Monday, September 28, 2009

कैसे मिले धनवान पति और रूपवान पत्नी

विवाह के संदर्भ में कन्या की आकांक्षा धनवान पति और वर की कामना सुंदर पत्नी की होती है। दोनों के माता-पिता भी कुंडलियों के मिलान के साथ बहू या दामाद के बारे में सौंदर्य और धन को प्राय: केंद्र में रखते हैं। आइए जानें कि किन योगों में सुंदर पत्नी और धनवान पति प्राप्त होता है।
यदि वर की कुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो उसे सुंदर पत्नी मिलती है। यदि कन्या की कुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र में से कोई भी हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा धनवान होता है।
वर की कुंडली में सुंदर पत्नी के योग
जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होता है तथा स्वग्रही होकर सप्तम भाव में ही उपस्थित होता है तो जातक को सुंदर, आकर्षक, प्रभामंडल से युक्त एवं सौभाग्यशाली पत्नी प्राप्त होती है। जब सप्तमेश सौम्य ग्रह होकर भाग्य भाव में उपस्थित होता है तो जातक को शीलयुक्त, रमणी एवं सुंदर पत्नी प्राप्त होती है तथा विवाह के पश्चात जातक का निश्चित भाग्योदय होता है।
जब सप्तमेश एकादश भाव में उपस्थित हो तो जातक की पत्नी रूपवती, संस्कारयुक्त, मृदुभाषी व सुंदर होती है तथा विवाह के पश्चात जातक की आर्थिक आय में वृद्धि होती है या पत्नी के माध्यम से भी उसे आर्थिक लाभ प्राप्त होते हैं।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में वृषभ या तुला राशि होती है तो जातक को चतुर, मृदुभाषी, सुंदर, सुशिक्षित, संस्कारवान, तीखे नाक-नक्श वाली, गौरवर्ण, संगीत, कला आदि में दक्ष, भावुक एवं चुंबकीय आकर्षण वाली, कामकला में प्रवीण पत्नी प्राप्त होती है।
यदि जातक की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में मिथुन या कन्या राशि उपस्थित हो तो जातक को कोमलाङ्गी, आकर्षक व्यक्तित्व वाली, सौभाग्यशाली, मृदुभाषी, सत्य बोलने वाली, नीति एवं मर्यादाओं से युक्त बात करने वाली, oंृगारप्रिय, कठिन समय में पति का साथ देने वाली तथा सदैव मुस्कुराती रहने वाली पत्नी प्राप्त होती है। उन्हें वस्त्र एवं आभूषण बहुत प्रिय होते हैं।
जिस जातक के सप्तम भाव में कर्क राशि स्थित होती है, उसे अत्यंत सुंदर, भावुक, कल्पनाप्रिय, मधुरभाषी, लंबे कद वाली, छरहरी तथा तीखे नाक-नक्श वाली, सौभाग्यशाली तथा वस्त्र एवं आभूषणों से प्रेम करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में कुंभ राशि स्थित हो तो ऐसे जातक की पत्नी गुणों से युक्त धार्मिक, आध्यात्मिक कार्यो में गहरी अभिरुचि रखने वाली एवं दूसरों की सेवा और सहयोग करने वाली होती है।
सप्तम भाव में धनु या मीन राशि होने पर जातक को धार्मिक, आध्यात्मिक एवं पुण्य के कार्यो में रुचि रखने वाली, सुंदर, न्याय एवं नीति से युक्त बातें करने वाली, वाक्पटु, पति के भाग्य में वृद्धि करने वाली, सत्य का आचरण करने वाली और शास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन करने वाली पत्नी प्राप्त होती है।
वधू की कुंडली में धनवान पति के योग
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में चन्द्र, बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित होता है, उसे धनवान पति प्राप्त होता है।
जिस कन्या की जन्मकुंडली के लग्न में गुरु उपस्थित हो तो उसे सुंदर, धनवान, बुद्धिमान पति व श्रेष्ठ संतान मिलती है।
भाग्य भाव में या सप्तम, अष्टम और नवम भाव में शुभ ग्रह होने से ससुराल धनाढच्य एवं वैभवपूर्ण होती है।
