के अनुसार हर ग्रह के दो असर होते हैं - शुभ और अशुभ। जब कोई ग्रह ठीक हालत में हो तो वह आपके लिए शुभ असर देता है और वही ग्रह यदि अपने कर्मा या दृष्टि प्रभाव से मंदा असर दे तो कष्टप्रद बन जाता है। कोई भी ग्रह चाहे जितना भी शुभ क्यों न हो, आजीवन शुभ फल नहीं दे सकता और इसी प्रकार कोई ग्रह कितना भी अशुभ क्यों न हो, जीवन भर अशुभ फल नहीं देता।

इसीलिए लाल किताब में वर्षफल कुंडली तथा जन्मकुंडली दोनों के तालमेल से ही उपाय बताए जाते हैं। सिर्फ वर्षकुंडली या जन्मकुंडली देखकर कोई भी उपाय करना ठीक नहीं होता, क्योंकि यदि जन्मकुंडली के अशुभ ग्रह उस साल वर्षफल में शुभ स्थान में स्थित हों तो उनके उपाय की जरूरत नहीं होती।

इन सिद्धांतों के आधार पर यदि कोई ग्रह नेक हालत में भी हो तो भी कई बार देखा गया है कि व्यक्ति को उसके अच्छे प्रभाव नहीं मिल रहे होते और वह कष्ट में पड़ जाता है। यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि कुंडली का नेक ग्रह भी मंदा फल दे सकता है।

उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का बृहस्पति लग्न में या चौथे घर में उत्तम फलदायक है और अन्य ग्रहों से युति, मित्रता, शत्रुता और दृष्टि सिद्धांत द्वारा भी नेक हालात में है, लेकिन वह व्यक्ति अपने पिता, दादा या आदर योग्य व्यक्ति की अवहेलना और निरादर करे तो उसका उत्तम बृहस्पति भी निष्फल हो जाता है। ऐसे में जातक को मानहानि, अप्रतिष्ठा, पुत्र-सुख की कमी, शत्रुओं द्वारा हानि जैसे कष्ट संभव हैं।

इसी प्रकार अपने भाइयों के साथ बेईमानी करने वाले व्यक्ति का मंगल नीच हो जाता है और उत्तम मंगल भी नीच प्रभाव देना आरंभ कर देता है, लेकिन मंदे मंगल वाला व्यक्ति भी यदि अपने भाइयों के साथ नरमी और प्यार का बरताव करता रहे तो नीच मंगल भी अच्छा फल देने लगता है।

शनि सातवें, दसवें और ग्यारहवें घर में उत्तम प्रभाव देता है, परंतु व्यक्ति यदि शराब, मांस, अंडे का प्रयोग करता है, झूठ बोलता है, पराई स्त्री से संबंध रखता है या किसी को धोखा देता है तो यह शनि के प्रभाव को मंदा कर देता है। शनि को मंदा करने वाली इन आदतों से दूर रहकर व्यक्ति अपने अशुभ शनि के प्रभावों से बच भी सकता है।


सुमन पंडित

कब मिलेगी कार?

मध्यम वर्ग में वाहनों विशेषकर कार का क्रेज बढ़ गया है। इधर विदेश यात्राओं व पर्यटन ने हवाई यात्राओं की आवृत्ति भी बढ़ा दी है। क्या इसके भी केाई योग होते हैं? ज्योतिषीय दृष्टि से इनका आकलन करें तो जवाब मिलता है- हां। वाहन सुख का कुंडली में स्पष्ट संकेत होता है। जन्मकुंडली का आधार इसके बारह भाव, बारह राशियां व नौ ग्रह हैं।

संसार की तमाम जड़-चेतन, चर-अचर वस्तुएं, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फल-फूल इत्यादि सभी जन्मकुंडली के बारह भावों, बारह राशियों व नौ ग्रहों को आवंटित हैं। मोटे तौर पर जन्मकुंडली के पहले भाव से सेहत, दूसरे भाव से धन, तृतीय भाव से धैर्य शक्ति, चतुर्थ भाव से सांसारिक सुख, पंचम भाव से संतान, षष्ठ भाव से रोग, ऋण व शत्रु, सप्तम भाव से वैवाहिक जीवन, अष्टम भाव से आयु-मुत्यु, नवम भाव से भाग्य, दशम भाव से व्यवसाय, एकादश भाव से आय तथा द्वादश भाव से व्यय का विचार किया जाता है।

चूंकि सांसारिक सुखों का विचार जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव से किया जाता है। अत: वाहन सुख का विचार इसी भाव से किया जाता है - ‘चंद्र’ ग्रह इस भाव का स्थाई कारक है जबकि ‘शुक्र’ ग्रह वाहन सुख का कारक है।

स्वर ज्ञान से पाएं तेजोमयी शक्तिरूपा पुत्री

आज संपूर्ण विश्व पुरुष व स्त्री में समान हक व नेतृत्व की बात कर रहा है। भारत में भी पहल हो रही है। जातक ग्रंथकार के रूप में प्रसिद्ध ज्योतिर्विद आचार्य वराहमिहिर, यवनाचार्य मीनराज एवं कल्याण वर्मा ने संस्कारी व प्रतापी संतानोत्पति को लेकर अपने ग्रंथों में कहा है कि तिथि, वार, नक्षत्र लग्न का ध्यान रखकर ही पुरुष व स्त्री को यह गर्भाधान यज्ञ पूर्ण करना चाहिए।

इस विषय में स्वरोदय शास्त्र निर्धारित दिन व स्वर ज्ञान से ही विशिष्ट, बली, तेजस्वी व मनवांछित संतान प्राप्ति की जानकारी देता है।

महान, वैभवशाली व देश को नेतृत्व प्रदान करने वाली पुत्री की इच्छा रखने वाले पुरुषों को चाहिए, कि वे पत्नी को अपने दाएं तरफ शयन कराएं। इस प्रकार शयन करने से पुरुष दायीं करवट से व स्त्री बायीं करवट से एक-दूसरे को देखेंगे।

उस समय अपना स्वर परीक्षण करेंगे तो देखेंगे कि पुरुष का चंद्र स्वर (बायां) व स्त्री का सूर्य स्वर (दायां) चल रहा होगा। यही पहला ध्यान रखना होगा।

दूसरा ध्यान पुरुष को यह रखना है, कि अपनी पत्नी के रजस्वला होने की प्रथम रात्रि से गिनकर सिर्फ नवम एवं पंद्रहवीं रात्रि को ही समागम करें। ऐसे गर्भाधान यज्ञ से प्राप्त पुत्री संतान आपका, परिवार का, प्रांत व अपने देश का नाम अवश्य ही रोशन करेगी।

व्यक्ति के कर्म बनाते हैं बृहस्पति को शुभ-अशुभ

व्यक्ति के कर्म बनाते हैं बृहस्पति को शुभ-अशुभ  बृहस्पति नवग्रहों में सबसे शुभ है। कुंडली में शुभ बृहस्पति की स्थिति राजयोग कारक है। लाल किताब में बृहस्पति को जगत गुरु और ब्रह्मा जी महाराज कहा गया है। उच्च या प्रबल बृहस्पति वाले व्यक्ति का माथा चौड़ा और रंगत सोने जैसी होती है। ऐसे व्यक्ति का बोलचाल गुरु की तरह गंभीर, नेक और बड़प्पन से युक्त होता है। वह आत्मविश्वास से भरपूर और धर्म के रास्ते पर चलने वाला होगा।

बृहस्पति का पक्का घर कुंडली का नवम भाव है, इसके अलावा यह एक से पांच भाव और 12वें भाव में भी शुभ असर देता है। आमतौर पर छठे, सातवें, आठवें और दसवें घर में बृहस्पति का मंदा असर सामने आता है। लाल किताब के अनुसार बृहस्पति के मंदे या नेक असर को समझने के लिए हमें कुंडली के सभी घरों और उनमें स्थित ग्रहों को भी देखना जरूरी है। यदि दूसरे, पांचवें, नौवें और बारहवें भाव में बृहस्पति के शत्रु ग्रह हों, जैसे शुक्र, बुध और राहु या ये ग्रह बृहस्पति के साथ हों, तो बृहस्पति का असर मंदा होगा। यदि बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में या चौथे भाव में हो या अपने कारक घरों (2,5,9,12) में हो, तो शुभ असर होगा।

बृहस्पति मान-सम्मान, संतान सुख और विद्या का कारक है। बृहस्पति के निर्बल होने पर या अपने कर्मो द्वारा निर्बल कर लिए जाने पर इसके शुभ फल नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति के अपने आचरण, व्यवहार, कामकाज, रिश्तेदारों, मकान तथा अन्य कई प्रकार की स्वयं से जुड़ी स्थितियों, चीजों और हालातों से भी किसी ग्रह का असर प्रभावित होता है। जैसे यदि बृहस्पति कुंडली में नौवें घर में हो और किसी भी तरीके से अशुभ न हो। लेकिन ऐसी स्थिति में यदि व्यक्ति पीपल के दरख्त कटवाए या पिता, साधु-संतों, बुजुर्गो, ब्राह्मणों की अवहेलना या अपमान करने लगे तो उसका उत्तम बृहस्पति भी निष्फल हो जाएगा। ऐसे समय सिर पर चोटी के स्थान के बालों का उड़ना, शिक्षा में अड़चनें आना, सोना चोरी होना, बेचना या खोना, बदनामी होना, झूठी अफवाहें फैलना आदि बृहस्पति के अशुभ असर की निशानी होती हैं।

कुंडली में मित्र ग्रहों सूर्य, चंद्रमा और मंगल के साथ युति होने से बृहस्पति की शक्ति में वृद्धि होती है और शुभ फल मिलते हैं। सूर्य के साथ होने पर बृहस्पति प्रतिष्ठा दिलाता है। बुध, शुक्र और राहु, बृहस्पति के शत्रु ग्रह हैं और दृष्टि या युति द्वारा इसके असर को प्रभावित करते हैं। ऐसे में बृहस्पति के मित्र ग्रहों के उपाय से सहायता मिलती है। शुक्र द्वारा बृहस्पति पीड़ित हो तो सूर्य और मंगल के उपाय सहायक होते हैं। इसी प्रकार राहु से बृहस्पति पीड़ित हो तो सूर्य, चंद्र और मंगल के उपाय सहायक होते हैं।

यदि जन्मकुंडली में बृहस्पति सातवें घर में हो, तो घर में मंदिर बनाने और रोज पूजा-पाठ करने से इसका फल मंदा हो जाता है। घर में रखी चीजें, व्यक्ति का आचरण, व्यवहार आदि भी जन्म पत्रिका के ग्रहों के फल पर शुभ या अशुभ असर डालता है। कुंडली के दसवें घर में बृहस्पति हो तो घर के पश्चिम भाग में पूजा स्थान बनाने से भी बृहस्पति मंदा प्रभाव देते हैं, क्योंकि दसवें भाव में बृहस्पति नीच का माना जाता है।

सुमन पंडित

स्वप्न - फल.

