Saturday, November 21, 2009

गुड़ी पड़वा और नवसंवत्सर

हिंदू पंचांग के बारह महीनों के क्रम में पहले चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्षभर की सभी तिथियों में इसलिए सबसे अधिक महत्व रखती है क्योंकि मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर ब्रम्हा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की। इस तिथि को प्रथम पद अर्थात स्थान मिला, इसीलिए इसे प्रतिपदा कहा गया है।
जब ब्रrा ने सृष्टि का प्रारंभ किया उस समय इसे प्रवरा तिथि सूचित किया था। जिसका अर्थ है सर्वोत्तम। इस अर्थ में यह वर्ष का सर्वोत्तम दिन है जो सिखाता है कि हम अपने जीवन में, सभी कामों में, सभी क्षेत्रों में जो भी कर्म करें, हमारा स्थान और हमारे कर्म लोक कल्याण की दृष्टि से प्रथम पद अर्थात श्रेष्ठ स्थान पर रखे जाने योग्य हो।
नवसंवत्सर क्यों : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नवसंवत्सर प्रतिपदा कहते हैं। कारण इस दिन से नए संवत्सर का प्रारंभ होता है। संवत्सर उसे कहते हैं जिसमें मासादि भलीभांति निवास करते रहे। इसका दूसरा अर्थ है बारह महीने का समय विशेष। श्रुति भी यही कहती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संवत्सर के सौर, सावन, चांद्र बार्हस्पत्य और नाक्षत्र ये पांच भेद हैं परंतु धर्म, कर्म और लोक व्यवहार में चांद्र संवत्सर की ही प्रवृति विख्यात है, जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
सृजन, जीवन और सत्य : ब्राम्हपुराण, स्मृतिकौस्तुभ और भविष्योत्तर पुराण में नवसंवत्सर तथा प्रतिपदा के संदर्भ मिलते हैं। इसके अनुसार ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि का आरंभ किया और इसी दिन विष्णु के मत्स्यावतार तथा सत्य युग का शुभारंभ भी हुआ। जरा विचार करें इस तिथि पर इन तीन संदर्भो सृष्टि आरंभ, मत्स्यावतार और सत्य युग के प्रतीक क्यों गढ़े गए? सृष्टि के आरंभ का अर्थ है सृजन का आरंभ।
प्रतीक है हम सृजन ऐसा करें जो सुखद, मनोहारी और प्रेरक हो। सृष्टि से बेहतर इसका दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। मत्स्यावतार जीवन के प्रारंभ का प्रतीक है। हमारे शास्त्रों में उल्लेखित भगवान विष्णु के दस अवतार क्रमश: मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध और कल्कि की कथा मानव जीवन के विकास की कथा है। जो संकेत करती है कि जीवन का प्रारंभ जल से हुआ है। जल का सुपरिचित जीव मछली है अत: मछली भगवान का पहला स्वरूप या अवतार माना गया। नववर्ष प्रतिपदा को मत्स्यावतार हुआ है जो इन्हीं संदर्भो को पुष्ट करता है। सत्य युग जीवन में सत्यव्रत के धारण का संकेत है।
वसंत का प्रभाव : किसी समय वर्ष का प्रारंभ मार्गशीर्ष मास से माना जाता था। फिर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाने लगा। शायद इसीलिए कि इसी काल में वसंत ऋतु का राज होता है। प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम पर होती है, फाल्गुन के रंग और फूलों की सुगंध के बीच वातावरण तन-मन जीवन को प्रफुल्लित और उत्साहित रखता है। किसी नए काम को प्रारंभ करने के लिए उत्साह की आवश्यकता होती है, इसीलिए शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आगामी मासों में सद्कर्मो के संकल्प की तिथि के रूप में प्रतिष्ठित की गई।
लोकाचार व संदेश : शास्त्रों में नववर्ष प्रतिपदा मनाने के लोकाचारों का विस्तार से वर्णन है। निर्देश है इस दिन निवास स्थानों को सुंदर पताकाओं से सुशोभित करें और अंजुरी में जल लेकर भावी कर्मो के प्रति संकल्पित हों। नववर्ष प्रतिपदा एक असाधारण तिथि है जिसके धार्मिक संदर्भो को हम ग्रहण तो करें लेकिन उनके प्रतीकों के अर्थ के साथ।

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