कन्या की जन्मकुंडली में चन्द्र से सप्तम स्थान पर शुभ ग्रह बुध, गुरु, शुक्र आदि में से कोई उपस्थित हो तो उसका पति राज्य में उच्च पद प्राप्त करता है तथा उसे सुख व वैभव प्राप्त होता है।
कुंडली के लग्न में चंद्र हो तो ऐसी कन्या पति को प्रिय होती है और चंद्र व शुक्र की युति हो तो कन्या ससुराल में अपार संपत्ति एवं समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में वृषभ, कन्या, तुला लग्न हो तो वह प्रशंसा पाकर पति एवं धनवान ससुराल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।
कन्या की कुंडली में जितने अधिक शुभ ग्रह गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र लग्न को देखते हैं या सप्तम भाव को देखते हैं, उसे उतना धनवान एवं प्रतिष्ठित परिवार एवं पति प्राप्त होता है।
कन्या की जन्मकुंडली में लग्न एवं ग्रहों की स्थिति की गणनानुसार त्रिशांश कुंडली का निर्माण करना चाहिए तथा देखना चाहिए कि यदि कन्या का जन्म मिथुन या कन्या लग्न में हुआ है तथा लग्नेश गुरु या शुक्र के त्रिशांश में है तो उसके पति के पास अटूट संपत्ति होती है तथा कन्या सदैव ही सुंदर वस्त्र एवं आभूषण धारण करने वाली होती है।
कुंडली के सप्तम भाव में शुक्र उपस्थित होकर अपने नवांश अर्थात वृषभ या तुला के नवांश में हो तो पति धनाढच्य होता है।
सप्तम भाव में बुध होने से पति विद्वान, गुणवान, धनवान होता है, गुरु होने से दीर्घायु, राजा के संपत्ति वाला एवं गुणी तथा शुक्र या चंद्र हो तो ससुराल धनवान एवं वैभवशाली होता है।
एकादश भाव में वृष, तुला राशि हो या इस भाव में चन्द्र, बुध या शुक्र हो तो ससुराल धनाढच्य और पति सौम्य व विद्वान होता है।
हर पुरुष सुंदर पत्नी और स्त्री धनवान पति की कामना करती है। लेकिन यह तभी संभव है, जब आपकी जन्मकुंडली में सितारों का योग उत्तम हो।कुंडली पर पड़ रही ग्रहों की दृष्टि और लग्न योग ही बताते हैं कि पत्नी कितनी रूपवान और पति कितना धनवान होगा।
यदि जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो उसकी पत्नी शिक्षित, सुशील, सुंदर एवं कार्यो में दक्ष होती है, किंतु ऐसी स्थिति में सप्तम भाव पर यदि किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो दाम्पत्य जीवन में कलह और सुखों का अभाव होता है।
जातक की जन्मकुंडली में स्वग्रही, उच्च या मित्र क्षेत्री चंद्र हो तो जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है तथा उसे सुंदर, सुशील, भावुक, गौरवर्ण एवं सघन केश राशि वाली रमणी पत्नी प्राप्त होती है। सप्तम भाव में क्षीण चंद्र दाम्पत्य जीवन में न्यूनता उत्पन्न करता है।
जातक की कुंडली में सप्तमेश केंद्र में उपस्थित हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि होती है, तभी जातक को गुणवान, सुंदर एवं सुशील पत्नी प्राप्त होती है।
पुरुष जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव में शुभ ग्रह बुध, गुरु या शुक्र उपस्थित हो तो ऐसा जातक सौभाग्यशाली होता है तथा उसकी पत्नी सुंदर, सुशिक्षित होती है और कला, नाटच्य, संगीत, लेखन, संपादन में प्रसिद्धि प्राप्त करती है। ऐसी पत्नी सलाहकार, दयालु, धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में रुचि रखती है।
सुंदर पत्नी प्राप्ति हेतु श्लोक
पत्नी मनोरमां देहि मनोवृतानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
दुर्गा सप्तशती
अच्छे वर की प्राप्ति के लिए श्लोक
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देहि पतिं में कुरु ते नम:॥
श्रीमद्भागवत्
धाता दाधार पृथिवीं धाता द्यामुत सूर्यम्।
धातास्या अग्रुवे पतिं दधातु प्रतिकाम्यम्॥
पतिलाभ सूक्त