दोस्तों आज हम आपको बता रहे है स्वपन फल के बारे में:

dreams

गिरना
खुद को कहीं से गिरते हुए देखना दर्शाता है कि आपका आने वाला समय स्ट्रगल भरा होगा, लेकिन अगर आपने सपने में खुद को गिरकर उठते हुए भी देखा है तो आप जीवन में और प्रगति करेंगे।

बाढ़ का प्रकोप
यह बीमारी, व्यापार में नुकसान, नाखुश या अव्यवस्था बने रहने की निशानी है।

खेत-खलिहान
खेत-खलिहान देखने का अर्थ है कि आपके विकास का समय शुरू हो गया है। आपका आने वाला समय व्यस्तता से भरा है और आप परेशानी में भी घिर सकते हैं।

आग देखना
अग्नि ह्यूमन इमोशंस को दर्शाती है। महिलाओं को स्वप्न में अग्नि दिखना वैवाहिक जीवन में समस्याओं का द्योतक है।

फूल देखना
फूल स्वप्न देखने वाले की भावनाओं को बताता है। यह हमारे ग्रह के जीवन चक्र व बनने- बिगड़ने को भी दर्शाता है।

Thursday, December 3, 2009

मानसिक तनाव और कारण

किसी भी मनुष्य के जीवनकाल में उसका स्वास्थ्य और बीमारी इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे घर के ग्रह आठवें घर को बचाने में कितने सक्षम हैं। आठवें घर के ग्रह सदैव वक्र दृष्टि से दूसरे घर को देखते हैं। दूसरा घर आठवें घर का द्वार है। आठवें घर से ही रोग व मृत्यु का निर्धारण किया जाता है, साथ ही साथ दूसरे, छठे, बारहवें घर का भी विश्लेषण किया जाता है।

वषर्फल में तीसरे व पांचवे घर में आने वाले ग्रह स्वास्थ्य, फिजूलखर्च, धन की प्राप्ति और मृत्यु को बताते हैं। भले ही दूसरे घर का ग्रह मृत्यु को रोकने वाला हो फिर भी ग्यारहवे घर का ग्रह धोखा देगा और आठवां मृत्यु का कारक होगा। पांचवां घर टकराव के लिए तथा बारहवां व तीसरा घर बीमारी तथा मृत्यु के फैसले के लिए न्यायाधीश होगा।

रक्त से संबंधित जो रोग हैं वे रक्त का प्रवाह असंतुलित होने या रक्त में प्रदूषण के कारण होते हैं। रक्त से संबंधित रोग हीमोग्लोबिन कम होना, इंसोमेनिया, हाइपरटेंशन, कैंसर, ट्यूमर, हार्टअटैक, हैपेटाइटिस आदि हैं। यहां तक कि मधुमेह भी मंगल व शुक्र का संबंध असंतुलित होने के कारण होता है। जब भी किसी व्यक्ति को इन रोगों के कारण परेशानी होती है, मंगल ग्रह का सही विश्लेषण हम दो स्थिति में कर सकते हैं।

कुंडली का पहला घर यानी एक नंबर राशि में मंगल शुभ होता है और अक्सर राजयोग कारक होता है। पर वृश्चिक राशि यानी आठवीं राशि का मंगल मारक होता है अर्थात मंगल बद होता है। किसी कुंडली में मंगल के साथ, बृहस्पति या चंद्र हो तो मंगल बद नहीं होता है। शुभ मंगल शुभ फल देता है और अगर कुंडली में मंगल शुभ है और उसके साथ बृहस्पति, सूर्य अथवा चंद्र शुभ फल दे रहे हैं तो ऐसा व्यक्ति अक्सर शासक होता है।

चंद्र का संबंध मन से है। चंद्र पानी भी है, इसी प्रकार यदि मंगल, चंद्र दोनों में से कोई दूषित है तो निश्चित ही मनुष्य रक्तचाप, हाइपरटेंशन से पीड़ित होगा। सूर्य, बुध की युति व दृष्टि से हो या साथ-साथ होने से वही फल देगी जो अकेला मंगल देता है और सूर्य अथवा बुध इनमें से कोई एक दूषित अथवा अशुभ है और चंद्र से संबंध हो जाता है तो निश्चित ही जातक को मानसिक तनाव, रक्तचाप अथवा हार्टअटैक होगा।

इसको दूर करने के लिए कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करें और यह देखें कि चंद्र व मंगल में से कौन सा ग्रह अशुभ फल दे रहा हैे। इसी आधार पर सूर्य, बुध की युति से मंगल बन रहा है और उसका चंद्र से संबंध हो गया है तो कहीं ने कहीं दोष होने से उपरोक्त बीमारियां मनुष्य को घेर सकती है।

ऋषि पूजन से पाएं बुद्धि, पद और प्रतिष्ठा - डॉ. श्रीकृष्ण

भारत को ऋषियों की भूमि कहा जाता है। महर्षि कश्यप के कारण ही सर्ग या सृष्टि का विकास हुआ। विष्णु पुराण, मरकडेय और मत्स्यपुराण में ऋषियों के सर्ग का विवरण है। इन्हीं ऋषियों ने ब्रrा से प्राप्त ज्ञान की विभिन्न शाखाओं को उन्नत किया।

जीवन में ऋषितुल्य बुद्धि, पद व प्रतिष्ठा पाने के लिए ऋषि पंचमी पर सात ऋषियों की आराधना करनी चाहिए। इस दिन दूब, सांवा और मलीची नामक वनस्पति घास के प्रतीकात्मक पुतले बनाकर उनको पूजना चाहिए और व्रत रखना चाहिए। हो सके तो इस दिन किसी भी रूप में अन्न का आहार नहीं लें।

भारत को ऋषियों की भूमि कहा जाता है। मित्रावरुण और उनके पुत्र अगस्त्य एवं वशिष्ठ ने जिस ऋषि प्रज्ञा की नींव डाली, वह इस संस्कृति को उन्नत करने वाली रही। एक दौर में तो महर्षि कश्यप के कारण ही सर्ग या सृष्टि का विकास हुआ। विष्णु पुराण, मरकडेय और मत्स्य पुराण में ऋषियों के सर्ग का विवरण है।

इन्हीं ऋषियों ने हमारे यहां ब्रrा से प्राप्त ज्ञान की विभिन्न शाखाओं को उन्नत किया। महर्षि भारद्वाज के ‘यंत्र सर्वस्व’ में विभिन्न ऋषियों के अनुसंधान से विमान विद्या, जल विद्या, वाष्प विद्या, स्वचालित यंत्र विधा जैसे दर्जनों विज्ञानों के विकास की जानकारी मिलती है।

वायु पुराण के मतानुसार वास्तु ग्रंथ समरांगण सूत्रधार के महासर्गादि अध्याय में वृक्षों के साथ रहने वाले मानव समुदाय के विज्ञान सम्मत विकास का वर्णन है, जिन्होंने कभी देव रूप में तो कभी ऋषि रूप में अनुभव लिया।

उन्होंने सर्वप्रथम अनाज के रूप में सांवा (शाली तंडुल) को आहार के रूप में लिया और ज्ञानार्जन में अपने को लीन किया। हालांकि वे बाद में भूरस के स्वाद के कारण उच्छृंखल होते गए। इसलिए ऋषि पंचमी को ऋषिधान्य के रूप में सांवा की खिचड़ी (कृसरान्न) या खीर बनाकर आहार किया जाता है।

अपने परिवार में पुत्र-पुत्रियों के ऋषिप्रज्ञा होने की कामना से सप्त ऋषियों की पूजा की जाती है। एक प्रकार से यह ऋषियों की प्रज्ञा को सम्मान देने का स्मृति पर्व है। इसलिए अंगिरा, गर्ग आदि का पूजन भी किया जाना चाहिए। दूब, सांवा, मलीची नामक घास को एकत्रित कर तृणों के सात पुंज या समूह बनाएं और प्रत्येक पुंज पर लाल कपड़ा अथवा मौली लपेटें। पूजा स्थल पर इन्हें दूध, जल से स्नान करवाएं और धूप, दीप कर खीर अर्पण करें।

इस अवसर पर बृहस्पति, गर्ग, भारद्वाज, विश्वामित्र, विश्वकर्मा आदि का स्मरण करें। जो ऋषि जिस विद्या से संबंधित हो और अपना परिवार जिस विद्या से धनार्जन करता हो, उस ऋषि का पूजन करने से संबंधित कार्य में दोगुने लाभ, पद, पदोन्नति और यश की प्राप्ति होती है।

