Sunday, December 6, 2009

पूजा हमें रिचार्ज करती है

हजारों वर्षो से जन्म और ईश्वर को लेकर जो स्वरूप और विचार सामने आया है उसमें मतभेद, विवाद, अस्वीकृ ति बनी ही रही है। कई लोगों का मानना है कि ईश्वर की सत्ता को सवीकार करने का अर्थ है स्वयं के कर्मयोगी स्वरूप को नकारना। अनेक पुरूषार्थी लोग यह कहते हैं कि जब हम ही करने वाले हैं, हम ही भोगने वाले हैं तो भगवान की क्या जरूरत, उस परम सत्ता के चक्कर में तो हम अपनी सत्ता से भी हाथ धो बैठेंगे।

दरअसल में ऐसे विचार इसलिए उठते हैं कि हम उस परम सत्ता से ठीक से जुड़ नहीं पाते। ईश्वर से जुड़ने के लिए सबसे सरल माध्यम है पूजा। कर्मकांड में जब भावना अपना महत्व बढ़ाने लगे तो वह पूजा का सही स्वरूप है। जीवन प्रबंधन का चौथे सूत्र पूजा से मनुष्य में चार गुण स्थापित होंगे। अनुशासन, परिश्रम, धर्य और दूरदर्शिता। इसीलिए न सिर्फ हिंदुओं ने बल्कि सभी धर्मो ने पूजा की एक निश्चित ड्रिल बनाई है। कब, क्या, कितना करना इसमें एक अनुशासन छिपा है।

आज केवल हिंदू धर्म की बात करें तो सबसे पहले सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। सूर्य को जल चढ़ाना धार्मिक कर्मकांड ही नहीं है असल में प्रकृति के तेज को प्रतिदिन अपने भीतर आमंत्रित करने की क्रिया है। तुलसी को प्रतिदिन जल चढ़ाया जाए। तुलसी प्रकृति का वह पौधा है जिसमें शांति के तत्व बसे हैं, यह वनस्पति विज्ञान का घोषित तथ्य है। जिनके आंगन में तुलसी है समझ लें उन्होंने शांति को आमंत्रण दे रखा है। गाय को गोग्रास देने का अर्थ है एक निश्छल आत्मा को अपने भीतर उतारना।

जीवविज्ञान का यह मान्य तथ्य है कि गाय जैसी शुद्ध आत्मा और किसी पशु की नहीं है। पंचदेव पूजा यह अपने आप में पृथक विषय है जिसका विस्तार इसी स्तंभर में फिर कभी। लेकिन देवपूजा का अर्थ है अपने पुरूषार्थ के साथ किसी और परमशक्ति पर भरोसा करना जो बिल्कुल भी अनुचित नहीं है।

नित्यपूजा का अगला क्रम है किसी न किसी ग्रथ का पाठ प्रतिदिन किया जाए। शुभ साहित्य के शब्द आपके चिंतन को सकारात्मक और सृजनशील बनाएंगे। इसके बाद जीवित माता-पिता, वृद्धजन तथा दिवंगत पितृजनों को प्रतिदिन प्रणाम करने का अर्थ है अपने भीतर की ऊर्जा को उपर उठाना। बड़े-बूढ़े हमारे इस व्यक्तित्वरूपी वृक्ष के ये बीज हैं और कोई भी पेड़ कभी बीज से बड़ा नहीं होता। नित्यपूजा की अंतिम गतिविधि है प्रतिदिन किसी भी मंदिर जाया जाए। मंदिरों को केवल ईंट और गारे का ढांचा न माना जाए ये उर्जा के केंद्र हैं। हमारी दैहिक ऊर्जा यहां की प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमाओं से रिचार्ज होगी ही।

नित्य पूजा का यह अनुशासन, परिश्रम हमारे भीतर उस धर्य और दूरदर्शिता को बढ़ता है जिसकी जरूरत आज हर क्षेत्र में है ही और यदि किसी दिन ऐसा न भी कर पाएं तो एक काम जरूर करें जरा मुस्कुराएं......।

पं. विजयशंकर मेहता

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