Wednesday, September 23, 2009

कार्तिक शुक्ल एकादशी अथवा देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व

महाकवि कालिदास ने मेघदूत में यक्ष को प्राप्त शाप की अवधि के विषय में लिखा है - जब भगवान विष्णु अपनी शेषशय्या से उठेंगे, तब मेरे शाप का अंत होगा। हे प्रिये! इन चार मासों को तुम आंख मूंदकर व्यतीत कर लो। कालिदास की इन्हीं दो पंक्तियों के आधार पर उज्जैन में कालिदास समारोह प्रतिवर्ष देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन होता है।
मेघदूत के उक्त कथन से यह तो स्पष्ट है कि महाकवि कालिदास के समय अर्थात ईसा पूर्व से ही कार्तिक शुक्ल एकादशी अथवा देव प्रबोधिनी एकादशी का महत्व है। वराहपुराण में लिखा है कि ब्रrा ने कुबेर को एकादशी दी और उसने (कुबेर ने) उसे उस व्यक्ति को दिया जो संयमित रहता है, शुद्ध करता है, केवल वही खाता है, जो पका हुआ नहीं है।
कुबेर प्रसन्न होने पर सब कुछ देते हैं। एक नारी का आख्यान लिखा है - वह अति झगड़ालू थी, अपने प्रेमी के विषय में सोचती थी और इस कारण वह अपने पति द्वारा निंदित हुई और पीटी भी गई। वह क्रोधित होकर बिना भोजन किए रात्रि भर रही। उपवास करने के कारण (जो जानबूझ कर या प्रसन्नतापूर्वक नहीं किया गया था, प्रत्युत क्रोधावेश में किया गया था) वह शुद्ध हो गयी। प्रसन्नतापूर्वक उपवास करने से मनुष्य को गर्हित वासनाओं से निवृत्ति मिलती है।
एकादशी व्रत के सामान्य महत्व के अतिरिक्त देव प्रबोधिनी एकादशी का विशेष सामाजिक महत्व है। वर्षाकाल के चार मासों में भारत के बहुत से भागों में प्राचीन काल में यातायात सुविधाएं नहीं थीं। इसलिए इस अवधि में विवाह निषिद्ध कर दिया गया। इसका एक और कारण यह है कि ये चार महीने खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और कृषि प्रधान देश भारत का किसान निश्चिंत होकर बिना किसी सामाजिक, धार्मिक दायित्व के इन चार महीनों में अपना कृषिकर्म कर सकता था।
इसलिए संभवत: यह कल्पना की गई कि इस अवधि में भगवान विष्णु शयन करते हैं। देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन विशेष उत्सव मनाया जाता है। नए अन्न, मूल तथा फलों से भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है और उन्हें प्रार्थनापूर्वक उठाया जाता है। यद्यपि आज शहरीकरण बढ़ गया है तथा जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग नगरीय जीवन जी रहा है, किंतु भारत के प्रधान व्रत उत्सव, जिनमें देव प्रबोधिनी एकादशी भी शामिल है, आज भी मनाए जाते हैं।
राजबलि पांडे का यह मत है कि वैदिक काल में विष्णु सूर्य के ही एक स्वरूप थे। अत: ये दोनों एकादशियां सूर्य के मेघाच्छन्न और मेघ से मुक्त होने की प्रतीक भी हो सकती हैं। जैसाकि व्रतों के दिन होता है, देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन भी लोग व्रत करते हैं और इन व्रतों के साथ बहुत-सा संयम भी जुड़ा होता है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। नारद पुराण में तो यह विधान किया गया है कि जो मानव आठ वर्ष से अधिक अवस्था का हो और अस्सी वर्ष से कम अवस्था का हो, उसे एकादशी व्रत करना चाहिए। वह यदि मोहवश एकादशी के दिन पका भोजन कर लेता है तो पाप का भागी होता है।
ऋषियों ने सामाजिक स्थिति को देखते हुए संन्यासियों, गृहस्थों, दीक्षित वैष्णवों, सामान्य वैष्णवों (स्मार्तो) के लिए उपवास की अलग-अलग व्यवस्था की है, जिसमें कृष्ण एकादशी को व्रत न करना, केवल पका भोजन न करना या कि अशक्त होने पर केवल रात्रि भोजन की व्यवस्था है। जबकि संन्यासियों के लिए सभी एकादशियों को निराहार, निर्जल व्रत की व्यवस्था है।
आज के संदर्भ में व्यक्ति के अपने कल्याण तथा समाज में उसकी उपादेयता बढ़ाने के लिए मनुष्य को देव प्रबोधिनी एकादशी जैसे महाव्रतों पर संयमित आचरण तथा मितभोजन करके अपने इष्टदेव का स्मरण-पूजन करना ही चाहिए। भले ही वह एकादशी के संबंध में पुराणोक्त व्यवस्था का पालन न कर सके। यह शास्त्रसम्मत विधान है और जो व्यक्ति शास्त्रसम्मत आचरण करता है, वह दीर्घ और सुखी जीवन जीता है।