शनि - प्रबंध, प्रशासन एवं संपन्नता के देव - पं. विनोद राजाभाऊ

नवग्रहों में शनि ग्रह के नाम से ही सभी भयभीत रहते हैं। शनि सूर्य के पुत्र हैं। सूर्य के प्रचंड तेज के कारण इनका शरीर काला हो गया इसीलिए शनिदेव क्रूरता, कुरूपता, तामसी प्रवृत्ति के लिए विख्यात हैं। इनका कश्यप गोत्र है। शनि देव का वाहन गिद्ध नामक पक्षी है जो अपनी तीक्ष्ण एवं दूरदृष्टि के लिए विख्यात है। शनि बारह राशियों में मकर एवं कुंभ राशि के स्वामी एवं तुला राशि में 20 अंश तक परम उच्च एवं मेष राशि में 20 अंश तक नीच माने जाते हैं। शनि की बुध एवं शुक्र ग्रह से मित्रता, गुरु से समभाव तथा सूर्य, चंद्र, मंगल से शत्रुता है। शनि वक्री तथा चंद्र की युति होने पर अधिक बली होता है।

शनि नीले एवं काले रंग का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए प्रशासन-प्रबंध का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था चाहे वह भारत की हो या अन्य देश की, उनका प्रतीक चिह्न्, वेशभूषा में नीला-काला रंग अवश्य होता है। शनि की साढ़े साती के आरंभिक काल में कुछ परेशानी आती है (यह परिश्रम है) किंतु उत्तरार्ध में परेशानी दूर होकर संपन्नता, प्रसन्नता, पद, प्रतिष्ठा, विजय मिलती है।

यदि जन्म पत्रिका में बलवान शनि हो तो जातक को राजकीय पक्ष की अनुकूलता, धन संपदा, वाहन, मकान सुख, शिक्षा में सफलता, उच्च नौकरी, पद प्रतिष्ठा, पौत्र, लक्ष्मी की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। कुंडली में छठे, आठवंे, दसवें एवं ग्यारहवें स्थान पर शनि को कारक ग्रह माना जाता है। आइए जाने द्वादश भावों में स्थित शनि के क्या फल होते हैं।

प्रथम भाव में शनि

ऐसा जातक श्रेष्ठ प्रशासक, कुटनीतिज्ञ, दूरदृष्टि युक्त, परिश्रमी, विद्वान, गुणी एवं उच्च पद को प्राप्त करता है।

द्वितीय भाव में शनि

दूसरे भाव का शनि जीवन के आरंभिक काल में कठिनाई देता है परंतु जीवन में कठिन परिश्रम से धन जुटा कर यौवनावस्था एवं वृद्धावस्था में सुख एवं संपन्नता देता है।

तृतीय भाव में शनि

जातक साहसी, वीरता एवं कर्मण्यता में अग्रणी रहता है एवं अपने आदर्शो पर जीता है व संस्था प्रमुख का पद ग्रहण करता है।

चतृर्थ भाव में शनि

जातक माता-पिता से दूर जाकर अपने परिश्रम से सफलता एवं संपन्नता प्राप्त करता है। पंचम भाव में शनि

जातक को शिक्षा में कुछ अवरोधों के साथ सफलता मिलती है। शिक्षा के लिए घर से दूर जाना पड़ता है। प्रबंध या तकनीकी विषय की उच्च शिक्षा ग्रहण करता है।

षष्ठम भाव में शनि

जातक सुस्वाद, नमकीन व्यंजनों का शौकीन, विरोधियों को परास्त करने वाला, समाज एवं कुल में सम्मान प्राप्त करता है।

सप्तम भाव में शनि

सप्तम शनि प्रेम प्रसंग, प्रेम विवाह एवं जीवनसाथी के प्रति अधिक आकषर्ण उत्पन्न करता है। विवाह में विलंब एवं अधिकारी जीवनसाथी प्रदान करता है।

अष्टम भाव में शनि

अष्टम शनि लंबी आयु का कारक है तथा घर से दूर जाकर जीवनयापन कराता है। परिवार के प्रति विशेष लगाव रहता है। यौवनकाल उत्तम व्यतीत होता है।

नवम भाव में शनि

नवम शनि वाचाल, राजनीति में निपुण, परिश्रमी, लंबी यात्राओं का लाभ तथा जीवन के 28वें वर्ष के पश्चात भाग्योदय कराता है।

दशम भाव में शनि

जातक राजकीय पक्ष की अनुकूलता, राज्य से लाभ, उच्च अधिकारी, आर्थिक संपन्नता, कला आदि के प्रति रुचि तथा ऐश्वर्य से जीवन व्यतीत करता है।

एकादश भाव में शनि

जातक एक श्रेष्ठ प्रशासनिक एवं उच्च पदस्थ अधिकारी होता है। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। अपनी प्रखरता से लोकप्रियता प्राप्त करता है। साथ ही बौद्धिक कुशाग्रता से यश-धन अर्जित करता है।

द्वादश भाव में शनि

द्वादश भाव स्थित शनि जीवन में पूर्णता प्रदान करता है। ऐसा जातक प्रख्यात धनी, समाज, कुल एवं देश में लोकप्रियता अर्जित करता है। नौकरी में धीरे-धीरे प्रगति करते हुए उच्च पद को प्राप्त करता है। यात्रा एवं स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाता है।

भारत में स्व. इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी तो पाकिस्तान में परवेज मुर्शरफ आदि शनि ग्रह से प्रभावित होने के कारण ही कुशल प्रशासक सिद्ध हुए हैं। शनि कर्मप्रधान ग्रह है। अत: श्रेष्ठ कर्म से ही पद, प्रतिष्ठा, संपन्नता की प्राप्ति संभव है।

जनम कुंडली में सथानीय समय कैसे निकाले ?

जन्म कुंडली बनाने के लिए जन्मतिथि, समय एवं स्थान की आवश्यकता होती है। हमें जो समय ज्ञात है वह स्टैंडर्ड टाइम है जबकि हमें उस निश्चित स्थान के (जहां जन्म हुआ है) स्थानीय समय की आवश्यकता रहती है। ऐसी स्थिति में पहले हमें समय का परिवर्तन (शुद्ध) करना होगा। इसके लिए वेलांतर संस्कार एवं देशांतर संस्कार करने की आवश्यकता होती है।

वेलांतर संस्कार हेतु वेलांतर सारिणी पंचांग तथा ज्योतिष के विभिन्न ग्रंथों में उपलब्ध हैं। उसमें निश्चित अंग्रेजी माह की तारीख एवं माह को देखकर निर्धारित मिनट-सेकंड स्टैंडर्ड टाइम में से कम या जोड़ देंगे (जैसा कि सारिणी में + या - हो)। वेलांतर संस्कार करने के पश्चात देशांतर संस्कार करना होता है।

भारतीय मानक समय (स्टैंडर्ड टाइम) 82.30 डिग्री रेखांश/देशांश/तुलांश का है। इसी आधार पर पूरे देश की घड़ियां चलती है। जबकि प्रत्येक शहर का स्थानीय समय भिन्न होता है। ज्योतिषी को चाहिए कि वे जिस शहर में बालक जन्मा है उस शहर या उसके नजदीकी शहर का देशांतर ज्ञात कर लें।

प्राप्त देशांतर का स्टैंडर्ड देशांतर 82.30 डिग्री से अंतर निकाल लें। प्राप्त अंतर को 4 से गुणा कर लें। प्राप्त फल को अभीष्ट समय से घटाएं/जोडं (यदि नियत स्थान का देशांतर 82.30 डिग्री से अधिक है तो जोड़ें, किंतु 82.30 डिग्री से कम है तो घटाएं) उदाहरण के रूप में दिनांक 1 जनवरी 2008 को प्रात: 9.40 पर बालक का जन्म उज्जैन में हुआ।

वेलांतर सारिणी के अनुसार 1 जनवरी का वेलांतर -4 मिनट है। अत: वेलांतर संस्कार करने से जन्म 9.36 (9.40 - 0.4 = 9.36) हुआ। उज्जैन का देशांतर 75.50 है। इसे भारतवर्ष के स्टैंडर्ड मापक देशांतर 82.30 से कम किया (82.30 - 75.50 = 6.40) तो - 6.40 अंतर आया इसे 4 से गुणा करने पर 26 मिनट एवं 40 सेकंड आया।

इसे 9.36 में से कम किया गया क्योंकि उज्जैन का देशांतर भारतवर्ष के देशांतर 82.30 से कम है। 9.36 - में से 26 मिनट 40 सेकंड कम करने से स्थानीय समय 9 बजकर 09 मिनट एवं 20 सेकंड आया। यही बालक (जातक) का शुद्ध स्थानीय समय है।

उज्जैन जन्म समय 9.40.00 स्टैं.
9.40.00 स्टैं. जन्म समय
- 0.04.00 वेलांतर समय
9.36.00
- 0.26.40 देशांतर संस्कार
9.09.20 शुद्ध स्थानीय समय उज्जैन

Tuesday, November 24, 2009

गणेश जी दूर करें वास्तुदोष - डॉ. श्रीकृष्ण

भगवान गणेश विघ्न विनाशक माने गए हैं। वास्तुपूजन के अवसर पर गणेश को प्रथम न्योता और पूजा जाता है। जिस घर में गणेश की पूजा होती है, वहां समृद्धि की सिद्धि होती है और लाभ भी प्राप्त होता है।

गणेश जी की स्थापना अपने भवन के द्वार के ऊपर और ईशान कोण में पूजा जा सकता है किंतु गणेश जी को कभी तुलसी नहीं चढ़ाएं। गणेश चतुर्थी पर विनायक की प्रतिमा पर सिंदूर चढ़ाने से सुख मिलता है और चमकीला पन्ना चढ़ाने पर पूजक को आरोग्य मिलता है।

