Saturday, November 21, 2009

संकल्प क्यों करना चाहिए?

प्रत्येक धर्मानुष्ठान की शुरुआत संकल्प से होती है। सभी कामनाएं संकल्प मूलक ही हैं। सभी यज्ञ संकल्प के अनंतर ही संपन्न होते हैं।
मानव जीवन पर भावनाओं का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। संकल्प भी अनुष्ठेय कर्म की साधना के प्रति साधक की भावना का मूर्त रूप है। संकल्प लेना जोखिम का काम इसलिए है क्योंकि यदि संकल्प लेकर आपने उसे पूरा नहीं किया तो गलत माना जाता है। हमारे यहां शपथ उठाना बहुत जोखिमभरा काम समझा जाता है।
इसलिए उसे प्राण पर आ बनने की दशा में ही शपथ उठाने को विवश होना पड़ता है। यदि किसी कारणवश एक बार शपथ उठा ली तो फिर रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई के आदर्शानुसार अवसर पड़ने पर स्वयं हंसते-हंसते प्राण पर खेल गए महाराजा दशरथ इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। लेकिन आज लोगों ने शपथ ग्रहण को भी एक रस्मी कार्यवाही मात्र समझ रखा है। देश धर्म और अपने मतदाताओं के प्रति वफादारी की शपथ उठाने वाले ये राष्ट्रीय सांसदों के सदस्य जनमत की अवहेलना कर जनविरोधी कानून की सृष्टि करने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाते।
संकल्प प्रथा का ही विधान किया गया है। शपथ उठाना एक अपमान सूचक प्रथा है। उसे वही व्यक्ति उठाता है जिसकी ईमानदारी में सर्वसाधारण को संदेह हो और वह इस कठिनतम व्यापार द्वारा विश्वास दिलाना चाहता हो। संकल्प प्रथा, शपथ प्रणाली के सर्वथा विपरीत वह अनुष्ठान है कि जिसमें साधक अमुक अनुष्ठेय कर्म के प्रति अपनी दृढ़निष्ठा और आत्मविश्वास की भावना से ताजा होकर कत्र्तव्य पालन में संलग्न हो जाता है। इसके साथ ही वह अनुष्ठान पवित्रता के शीर्ष पर पहुंचकर सामान्य जीवन में हमें पराकाष्ठा तक पहुंचने में मदद भी करता है।
हमारे पूर्वजों ने आज से करोड़ों वर्ष पूर्व सांस्कृतिक जीवन की जिस परंपरा को प्रारंभ किया वह आज भी अक्षुण्ण है। सभी लोग आदरसहित संकल्प के महत्व को जानते समझते और उसकी वंदना भी करते हैं। संध्या वंदन आदि सभी धार्मिक कृत्यों के समय संकल्प को बोलकर हम उसी परंपरा का निर्वाह करते हैं। संध्या वंदन संकल्प का ऐसा अनुष्ठान है जिसकी ऊंचाइयां हमें छोटे-छोटे कर्मो में सदियों से दिखाई देती रही है। इसकी महत्ता से तो विद्वानों के साथ मुनिजन भी मानते आए हैं। वास्तव में ऋषियों और मुनियों ने ही भारतीय समाज में संकल्प के लालित्य और महत्ता से परिचित करवाया है। यदि वे इसकी महत्ता को सदियों पहले जाग्रत नहीं करवाते तो हम भला कैसे संकल्प को अनुष्ठान के रूप में निभा पाते।
संकल्प में जल ग्रहण क्यों?
संकल्प करने का विधान इसलिए है क्योंकि जल में वरुण देव का वास है और उसके साक्ष्य में जो प्रतिज्ञा की जाएगी उसका निर्वाह न करने पर वरुण देव प्रतिज्ञा पालन न करने वाले को ही दंड देंगे। आस्तिक जनों को अपने सभी धार्मिक अनुष्ठान जल को स्पर्श करके ही संकल्प से ही आरंभ करना चाहिए। इससे संकल्प के निमित्त प्रथम ही जल की विद्यमानता हो जाने पर आगे का समस्त क्रिया-कलाप सुचारू रूप से चलता रहता है। यही संकल्प का महत्व है जिसे जानना और समझना जरूरी है।

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