Monday, September 21, 2009

इष्ट सिद्धि के लिए नवरात्र साधना - पं. पुष्कर राज

हमारी जीवनशक्ति, चेतना शक्ति बीज रूप से शरीर के नीचे के केंद्र यानी मूलाधार चक्र में सुप्त पड़ी है। इस दिव्य योग में मंत्र जप व साधना से वह जाग्रत होकर ऊध्र्वगामी होती है। ऊर्जा के इस ऊध्र्वगमन से शरीर में स्थित षट्नाड़ी चक्रों का वेधन होता है। इससे नाड़ी शोधन होकर स्वरों की पुष्टि और प्राणों की गति सामान्य होती है। साधक इस ऊर्जावान साधना से उत्तम स्वास्थ्य के साथ ही अलौकिक शक्तियों को प्राप्त करता है। यही दिव्य ऊर्जा शरीर में रामजन्म है जिसे पर्व के रूप में रामनवमी को मनाया जाता है।
ऊर्जादायक अनुष्ठान
देवी भागवत, चतुर्वर्गचिंतामणि, कालोदय, मदनरत्न, निर्णयसिंधु आदि ग्रंथों के अनुसार नवरात्र में शक्ति जागृत रहती है। इस समय नवाह्न् पाठ को अश्वमेध यज्ञानुष्ठान के समान फल देने वाला माना गया है। महाभारत में आया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी यह अनुष्ठान किया था। महर्षि व्यास ने राजा जनमेजय को कलिकाल में नवदुर्गा पूजन श्रेष्ठ व सिद्धि प्रदाता बताया था। व्यास ने इन शक्तियों की स्थापना के उद्देश्य से ही मरकडेय पुराण की रचना की। नवरात्र की नौ देवियां हैं जिनकी क्रम से पूजा आराधना करनी चाहिए-
1. शैलपुत्री, 2. ब्रrाचारिणी, 3. चंद्रघंटा, 4. कुष्मांडा, 5. स्कंदमाता, 6. कात्यायिनी, 7. कालरात्रि, 8. महागौरी और 9. सिद्धिदात्री।
सर्वप्रकारेण लाभ
भौतिक और आध्यात्मिक लाभ के लिए गायत्री महामंत्र का लघु अनुष्ठान भी करना चाहिए। रोजाना 27 माला करने से नौ दिन में लघु अनुष्ठान पूरा हो जाता है। रामचरित मानस, हनुमान चालीसा, रामरक्षास्तोत्र, सुदर्शन कवच, दैवीकवच आदि का पारायण भी सिद्धिदायक है। चार प्रकार के मंत्रों में साबर मंत्र सिद्धि के लिए, तांत्रिक मंत्र चमत्कार के लिए, बीजमंत्र ग्रहदोष निवारण व देव प्रसन्नता के लिए और वैदिक मंत्र आत्म शांति व आध्यात्मिक सिद्धि के लिए फलदायी होते हैं। अपने उद्देश्य के अनुसार इनका चयन कर सकते हैं।
अंतिम दिन साधना की पूर्णाहुति हवन के साथ करनी चाहिए। हवन में आहुति स्वयं के हित के साथ ही राष्ट्रहित का चिंतन करते हुए दें। अंत में कुमारीपूजा करनी चाहिए। यह नवरात्र का प्राण है। वस्त्रालंकार, गंध, पुष्प से कुमारियों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक उन्हें भोजन कराना चाहिए। दो साल की बालिका कुमारी, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छह साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शांभवी और नौ साल की दुर्गा कही जाती है।
अनुष्ठान विधि इस बार छह अप्रैल, रविवार को प्रतिपदा तिथि का क्षय हुआ है, फिर भी शास्त्र सम्मति से इस दिन अभिजित् मुहूर्त (12.04 से 12.54 बजे) में घट स्थापना करें। अखंड तेल का दीपक प्रज्वलित करें। स्नान के बाद धुले हुए वस्त्र धारण करें और कंबल के आसन पर ईशान कोण की ओर मुंह करके, सुखासन में बैठकर साधना करें। साधना में रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहनी चाहिए अन्यथा ऊर्जा का ऊध्र्वगमन नहीं होगा।
साधना में माला को कपड़े से ढंककर या गोमुखी में रखकर ही जाप करें अन्यथा जाप का फल नहीं मिलता है। रोजाना दिन में फलाहार या सादा सात्विक भोजन एक बार ही करें। नवरात्र में भूमि शयन करें और ब्रrाचर्य का पूर्ण पालन करे। साधना मौन व्रत के साथ, शांत चित्त से और मन में दृढ़ विश्वास के साथ करें। नवरात्र के अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद घट के जल को तुलसी में सींच दें व अन्य सामग्री को अच्छा चौघड़िया देखकर जल में प्रवाहित करें।