अन्य वास्तुप्रयोग >>>

>> यदि भवन में द्वारवेध हो तो वहां रहने वालों में उच्चटन होता है। भवन के द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि के होने पर द्वारवेध माना जाता है। ऐसे में भवन के मुख्य द्वार पर गणोशजी की बैठी हुई प्रतिमा लगानी चाहिए किंतु उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।

>> जिस रविवार को पुष्य नक्षत्र पड़े, तब श्वेतार्क या सफेद मंदार की जड़ के गणेश की स्थापना करनी चाहिए। इसे सर्वार्थ सिद्धिकारक कहा गया है। इससे पूर्व ही गणेश को अपने यहां रिद्धि-सिद्धि सहित पदार्पण के लिए निमंत्रण दे आना चाहिए और दूसरे दिन, रवि-पुष्य योग में लाकर घर के ईशान कोण में स्थापना करनी चाहिए।

>> घर में पूजा के लिए गणेश जी की शयन या बैठी मुद्रा में हो तो अधिक उपयोगी होती है। यदि कला या अन्य शिक्षा के प्रयोजन से पूजन करना हो तो नृत्य गणेश की प्रतिमा या तस्वीर का पूजन लाभकारी है।

>> संयोग से यदि श्वेतार्क की जड़ मिल जाए तो रवि-पुष्य योग में प्रतिमा बनवाएं और पूजन कर अपने यहां लाकर विराजित करें। गणोश की प्रतिमा का मुख नैर्ऋत्य मुखी हो तो इष्टलाभ देती है, वायव्य मुखी होने पर संपदा का क्षरण, ईशान मुखी हो तो ध्यान भंग और आग्नेय मुखी होने पर आहार का संकट खड़ा कर सकती है।

>> पूजा के लिए गणेश जी की एक ही प्रतिमा हो। गणोश प्रतिमा के पास अन्य कोई गणोश प्रतिमा नहीं रखें।

>> गणेश को रोजाना दूर्वा दल अर्पित करने से इष्टलाभ की प्राप्ति होती है। दूर्वा चढ़ाकर समृद्धि की कामना से ऊं गं गणपतये नम: का पाठ लाभकारी माना जाता है। वैसे भी गणपति विघ्ननाशक तो माने ही गए हैं।

ग्रह प्रभाव और रोग

ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उनको नुकसान पहुंचाता है। नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

वैदिक वाक्य है कि पिछले जन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में रोग के रूप में सामने आता है। शास्त्रों में बताया है-पूर्व जन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण जायते अत: पाप जितना कम करेंगे, रोग उतने ही कम होंगे। अग्नि, पृथ्वी, जल, आकाश और वायु इन्हीं पांच तत्वों से यह नश्वर शरीर निर्मित हुआ है। यही पांच तत्व 360 की राशियों का समूह है।

इन्हीं में मेष, सिंह और धनु अग्नि तत्व, वृष, कन्या और मकर पृथ्वी तत्व, मिथुन, तुला और कुंभ वायु तत्व तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कालपुरुष की कुंडली में मेष का स्थान मस्तक, वृष का मुख, मिथुन का कंधे और छाती तथा कर्क का हृदय पर निवास है जबकि सिंह का उदर (पेट), कन्या का कमर, तुला का पेडू और वृश्चिक राशि का निवास लिंग प्रदेश है। धनु राशि तथा मीन का पगतल और अंगुलियों पर वास है।

इन्हीं बारह राशियों को बारह भाव के नाम से जाना जाता है। इन भावों के द्वारा क्रमश: शरीर, धन, भाई, माता, पुत्र, ऋण-रोग, पत्नी, आयु, धर्म, कर्म, आय और व्यय का चक्र मानव के जीवन में चलता रहता है। इसमें जो राशि शरीर के जिस अंग का प्रतिनिधित्व करती है, उसी राशि में बैठे ग्रहों के प्रभाव के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। कुंडली में बैठे ग्रहों के अनुसार किसी भी जातक के रोग के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

कोई भी ग्रह जब भ्रमण करते हुए संवेदनशील राशियों के अंगों से होकर गुजरता है तो वह उन अंगों को नुकसान पहुंचाता है। जैसे आज कल सिंह राशि में शनि और मंगल चल रहे हैं तो मीन लग्न मकर और कन्या लग्न में पैदा लोगों के लिए यह समय स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता।

अब सिंह राशि कालपुरुष की कुंडली में हृदय, पेट (उदर) के क्षेत्र पर वास करती है तो इन लग्नों में पैदा लोगों को हृदयघात और पेट से संबंधित बीमारियों का खतरा बना रहेगा। इसी प्रकार कुंडली में यदि सूर्य के साथ पापग्रह शनि या राहु आदि बैठे हों तो जातक में विटामिन ए की कमी रहती है। साथ ही विटामिन सी की कमी रहती है जिससे आंखें और हड्डियों की बीमारी का भय रहता है।

चंद्र और शुक्र के साथ जब भी पाप ग्रहों का संबंध होगा तो जलीय रोग जैसे शुगर, मूत्र विकार और स्नायुमंडल जनित बीमारियां होती है। मंगल शरीर में रक्त का स्वामी है। यदि ये नीच राशिगत, शनि और अन्य पाप ग्रहों से ग्रसित हैं तो व्यक्ति को रक्तविकार और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। यदि इनके साथ चंद्रमा भी हो जाए तो महिलाओं को माहवारी की समस्या रहती है जबकि बुध का कुंडली में अशुभ प्रभाव चर्मरोग देता है।

चंद्रमा का पापयुक्त होना और शुक्र का संबंध व्यसनी एवं गुप्त रोगी बनाता है। शनि का संबंध हो तो नशाखोरी की लत पड़ती है। इसलिए कुंडली में बैठे ग्रहों का विवेचन करके आप अपने शरीर को निरोगी रख सकते हैं। किंतु इसके लिए सच्चरित्रता आवश्यक है। आरंभ से ही नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को ध्यान में रखकर आप अपने भविष्य को सुखद बना सकते हैं।

मूलांक ‘3’ वाले पहनें पीला पुखराज

अंक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का जन्म किसी भी अंग्रेजी महीने की ३, १२, २१ या ३0 तारीख को हुआ हो तो उसका जन्म मूलांक ‘३’ माना जाता है। इस अंक के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। इस मूलांक वाले स्त्री-पुरुषों पर गुरु का प्रभाव होता है। मूलांक तीन का स्वामी गुरुसभी ग्रहों का भी गुरु है। बृहस्पति दैविक एवं आध्यात्मिक गुणों का प्रतीक है।

स्वभाव :
मूलांक ३ वाले व्यक्ति बृहस्पति ग्रह के प्रभाव से ओत-प्रोत होते हैं। यह उत्तम विचार एवं चरित्र वाले होते हैं। ये ईमानदार, परोपकारी एवं अध्ययनशील होते हैं। नम्र स्वभाव इनके व्यक्तित्व को निखारने में सहायक रहता है। बृहस्पति की स्थिति में कुछ कमी के कारण कभी-कभी इनका एक और स्वरूप भी दिखाई पड़ता है। इनकी मधुर वाणी में झूठ की मात्रा अधिक होती है तथा ये विलासी और बड़े गुरुघंटाल सिद्ध होते हैं।

स्वास्थ्य :
जीवन शक्ति उत्तम होती है। यदि ये बीमार भी हो जाएं तो शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को स्वास्थ्य, नाड़ी विकार, गला, चर्म, वात, शुगर, नेत्र विकार तथा स्त्रियों को गर्भ एवं गुप्त रोग, पथरी, कमर दर्द तथा हृदय रोग की आशंका रहती है। फरवरी, सितंबर व दिसंबर में स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका होती है।

व्यवसाय एवं कार्यरुचि :
मूलांक ३ वाले व्यक्ति अनुशासित, अध्ययनशील, बुद्धिमान और मृदुभाषी होते हैं। ये उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। प्रचार-प्रसार तथा लेखन में विशेष सफलता मिलती है। ये वकील, जज, राजदूत, मंत्री, चिकित्सक तथा सफल प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ये अध्यापक, डिजाइनर, अभिनेता तथा ज्योतिषी भी होते हैं।

आर्थिक स्थिति :
महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अधिक धन खर्च करते हैं। कभी-कभी बुद्धिमत्ता के बावजूद धनहानि का सामना करना पड़ता है। आसानी से धन कमाने व संपत्ति जमा करने की लालसा रहती है। बृहस्पति की उच्च स्थिति होने पर भारी दूरदर्शिता और निर्णय क्षमता के कारण अपने काम में हमेशा अपने प्रतिस्पर्धी से एक कदम आगे ही रहते हैं।

प्रेम संबंध, विवाह और संतान :
मूलांक ३ वाले बड़े गुरूघंटाल होते हैं। प्रेम संबंध रखते हैं और पता भी नहीं चलने देते। ये विलासी होते हैं, परंतु अपने मान-सम्मान का पूरा ध्यान रखते हैं। वैवाहिक जीवन सुखी होता है। धार्मिक कार्यो में अधिक रुचि के कारण घर में अशांति आ जाती है। एकाधिक विवाह का योग होता है। इनके एक पुत्र-संतान अवश्य होती है। ३, ६, ७, ९ वाले व्यक्ति इनके अच्छे जीवनसाथी सिद्ध होते हैं।

यात्राएं :
मूलांक ३ वाले व्यक्तियों को अक्सर धार्मिक यात्रा का अवसर मिलता है। विदेश यात्रा से भी लाभ प्राप्त होता है।

शुभ रंग :
पीला रंग अति शुभ है। गुलाबी, हल्का जामुनी, सफेद रंग भी इन्हें लाभ देता है। काला तथा हल्का नीला रंग अशुभ माना गया है।

