Saturday, November 21, 2009

कुंडली से जानें विद्या-कैरियर के योग - डॉ. रामनरेश त्रिपाठी

ग्रह अध्ययन. बालक हो अथवा बालिका, प्रत्येक जातक का भविष्य ‘आधान’ अर्थात् गर्भधारण के साथ ही सुनिश्चित हो जाता है। उस समय की कुंडली ‘आधान’ कुंडली कहलाती है। जन्म के समय जो ग्रह-नक्षत्र होते है, उस समय की कुंडली ‘जन्म कुंडली’ कही जाती है। इन कुंडलियों के आधार पर ही प्रत्येक जातक की ‘मेधा’ (बुद्धि) सुनिश्चित होती है। माता-पिता तथा अनेक पीढ़ियों के ‘जींस’ भी जातक के भविष्य के साथ जुड़े होते हैं। ‘जातक’ के रक्त तथा उसकी संरचना में इनका प्रभाव देखने को मिलता है। बालक-बालिका के पूर्व जन्म के कर्म, संस्कार, जिस घर में उसका जन्म हुआ है, उसके कुल तथा वर्तमान परिवेश यानी ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव से बुद्धि, आयु, कर्म आदि का निर्धारण होता है।
इसी आधार पर हमें स्कूल-कॉलेजों की परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों के भविष्य का भी अध्ययन करना चाहिए। बच्चों की पढ़ाई में स्थान विशेष का महत्व अधिक होता है। यदि उनका पढ़ाई का कक्ष अध्ययन की दृष्टि से अच्छा नहीं है, उसमें ‘वास्तुदोष’ है तो निश्चय ही इसका उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ेगा। विद्यार्थियों को ऐसे दोषों से बचना चाहिए। उन्हें पूर्व की ओर सिर करके सोना चाहिए, इससे उन्हें विद्या प्राप्त होगी।
प्राक शिर: शयने विद्याद्धन मायुंचदक्षिणो।
पश्चिमे प्रबलाचिंता हानिमृत्युरथोत्तरे।।

दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि, पश्चिम की ओर सिर करके सोना चिन्ताकारक तथा उत्तर में सिर करके सोने से हानि तथा आयु क्षीण होती है, विद्यार्थी इस बात का ध्यान रखें। परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी को पूर्व अथवा ईशान कोण की ओर मुख करके मंजन अथवा दातून करना चाहिए इससे उनमें धैर्य बढ़ेगा एवं शरीर निरोग रहेगा। कामनाओं की सिद्धि होगी।
प्राड्मुखस्य धृति:सौख्यं शरीरारोग्य मेवचं..
पूवरेत्तरें तु दिग्भागें सर्वान्कामान् वाप्नुयात्।।

इसी प्रकार पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से बल और बुद्धि बढ़ेगी। अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा से भयभीत होते हैं। जिन छात्र-छात्राओं का चंद्रमा कमजोर है व पाप ग्रहों के साथ अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि से युक्त है, उन्हें मानसिक दुर्बलता के कारण परीक्षा से भय लगने लगता है। ऐसे विद्यार्थियों को चाहिए कि वे शिव मंदिर में दर्शन कर परीक्षा में जाएं। बेल पत्र, दुग्ध आदि से पूजन कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा। वे मोती भी धारण कर सकते हैं। चौथा घर मेधा तथा पंचम विद्या के आत्मसात करने का है। इन दोनों घरों में किसी पाप ग्रह की दृष्टि है तो उसे दूर कर लेना चाहिए।
वार का दोष निवारण
वार के दोष को दूर करने के लिए सोम को दर्पण में मुख देखना और मंगलवार को धनिया को प्रयोग कर जाना चाहिए। बुध को मीठा, बृहस्पति को राई, शनि को घी आदि का सेवन कार्य में सिद्धि प्रदान करते हैं। परीक्षा में जाने से पूर्व माता-पिता, गुरु का पैर छूकर जाना बल-बुद्धि प्रदान करने में सहायक होता है। प्रात:काल उठकर स्वयं की हथेली का दर्शन करना भी शुभ है। परीक्षा में जाते समय इष्ट देवता को चढ़े हुए फूल को अपनी जेब में रखें, इससे आपके मन का विश्वास बना रहेगा और घबराहट भी नहीं होगी। आप वार की दृष्टि से अपने कपड़े भी पहन सकते हैं। वार का संबंध ग्रहों से है। रविवार को गुलाबी, सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरे, गुरुवार को पीले, शुक्रवार को आसमानी व चमकदार सफेद तथा शनिवार को काले वस्त्र धारण कर विद्यार्थी परीक्षा देने जा सकते हैं।
अध्ययन में मुहूर्त का प्रभाव
किसी भी शुभ कार्य में मुहूर्त का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। प्रात:काल चार से छह बजे को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। इस काल में अध्ययन करने से विद्या अर्जन की क्षमता में वृद्धि होती है और वाणी में प्रखरता आती है। बुद्धि के स्वामी गणोश हैं जबकि बुध वाणी का ग्रह है। वाक परीक्षा के लिए जाएं तो गणोश जी का ध्यान करें। राहु इंजीनियरिंग की दिशा में ले जाता है। शुक्र कॉमर्स, व्यावसायिक शिक्षा तथा कला से जोड़ता है। सूर्य प्रशासन, मंगल सेना व पुलिस विभाग से जोड़ता है। इसी तरह गुरु उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायक होता है। शनि व बुध, तकनीकी क्षेत्र व कंप्यूटर आदि से, चंद्रमा रसायन व वनस्पति तथा मंगल व शनि मेडिकल क्षेत्र से संबंधित हैं। विद्यार्थियों को ग्रहों के अनुकू ल ही फल प्राप्त होता है। फल की प्राप्ति नवें घर से मिलती है। परीक्षा में जाते समय वार अर्थात दिन का ध्यान रखें, यदि दिन अच्छा नहीं है तो दोष का परिहार कर दही, पेड़ा का सेवन शुभ माना गया है।

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