नवरात्र में श्री सरस्वती की उपासना - प्रो. शुकदेव

अपनी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का विकास करने के लिए साधना सबसे कारगर उपाय है। यह साधना नित्य एवं नैमित्तक भेद से दो प्रकार की होती है। जो साधना सदैव एवं निरंतर की जाती है वह नित्य साधना कहलाती है, किंतु सांसारिक लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वे नित्य साधना कर सकें। अत: सांसारिक मनुष्यों के जीवन की समस्या एवं संकटों का समाधान करने के लिए महर्षियों ने नैमित्तक साधना का प्रतिपादन किया है। इस नैमित्तक साधना के महापर्व को ही नवरात्र कहते हैं। नवरात्र के भेद
वैदिक ज्योतिष की गणना के अनुसार प्रतिवर्ष चार नवरात्र होते हैं। इनमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वासंतिक नवरात्र, आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से गुप्त नवरात्र, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र एवं माघ शुक्ल प्रतिपदा से पुन: गुप्त नवरात्र होता है। शाक्त आगमों के अनुसार ये चारों नवरात्र साधकों के लिए अमोघ फलदायी होते हैं।
वासंतिक नवरात्र का महत्व
वैसे तो चारों नवरात्र साधना के महापर्व होते हैं किंतु इनमें चैत्र मास का वासंतिक नवरात्र देवी-देवताओं के दिन के प्रात:काल में पड़ता है। इसलिए इसकी महिमा अपरंपार है। इस वासंतिक नवरात्र में मां सरस्वती की साधना विशेष फलदायी होती है। इस वर्ष वासंतिक नवरात्र 6 अप्रैल से 14 अप्रैल २क्क्८ के बीच पड़ रहा है। (कुछ स्थानों पर 7 अप्रैल से भी नवरात्र मान्य हैं) यह समय मां सरस्वती के उपासकों के लिए कामधेनु या कल्पवृक्ष के समान फलदायी है।
शक्ति एवं उसके रूप
मानव जीवन समस्या एवं संकटों से भरा है। कष्टों के दलदल में फंसे लोगों को मुक्ति पाने के लिए ‘आद्याशक्ति’ की उपासना सबसे विश्वसनीय उपाय है। वह आद्याशक्ति ‘एकमेव’ एवं ‘अद्वितीय’ होते हुए भी अपने साधकों को काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी एवं कमला - इन दशमहाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती है। वही जगतजननी शैलपुत्री, ब्रrाचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री, इन नवदुर्गाओं के रूप में भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करती है। तात्विक दृष्टि से उसके तीन रूप महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हैं।
बौद्धिक विकास के लिए साधना