शुभ तिथियां :
मूलांक ३ वालों के लिए २, ३, ६, ९, २१, २४, २७, ३0, तारीखें शुभ हैं।

शुभ दिन :
मूलांक ३ वालों के लिए गुरुवार, शुक्रवार एवं मंगलवार शुभ होता है।

गुरुमंत्र :
मूलांक ३ वालों को पीली वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। शुभ रत्न- पीला पुखराज है। सवा पांच से सवा छह रत्ती का पीला पुखराज सोने की अंगूठी में जड़कर, तर्जनी में बृहस्पतिवार को धारण करने से लाभ मिलता है। अगर इसका सामथ्र्य न हो तो पीला रुमाल अपने पास रखें एवं गुरुदेव का ध्यान करके ‘ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रों स: गुरुवे नम:’ का जाप करें।

कई महान योगों ने बनाया टाटा को ‘रतन’ - पं. जयगोविंद शास्त्री

tata कर्मप्रधान जीवन में कर्म करते हुए अगर भाग्य का भी साथ मिल जाए तो व्यक्ति ऊंचाइयों के शिखर पर पहुंच जाता है। कुछ इसी तरह का भाग्य उद्योगपति रतन टाटा का है। इनकी जन्मकुंडली में ४६ शुभ योग हैं।

रतन टाटा का जन्म २८ दिसंबर, १९३७ को सुबह ६ बजकर ३0 मिनट पर मुंबई में हुआ। उनके जन्म के समय धनु लग्न और तुला राशि का उदय हो रहा था। अन्य ग्रहों में लग्न में सूर्य, बुध, शुक्र, द्वितीय धन भाव में गुरु तथा तृतीय पराक्रम भाव में पृथ्वीपुत्र मंगल बैठे हैं, जबकि शनि चतुर्थ, केतु छठे, चंद्र ग्यारहवें तथा राहु बारहवें भाव में हैं।

इनकी जन्मकुंडली में ४६ शुभ योगों का निर्माण हुआ है। जिनमें सर्वोत्तम गजकेसरी योग, चार राजयोग, पांच कर्म जीवयोग तथा तीन वेशियोग हैं। इसी के साथ चार पूर्ण आयु योग, महालक्ष्मीवान योग, अत्यंत धनाढ्य योग के साथ-साथ कई धनयोगों का भी निर्माण हुआ है।

धनु लग्न की कुंडली में लग्न के स्वामी बृहस्पति नीच राशिगत मकर में बैठे हैं। साथ ही इस राशि के स्वामी शनि केंद्र भाव में बैठकर नीच भंगयोग का निर्माण कर रहे हैं। महान गजकेसरी योग ने रतन टाटा को दिग्विजयी बनाया। लग्न भाव में ही भाग्य के स्वामी, कर्म के स्वामी और लाभ के स्वामी बैठे हैं।

किसी भी जातक की जन्मकुंडली में यह योग हो तो श्रेष्ठ भाग्य कर्म और लाभ की ओर ले जाता है। यही योग व्यक्ति को विरासत में अथाह धन दिलाता है। लग्नेश गुरु और धनेश शनि का राशि परिवर्तन भी इन्हें अतुल धन दिलाने का संकेत कर रहा है।

रतन टाटा की जन्मकुंडली के पांच कर्म जीव योग, जो दशमेश बुध के द्वारा निर्मित हैं, इन्हें पूर्ण कर्मयोगी बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। २२वें वर्ष से ही भाग्योदय का आनंद लेने वाले रतन का जन्म ही नीचभंग राजयोग बनाने वाले गुरु की महादशा में हुआ।

इनकी जन्मकुंडली में कर्म जीव योगों का अत्यधिक प्रभाव ३२वें वर्ष से हुआ। इनको जनवरी,१९७१ से बुध की महादशा प्रारंभ हुई। यह अवधि इनके जीवन की श्रेष्ठतम अवधियों में से एक रही। यहां से रतन टाटा की ख्याति बढ़नी शुरू हुई।

इस अवधि में ये एक से बढ़कर एक मील के पत्थर पार करते रहे। बुध की महादशा इन पर १९८८ तक रही, उसके बाद योगकारक केतु की महादशा १९९५ तक रही। महान धन, यश और कीर्ति योग का निर्माण करने वाले शुक्र की महादशा इन पर १९९५ से आरंभ हुई। यह योग तब से अब तक रतन टाटा को एक से बढ़कर एक उपलब्धि दिला रहा है।

अत्यंत धनाढ्य योग के साथ-साथ नीच भंग राजयोग बनाने वाले बृहस्पति की अंतरदशा इन पर मार्च, २00५ से नवंबर, २00७ तक रही। इस अवधि में रतन ने एक से बढ़कर एक कारनामे किए और इन्हें विश्वपटल पर अभूतपूर्व ख्याति मिली।

वर्तमान में इन पर धनेश और जनता के कारक शनि की अंतरदशा चल रही है। इसी के फलस्वरूप ये लखटकिया कार बाजार में लाकर जन-जन के चहेते बने हैं। शनि की यह दशा जनवरी, २0११ तक रहेगी। उसके बाद इनकी कुंडली में बुध की अंतरदशा प्रारंभ होगी। यह योग इन्हें आगे भी ढेरों सफलताएं दिलाएगा।

कैसे जानें इष्टकाल को - पं. विनोद राजाभाऊ रावल

ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करने में पंचांगों की जानकारी जितनी अधिक होगी, उतना सही एवं सटीक ज्ञान प्राप्त होगा। जैसा कि पूर्व में उल्लेखित किया गया था कि पंचांग में लघु शब्द-अक्षर का उपयोग अधिक होता है तथा ज्योतिष के साहित्य में भी कई ऐसे शब्द उपयोग में आते हैं जिन्हें समझने में कठिनाई महसूस होती है। कई बार उस शब्द के भ्रम में अर्थ ही नहीं समझ पाते हैं, जैसे सूर्यास्त (सू.अ.) सूर्य के अस्त होने का समय, सूर्योदय (सू.उ.) सूर्य के उदय होने का समय, दिनमान (दि.मा.) सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के समय को दिनमान कहते हैं। यह समय पंचांग में सामान्यत: घटी एवं पल में दिया जाता है।

रात्रिमान सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय के मध्य का समय रात्रिमान कहलाता है। चंद्रस्थिति (च.स्थि.) या चंद्र सचार से लिखा रहता है अर्थात चंद्रमा अमुक राशि में इस समय प्रवेश करेगा।

सर्वक्षय नक्षत्र का मान अर्थात अमुक नक्षत्र अमुक दिन में इतनी घटी एवं इतने पल है।

सोम्यायन सूर्य की उत्तरायण स्थिति को सोम्यायन कहते हैं।

याम्यायनं सूर्य के दक्षिणायन की स्थिति को याम्यायनं कहते हैं। मकर संक्राति (14-15 जनवरी) से सूर्य उत्तरायण होता है तथा कर्क संक्राति (16-17 जुलाई) से मकर संक्राति तक सूर्य दक्षिणायन होता है।

प्रात: सूर्य स्पष्ट (प्रा. सू. स्प.)- प्रात:काल सूर्य की स्थिति जो कि राशि/अंश/कला/विकला(11/29/44/42) में उल्लेखित रहती है। पंचांग में दैनिक या साप्ताहिक ग्रह स्पष्ट रहते हैं। साथ ही दैनिक लग्न सारिणी भी दी जाती है। इसमें प्रवेश अथवा समाप्ति के समय का अवश्य उल्लेख रहता है।

जातक यह शब्द ज्योतिष के साहित्य में अधिक आता है। जिस जन्म लिए बालक-बालिका की चर्चा की जा रही है उसे जातक कहते हैं।

इष्टकाल सूर्योदय से किसी निश्चित (अभीष्ट) समय। घटी पल को इष्टकाल कहेंगे जैसे किसी जातक का जन्म समय दोपहर 2.10 है तो प्रात: सूर्योदय से दोपहर 2.10 तक की समय (जो कि घटी पल में हो) इष्टकाल होगा।

घर का मुख्य द्वार और वास्तु

घर का मुख्य द्वार सभी सुखों को देने वाला होता है। यह भवन का मुख्यांग होने के कारण एक प्रकार से मुखिया है। वास्तुपद रचना के अनुसार यदि द्वार की स्थिति सही हो तो कई दोषों का स्वत: ही निवारण हो जाता है और सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य व यश-कीर्ति में वृद्धि होती है।
वास्तुशास्त्रों में द्वार की रचना पर बहुत जोर दिया गया है। द्वार को जितना सुंदर और मजबूत बनाने पर जोर है, उससे कहीं अधिक बल इस बात पर है कि यह वास्तुपद सम्मत हो। भवन की जो लंबाई चौड़ाई हो, उसे वास्तु पदानुसार आठ-आठ रेखाएं डालकर 64 पदों में बांट दें और दिशानुसार वहां द्वार रखें। यह नियम मुख्य भवन सहित चारदीवारी के प्रधान द्वार के लिए भी लागू होता है।
‘समरांगण सूत्रधार’ और ‘अपराजितपृच्छा’ में द्वार निवेश के बारे में विस्तार से बताया गया है। मयमतं, वास्तुप्रदीप, राजवल्लभ वास्तुशास्त्र, वास्तुमंजरी में भी यही विचार मिलता है। पूर्वकाल में राजमहलों और हवेलियों के निर्माण के समय द्वार निवेश पर प्रमुखता से विचार होता था। यह विचार आज भी सर्वथा प्रासंगिक है।
इस नियम के अनुसार पूर्व के क्रम से ईशान कोण से क्रमश: पहला और दूसरा क्षेत्र छोड़कर तीसरे और चौथे पद पर द्वार रखना चाहिए। ऐसे द्वार धन, धान्यप्रद, सरकार से सम्मान और रोजगार की दृष्टि से सुकून देने वाले होते हैं।
दक्षिण में आग्नेय कोण से क्रमश: तीन पद छोड़कर आगे के तीन पदों पर द्वार रखने से पुत्र-पौत्र, धन और यश की प्राप्ति होती है। पश्चिम में नैऋत्यकोण से दो पद छोड़कर चार पदों पर द्वार निवेश से धन-वैभव, विशेष संपदा और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तर में वायव्य से तीन पद छोड़कर क्रमश: तीन पदों पर द्वार रखने से धन संपदा, सुख और निरंतर आय की प्राप्ति होती है।
द्वार पर लगाया जाने वाला किवाड़ बिल्कुल पतला नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर भुखमरी या अर्थाभाव का सामना करना पड़ सकता है। यदि किवाड़ टेढ़ा-मेढ़ा हो जाए तो अमंगलकारी होता है। इस कारण दिमागी संतुलन बिगड़ सकता है।
यदि किवाड़ में जोड़ गड़बड़ हो तो भवन मालिक कई कष्ट झेलता है। यह पारिवारिक शांति को प्रभावित करता है। यदि किवाड़ भवन के अंदर की ओर लटक जाए तो बहुत कष्टकारी और बाहर की ओर लटका हो तो वहां रहने वाले निरंतर प्रवास पर ही रहते हैं।

