Sunday, October 11, 2009

समर्पण एवं भक्ति का मास - कार्तिक (पं. प्रहलाद कुमार)

का र्तिक मास भगवान विष्णु के प्रति हमारे समर्पण, निष्ठा एवं भक्ति का मास है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि -
मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन:। र्तीथ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ॥
अर्थात - भगवान विष्णु के सदृश्य ही कार्तिक मास श्रेष्ठ है। इस मास का महत्व पद्म पुराण, स्कन्द पुराण एवं अन्य पुराणों में विस्तार से लिखा गया है। इस माह में प्राय: सूर्य तुला राशि में रहते है और शीतकाल रहता है। अत: इस माह में पुरुष और स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ब्रrा मुहूर्त में उठकर जलाशय, नदी, तालाब आदि में स्नान कर भगवान राधा दमोदर की पूजा अर्चना करते है। शास्त्रों में कार्तिक मास के व्रत को मोक्ष प्रदान करने वाला मास माना गया है। इस समय के किए गए व्रत उपवास से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति बताई गई है।
कार्तिक मास के कर्म
व्रत एवं स्नान कार्तिक मास का स्नान व्रत करने वाले लोगों को अनेक प्रकार से संयम, नियम का पालन करना पड़ता है। संपूर्ण माह में व्रत और उपवास रखकर राधा दमोदर की पूजा की जाती है। इसमें व्रतोपवास करने से रोगों का विनाश होता है और प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती है। सद्बुद्धि प्राप्त करके मनुष्य दीघायरु एवं लक्ष्मी प्राप्त करता है।
दीपदान कार्तिक मास में व्रत उपवास रखने वाले साधक को प्रतिदिन दीप का दान करना चाहिए। तुलसी सेवा तुलसी का पौधा लगाना, तुलसी को जल सिंचन और तुलसी का सेवना निर्दिष्ट है। आयुर्वेद शास्त्र में भी तुलसी को एंटीबायटिक कहा गया है और इसके द्वारा पर्यावरण की शुद्धि होती है। भगवान को तुलसी पत्र और मंजरी अर्पण करने के साथ स्वयं भी तुलसी सेवन करने से व्यक्ति रोगों से मुक्ति प्राप्त करता है। भगवान विष्णु को तुलसी अति प्रिय है।
भूमि पर शयन शास्त्र में उल्लेख है कि कार्तिक मास का व्रत करने वाले व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। इसके कारण एक ओर जहां मनुष्य शरीर में पृथ्वी तत्व की वृद्धि होती है वहीं भगवान के प्रति आस्थावान होकर व्यक्ति भय से मुक्त होता है।
ब्रrाचर्य का पालन तथा आहार पर नियंत्रण कार्तिक मास के नियमों के अंर्तगत ब्रrाचर्य का पालन करना नितांत आवश्यक है। साथ ही उड़द, मूंग, चना, मटर आदि द्वि-दल, दलहन एवं तेल आदि का परित्याग करना निर्देशित है। भगवान नाम का संकीर्तन करना और भगवान विष्णु की कथाओं का श्रवण करना श्रीमद्भगवदगीता, भागवत पुराण आदि का अध्ययन या श्रवण करना सत्य, अहिंसा पर चलकर धर्माचरण करना भी निर्देशित है। इस माह में पीपल, तुलसी, आंवला, गौ-पूजा, स्नान और गोवर्धन पूजा आदि का प्रावधान किया गया है।
जिसके कारण व्यक्ति इस लोक में धन ऐश्वर्य, बुद्धि, बल और यश प्राप्त करके अंत में मोक्ष प्राप्त करें। कार्तिक मास में काशी में निवास करके गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि व्रती को गंगा, विष्णु, शिव तथा सूर्य का स्मरण करके जल में प्रवेश कर नाभि पर्यंत जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। आंवला और काला तिल शरीर पर मलना चाहिए किंतु संन्यासियों को तुलसी के पौधें की जड़ में लगी हुई मृत्तिका लगाकार स्नान करना चाहिए। व्रत की समाप्ति पर पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करके बांस की टोकरी में अन्न और कांसे के पात्र में पुएं रखकर वस्त्र, स्वर्ण आदि का दान करना चाहिए।
कार्तिक मास के महत्वपूर्ण व्रतोत्सव
करवा चौथ, अहोई अष्टमी, गौवत्स द्वादशी, धन तेरस, गोत्रिरात्र व्रत, नरक चतरुदशी, दीपावली, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, यमद्वितीया, सूर्य षष्ठी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थापनी एकादशी, तुलसी विवाह, बैंकुंठ चतुर्दशी, विष्णु पंचक व्रत तथा कार्तिक पूर्णिमा। स्पष्ट है कि संपूर्ण कार्तिक मास में अनके महत्वपूर्ण व्रत एवं त्योहार संपन्न होते हैं। कार्तिक स्नान करने वाले व्रर्ती को प्रत्येक व्रत दिवस पर शास्त्र निर्धारित पद्धतियों के साथ व्रत का अनुशीलन करना चाहिये, जिससे व्रत के सहज फल प्राप्त होते हैं।

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