‘बुद्धिर्यस्य बलतस्य’ जैसे कालजयी सिद्धांतों को निरूपित करने वाले आचार्यो के अनुसार मानवीय शक्तियों में बुद्धि सर्वोपरि है किंतु जब मनुष्य की बुद्धि विचलित या भ्रष्ट हो जाती है, तब वह दयनीय स्थिति में फंस जाता है। यह स्थिति उसके धैर्य या विश्वास के टूटने पर आती है। मानवमात्र के धैर्य एवं विश्वास को जाग्रत कर उसके बौद्धिक विकास के लिए मां सरस्वती की उपासना की परंपरा हमारे यहां प्राचीन काल से प्रचलित है। मां सरस्वती की कृपा से प्राप्त बुद्धि के बल पर मनुष्य विद्या, यश एवं धन सभी कुछ प्राप्त कर लेता है। इसीलिए दुर्गा सप्तशती में बुद्धि को देवी/शक्ति का रूप माना गया है, यथा ‘या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता’, अस्तु।
आज हमारे समाज के सभी वर्गो में तनाव, निराशा, आपाधापी एवं हड़बड़ी का बोलबाला है, जो लोगों के बौद्धिक विचलन का लक्षण है किंतु समाज के अन्य वर्गो की अपेक्षा युवा वर्ग इस समस्या से ज्यादा ग्रस्त है। मां सरस्वती की उपासना इस बीमारी की रामबाण औषधि है। इसलिए इस वासंतिक नवरात्र में छात्रों, बेरोजगार युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को मां सरस्वती की उपासना करनी चाहिए।
इस वासंतिक नवरात्र में छात्रों एवं युवाओं को अपनी परीक्षा, प्रवेश परीक्षा, प्रतियोगिता परीक्षा, इंटरव्यू, काउंसलिंग एवं ग्रुप डिस्कशन आदि में सफलता के लिए जिन मंत्रों का अनुष्ठान करना चाहिए, वे इस प्रकार हैं :- परीक्षा, प्रवेश परीक्षा एवं प्रतियोगिता
परीक्षा के लिए
‘ú हृीं ऐं हृीं ú सरस्वत्यै नम:’
शोधछात्र एवं प्रोफेशनल कोर्सो के छात्रों के लिए
ú ऐं सरस्वत्यै सुबुद्धिं सिद्धिं कुरु स्वाहा’
इंटरव्यू, काउंसलिंग एवं ग्रुप डिस्कशन आदि के लिए
‘वद वद वाग्वादिनि स्वाहा’
माध्यमिक कक्षाओं के सामान्य छात्रों के लिए ‘ú ऐं सरस्वत्यै नम:’
अनुष्ठान विधिनित्य नियम से निवृत्त होकर सफेद धुले वस्त्र पहनें। आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठकर माथे पर चंदन या तिलक लगाएं। अपने सामने श्री सरस्वती का यंत्र/मूर्ति/चित्र स्थापित कर उसका षोडशोपचार या पंचोपचार (गंध, अक्षत, पुष्प, धूप एवं दीप) से पूजन कर मां सरस्वती का ध्यान करते हुए एकाग्रतापूर्वक मंत्र का जप करें।
अनुष्ठान के दिनों में एक समय फलाहार या सात्विक आहार लेना चाहिए। जप के बाद शारदा स्तोत्र, सिद्ध सारस्वत स्तोत्र या श्री सरस्वती सहस्त्रनाम आदि का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। वासंतिक नवरात्र में श्रद्धापूर्वक मां सरस्वती का पूजन, मनोयोगपूर्वक मंत्र का जप और आस्थापूर्वक पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