रसोईघर का वास्तु - डॉ. श्रीकृष्ण

रसोई को घर के आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) में बनाना चाहिए क्योंकि इसे ही अग्नि का स्थान माना गया है। यहां रसोई होने से अग्नि देव नित्य प्रदीप्त रहते हैं और घर का संतुलन बना रहता है। किंतु, इससे यह भी देखा गया है कि अक्सर दिन में तीन या उससे अधिक बार भोजन बनता है यानी खर्च बना ही रहता है।
ऐसे में एकदम अग्निकोण को छोड़कर पूर्व की ओर रसोई बनाएं। यदि पूर्व की रसोई बनी हुई हो तो चूल्हे को थोड़ा पूर्व की ओर खिसका दें। चूल्हा इस तरह लगाएं कि सिलेंडर भी उसके एकदम नीचे रहे। रसोई तैयार करते समय मुख की स्थिति पूर्व में रहनी चाहिए।
यह भी ध्यान रखें कि यदि रसोई के दक्षिण में एग्जॉस्ट फैन हो तो व्यय की संभावना रहती है। ऐसे में पूर्व की दीवार पर एग्जॉस्ट फैन लगाना चाहिए। रसोई बन जाने के बाद भोजन कभी घर के ब्रrास्थान पर बैठकर नहीं करें। न ही वहां पर झूठा डालें।
इससे रसोई का खर्च बढ़ता है और घर में अनर्गल वार्तालाप भी बढ़ता है। भोजन कभी वायव्य कोण में बैठकर या खड़े-खड़े भी नहीं करें। इससे अधिक खाने की आदत हो जाती है। इसी तरह नैऋत्य कोण में बैठकर भोजन नहीं करें। यह राक्षस कोना है और इससे पेटू हो जाने की आशंका रहती है।
रसोई घर के लिए जरूरी टिप्स.. 1. रसोई घर में अन्नपूर्णा या लक्ष्मीजी का चित्र लगाना चाहिए और रसोई बनाने से पूर्व चित्र पर अगरबत्ती लगानी चाहिए। 2. भोजन बनाकर खाने से पूर्व एकाध कौर आग की ज्वाला में अर्पित कर दें। 3. भोजन करने के बाद एक कौर हर हाल में टिफिन में बचाकर रखें। 4. अपने हाथों से एक रोटी गाय को अवश्य दें। यदि द्वार पर श्वान बैठता हो तो उसे भी रोटी से संतुष्ट करें। 5. यदि भोजन की सामग्री रसोई घर में ही रखी जाती हो तो उसे हटा दें और दक्षिण दिशा में रखने का प्रबंध करें। 6. रसोई को व्यवस्थित रूप से तैयार करें और कम समय के लिए ही एग्जॉस्ट फैन चलाएं।

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Monday, November 23, 2009

अच्छे चित्र देते हैं उन्नति की ऊर्जा - डॉ. श्रीकृष्ण

चित्र-वास्तु.krishna हमारे जीवन में चित्रों का बड़ा महत्व है। पूर्वकाल में घर की दीवारों पर फ्रेस्को पेंटिंग की जाती थी। हाथ से बनाए गए चित्रों और मांडनों को चिपकाया जाता था। मांगलिक, शुभ कार्यो में देवचित्रों को प्रधानता से प्रयोग में लाया जाता था। विवाह, यज्ञोपवीत, तीर्थाटन से वापसी जैसे प्रसंगों पर चित्रकारों को न्यौतकर चित्रांकन कराया जाता था। ये चित्र घर में मंगल-मांगल्य की सृष्टि करते थे।
चित्रों के प्रसंग में यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी तरह से विकृत चित्र अथवा रंगविहीन रेखाचित्र को कभी दीवार पर नहीं लगाएं। वास्तु ग्रंथों में मयमतम्, समरांगण सूत्रधार, मानसार आदि में चित्रों के संबंध में कई निर्देश दिए गए हैं।
इसी आधार पर अपराजितपृच्छा, वास्तुमंडन व राजवल्लभ में भी कहा गया है कि विकृत, अंग-भंग वाले, युद्ध के दृश्य वाले वीभत्स चित्र, नग्न, अश्लील, मांसभक्षी श्वान, सर्प, नकुल, सिंह आदि चौपायों के चित्र घर में वर्जित हैं।
घर में ऐसे ही चित्रों का प्रयोग किया जाना चाहिए जिनसे प्रेम, सहिष्णुता, आस्था का उदय होता हो। प्रेरक चित्र बहुत शुभ हैं। ऐसे धार्मिक चित्रों में युद्ध दृश्य विहीन श्रीकृष्ण द्वारा अजरुन को गीतोपदेश, रास मंडल, ध्यानस्थ शिव, सौम्य रूप में विष्णु व किसी देवस्थान का छायाचित्र भी शुभ है।
प्रकृति दर्शन करवाने वाले हरियाली, झरनों व पानी के दृश्य भी शुभ हैं। यदि परिवार के पूर्वजों की तस्वीर लगानी हो तो उसे घर में ऐसे स्थान पर लगाएं, जहां से पूरे घर पर निगाह पड़ती हो। नरसिंहपुराण में देवताओं के पट्टचित्र के पूजन और दर्शन से इष्टसिद्धि करने का उल्लेख है। वैसे घर की दीवारों पर अधिक चित्र नहीं लगाने चाहिए।
चित्र कब लगाएं
अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा नक्षत्र और बुधवार, गुरुवार व शुक्रवार के साथ-साथ द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी एवं पूर्णिमा तिथियां चित्रकला और चित्रों के संयोजन के लिए शुभ हैं। यदि देवी-देवताओं के चित्र लगाना हों तो इन देवताओं के वार, तिथि भी ग्रहण की जा सकती है किंतु इसके लिए पूर्वाह्न् का समय शुभ है।
कहां कैसे चित्र हों
दुकान:
बैठी हुई लक्ष्मी का चित्र, जिसके गज सूंड से जलाभिषेक करते हों, श्रीयंत्र और आसनस्थ लेखक-गणोश।
बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान :
संसार का नक्शा, कोई झरना, गीतोपदेश और तैरती मछलियां।
अध्ययन कक्ष व शिक्षण संस्था :
उपदेश करते ऋषियों व महापुरुषों के आवक्ष चित्र, सुलेख वाले अक्षर, ब्राrाी, शारदा व देवनागरी लिपि के प्रदक्षिण अर्थात् पूर्व से दक्षिण की ओर लिखे सद्वाक्य।

बृहस्पति को प्रसन्न कर पाएं धन लाभ - सुमन पंडित

लाल किताब ज्योतिष में कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो कि फलादेश के लिए बहुत आवश्यक हैं। लाल किताब में अंधे ग्रहों की कुंडली या अंधे ग्रहों के टेवा jupiterका जिक्र आता है। इसके अनुसार दसवें घर में शनि की मकर राशि आती है और इस प्रकार इस घर का सीधा संबंध शनि से है। यदि दसवें भाव या घर में दो या दो से अधिक ऐसे ग्रह हों, जो आपस में शत्रु हों या नीच राशि के ग्रहों से दसवां भाव खराब हो तो कुंडली के सभी ग्रह अंधे की तरह फल देने वाले होते हैं अर्थात बहुत हद तक उस कुंडली में शुभ ग्रहों का भी फल निष्फल रहता है। इस प्रकार के योग में व्यक्ति जीवन में कितना भी संघर्ष और मेहनत करें, उसे पूर्ण प्रतिफल नहीं मिल पाता। कार्यक्षेत्र में उतार-चढ़ाव रहते हैं। दसवां घर शनि का पक्का स्थान है और इसका हमारे कर्मक्षेत्र और जीवनयापन के साधन से सीधा संबंध है। इस घर में यदि एक से ज्यादा शत्रु ग्रह हों तो ये नौकरी या व्यवसाय में स्थिरता नहीं रहने देंगे। उदाहरण के लिए दसवें घर में यदि सूर्य, केतु और शुक्र में कोई दो या तीनों ग्रह आ जाएं तो इस प्रकार की कुंडली अंधे ग्रहों का टेवा कहलाएगी।
इसी प्रकार यदि बृहस्पति, राहु और शुक्र दसवें घर में हांे तो यह कुंडली अंधे ग्रहों की कुंडली होगी। यहां बृहस्पति पहले से बहुत कमजोर है, क्योंकि यहां गुरु दसवें भाव में कालपुरुष कुंडली के अनुसार अपने नीच घर में अपने शत्रु राहु और शुक्र के साथ है। यहां राहु और शुक्र दोनों अपने मित्र ग्रह शनि के घर में होने से बलवान हैं। इस प्रकार के योग से कुंडली में बृहस्पति का प्रभाव निष्फल हो जाएगा या उसके शुभ प्रभाव में कमी आ जाएगी।
लाल किताब में दसवें घर के बृहस्पति के बारे में कहा गया है कि ऐसी स्थिति में जातक को धन की कमी रहती है। यहां बृहस्पति होने से धन कमाने के लिए दिमागी काम के बजाय शारीरिक मेहनत से किए काम से लाभ होता है। दूसरों की भलाई करना अशुभ फल देता है अर्थात यहां शनि के पक्के घर में बैठे बृहस्पति को शनिवत व्यवहार/कार्य/व्यवसाय से ही लाभ हो सकता है। यदि बृहस्पति, शुक्र और राहु दसवें घर में हों तो अंधे व्यक्ति को भोजन कराना चाहिए। किसी भी एक समय का पूरा नाश्ता या दोपहर का भोजन, जिसमें मीठा जरूर हो, खुद दस दृष्टिहीन व्यक्तियों को परोसें।
इसके अलावा दसवें घर में बैठे अन्य ग्रहों को समझकर उन सभी का उपाय करने से शुभ फल प्राप्त होगा जैसे ऊपर दिए योग में पहले तो दस दृष्टिहीन व्यक्तियों को भोजन खिलाएं और फिर बृहस्पति की कारक वस्तुएं हल्दी या चने की दाल धर्मस्थान में देने से इसका प्रभाव ठीक होगा।

