Tuesday, January 12, 2010

नाम करेगा रोशन जग में राजदुलारा

प्रतिस्पर्धा के दौर में हर माता-पिता का सपना है कि उनकी संतान उच्च शिक्षा प्राप्त कर उनका नाम रोशन करे। परीक्षाफल आने के बाद उचित विषयों का चयन करना माता-पिता तथा बच्चों के सामने एक चुनौती होती है। इसके लिए वे शिक्षा विशेषज्ञ तथा ज्योतिषियों से परामर्श भी लेते हैं क्योंकि उचित विषयों का चयन ही बच्चे के भविष्य का निर्णायक होता है।

जन्मकुंडली में शिक्षा प्राप्ति के लिए कारक भाव, द्वितीय भाव व तृतीय भाव - प्रारंभिक शिक्षा, चतुर्थ व पंचम भाव - स्कूल व कालेज शिक्षा तथा पंचम से पंचम नवम भाव जातक की उच्च शिक्षा को बतलाता है। पंचम भाव जातक के मस्तिष्क विकास को भी दर्शाता है। अत: पंचम भाव का बलवान होना जातक की शिक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

पंचम से पंचम, नवम भाव जातक के भाग्य का भाव भी है, यदि नवम भाव बलवान है और उसका संबंध चतुर्थ, पंचम व लग्न से हो जाए तो जातक प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिभावान होता है। प्रतिभा के लिए पंचम, नवम, पंचमेश व नवमेश का बलवान होना आवश्यक है। इसी प्रकार विद्या प्राप्ति के कारक ग्रह गुरु -बुद्धि, विवेक, बुध-स्मरण शक्ति तथा चंद्रमा - मन, एकाग्रता के लिए है।

चंद्रमा का पक्ष बलवान होना, शुभ स्थान पर स्थित होना तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट होना एकाग्रता के लिए अति आवश्यक है। दूसरी आवश्यकता है स्मरण शक्ति की। स्मरण शक्ति के लिए बुध की केंद्र में स्थिति तथा शुभ ग्रहों से युति व दृष्टि होनी चाहिए। तीसरी आवश्यकता है बुद्धि व विवेक की। इसके कारक बृहस्पति के बलवान रहने पर जातक उच्च शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता रखता है।

बुध, गुरु, शुक्र यदि केंद्र और त्रिकोण भाव में रहकर परस्पर दृष्टि, युति करे तथा गुरु बलवान हो तो सरस्वती योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धिमान, कार्यकुशल व श्रेष्ठ विद्वान बनाता है। बुध व सूर्य की केंद्र या त्रिकोण में युति, बुध अस्त नहीं होने चाहिए, इससे बना बुध आदित्य योग जातक की प्रखर बुद्धि व विद्या के लिए उत्तम है। यदि पंचमेश तथा षष्ठेश एक दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में तथा शुभ भाव में स्थित हो तो शंख योग का निर्माण होता है जो जातक को उत्तम विद्या प्रदान करता है।

चंद्र से त्रिकोण भाव में गुरु, बुध से त्रिकोण भाव में मंगल तथा बुध से लाभ भाव में गुरु हो तो शारदा लक्ष्मी योग बनता है। यह योग जातक को बुद्धि और विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती तथा धन-वैभव की स्वामिनी लक्ष्मी देवी दोनों की कृपा का पात्र बनाता है।

गुरु, द्वितीय या पंचम भाव में बुध या शुक्र की राशि में बैठा हो और बुध या गुरु से दृष्टि या युति संबंध करें तो कलानिधि योग का निर्माण होता है। यह योग जातक को धनी व उत्तम कलाकार बनाता है। शिक्षा के विभिन्न विषयों के कारकत्व अलग-अलग ग्रहों को प्राप्त है।

सूर्य
अध्यात्म, दार्शनिक शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, नेत्र रोग, कुष्ठ रोग, शल्य चिकित्सा आदि से संबंधित विषयों का कारक है।
चंद्रमा
औषधि, मनोविज्ञान, जलीय पदार्थ, नेवी आदि।
मंगल

शल्य चिकित्सा, कृषि, भवन निर्माण, यांत्रिक शिक्षा, खेलकूद, अपराध विज्ञान आदि।
बुध
तर्क-वितर्क, शिल्प, व्यापार कौशल, शिक्षक, बहीखाते लिखना आदि।
बृहस्पति
साहित्य, कानूनी सलाहकार, वित्त व्यवस्था, अध्यापन, धार्मिक कार्य, अर्थशास्त्र, संतान कारक होने के कारण बालरोग विशेषज्ञ।
शुक्र
संगीत, नाटक, अभिनय, रूप सज्जा, नृत्य, कला आदि।
शनि
इतिहास, पुरातत्व, राजनीति, मशीन संबंधी ज्ञान को दर्शाता है।
राहू
इलेक्ट्रानिक्स, अनुसंधान संक्रमणरोही आदि।

मंगल, शनि, राहू, केतु का द्वितीय, चतुर्थ या पंचम भाव से दृष्टि युति संबंध तकनीकी क्षेत्र में शिक्षा दिलवाता है। पंचम और नवम भाव का परस्पर संबंध अध्यात्म व दर्शनशास्त्र में रुचि देता है क्योंकि पंचम भाव देव भक्ति व मंत्र है तथा नवम भाव धार्मिक आस्था, सत्यनिष्ठा तथा प्रारब्ध दर्शाता है।

बुध या गुरु का संबंध द्वितीय, चतुर्थ, पंचम भाव या इनके स्वामी ग्रह से हो तो जातक वाणिज्य व्यापार की शिक्षा पाता है। चंद्रमा या शुक्र यदि 2, 4, 5 भाव या भावेश से दृष्टि युति करे तो जातक कला संबंधी विषयों में रुचि लेता है। पंचम भाव में स्थित गुरु कानूनी शिक्षा दिलवाता है।

अष्टमेश और तृतीयेश की युति हो तथा दोनों बलवान हो तो ऐसा जातक अनुसंधान व शोधपरक अध्ययन में रुचि लेता है। द्वितीय भाव या द्वितीयेश से बुध, गुरु, शुक्र या इनमें से किन्हीं दो का दृष्टि युति संबंध जातक को वकील या न्यायाधीश बनाता है।

द्वितीय भाव या द्वितीयेश पर सूर्य, राहु, शनि और बुध में किन्हीं तीन ग्रहों का दृष्टि युति प्रभाव डाक्टर, वैद्य अथवा औषधि विज्ञान से धन व यश देता है। तृतीय व दशम भाव का शुक्र से संबंध बहुधा कम्प्यूटर प्रोग्रामर बनाता है।


कविता चैतन्य

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