Sunday, September 20, 2009

बच्चे सुधारें आपके सितारे

बच्चे परिवार और राष्ट्र का भविष्य और उसका मुख्य आधार हैं। उन्हीं के कारण जीवन गुलजार होता है। वे भविष्य के राष्ट्र के निर्माता हैं। देश व विश्व की अमूल्य संपदा हैं। ग्रह हमारे जीवन व्यवहार से बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। बच्चों के प्रति हमारे अच्छे एवं बुरे व्यवहार का प्रभाव भी हमारे ग्रहों और उनसे प्राप्त होने वाले परिणामों पर पड़ता है। ज्योतिषीय दृष्टि में बाल रक्षा दिवस का अपना विशिष्ट महत्व है।
काल पुरुष की कुंडली में पांचवां घर संतान का माना गया है। सूर्य आत्मा और पिता का कारक ग्रह है। बच्चे, जिन्हें आत्मज कहा जाता है, उनके जोखिम भरे श्रम करने से सूर्य ग्रह कुपित हो उठता है। अत: आत्मा की प्रसन्नता हेतु बालकों की सुरक्षा व विकास कर उनका संरक्षण करना चाहिए।
जब हम बच्चों पर अन्याय करते हैं तो हमारी आत्मा (सूर्य) पर बोझ पड़ता है और न्यायाधीश गुरु नाराज होते हैं। गुरु भाग्य का ग्रह है, इसलिए भाग्य खराब होता है। बच्चों से श्रम करवाने पर शनि, गुरु व सूर्य की क्रूरता भी झेलनी पड़ सकती है।
बच्चों से अनावश्यक कार्य करवाने से शनि, जो आध्यात्म के भी स्वामी हैं, वे दर-दर भटकाते हैं। बच्चों को कष्ट पहुंचाने से भगवान रुष्ट हो जाते हैं। बच्चों को संरक्षण व सहयोग देने से भगवान के साथ कुण्डली के कई भावों के ग्रह भी प्रसन्न होते हैं।
सूर्य जो आत्मा व पिता का कारक ग्रह है, गुरु जो संतान की इच्छा पूरी करता है, वह और शनि बच्चों के संरक्षण व सहयोग से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
बाल सुरक्षा दिवस के अवसर पर बच्चों की आर्थिक, शारीरिक व नैतिक मदद कर उनकी रक्षा में योगदान दें। आत्म तत्व सूर्य, संतान तत्व गुरु तथा इच्छापूर्ति कारक शनि प्रसन्न हों तो अपना व राष्ट्र का भविष्य उज्‍जवल बन सकेगा।

Tuesday, September 1, 2009

एक परिचय

नमस्कार!
ये ब्लॉग समर्पित है हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी को। इस ब्लॉग में हम पोस्ट करेंगे ज्योतिष, वास्तु और धर्म से सम्बंधित रचनायें।

इस ब्लॉग का उद्देश्य है:
(१) हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना
(२) ज्योतिष-वास्तु एवं धर्म के बारे में लोगों को जागरूक करना ।
(३) ज्योतिष को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करना ।

आशा है आपको हमारा ये प्रयास पसंद आएगा।


धन्यवाद् सहित,
प्रबंधक