गृह निर्माण के लिए शुभ मार्गशीर्ष और पौष - डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

मार्गशीर्ष और पौष मास में नया घर बनवाना शुभ है। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में जिन मासों को गृह निर्माण के लिए शुभ माना गया है, उनमें इन गृह निर्माण के लिए शुभ मार्गशीर्ष और पौषदोनों मास को धन-धान्य के भंडार को भरा रखने वाला बताया गया है। स्थायी आवास बनवाने में मास विचार को अपरिहार्य किया गया है। पूर्वकाल में मार्गशीर्ष या अगहन मास को गृहारंभ के लिए शुभ कहा गया, वराहमिहिर ने 580 ई. में पहली बार पौष को भी गृहारंभ के लिए प्रशस्त बताया था।
आचार्य जिनदत्त सूरि कृत विवेक विलास, सूत्रधार मंडन कृत राजवल्लभ, श्रीपति कृत ज्योतिष रत्नमाला और दैवज्ञवल्लभ आदि ग्रंथों में गृह, देव प्रासाद, यज्ञशाला अन्य शालागृह के निर्माण के लिए मार्गशीर्ष व पौष को शुभ कहा गया है। मार्गशीर्ष व पौष में गृहारंभ करने से उस घर में हमेशा वैभव रहता है। वास्तुप्रदीप में मार्गशीर्ष को बहुत धन लाभ देने वाला मास कहा गया है। इसके बाद माघ में गृहारंभ करने से अग्निकांड की आशंका रहती है। लोक मान्यताओं के चलते कतिपय क्षेत्रों में धनु या मलमास को टाला जाता है, किंतु शास्त्रों में इसका निषेध नहीं है। इस कार्य में प्रचलित नाम राशि को ही प्राथमिकता देने का विधान है। बुध, गुरु, शुक्र व शनि की होरा प्रशस्त है।
सामान्यत: गृहारंभ के लिए 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 13 और पूर्णिमा तिथियां और वारों में सोम, बुध, गुरु, शुक्र और शनिवार ग्राह्य हैं। नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, स्वाति, अनुराधा, तीनों उत्तरा, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती व पुष्य शुभ हैं किंतु वे वेधरहित हों और लग्नों में पहला, तीसरा, पांचवां, छठवां, आठवां, ग्यारहवां व बारहवां लग्न शुभ है। लग्न से त्रिकोण में शुभ ग्रह हो तथा तीसरे, छठवें, ग्यारहवें स्थान में पापग्रह और आठवां स्थान शुद्ध देखना चाहिए।
भूमि परीक्षण : गृह निर्माण प्रारंभ करने से पूर्व भूमि परीक्षण करना बहुत अच्छा है। जहां कार्य प्रारंभ करना हो, वहां एक हाथ लंबा-चौड़ा और एक हाथ ही गहरा गड्ढा खोदें और कुछ देर बाद उसमें से निकाली गई मिट्टी को पुन: उसी में भरें। यह ध्यान दें कि यदि निकली हुई सारी मिट्टी उस गड्ढे में आने से बच जाए तो वह भूमि और वहां पर गृह लाभदायक, वृद्धिकारक रहेगा और यदि मिट्टी कम पड़ जाए या गड्ढा उसी मिट्टी से पूरा नहीं भरे तो घाटे का सौदा रहेगा।

गठिया रोग ज्योतिषीय कारण एवं उपचार - पुष्कर राज

गठिया रोग ज्योतिषीय कारण एवं उपचार शरीर में यूरिक अम्ल का संतुलन बिगड़ जाने से घुटनों व जोड़ों में श्वेत पदार्थ जमकर उन्हें निष्क्रिय बना देता है। इससे रोगी उठने-बैठने व चलने-फिरने में दर्द का अनुभव या असमर्थता प्रकट करता है। 45 वर्ष की आयु के बाद प्राय: यह रोग सक्रिय होता है। यह बुढ़ापे का एक कष्टकारी रोग है। इसे आमवात भी कहते हैं।
ज्योतिष मतानुसार इस रोग का कारक ग्रह बृहस्पति है। गुरु व लग्नेश की युति षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर गठिया रोग होता है। वृष, मिथुन व तुला राशि के जातकों में गठिया का विशेष प्रभाव देखा जाता है। कुछ विद्वानों ने वृष, सिंह, कन्या, मकर व मीन राशियों में शनि, मंगल व राहु की युति व दृष्टि संबंध से भी इस रोग के होने की पुष्टि की है। आचार्य वराहमिहिर ने लग्न में बृहस्पति पर सप्तम में शनि की दृष्टि से गठिया रोग होना बताया है।
अनुभूत योग:
लग्न में बृहस्पति सप्तम के शनि द्वारा दृष्ट है। अत: जातक गठिया रोग से पीड़ित रहा।
ज्योतिषीय उपचार
* गुरुवार को गुरु की वस्तुओं का दान, व्रत व मंत्र साधना करनी चाहिए। एक माला ऊं बृं बृहस्पतये नम: का जाप प्रतिदिन करना चाहिए।
* गुरुवार को गाय को चने की दाल, रोटी एवं केला खिलाना चाहिए।
* मंगल, शनि व राहू आदि की वजह से गठिया रोग हो तो उस ग्रह से संबंधित दान, व्रत, मंत्र जाप करने से रोग में शांति मिलेगी।
* सप्ताह में एक बार लंघन करना अर्थात निराहार रहकर मंत्र साधना करने से बहुत लाभ होगा।

लग्न कैसे निकालें - पं. विनोद राजाभाऊ

जन्म कुंडली में सर्वाधिक महत्व लग्न का है। जब भी कोई व्यक्ति ज्योतिष या किसी जातक की चर्चा करेगा तो पहले लग्न क्या है, पूछा जाएगा। लग्न से व्यक्ति की संपूर्ण शारीरिक संरचना का ज्ञान होता है। अत: लग्न की गणना करते समय बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। पूर्व दिशा में उदित होने वाली राशि को लग्न कहते हैं अर्थात जब जातक का जन्म हुआ उस समय में पूर्व दिशा में जो राशि होती है उसे ही लग्न कहेंगे।
जन्म समय को स्थानीय समय में परिवर्तन कर उसे घटी-पल में परिवर्तन कर इष्टकाल बनाने के पश्चात हम लग्न निकाल सकते हैं। पंचांग में प्रात: सूर्य स्पष्ट (प्रा.सू.स्प) दिया रहता है। जिस दिनांक का जन्म हो, उस दिनांक का प्रात: सूर्य स्पष्ट पंचांग में देख लें। गत अंक में इष्ट दिनांक 01.01.२क्क्८ का (उज्जैन) प्रात: सूर्य स्पष्ट 8:16:2:44 (राशि: अंश: कला: विकला) है। यहां हम केवल 8 राशि एवं 16 कला को ही लेंगे तथा पंचांग में 8 राशि एवं 16 कला का मान देखेंगे जो कि लग्न सारिणी में दिया गया है।
8-16 का मान 48:39:12 आया इसमें इष्टकाल को जोड़ दिया 48:39:१२ + इष्टकाल 4:५८:क्क् (गत अंक से) = 53:३७:१२ आया। यदि जोड़ 60 से अधिक हो तो 60 से कम कर लें। इसे पुन: लग्न सारिणी में देखा तो इसके निकटतम अंक मिले 53:३६:३६ जिसके बायीं ओर देखने में मकर राशि तथा ऊपर अंश के कॉलम में देखने पर 17 मिले। अत: लग्न स्पष्ट हुआ 9:१७:५३:३६ मकर राशि १७ अंश ५३ कला एवं 36 विकला। यहां जिज्ञासुओं को ध्यान देने योग्य बात यह है कि पंचांग में किसी भी ग्रह की स्थिति का उल्लेख रहता है।
उसे ऐसे समझेंगे जैसे दिनांक 01.01.क्८ को सूर्य ८:१६:२:४४ था अर्थात सूर्य वृश्चिक राशि को क्रॉस कर 16 अंश एवं 2 कला एवं 44 विकला पर था। तो इसे लिखने या बोलने में धनु में सूर्य कहेंगे क्योंकि आठवीं राशि वृश्चिक है तथा नवमीं राशि धनु है। यहां सूर्य आठवीं राशि क्रॉस (पूर्ण) कर नवमीं राशि में भ्रमण कर रहा है। उपरोक्त लग्न स्पष्ट होने के पश्चात अब हम लग्न कुंडली बना सकते हैं। कुंडली में 12 खाने (कॉलम) होते हैं। यह हम खींच लें। ऊपर के मध्य कॉलम को लग्न से संबोधित करते हैं।
इस कॉलम में हम 10 अंक लिखेंगे, यह 10वीं राशि मकर को इंगित करती है। चूंकि गणना में लग्न मकर आया। जैसा कि ऊपर वर्णित किया गया है - लग्न 9:१७:५३:३६ अर्थात नवीं राशि धनु को क्रॉस कर 10वीं राशि मकर में लग्न चल रहा है। अब हम कुंडली बनाकर लग्न स्थान में 10वीं राशि लिखकर आगे बायीं तरफ बढ़ते क्रम में लिखते जाएंगे। जैसे 11, 12, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9। बारह के पश्चात पुन: एक से आरंभ करेंगे क्योंकि कुल राशि बारह ही होती है।

उम्र जानें.. अपने लाड़ले की - डॉ. अनुराग

आयुर्वेद आयु संबंधी विज्ञान है। नवजात शिशु की आयु जानने के लिए महर्षि अग्निवेश ने शिशु के शारीरिक अंगों की परीक्षा का विधान बतलाया है, जिससे उनकी आयु का आकलन किया जा सकता है।
केश : प्रत्येक रोमकूप में से एक-एक केश निकला हो, बाल मुलायम, अल्प, चिकने व मजबूत जड़ वाले हों। ऐसे बाल शुभ होते हैं।
त्वचा : अपने-अपने अवयवों के ऊपर अच्छी तरह से स्थिर त्वचा अच्छी मानी गई है। सिर : अपनी स्वाभाविक आकृति वाला सिर, शरीर के अनुपात में, छाते के समान बीच में कुछ ऊंचा सिर श्रेष्ठ होता है।
ललाट : चौड़ा, मजबूत, समतल, शंख प्रदेश की संधियां परस्पर मिली हों, ऊपर की ओर रेखाएं उभारयुक्त हों, ललाट मांसल हों। अभिप्राय यह है कि उस पर केवल त्वचा का ही आवरण न हो। माथे पर वलियां दिखाई दें। अर्धचंद्र की आकृति वाला ललाट शुभ होता है।
कान : दोनों कान मांसल हों, बड़े, पीछे की ओर समतल भाग वाले और बाहरी भाग मजबूत हो, कर्ण गुह्य के छिद्र मजबूत हों, ऐसे कान शुभ होते हैं।
भौंहें : दोनों भौंहें थोड़ा-सा नीचे की ओर लटकी हों, नाक के ऊपरी भाग के पास भौंहें मिली न हों, दोनों समान व दूर तक फैली हुई हांे। ऐसी लंबे आकार वाली भौंहें शुभ होती हैं।
आंखें : दोनों आंखों का आकार समान हो अर्थात एक आंख बड़ी और एक छोटी न हो। दृष्टि मंडल, कृष्ण मंडल तथा श्वेत मंडल का विभाजन ठीक ढंग से हुआ हो, आंखें बलवती और तेजोमय हों। ऐसी आंखें शुभ लक्षणों से युक्त मानी गई हैं।
नासिका : सीधी, लंबी, सांस लेने में समर्थ और नासिका का अगला कुछ भाग झुका हुआ हो तो ऐसी नासिका शुभ होती है।
मुख : मुख का आकार बड़ा तथा शरीर के अनुपात में होना चाहिए। सीधा व जिसके भीतर दंतपंक्ति व्यवस्थित हो, ऐसा मुख शुभ होता है। हालांकि इस समय दंत उत्पत्ति नहीं हुई होती, लेकिन शिशु के मसूढ़ों को देखकर दांतों की परीक्षा की जा सकती है।
जीभ : चिकनी अर्थात जिसमें खुरदरापन न हो, पतली, अपनी आकृति तथा अपने वर्ण से युक्त जीभ शुभ होती है।
तालु : चिकना, मांस से समुचित रूप से भरा हुआ और स्वाभाविक गरमी से युक्त लाल वर्ण का तालु शुभ होता है।
स्वर : दीनतारहित, चिकना, स्पष्ट और गंभीर स्वर शुभ होता है।
होंठ : दोनों होंठ न अधिक मोटे हों, न अधिक पतले हों, मुंह को भलीभांति ढंकने में समर्थ हों तथा लालिमा से युक्त हों।
हनु : ठोढ़ी को हनु भी कहा जाता है। ठोढ़ी की दोनों हड्डियों का समान रूप से बड़ा होना शुभ होता है।
गर्दन : गर्दन का गोलाकार होना और अधिक लंबी न होना शुभ होता है।
उर : चौड़ी और मांसपेशियों से ढंकी छाती शुभ है।
कॉलर बोन तथा रीढ़ : इन दोनों का मांसपेशियों से ढंका रहना शुभ लक्षण माना गया है।
स्तन : दोनों स्तनों के बीच पर्याप्त दूरी का होना शुभ माना गया है।
पाश्र्व : दोनों पाश्र्व भाग मांसल, पतले व स्थिर हों तो शुभ माने जाते हैं।
बाहु, टांगें और उंगलियां : दोनों भुजाएं, पैर और उंगलियां गोलाकार और अपने अनुपात से लंबी हों तो शुभ होती हैं।
हाथ-पैर : जिसके हाथ-पैर लंबे हों और मांस से भरे-पूरे हों, पादतल और करतल मांसल हो, ऐसे हाथ-पैरों को शुभ माना गया है।
नख : स्थिर, ठोस, आकार में गोल, चिकने, तांबे के समान लालवर्ण वाले, बीच में उठे हुए और कछुए की पीठ की हड्डी के समान नाखून शुभ माने गए हैं।
नाभि : दाहिनी ओर घुमाव वाली, बीच में गहरी व चारों ओर से उठे किनारों वाली नाभि को परम शुभ माना गया है।
कटि : कमर छाती की चौड़ाई से तीन हिस्सा पतली, समतल, समुचित रूप से मांसपेशियों से ढंकी हुई अर्थात जो आवश्यकता से अधिक मोटी न हो, वह शुभ होती है।
कूल्हे : दोनों कूल्हे सामान्य रूप से गोलाकार होने चाहिए, मांस से परिपुष्ट होने चाहिए, अधिक उठे हुए और अधिक धंसे हुए नहीं होने चाहिए।
जंघा : दोनों जांघें हरिणी के पैर जैसी, जो न अधिक मोटी हों और न अधिक पतली अर्थात मांसहीन हों, ऐसी जांघें शुभ मानी गई हैं।

देवालय के आसपास नहीं हो घर - श्रीकृष्ण जुगनू

अपना घर न तो किसी प्राचीन देवालय के सामने बनवाएं, न ही घर के सामने कोई देवालय बनवाएं। यह भयंकर दोषकारी है। वास्तुशास्त्र में इसे वेध कहा गया है जिसे हर हाल में टालना चाहिए। यदि जिद के साथ ऐसा निर्माण किया जाता है तो संतान को पीड़ा, नेत्र बाधा, अपस्मार, अंग विकृति जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
घर सुख-साधना का केंद्र है। इहलोक और परलोक की सिद्धि में घर बड़ी मदद करता है। भविष्यपुराण में कहा गया है कि अपने घर में किए गए हवन, यज्ञ-अनुष्ठानों का फल निश्चित ही गृहपति को मिलता है। ऐसे में घर का निरापद होना जरूरी है।
इसके लिए सर्वप्रथम उसे देव-वेध से बचाना चाहिए। वेधवास्तु प्रभाकर, निर्दोष वास्तु और वास्तु उद्धारधोरणी जैसे ग्रंथों में जिन उन्नीस प्रकार के वेधों का उल्लेख है, देव-वेध उनमें प्रमुख है। मत्स्यपुराण में भी वेध को हर हाल में टालकर वास्तु निर्माण का निर्देश है।
जो लोग पुराने देवालय के सामने घर या व्यापारिक प्रतिष्ठान बनवाते हैं, वे धन तो पाते हैं किंतु शारीरिक आपदाओं से घिर जाते हैं। यदि शिवालय के सामने घर बना हो तो मृत्यु तुल्य पीड़ा होती है। जिनालय के सामने बना हो तो घर शून्य रहेगा या वैभव से वैराग्य हो जाएगा।
भैरव, कार्तिकेय, बलदेव और देवी मंदिर के सामने घर बनाया गया तो क्रोध और कलह की आशंका रहेगी जबकि विष्णु मंदिर के सामने घर बनाने पर घर-परिवार को अज्ञात बीमारियां घेरे रहती हैं। इसी तरह मंदिर की जमीन या अन्य किसी हिस्से पर कब्जा नहीं करना चाहिए। मंदिर के किसी टूटे पत्थर को भी चिनाई के कार्य में नहीं लेना चाहिए।
यह भी कहा गया है कि देवालय वेध से वंश नहीं बढ़ता है। व्यक्ति तनाव और अवसाद का शिकार हो जाता है। उसे पक्षाघात, अंग विकृति, नेत्र ज्योति में बाधा भी हो सकती है। इसका कोई कारगर उपाय भी नहीं है, लेकिन द्वार बदलकर थोड़ी राहत पाई जा सकती है किंतु यह परिवर्तन बहुत सावधानी से होना चाहिए। प्राचीन काल में ऐसा दोष होने पर मंदिर की दूरी के बराबर बड़ा द्वार या पोल बनाकर नई बस्ती को बसाया जाता था।
पानी पर आवास नहीं हो :
भविष्यपुराण में जिक्र है कि जल के स्थान पर कभी आवास नहीं होना चाहिए। हां, विहार स्थल हो सकता है किंतु जल-पुलिया पर आवास नहीं होना चाहिए। देवालय नीचे हो और अपना आवास उससे ऊंचा हो, ऐसा भी नहीं होना चाहिए। किसी देवता का मुख अपने घर की ओर भी नहीं होना चाहिए। यदि घर में भी ऐसा हो तो पूजा के बाद पर्दा ढंक दिया जाना चाहिए।